यादों में बचपन, जो मुझमें अब भी साँस लेता है...!

यादों में बचपन, जो मुझमें अब भी साँस लेता है...!

प्रकाश मनु

वरिष्ठ कवि-कथाकार। ‘यह जो दिल्ली है’, ‘कथा सर्कस’ और ‘पापा के जाने के बाद’ उपन्यास चर्चित हुए। ‘एक और प्रार्थना’, ‘छूटता हुआ घर’ कविता-संग्रह तथा ‘अंकल को विश नहीं करोगे’, ‘अरुंधती उदास है’ समेत ग्यारह कहानी-संग्रह। शिखर साहित्यकारों से मुलाकात, संस्मरणों और आलोचना की कई पुस्तकें। साहित्य अकादमी के पहले बाल-साहित्य पुरस्कार, उ.प्र. हिंदी संस्थान के ‘बाल-साहित्य भारती’ पुरस्कार तथा हिंदी अकादमी के ‘साहित्यकार सम्मान’ से सम्मानित।

मेरी कहानियों में नंदू भैया अकसर आते हैं। खूब गोल-मटोल से नटखट और शरारती नंदू भैया। जिंदगी से लबालब। खाने-पीने, खूब बढि़या पहनने-ओढ़ने और हर नई चीज के शौकीन। थोड़ा सा रोब, मगर खासी मस्ती भी। ये नंदू भैया मेरे बड़े भाई हैं, श्याम भैया। मुझसे ढाई-तीन बरस बड़े श्याम भैया बचपन में मेरे हीरो थे, जिनसे चुपके-चुपके बहुत कुछ सीखा। श्याम भैया पास हों तो मुझे लगता था, सारी दुनिया मिलकर भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। अकेले श्याम भैया ही सब पर भारी पड़ेंगे। उनके होते दुनिया का कोई दुःख-परेशानी मेरे अंदर झाँक भी नहीं सकती।

और यही नहीं, मुझे आसपास की जिंदगी से मजबूत डोर से जोड़नेवाले भी श्याम भाईसाहब ही थे, जिन्होंने मुझ घरघुसरे और एकांतवासी के लिए बाहरी दुनिया की खिड़कियाँ और गवाक्ष खोले तथा मुझे जाने-अनजाने यह सीख दी कि दुनिया बड़ी सुंदर और खूबसूरत शै है और इसका आनंद लेने के लिए थोड़ी सी आवारगी तो जरूरी है। और उसका सबसे बढि़या ढंग है कि घर से निकल पड़ो। घर से निकलोगे तो तमाम दोस्त मिलेंगे, उनके साथ मस्ती, बतकही और घुमक्कड़ी करते जिंदगी अपने तमाम छिपे हुए पन्ने खोलती जाएगी।...उनका आनंद लोगे तो दुनिया तुम्हारे लिए इकसार नहीं, बल्कि भाँति-भाँति के चेहरोंवाली एक खूबसूरत और बहुरंगी दुनिया होगी, जिसका आकर्षण हर पल बढ़ता ही जाएगा। और यही सच मानी में, जिंदगी जीना भी है। जिंदगी जीना है तो अपने आसपास की हर छोटी-बड़ी चीज में रस लेना चाहिए और हर लम्हे को डूबकर जीना चाहिए।

खूब बड़ा परिवार था हमारा। सात भाई, दो बहनें। यों हम नौ भाई-बहन थे, जिनमें मेरा नंबर ऊपर से आठवाँ। बस, एक छोटा भाई सत मुझसे छोटा था, बाकी सब भाई-बहन बड़े। माता-पिता ने तो कभी पीटा नहीं, पर पाँच भाई जो बड़े थे, उनका शासन तो सिर पर था ही। इनमें बाकी भाई तो बड़े थे और उनसे थोड़ी दूरी भी रही, पर श्याम भैया तो मुझसे तीन-साढ़े तीन बरस बड़े थे। हर वक्त मेरी चुटिया उनके हाथ में रहती थी, और वे जब चाहें उसे खींच सकते थे। मैं आ-आ, ऊ-ऊ के सिवा भला और क्या कर सकता था? पर वे रोबीले इतने थे कि पीटकर रोने भी नहीं देते थे। अगर वे कहते, ‘खबरदार जो जरा भी आवाज निकाली...!’ तो मजाल है कि मुँह से जरा भी टसक बाहर निकल जाए।

यों बड़े भाइयों में श्याम भैया के साथ मैं सबसे ज्यादा रहा और उनकी बहुत मार खाई है। मगर श्याम भैया प्यार भी बहुत करते थे। वैसा प्यार भी शायद ही कोई और कर सके। श्याम के बारे में लिखने बैठूँ तो शायद दो-ढाई सौ पन्ने का ग्रंथ बड़े आराम से तैयार हो जाए। मैंने ‘नंदू भैया की कहानी’ में श्याम भैया के बारे में कुछ लिखा है या कहूँ कि लिखने की कोशिश की है। पर यह वैसा जीवंत और पेचीदा कहाँ है, जैसा खुद श्याम भैया का चरित्र था। मेरी बाल कहानियों की पुस्तक ‘नंदू भैया की पतंगें’ एक तरह से श्याम भाईसाहब को ही ट्रिब्यूट है। फिर भी यह चीज बराबर मन में आती है कि श्याम भैया को अभी भी मैं वैसा कहाँ दिखा पाया, जैसे असल में वे थे।

कुक्कू, पग्गल है क्या...!

श्याम भैया मेरे लिए दुनिया से जुड़ने की अनिवार्य कड़ी तो थे ही। मगर सवाल यह है कि श्याम भैया क्या न थे। श्याम भैया न होते तो मैं क्या होता, कहाँ होता? उन्होंने ही मुझे उस समय और उस दुनिया से परिचित कराया, जिसके बगैर मेरा कुछ वजूद न था। मगर मैं उन सब चीजों से दूर, डरा-डरा सा रहता था। सिनेमा मैंने सबसे पहले श्याम भैया के साथ ही देखा और उन्होंने इतनी पिक्चरें दिखाईं कि उनका एक पूरा इतिहास ही है। इनमें ‘भाभी’ और ‘छोटी बहन’ की तो मुझे बड़ी अच्छी तरह याद है। मेला, नुमाइश और रामलीला जाना भी उन्हीं के साथ होता था। इसी तरह साइकिल पर मुझे आगे बैठाकर श्याम भैया ने न जाने कहाँ-कहाँ की और कितनी लंबी-लंबी सैर कराईं। मुझे लगता था, मैं श्याम भैया के साथ दुनिया की अनवरत परिक्रमा पर निकल पड़ा हूँ...और पहली बार दुनिया की ये खूबसूरत चीजें और सूरतें देख रहा हूँ। इसी तरह पतंगों की दुनिया के न जाने कितने रोमांच श्याम भैया से जुड़े हुए हैं।

श्याम भैया की साइकिल तो खुद में एक महाकाव्य है। महागाथा। उन्होंने मुझे साइकिल पर बैठाकर इतनी सैर कराई कि लगता था, उनकी साइकिल पर बैठकर ही मैं बड़ा हुआ और वहीं बैठे-बैठे जैसे मैंने छुटपन में ही सारी दुनिया की परिक्रमा कर ली हो। उनकी साइकिल के डंडे पर बैठकर शान से इधर-उधर देखते हुए चलने में इतना मजा आता कि लगता, जैसे मैं कोई नन्हा-मुन्ना सा राजा हूँ और सारी दुनिया का नजारा लेने के लिए निकला हूँ। वे सचमुच बड़े ही आनंद की घडि़याँ होती थीं। गर्व और आनंद से छलछलाती उल्लसित घडि़याँ।

पर चूँकि मैं राजा खुद को भले ही समझ रहा होऊँ, पर असल में तो डिर्रू था और यह खटका मन में बराबर लगा रहता था कि साइकिल इधर-उधर मोड़ते समय कहीं मैं टप्प से टपके की तरह नीचे न गिर जाऊँ। इसलिए आत्मरक्षा के लिए मैं साइकिल के हैंडिल को खूब कसकर पकड़ लेता था। कुछ ज्यादा ही जोर से। इससे श्याम भैया के लिए भारी मुसीबत हो जाती थी। इसलिए कि रास्ते में ट्रैफिक के हिसाब से या फिर सड़क में गड्ढे वगैरह होने पर जैसे-जैसे उन्हें साइकिल मोड़नी होती थी, उस तरह आसानी से मोड़ नहीं पाते थे। इससे उलटा साइकिल के डगमगाने या गिरने का खतरा पैदा हो जाता। तो उन्हें बार-बार आगाह करना पड़ता, ‘कुक्कू, पग्गल है क्या!...हैंडिल को इतना कसकर क्यों पकड़ लिया है? आराम से पकड़ो, खूब ढीला सा, नहीं तो मैं साइकिल कैसे चला पाऊँगा?’

उस समय मैं हाथ की पकड़ कुछ ढीली कर देता, बस थोड़ी देर के लिए, पर आगे जैसे ही कोई धचका या मोड़ आता, मैं फिर से हैंडल कसकर पकड़ लेता। इससे उलटा साइकिल के गिरने का खतरा बढ़ जाता, क्योंकि श्याम भैया अपने ढंग से सहजता से साइकिल नहीं चला पाते थे, तो उन्हें डाँटना पड़ता, ‘कुक्कू तेरे को अकल भी है? कितनी बार कह चुका हूँ, हैंडल को आराम से पकड़ना चाहिए। पर तेरे भेजे में ही नहीं घुसता। तू जरूर मुझे गिरवाकर मानेगा!’

इस समय उनकी बात मैं मान लेता, पर फिर मेरा डिर्रूपन हावी हो जाता तो मैं फिर वही गलती करता। इस चक्कर में उनसे एकाध थप्पड़ भी मैंने जरूर खाया होगा। तब थोड़ी सी अक्ल आई।

शुरू में तो श्याम भैया आगे डंडे पर बैठाकर चलाते, फिर पीछे कैरियर पर बैठाना शुरू किया। और मैं भी जैसे-जैसे बड़ा हुआ, कुछ आत्मविश्वास आया, भय खुद-ब-खुद कम होने लगा और मुझे समझ में आया कि साइकिल तो बड़ी मजेदार सवारी है। उससे डरने का क्या काम? साइकिल की सवारी तो आनंद लेने की चीज है। तो वे साइकिल चलाते और मैं पीछे बैठा हवा के साथ फर्राटे का आनंद लेता। कभी हवा ठंडी और बढि़या होती, फिर तो कहना ही क्या!

चली-चली रे, मेरी साइकिल चली!

छठी कक्षा तक पहुँचते-पहुँचते मेरे मन में साइकिल चलाने की लालसा बलवती होने लगी। मेरे पड़ोस में ही रहनेवाला दोस्त सत्ते साइकिल खूब अच्छी चलाता था। मुझसे वह एकाध बरस ही बड़ा था, पर पढ़ता मेरी ही क्लास में था। उसे मजे से हवा में फर्राटे भरते देख मन में अरमान पैदा होता, ‘‘काश, मैं भी साइकिल चला पाता!’’ मुझे लगता था, साइकिल चलाने से बड़ी कला इस दुनिया में कुछ और हो नहीं सकती। क्या ही मजे की बात है। झट साइकिल घर के अंदर से बाहर निकालो, पैडल पर पैर रखो और मिनटों में उड़न-छू हो जाओ।...यानी हवा में फर्राटे, वाह! साइकिल मेरे लिए धरती नहीं, परीलोक की कोई चीज थी। एकदम जादुई शै...!

मैंने सत्ते से कहा, ‘‘सत्ते यार, मुझे भी सिखा दो साइकिल चलाना।’’ तो उसने कहा, ‘‘देख कुक्कू, यह कोई मजाक नहीं है। इसमें दो-चार बार गिरना पड़ता है। कभी-कभी तो दस-बीस बार भी। तू गिरेगा, चोट लगेगी तो रोएगा कि सत्ते ने गिरा दिया। क्या फायदा?’’

मैंने कहा, ‘‘नहीं रोऊँगा, तुम सिखाओ तो!’’

सत्ते ने भरपूर कोशिश की, पर कामयाब नहीं हो पाया। मुझसे वह कोई साल भर बड़ा होगा। उसमें इतनी ताकत और फुरती भी थी कि गिरने-डगमगाने पर मुझे सँभाल ले। पर वही मेरा डिर्रूपन बीच में आ जाता। फिर उसने दिमाग लगाया और मुझे गद्दी पर बैठकर चलाने के बजाय कैंची सिखाने की कोशिश की। बोला, ‘‘कुक्कू, तू पहले कैंची सीख ले। कैंची साइकिल चला लेगा तो साइकिल साधना आ जाएगा। फिर तू सीधा गद्दी पर बैठकर भी चला लेगा।’’

सत्ते ने गरमी की छुट्टियों में दो-चार दिन लगातार साइकिल सिखाई और अभ्यास कराया तो मैंने बमुश्किल थोड़ी सी कैंची सीख ली। अब कैंची साइकिल चलाना क्या होता है, शायद आज के बच्चे न समझ पाएँ। पर उन दिनों साइकिल चलाने और साधने की यही एक मध्यमा प्रणाली थी कि पहले कैंची साधना सीख लो, फिर तुम्हें सीधा गद्दी पर बैठकर चलाना भी आ जाएगा। कैंची चलाने के लिए चालक को एक पैर पैडल पर रखकर दूसरा डंडे के ऊपर से दूसरी ओर ले जाने के बजाय, डंडे के नीचे से ही निकालना पड़ता था। इस तरह छोटे बच्चों को आसानी हो जाती थी। जिनके पैर सीधा चलाने में पैडल तक नहीं पहुँचते थे, वे इस तरह दोनों पैर पैडल पर रखकर चला सकते थे।

पर कैंची सीखने के बाद सीधा गद्दी पर बैठकर साइकिल चलाना भी कोई आसान बात नहीं थी। सत्ते ने दो-चार बार मेरे गिरने पर हाथ खड़े कर दिए। कारण यह था कि मेरे पैर पैडल तक पहुँचते ही नहीं थे। उसके लिए आगे पंजे को झुकाकर विशेष प्रयत्न करना होता था। मैं उस कोशिश में लगता तो हैंडल डगमगाने लगता। मैं खुद को सँभालने की कोशिश करता, पर इतने में ही अचकचाकर गिर जाता था।

जब श्याम भैया ने देखा तो उन्होंने मुझे साइकिल सिखाने का जिम्मा ले लिया। कहा, ‘‘हट सत्ते, मैं सिखाता हूँ।’’ और वाकई उन्होंने तीन-चार दिन में ही मुझे साइकिल चलाना सिखा दिया। हालाँकि मुझ सरीखे बुद्धू को सिखाने में उन्हें भी खूब पसीने आए। पर वे धुनी थे, जिस चीज पर आ जाते थे, उसे करके ही मानते थे। फिर वे मुझे डाँट भी सकते थे। जैसा-जैसा वह कहते थे, वैसा करना मेरी बाध्यता थी। और यों डरते-डरते भी मैं सीख गया।

श्याम भैया का साइकिल सिखाने का तरीका यह था कि वे मुझे गद्दी पर बैठा देते। पीछे कैरियर के पास से साइकिल पकड़कर साथ-साथ दौड़ते और कहते, ‘‘कुक्कू, हैंडल खूब अच्छी तरह साधकर चलाओ।...तुम बस हैंडल साधने की प्रैक्टिस करो। मैंने पीछे से पकड़ा हुआ है, डरो मत...!’’ मैं हैंडल साधने की कोशिश करता। कभी वह डगमगाता तो श्याम भैया सँभाल लेते और मैं गिरने से बच जाता। पूरा एक दिन पैडल चलाते हुए हैंडिल साधने का अभ्यास।

हमारे घर के सामने काफी बड़ा सा मैदान है, वहीं मेरी अभ्यास स्थली थी। मैं खूब डरपोक, पर श्याम भैया भी बड़े विकट गुरु थे। कई बार मैं गिरा भी, खूब चोटें खाईं। खासकर घुटने जल्दी फूटते थे। कारण यह कि उस समय जिस तरह की रंग-बिरंगी बेबी साइकिलें आजकल नजर आती हैं, उनकी तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। न वे कहीं आसपास दिखाई पड़ती थीं। और अगर कहीं थीं भी, तो हम तो सपने में भी कल्पना नहीं कर सकते थे कि वैसी साइकिल हमारे लिए खास तौर से ले ली जाएगी। लिहाजा पूरे आकार की जो बड़ों की साइकिल थी, उसी पर बैठकर सीखना होता। उन दिनों साइकिलें दिनभर के लिए किराए पर भी मिल जाती थीं। तो कई बार किराए की साइकिल लाकर काम चलाते। मेरे पैर आराम से पैडल को छू नहीं पाते थे, तो पंजे का सहारा लेकर किसी तरह साइकिल को चलाने की कोशिश करता। चूँकि कैंची थोड़ी-थोड़ी सीख चुका था, इसलिए साइकिल साधने का थोड़ा अभ्यास हो गया था, वह बहुत काम आया। उसके बाद भय कम हो गया। मेरे पैर पैडल पर पूरे नहीं आते थे। तो कैसे पंजे से पहले पैडल को ऊपर की ओर लाकर फिर पैर से पैडल चलाना चाहिए, यह मैंने सीखा। फिर धीरे-धीरे अभ्यास हो गया।

श्याम भैया का साइकिल सिखाने का तरीका यह था कि वे मुझे गद्दी पर बैठा देते। पीछे कैरियर के पास से साइकिल पकड़कर साथ-साथ दौड़ते और कहते, ‘‘कुक्कू, हैंडल खूब अच्छी तरह साधकर चलाओ।...तुम बस हैंडल साधने की प्रैक्टिस करो। मैंने पीछे से पकड़ा हुआ है, डरो मत...!’’ मैं हैंडल साधने की कोशिश करता। कभी वह डगमगाता तो श्याम भैया सँभाल लेते और मैं गिरने से बच जाता। पूरा एक दिन पैडल चलाते हुए हैंडिल साधने का अभ्यास। अगले दिन उन्होंने पीछे से पकड़ा और मैं साइकिल दौड़ाता। कहते, ‘‘कुक्कू डरियो मत। चला, मैंने पीछे से पकड़ा हुआ है...!’’ पर बीच-बीच में वे छोड़ देते। मेरे साथ-साथ तो चलते, पर पकड़ते न थे। और कई बार तो वे अपनी जगह पर ही खड़े रहते, पर हिम्मत बँधाने के लिए पीछे से लगातार आवाज देते, ‘‘कुक्कू, कुक्कू, डर नहीं। मैंने पकड़ा हुआ है पीछे से, तू चला...!’’ बाद में पता चला कि अरे, वे तो अपनी जगह खड़े हैं, साइकिल तो मैं ही खुद-ब-खुद चला रहा हूँ।

यों झिझक खत्म हुई, हिम्मत आई और आखिर मैं साइकिल चलाना सीख गया। उसके पीछे श्याम भैया और सत्ते, दोनों की बड़ी तपस्या थी। दोनों का ही मैं बेहद शुक्रगुजार हूँ। अफसोस, आज दोनों ही इस दुनिया में नहीं हैं, मैं कैसे उन्हें धन्यवाद दूँ, और किस-किस चीज के लिए धन्यवाद दूँ?

अलबत्ता साइकिल चलाना सीखा तो दिल में इतनी खुशी थी, जैसे मैंने दुनिया जीत ली हो। अब तो सारा-सारा दिन गलियों में पागलों और दीवानों की तरह साइकिल चलाता फिरता। यहाँ तक कि सपने भी साइकिल चलाने और सामनेवाली साइकिल से टक्कर खा के गिरने के आते। गिरता भी खूब था। उन दिनों निक्कर पहनता था, तो गिरने पर खूब घुटने फूटते थे। कितनी बार गिरा, इसका कोई हिसाब ही नहीं।...पर साइकिल चलाने की खुशी इस सब पर भारी थी। घर का कोई काम होता तो मैं झट साइकिल बाहर निकलता और दौड़ा देता। साइकिल पर बैठकर निकलता तो लगता, जैसे विश्व विजय पर निकला हूँ। कई बार खाली सड़कों पर यों ही हवा और फर्राटे खाने निकल पड़ता। सचमुच, साइकिल ने मेरे जीवन में रोमांच भर दिया था। और इसके साथ ही अब थोड़ा हिम्मत से जीना आ गया था।

उड़ी-उड़ी रे पतंग...बादलों के पार!

श्याम भैया पतंगें उड़ाने के भी शौकीन। वे अकसर शाम को छत पर पतंग उड़ाते तो हुचका सँभालने का जिम्मा मेरा। कभी वे खूब सारी ढील देने के लिए कहते तो हुचका ढीला पकड़ना पड़ता और जब वे डोर खींचने पर आते तो जमीन पर मंजे का ढेर लगना शुरू हो जाता और मुझे बिजली की सी तेजी से लपेटना होता, ताकि मंजा उलझ न जाए। मेरे इस शिष्यत्व में कभी उन्होंने कोई कमी नहीं निकाली। मैं एक आदर्श सहायक की भूमिका बड़ी अच्छी तरह निभाता, जिससे वे खुश रहते। यों समझिए कि मैं उनके इशारे पर काम करना सीख गया था।

हालाँकि कभी-कभी मेरी इच्छा होती कि काश, मैं भी पतंग उड़ा पाऊँ! इसकी कोशिश भी की। बाजार से कई बार पतंगें, डोर और हुचका लाया। पतंग के कन्ने बाँधना सीखा। श्याम भैया का कहना था, ‘‘तुम अकेले उड़ाकर प्रैक्टिस करो, तभी सीख पाओगे।’’

मैंने सत्ते की मदद ली। वह दूर खड़ा होकर पतंग की छुड़ैया देता और चिल्लाकर कहता, ‘‘कुक्कू, साध...! अच्छी तरह साध ले!’’ पर बड़ी कोशिश करने पर भी मैं सीख नहीं पाया। यह मेरी स्थायी असफलता है, जो आज भी भीतर-ही-भीतर करकती है और जिसका मलाल आज भी मेरे मन में है। जैसे मुझमें कोई अधूरापन है, जो सिर्फ पतंग उड़ा पाने से ही पूरा हो सकता था। और किसी बड़ी-से-बड़ी चीज से नहीं। बार-बार मन में हुड़क होती है, ‘‘काश, मैं भी पतंग उड़ा पाता!’’

हाँ, श्याम भैया ने एक काम जरूर किया। जब उनकी पतंग ऊपर गर्व से आसमान में जाकर बादलों से बात कर रही ही तो कभी-कभी थोड़ी देर के लिए डोर मेरे हाथ में पकड़ा देते। और मुझे लगता, ‘‘ओह, यह कितने सुख, कितने आनंद की बात है कि आकाश से बात करनेवाली पतंग मेरे हाथ में है!’’ मैं डरते-डरते एकाध ठुमका भी लगाता। फिर अगर पतंग कुछ डगमगाती तो श्याम भैया आगे बढ़कर सँभाल लेते। जो भी हो, ये बड़े रोमांचक पल थे, जिनका थ्रिल अब भी महसूस होता है।

एक बार की बात, श्याम भैया ने ‘भाभी’ या न जाने कौन सी फिल्म देखकर सात पतंगें एक साथ उड़ाईं। हुआ यह कि फिल्म का नायक सात पतंगें एक साथ बाँधकर उड़ाता है। श्याम भैया ने देखा तो ठान लिया, ‘‘मैं भी सात पतंगें उड़ाऊँगा एक साथ!’’

उसके लिए बड़े जोर-शोर से तैयारियाँ शुरू हुईं। कोई महीने भर तक युद्ध स्तर पर काम चलता रहा। कभी बड़ा पक्का वाला मंजा तैयार हो रहा है, जिस पर लेई, पिसा हुआ काँच और न जाने क्या-क्या लपेटकर उसे मजबूत किया जा रहा है, ताकि कोई दुश्मन उसे काट न पाए। फिर पतंगें कैसी हों, इस पर खूब दिमाग लगाया गया। सोचा गया, छह पतंगें छोटी हों और बीच में एक बड़ी तो काम चल सकता है।

इस सारी तैयारी में आदर्श सहायक की भूमिका मेरी थी। श्याम भैया की पूरी मित्र-मंडली जी-जान से लगी हुई थी। हर किसी की सलाह और नुक्ते का सही-सही इस्तेमाल...! पहले सात नहीं, केवल तीन-चार पतंगें एक साथ उड़ाई गईं। फिर संख्या बढ़ाने का तरीका।...और अंत में वह रोमांचक घड़ी भी आ गई, जब सात पतंगें एक साथ उड़ाई जानी थीं। उस दिन हमारी पूरी छत श्याम भैया के दोस्तों से भर गई थी। मन में अजीब सी धुक-धुक...धुकर-पुकर...! बड़े ही रोमांचक पल थे।

और जब छुड़ैया देने के बाद उड़ीं सात पतंगें तो हम सबके लिए वह ऐसा खूबसरत नजारा था, जैसे कोई सपना पूरा हो गया हो। हालाँकि दुर्भाग्य से यह रोमांच अधिक देर तक टिका नहीं।...सात पतंगें कटी तो नहीं, पर उनका वजन तो अधिक था ही। इस वजह से डोर टूट गई। टूटकर हवा के झोंके के साथ उड़ती हुई वे जिस घर की छत पर जा गिरीं, उस घर में एक जरा जिद्दी और अडि़यल स्त्री थी, जिसे बच्चों के खेल के आनंद से कोई मतलब न था। श्याम भैया अपने मित्रों के साथ दौड़ते और हाँफते हुए वहाँ पहुँचे। पर उस कठोर-हृदय स्त्री ने पतंगें देने से साफ इनकार कर दिया।

श्याम भैया ने पतंगों से जुड़ी नैतिकता का तर्क दिया कि ‘‘चाचीजी, पतंगें कटी थोड़े ही हैं, वह तो डोर टूट हई है। इसलिए कृपया पतंगें लौटा दीजिए।’’

पर उस स्त्री की जिद, ‘‘ना जी, ना! हम कुछ नहीं जानते। पतंगें हमारी छत पर आई हैं, हम नहीं देंगे।’’

यों एक सपने का अंत थोड़े दुखांत रूप में हुआ। मैं उसका गवाह हूँ और उन क्षणों में श्याम भैया की उस उदास मुद्रा का भी। हालाँकि ‘नंदू भैया की पतंगें’ कहानी में मैंने पूरे प्रसंग को कहानी में ढालते हुए उसका अंत बदलकर कहानी को सुखांत कर दिया है।

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जादूगरी क्राफ्ट की...!

पतंगें ही नहीं, श्याम भैया क्राफ्ट के भी उस्ताद थे। दफ्ती, कैंची, लेई और अबरी कागज उनके हाथ में हों, तो कला खुद-ब-खुद साकार होने लगती थी। बड़ी तबीयत से लेई बनाते। उसमें नीला तूता डालकर अच्छी तरह पकाते। फिर पेंसिल से निशान लगाकर सफाई से दफ्ती काटते और जैसा चाहते, वैसा बढि़या सा आकार बना लेते। फिर आता अबरी कागज का नंबर। उसे इतनी खूबसूरती से चिपकाते कि मजाल है कहीं झोल रह जाए। फिर उस पर चमकीले कागज से काट-काटकर बनाई गई फूल-पत्तियाँ चिपकाते। इन सारे कामों में वे ऐसे डूब जाते, कि उनकी तन्मयता और मस्ती देखकर मैं निहाल हो जाता।

अलबत्ता इन सारी कलाओं में श्याम भैया मेरे गुरु थे। वे कलाएँ जो जिंदगी की कलाएँ थीं, उन्हें श्याम भैया ने किसी से सीखा नहीं था, पर वे हर काम और-और बेहतर ढंग से करने की कोशिश करते थे। और यों ही काम करते-करते सीखते जाते थे और परफैक्शन तक पहुँच जाते थे। ‘काम करते-करते सीखना...!’ बहुत बाद में जब मैं दिल्ली आया और सत्यार्थीजी से मिला, तो उन्होंने बड़े पुरलुत्फ अंदाज में इस बात को फिर से रेखांकित किया।

मुझे उनके असिस्टेंट का रोल निभाना होता था और मैं बडे उत्साह से दौड़-दौड़कर ये सारे काम करता। यों मुझे पहले ही बहुत कुछ अंदाजा होता था कि कब, किस चीज की जरूरत पड़नेवाली है और मैं कोशिश करता था कि उनका आदेश मिलते ही चीज सामने हाजिर हो जाए, ताकि उनकी आँखों में अपने लिए प्रशंसा का भाव देख सकूँ। बाकी पूरे समय जब वे कोई सुंदर आकार या कलाकृति बना रहे होते तो मैं रामचंद्रजी के छोटे भाई लक्ष्मण की तरह मंत्रमुग्ध सा उनको देखता रहता। और मन-ही-मन सराहता रहता। ऐसी सुंदर कलाकृति कभी मैं भी बना सकूँगा, यह तो सोचना भी मुश्किल था। हाँ, काम चलाने के लिए थोड़ा-थोड़ा सीख जाऊँ, यह कोशिश जरूर करता था।

स्कूल में उन दिनों घर से मॉडल बनवा लाने के लिए बहुत-सा काम मिलता था। कभी मिट्टी का गमला और उस पर कागज के सुंदर फूल। कभी घर, कभी झोंपड़ी। कभी फूल माला। श्याम भाईसाहब इस सब में मेरे हीरो थे, उद्धारकर्ता भी। वे मेरी हर समस्या चुटकियों में हल कर देते। बस, जब वे बनाते, मुझे आज्ञाकारी सेवक की तरह हर क्षण दौड़ने को तैयार रहकर, उनके पास हर घड़ी उपस्थित रहना पड़ता था, और इसमें मैं कभी कोताही नहीं करता था।

उन दिनों ड्राइंग में पुस्तक-कला भी शामिल थी। पुस्तक कला में डाक विभाग का पोस्टकार्ड, लिफाफा वगैरह बनाने का भी गृहकार्य मिलता और श्याम भैया सफेद दस्ता कागज काटकर, उसे ठीक से मोड़कर इतनी सफाई से चिपकाते कि उनका बनाया लिफाफा दर्शनीय बन जाता। पोस्टकार्ड के लिए मोटा शीट पेपर इस्तेमाल किया जाता। मैं इन सुंदर कलाकृतियों को स्कूल लेकर जाता तो देखकर अध्यापक ही नहीं, साथी छात्रों का भी जी खुश हो जाता।

इसी तरह जिल्दसाजी के वे बादशाह थे। हर साल जुलाई में नई कक्षा में जब नई-नकोर किताबें आतीं तो उन पर गत्ते की जिल्द चढ़ाने की ताईद की जाती। यहाँ भी श्याम भाईसाहब मेरे संकटमोचक बन जाते। बड़ी सफाई से किताब के आकार के गत्ते काटकर, पहले उन्हें कपड़े के अस्तर से जोड़ना, फिर उस पर अबरी चिपकाना। यह सारा काम पूरी सावधानी रखते हुए करना होता था कि किताब खुलने में कोई परेशानी न हो। मैंने यह कला उनसे सीखी और कुछ आगे चलकर मैं भी किताबों पर अच्छी, मजबूत जिल्द चढ़ाने लगा। यह सावधानी भी रखता कि गत्ते की जिल्द चढ़ने पर किताब एकदम सुभीते से खुलनी चाहिए।

अलबत्ता इन सारी कलाओं में श्याम भैया मेरे गुरु थे। वे कलाएँ जो जिंदगी की कलाएँ थीं, उन्हें श्याम भैया ने किसी से सीखा नहीं था, पर वे हर काम और-और बेहतर ढंग से करने की कोशिश करते थे। और यों ही काम करते-करते सीखते जाते थे और परफैक्शन तक पहुँच जाते थे। ‘काम करते-करते सीखना...!’ बहुत बाद में जब मैं दिल्ली आया और सत्यार्थीजी से मिला, तो उन्होंने बड़े पुरलुत्फ अंदाज में इस बात को फिर से रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि जब वे ‘आजकल’ के संपादक बने, तब तक संपादन-कला का उन्हें कुछ खास ज्ञान न था। वे तो खानाबदोश थे, हरफनमौला लेखक। भला संपादन-कला की बारीकियाँ क्या जानें? पर वे ‘आजकल’ के संपादक बने तो इतने सफल संपादक माने गए कि ‘आजकल’ को उन्होंने देखते-ही-देखते अपने समय की सबसे शीर्ष पत्रिका बना दिया।

कई बार उनके निदेशक शशधर सिन्हा जो कि प्रशासकीय चाल-ढाल के व्यक्ति थे, कुछ परेशान होकर पूछते थे, ‘‘सत्यार्थीजी, आपने तो इतने सारे विशेषांकों की योजना बना ली। तो क्या आपने सोचा है कि कैसे उन्हें पूरा करेंगे?’’ इस पर सत्यार्थीजी एक पल की चुप्पी के बाद एक छोटा सा वाक्य कहते थे, ‘‘काम ही सिखाता है कि काम कैसे करना है!’’...यानी काम करते जाओ। जैसा भी आता है, मन और लगन से करते जाओ। काम करते-करते आप खुद सीख जाएँगे कि काम किस तरह से बेहतर हो सकता है। और सीखेंगे ही नहीं, एक दिन उस्तादी भी हासिल कर लेंगे।

श्याम भैया का भी यही गुर था। उन्हें हर चीज आती थी, हर चीज के वे उस्ताद थे, पर उन्होंने कहीं से सीखा नहीं था। बस, काम करते-करते ही सीखा और फिर करते-करते ही उस्ताद हो गए। मन और आँखें खुली हों और बुद्धि सतर्क हो तो फिर क्या मुश्किल है?

घर में कोई शुभ उत्सव होता तो विभिन्न रंगों के पतंगी कागजों को काट-काटकर रंग-बिरंगी झंडियाँ बनाकर टाँगना श्याम भैया का ही जिम्मा था। इसी तरह घर में हर शुभ पर्व की शुरुआत होती थी ‘घड़ोली’ से, जिसमें घर-परिवार की स्त्रियाँ कुएँ से जल भरकर लातीं। घड़ोली के लिए मंगल घट की सज्जा का जिम्मा हमेशा श्याम भैया का ही रहता। रंग-रंग की चमकीली पन्नियों से वे मंगल घट की ऐसी सजावट करते कि देखकर आँखें थकती न थीं। आखिर इसी मंगल घट को लेकर तो घर की बहुओं को घर-परिवार और मोहल्ले की स्त्रियों के साथ कुएँ से पानी भरकर लाना होता और मंगल गीत गाते हुए, हवा में उत्सव की एक प्रफुल्ल लय उत्पन्न करनी होती थी। उस समय श्याम भैया का बहुत मेहनत से सजाया गया मंगल घट दूर से आनंद और प्रसन्नता की विजय घोषणा सा करता।

दीवाली पर श्याम भैया का बनाया हुआ कंदील दूर से मन आलोकित कर देता था। रंग-रंग के पन्नी-कागज से बनाए कंदील में वे अपना पूरा मन उँड़ेल देते। इसके लिए पहले बाँस को काटकर छोटी-छोटी खपचियाँ बनाई जातीं। फिर धागे से उन्हें सुंदरता और मजबूती से बाँधा जाता। और फिर रंग-बिरंगे पन्नी-कागज को जब वे सफाई से चिपकाते तो कंदील किसी सुंदर कलाकृति की तरह दूर से मोहता। उसमें दीया रखने का भी स्थान होता था। फिर जब छत पर एक लंबे बाँस पर बाँधकर उसे टाँगा जाता तो दूर से वह किसी सपने जैसा झिलमिलाता लगता था। हर बार श्याम भैया अपने बनाए कंदील में कुछ-न-कुछ नयापन लाते। कभी नए ढंग की सजावट करके तो कभी उसके आकार में कुछ बदलाव करके। पन्नियाँ चिपकाने और उस पर फूल-पत्तियाँ लगाने में तो हर साल कुछ-न-कुछ निखार आता ही जाता।

एक बार मुझे याद है, श्याम भैया ने हवाई जहाज के आकार का कंदील बनाया था और उस पर इतना खूबसूरत और चमकीला पन्नी-कागज लगाया कि वह पूरा हुआ तो मुझे लगा, यह कंदील नहीं कोई अद्भुत सपना है, जो पूरा हो गया है। वह कंदील आज भी जैसे मेरी आँखों में झिलमिल-झिलमिल कर रहा है।

त्योहार जो नई जिंदगी लेकर आते थे!

याद आता है, उन दिनों त्योहारों का कैसा आनंद था। हर त्योहार का जमकर आनंद लेना मैंने श्याम भैया से सीखा और फिर वह मेरे जीवन का भी हिस्सा बन गया। पर आज त्योहारों, खासकर दीवाली का रंग-ढंग कितना बदल गया, सोचकर दुःख होता है। उसकी मूल भावना और उत्साह तो गायब हो गया, बस तड़क-भड़क और पटाखों की धाँय-धाँय ही बची है। कभी-कभी मैं सोचता हूँ, ‘‘काश, आज बच्चे पटाखे फूँककर पर्यावरण का सत्यानाश करने के बजाय, दीवाली की मूल भावना को अपना लें तो देश और समाज का कितना भला हो सकता है।’’

इसी तरह मुझे याद है, उन दिनों जन्माष्टमी पर घर-घर मंदिर सजाने की प्रथा थी। श्याम भैया इसमें भी बड़ी तन्मयता से जुटते थे। मंदिर की सजावट के लिए घर की चादरों और साडि़यों का इस्तेमाल होता। सुंदर ढंग से झालरें बनाई जातीं। फिर खिलौने सजाने की बारी आती। श्याम भैया की कोशिश होती कि मंदिर की सज्जा ऐसी हो कि उसमें कोई थीम उभरनी चाहिए। किसी दिलचस्प कहानी सरीखी। तो देखते-ही-देखते तरह-तरह के खिलौनों की बस्तियाँ सज जातीं। कहीं बैंड-बाजा लिये मटरूमल की बारात नजर आती तो कहीं ब्रज के पहलवानों के मल्लयुद्ध की बानगी नजर आती। कहीं राज-दरबार और सैनिकों का रोब-दाब तो कहीं हिरन, भालू, शेर-बघर्रे वाला घना जंगल। कहीं टिल्लू-मिल्लू के नन्हे-मुन्ने खिलौने तो कहीं गुड्डे-गुडि़यों का सजीला संसार। कहीं पानी में रेल का खेल दिखाने की कला तो कहीं समंदर में झंडे लहराता पानी का जहाज...!

दीवाली पर श्याम भैया का बनाया हुआ कंदील दूर से मन आलोकित कर देता था। रंग-रंग के पन्नी-कागज से बनाए कंदील में वे अपना पूरा मन उँड़ेल देते। इसके लिए पहले बाँस को काटकर छोटी-छोटी खपचियाँ बनाई जातीं। फिर धागे से उन्हें सुंदरता और मजबूती से बाँधा जाता। और फिर रंग-बिरंगे पन्नी-कागज को जब वे सफाई से चिपकाते तो कंदील किसी सुंदर कलाकृति की तरह दूर से मोहता। उसमें दीया रखने का भी स्थान होता था। फिर जब छत पर एक लंबे बाँस पर बाँधकर उसे टाँगा जाता तो दूर से वह किसी सपने जैसा झिलमिलाता लगता था। हर बार श्याम भैया अपने बनाए कंदील में कुछ-न-कुछ नयापन लाते।

पीछे एक तरफ कैलाश पर्वत पर तपस्यारत शिवजी तो हमेशा ही होते। उनके माथे पर छेद करके पीछे लाल बल्ब जलाकर तीसरा नेत्र बनाया जाता। फिर उनके सिर पर गंगा दिखाने के लिए एक बिल्कुल बारीक सी रबर की नलकी छिपाकर लगाई जाती। इस तरह कि पानी की एक पतली सी धार शिवजी के मस्तक पर निरंतर गिरती रहे। पर शिवजी के साथ उनका आभामंडल भी तो होना चाहिए। तो उनके पीछे एक टेबल फैन का कवर उतारकर, उसकी पँखुडि़यों पर गोंद लगाकर सफेद अबरक छिड़का जाता। फिर सूखने पर जब पंखा चलाया जाता तो अबरक की चमक से सचमुच ऐसा लगता कि शिवजी के मुख के चारों ओर ऐसा आभामंडल है, जो उन्हें इस धरती से ऊँचा और देवत्व की महिमा से पूर्ण बनाता है।

पर ये सारे खिलौने सीधे कमरे के फर्श पर रख दिए जाएँ, ऐसा नहीं था। पहले लकड़ी का बुरादा लाकर तरह-तरह के रंग से रँगकर फर्श पर बिछाया जाता और फिर ऊपर सजता खिलौनों का रंग और राग भरा संसार। सच ही श्याम भैया ऐसा सुंदर जन्माष्टमी का मंदिर सजाते कि देखनेवाले मुग्ध हो जाते। यहाँ भी हर काम में सहायक के रूप में मुझे हर पल उपस्थित रहना पड़ता। हालाँकि मेरे लिए तो ये रोमांचक पल थे। बाद में श्याम भैया ने जन्माष्टमी पर मंदिर सजाने का काम मुझ पर ही छोड़ दिया और उनकी सिखाई कला का इस्तेमाल करके मैं भी घर की बाहरवाली बैठक में काफी सुंदर जन्माष्टमी का मंदिर सजाने लगा। मैं कोशिश करता कि उसमें वैसी ही थीम उभरे, जैसे श्याम भाया साकार कर देते थे। मैं उतनी पूर्णता से तो यह सज्जा नहीं कर पाता था, पर मेरे बनाए जन्माष्टमी के मंदिर औरों से अलग और कलात्मक जरूर होते थे। और यह सब श्याम भैया की ही देन था।

वाकई उनका सहायक बनकर मैंने बहुत कुछ सीखा। साथ ही यह जाना कि अगर हम हर काम सफाई और सुंदरता से करें, पूरी तन्मयता से करें, तो सच में यह जिंदगी कितनी सुंदर है। और जीवन की सच्ची कला भी यही है।

बाल दिवस यानी बच्चों का मेला

उन दिनों छठी कक्षा से ही हम स्कूल नहीं, कॉलेज में जाते थे। इंटर कॉलेज। तो हमारे कॉलेज पालीवाल इंटर कॉलेज में १४ नवंबर को बाल दिवस पर हर साल बाल मेला लगता था। खूब उत्साह और धूमधाम से। श्याम भैया दोस्तों के साथ मिलकर उस मेले में बड़ी सुंदर चाय-नाश्ते की दुकान लगाने। दुकान की खूब सज्जा तो होती ही, बड़ी सफाई से कुरसी-मेजें जमाई जातीं। और फिर चाय और पकौड़े बना-बनाकर दूसरों को खिलाने का आनंद। बाल मेले में श्याम भैया की इस दुकान पर दिनभर छात्रों की चहल-पहल रहती, बल्कि अध्यापक भी ललककर आते और खूब तारीफ करके जाते थे। अच्छी-खासी बिक्री होती। पर फायदा शायद कभी नहीं हुआ। घाटा ही होता था। और फायदे के लिए लगाता भी कौन था? यों भी श्याम भैया फायदे और घाटे से ऊपर की किसी दुनिया के थे। इस दुनिया का गणित वे कभी नहीं समझ पाए। अंत तक नहीं।

इसी तरह नुमाइश देखने का हमारा कार्यक्रम भी उन्हीं के साथ बनता। हमारे शहर शिकोहाबाद में हर साल गरमी के दिनों में जब हमारी छुट्टियाँ होती थीं, नुमाइश लगती थी। इसमें खाने-पीने की चीजों के अलावा सर्कस, मौत का खेल, आइने का तमाशा, जादू वाली औरत, पाँच टाँगोंवाली गाय, हँसी का गोलगप्पा समेत तरह-तरह के अजूबे और खेल होते थे। श्याम भैया प्यार से हमें नुमाइश में घुमाते और जी भरकर खिलाते-पिलाते।

श्याम भैया में जिंदगी थी, जिंदादिली भी। वे निस्संदेह उन ‘किशोरों’ में से थे, जिन्हें उनकी आवारागर्दी के लिए लगातार बुरा-भला कहा जाता है। पर उनमें जितनी ऊर्जा थी, उसका उपयोग हो पाता, उसकी ढंग से तारीफ होती तो न जाने वे कहाँ पहुँचते? श्याम भैया में सचमुच एक दीवानगी थी और यही उन्हें श्याम बनाती थी।

हाँ, यह जरूर है कि श्याम भैया अपनी इसी तथाकथित आवारागर्दी के कारण पढ़ाई में पिछड़ गए थे और निरंतर पिछड़ते जा रहे थे। वे पढ़ाई के नित नए-नए नियम बनाते और उन्हें अपने साथ-साथ मुझ पर भी लागू करते। पर आश्चर्य, पढ़ाई में नंबर मेरे ज्यादा आते और श्याम भैया मुश्किल से पास होते। श्याम भैया कटकर रह जाते, पर उनका रोब जरा भी मुझ पर कम न होता।

५४५ सेक्टर-२९, फरीदाबाद-१४१००८ (हरियाणा)

दूरभाष : ९८१०६०२३२७

—प्रकाश मनु

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