गोपाल की बुद्धि

गोपाल की बुद्धि

क था लड़का। उसका नाम था गोपाल। वह बहुत ही चतुर और समझदार था। एक बार उसकी प्यारी माँ बीमार पड़ी, बहुत बीमार। बहुत दिन हो गए, पर वह अच्छी नहीं हुई। बड़े-बड़े वैद्यों ने देखा, डॉक्टरों ने देखा, हकीमों ने देखा; मगर कुछ न हुआ। गोपाल की माँ अच्छी नहीं हुई। आखिर एक हकीमजी आए। बड़े-बूढ़े, लंबी-लंबी उनकी दाढ़ी, बिलकुल सफेद बाल, पर बड़े समझदार। बहुत देर तक देखने के बाद वे बोले—बीमारी दूर तो हो सकती है, पर इन्हें एक खास तरह के पेड़ की छाल पकाकर देनी होगी। वह पेड़ बहुत दूर बर्फ के पहाड़ों की घाटी में होता है। आजकल वहाँ जाना बड़ा मुश्किल है। भयंकर रास्ते हैं और उनसे भी अधिक भयंकर जानवर वहाँ रहते हैं। जहाँ वह पेड़ है, वहाँ से कुछ पहले बड़े खूँखार भालू रहते हैं। उनसे बचकर जाना बड़ा मुश्किल है। अगर उनसे कोई बचकर चला भी जाए तो आगे चलकर एक शेर रहता है। वह इतना खूँखार है, इतना खूँखार है कि उसके पंजे से कोई आदमी बच नहीं सकता।

यह जानकर कि गोपाल की अम्मा को अच्छा करने की दवा तो है, पर कोई उसे ला नहीं सकता, गोपाल के पिता बहुत दुःखी हुए। यह तो ऐसी ही बात थी कि कोई बच्चों से कहे—देखो बच्चो, मिठाई तो है, पर तुम खा नहीं सकते।

लेकिन गोपाल हिम्मत हारनेवाला नहीं था। कई दिन तक वह इस बारे में सोचता-विचारता रहा। उसने अपने दोस्तों से कहा, ‘‘पुराने जमाने में ऐसी बातें होती थीं, पर आजकल तो दूसरा जमाना है। ऊँ हूँ, मैं वहाँ जाऊँगा और उस पेड़ की छाल लेकर लौटँूगा, कोई बात है। कौन-सी ऐसी जगह है, जहाँ आज आदमी नहीं जा सकता? खतरनाक है तो हुआ करे। वह आदमी ही क्या, जो खतरे से डर जाए!’’

कई दोस्तों ने गोपाल की बात का समर्थन किया। एक तो उसे साथ चलने को तैयार भी हो गया। लेकिन उसके पिता ने सुना तो घबरा उठे। किसी भी तरह वे गोपाल को भेजने को तैयार नहीं हुए, पर गोपाल तो इरादे का पक्का था। उसने पिता को समझाया और वह सब सामान भी दिखाया, जो उसने साथ ले जाने के लिए तैयार किया था। उसने यह भी कहा कि पिताजी, अब तो पंद्रह वर्ष के बच्चे शेर का शिकार खेलते हैं।

आखिर किसी तरह पिता को मनाकर गोपाल उस पेड़ की तलाश में चल पड़ा। साथ में उसका दोस्त अमित भी था। दोनों का दिमाग खूब चलता था। पहले वे रेल में बैठे, फिर बस में। आखिर में चालीस मील पैदल का रास्ता था। यह बड़ा तंग रास्ता था, जो बड़े-बड़े ऊँचे पहाड़ों से होकर एक नदी के किनारे-किनारे जाता था। जरा आँख बची कि कई सौ फीट नीचे नदी में जाकर गिरे उस नदी मेंपत्थर पानी से अधिक थे। पहाड़ी नदियों में पत्थर बहुत होते हैं। पानी थोड़ा होता है, पर बहता बहुत तेज है। सो वहाँ पहुँचकर उन्होंने एक खच्चर लिया। कोई चलने को तैयार नहीं था, पर जब मुँह माँगे दाम मिले तो एक आदमी तैयार हो गया। फिर कुछ लोगों को उनका साहस देखकर उनसे हमदर्दी हो गई थी।

खच्चर लेकर वे आगे बढ़ गए। बढ़ते चले गए, बढ़ते चले गए। उन्होंने बर्फ से लदे तंग रास्ते को पार किया, झूलते पूलों पर से नदी पार उतरे। कहीं-कहीं तो बर्फ के पुल से नदी पार की। चारों ओर आसमान को छूनेवाली बर्फ से ढकी चोटियाँ, घने जंगल, खूँखार जानवर, किसी-किसी दिन तो सारा दिन कुहासा छाया रहे, सूरज के दर्शन ही न हों, आँधी चल पड़े तो आगे न बढ़ने दे। एक दिन के रास्ते में तीन दिन लग जाएँ। पर उन दोनों दोस्तों ने हिम्मत नहीं हारी। खच्चर वाला उन्हें राह बताता जाता था। वह उनसे बहुत खुश था।

आखिर राम-राम करके बीस मील पार कर गए तो भयंकर घाटी में पहुँचे, जहाँ रीछ रहता था। दिन छिप चुका था। बर्फ उड़ रही थी। किसी तरह एक टूटे मकान में उन्होंने डेरा डाला। वे अपने साथ रेडियो और ग्रामोफोन भी ले गए थे। जहाँ कहीं डेरा डालते, वहीं जंगल में मंगल कर देते। यहाँ भी ऐसा ही किया। चाय बनाई, फिर सोने का इंतजाम किया; पर तभी उन्होंने सुना, जैसे रीछ गुर्रा रहा हो। दोनों दोस्त चौंक पड़े। मकान में किवाड़ नहीं थे। उन्होंने तंबू का कपड़ा बाँध रखा था। उसे हटाकर देखा तो दूर कुछ काला-काला-सा चलता दिखाई दिया। बस, गोपाल ने झट कुछ रिकॉर्ड निकाले और ग्रामोफोन पर चढ़ा दिए। अमित ने रेडियो खोल दिया। पक्का गाना हो रहा था। उधर रिकॉर्ड में से शेर की आवाज निकलने लगी, जैसे सचमुच का शेर गरज रहा हो। रीछ मकान के काफी पास आ गया था। गाने की तेज आवाज जो सुनी तो उचककर पीछे हटा। उधर शेर गुर्रा रहा था, गुर्राए चला जा रहा था। रीछ की जान निकलने लगी। घबराकर पीछे दौड़ा। दोनों दोस्त परदे के पीछे से झाँक रहे थे। बड़े जोर से हँसे।

गोपाल और अमित हँस पड़े। वैसे डर तो उन्हें भी लग रहा था। हाँ, वे उसका खयाल नहीं करते थे। आखिर वे किसी तरह उस जगह पहुँचे, जहाँ पर वह पेड़ था, जिसकी छाल लेनी थी। उस जगह से कुछ दूर एक गाँव में उन्होंने डेरा डाला। गाँव क्या था, केवल आठ-दस घर थे। गाँववाले नीचे चले गए थे। वहीं एक खुले दालान में तिरपाल बाँधकर हवा से बचाव कर लिया। उसी के अंदर बैठकर उन्होंने रेडियो लगाया, ग्रामोफोन तैयार किया और टॉर्च भी निकाल ली। वहाँ चारों तरफ कुहरा छा रहा था। कुछ दिखाई नहीं देता था। लेकिन जब रेडियो पर गाना शुरू हुआ तो उन्होंने सुना जैसे कोई गरज रहा है। वे समझ गए कि यही यहाँ का रखवाला शेर है।

रीछ कभी पीछे हटता, कभी आगे बढ़ता; कभी नाचता, कभी कूदता; पर जैसे ही आगे बढ़ता कि शेर की दहाड़ सुनाई पड़ी। आखिर यह हुआ कि रीछ तंग आकर भाग गया। वे ऐसे खुश हुए, मानो खजाना मिल गया। पर बेचारों को सारी रात जागना पड़ा, क्योंकि रीछ फिर आया। पता नहीं वही था या कोई दूसरा। शेर की आवाज सुनकर वह भी तीर की तरह भाग गया। गोपाल जोर से हँसकर बोला, डरपोक कहीं का। अमित तो नाचने लगा और खच्चरवाला! उसने तो ऐसा दृश्य कभी देखा ही नहीं था। वह तो हक्का-बक्का रह गया।

जैसे-तैसे सवेरा हुआ। वे फिर आगे बढ़े। शरीर से थक रहे थे, पर मन से बहुत खुश थे। एक मंजिल तय कर ली। लोगों ने डराया था कि रीछ तुम्हें खा जाएगा, लेकिन वह रीछ भी डरकर भाग गया।

आगे रास्ता और भी खराब था। बर्फ भी ज्यादा थी। कहीं-कहीं तो गड्ढों पर बर्फ जम गई थी। पैर फिसलता था। कहीं नीचे उतरना, कहीं ऊपर चढ़ना; कहीं पत्थर, कहीं मिट्टी, कहीं पानी। लेकिन खच्चरवाला अब भी जी-जान से उनकी सहायता कर रहा था। सो हाँफते-हाँफते वे आगे बढ़ते गए। हवा भी तेज होती गई। कभी ऐसा लगता, जैसे कोई जोर-जोर से नाच-गा रहा है। खच्चरवाले ने कहा, ‘‘यहाँ शिवाजी महाराज नाचते और गाते हैं।’’

गोपाल और अमित हँस पड़े। वैसे डर तो उन्हें भी लग रहा था। हाँ, वे उसका खयाल नहीं करते थे। आखिर वे किसी तरह उस जगह पहुँचे, जहाँ पर वह पेड़ था, जिसकी छाल लेनी थी। उस जगह से कुछ दूर एक गाँव में उन्होंने डेरा डाला। गाँव क्या था, केवल आठ-दस घर थे। गाँववाले नीचे चले गए थे। वहीं एक खुले दालान में तिरपाल बाँधकर हवा से बचाव कर लिया। उसी के अंदर बैठकर उन्होंने रेडियो लगाया, ग्रामोफोन तैयार किया और टॉर्च भी निकाल ली। वहाँ चारों तरफ कुहरा छा रहा था। कुछ दिखाई नहीं देता था। लेकिन जब रेडियो पर गाना शुरू हुआ तो उन्होंने सुना जैसे कोई गरज रहा है। वे समझ गए कि यही यहाँ का रखवाला शेर है। बस, वे तैयार हो गए। गोपाल ने इस मौके के लिए जो रिकॉर्ड रखे थे, वे निकाल लिये। रेडियो पर संगीत आ रहा था। गीत खत्म हुए तो किसी ने वंशी की तान छेड़ दी। खच्चरेवाला बहुत खुश हुआ। पहाड़ी लोग तो स्वयं बाँसुरी बहुत सुंदर बजाते हैं।

तभी गोपाल ने देखा, शेर धीरे-धीरे उनके पास आ रहा है। शेर क्या था? बस, दानव था। देखने में बड़ा खूँखार लगता था। आँखें ऐसी चमकीली जैसे मशाल। उनके दिल काँप उठे, पर उन्होंने हिम्मत से काम लिया। उन्होंने शेर की बोली का रिकॉर्ड चढ़ा दिया। जैसे ही उसकी आवाज निकली, सामने आता शेर चौंका, ठिठका, फिर चारों तरफ देखा और जोर से दहाड़ा। बस, इसी वक्त गोपाल ने बंदूक और तोप की आवाजवाला तवा चढ़ाया। जरासी देर में फटाफट, दनादन गोले छूटने लगे। उस वक्त शेर की हालत देखते बनती थी। कभी इधर देखता, कभी उधर, कभी दहाड़ता, कभी आगे भागता, कभी पीछे; लेकिन जब तोपों की आवाज से वह वन गूँज उठा और चारों तरफ चिल्लाहट मच गई तो शेर वहाँ से भागा। गोपाल इसी ताक में था। उसने बड़ी टॉर्च और छुरा लेकर उसका पीछा किया। अमित ने ग्रामोफोन उठाया। रिकॉर्ड खच्चरवाला लिये था।

शेर आगे और वे पीछे। अचानक शेर ने एकदम छलाँग लगाई, बीच घाटी में जाकर गिरा। गिरते ही वह इतने जोर से दहाड़ा कि कान फटने लगे, घाटी गूँज उठी, सारे वन में खलबली मच गई। बहुत देर तक शेर दहाड़ता रहा, तोपें छूटती रहीं और गोपाल उस पेड़ की छाल उतारता रहा।

आखिर धीरे-धीरे शेर की दहाड़ कम हुई। उधर सूरज भी कुछ चमका। उन्होंने देखा, दूर नदी के उस पार एक और शेर बेचैनी से घूम रहा है। खच्चरवाले से कहा, अब यहाँ मत रुको। लौट चलो। रात हो गई तो सर्दी के मारे गल जाएँगे। फिर यहाँ तो और भी शेर हैं, बाप रे...।

फिर तो उन्होंने ऐसी जल्दी की कि एक दिन में दस मील का भयानक रास्ता पूरा कर लिया। अब उतार था न रीछ मिले, पर वे नदी पार थे। रात तक वे एक सुरक्षित जगह पर आ गए। अब तो वे जैसे हवा में उड़ रहे थे। खुशी के मारे सब तकलीफ भूल गए थे। जब वे वहाँ पहुँचे, जहाँ से खच्चर लिया था तो लोगों को यकीन नहीं आया। लेकिन खच्चरवाले ने जब सारी बातें उन्हें बताईं तब तो सब जगह उनकी तारीफ होने लगी। माँ-बाप तो उन्हें देखकर जैसे स्वर्ग पा गए। बहुत खुश हुए। गोपाल ने वह छाल पकाकर माँ को पिलाई। देखते-देखते चार-पाँच दिन में माँ अच्छी होने लगी। इससे सबको बड़ी खुशी हुई। पर गोपाल और अमित के आनंद का तो कहना ही क्या था!

—विष्णु प्रभाकर

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