ह्यूस्टन में 'हाऊडी मोदी' कार्यक्रम

‘हाऊडी मोदी’ का अमेरिका के ह्यूस्टन में आयोजन अपने आपमें एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। इसको ‘एक व्यक्ति को महिमामंडित करने का प्रयास’ कहकर नकारा नहीं जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं बार-बार इस बात को उजागर किया है कि यह उनके पीछे १३० करोड़ भारतीयों का जो समर्थन है, उसका सम्मान है। जिस प्रकार नरेंद्र मोदी ने विदेशों में रहनेवाले भारतीय मूल के निवासी, विदेशों में कार्यरत भारतीय नागरिक और अधिकतर भारतीय मूल के वे लोग, जो अब अन्य देशों के नागरिक हैं, उनको भारत की समस्याओं से जोड़ने की कोशिश की है और ऐसा वे निरंतर कर रहे हैं। लेकिन पहले ऐसे जोश के साथ कभी नहीं हुआ। वे लोग काफी समर्थ हैं, उन्होंने अपने परिश्रम व मेधा से वहाँ के समाज में एक स्थान बनाया है। उनकी भी आकांक्षा तो रहती ही है कि किसी प्रकार उनका संबंध उनकी मूल संस्कृति से जुड़ा रहे। उनको भी यह भान होता है कि उनका अपना मूल देश, जहाँ से वे या उनके वंशज आए हैं, उनको अपना मानता है तथा उनके महत्त्व को स्वीकार करता है। अपनी जड़ों से जुड़ने की एक आंतरिक इच्छा सभी की रहती ही है। नरेंद्र मोदी ने इस मानसिकता, भावना को समझा है। वे देशहित में इसका उपयोग करने की कोशिश करते हैं। वे सब लोग एक प्रकार से भारत के अनौपचारिक राजदूत की तरह काम कर सकते हैं। भारत की समस्याओं को ठीक ढंग से समझकर आवश्यकतानुसार उनको प्रस्तुत कर सकते हैं। वे एक लॉबी का भी काम कर सकते हैं। भारत की नीतियों के विषय में जो भ्रांतियाँ पैदा की जाती हैं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनका निराकरण कर सकते हैं। भारत के दूतावास के काम में सहयोग दे सकते हैं। यह सब तभी संभव होता है, जब उनसे विचारों का आदान-प्रदान लगातार होता रहे। उनको भी गर्व होता है, जब भारत का प्रधानमंत्री उनसे मिलता है, उद्बोधन करता है। एक विश्वास का सूत्र निर्मित होता है। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी जहाँ भी जाते हैं, भारतीय मूल के व्यक्तियों से संपर्क को महत्त्व देते हैं, उन्हें जानकारी भी देते हैं कि भारत कैसे बदल रहा है, किस तरह उन्नति कर रहा है और आगे की क्या संभावनाएँ हैं।

ह्यूस्टन का आयोजन स्थानीय व्यक्तियों और संस्थाओं ने आयोजित किया। आयोजन अत्यंत शानदार रहा। स्टेडियम में पचास हजार से अधिक लोगों की उपस्थिति रही। रंग-बिरंगे सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। माँ भारती की विविधता तथा भव्यता का प्रदर्शन हुआ। एक अतीव उत्साह और हर्ष का वातावरण बना। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने उद्बोधन में भारत के भविष्य, नीतियों, कार्यक्रमों आदि अनेक पक्षों की चर्चा की, जिसे श्रोताओं ने बहुत ध्यान से सुना। पूरे विश्व का ध्यान भी इस आयोजन की ओर गया। उनको भी भारत की उपलब्धियों, बहुमुखी क्षमता और संभावनाओं का एहसास हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति टं्रप आयोजन में सम्मिलित हुए। अमेरिका के दोनों दलों, रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, के कई सदस्य भी उपस्थित हुए। उन्होंने भी अपने विचार रखे। ये सब बातें भारत की उभरती हुई शक्ति को रेखांकित करती हैं। भारत की नीति तो सब देशों से आत्मसम्मान व बराबरी के साथ दोस्ती और भाईचारे के संबंध बनाने की है। ह्यूस्टन के समारोह के बारे में पाकिस्तान ने बहुत कुप्रचार किया, पर उसका कोई असर नहीं हुआ। भारत में कुछ दलों ने भी आलोचना की। आशा थी कि राष्ट्रपति ट्रंप, भारत की जो व्यापार संबंधी करों की कठिनाइयाँ हैं, उनके बारे में कुछ कहेंगे, पर वह नहीं हुआ। आयोजन भारतीय मूल के लोगों ने किया था। इसका उद्देश्य किसी सौदेबाजी का नहीं था। भारत और अमेरिका के बीच जो भी मतभेद हैं, उनके समाधान के दूसरे फोरम हैं।

यह भी ध्यान देने की बात है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की जनरल एसेंबली में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने अनुच्छेद ३७० और जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को निरस्त करने और दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभक्त करने की बडे़ कटु व अभद्र शब्दों में आलोचना की। अपने नियत समय से अधिक बोलते रहे। उनकी अनर्गल बातों का प्रधानमंत्री ने कोई संज्ञान ही नहीं लिया। उनका सकारात्मक भाषण तो विश्व के सामने उपस्थित खतरों और समस्याओं पर केंद्रित था। जम्मू-कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है। अंतरराष्ट्रीय फोरम पर इसकी चर्चा बेमानी है। वैसे पहले भी भारतीय राजनयिक पाकिस्तान के कुतर्कों का समुचित उत्तर दे चुके हैं। अपने दौरे में भारत के विदेश मंत्री भी इस विषय में भारत के दृष्टिकोण को अन्य देशों के समक्ष स्पष्ट कर चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी भी अपने अनौपचारिक विचार-विमर्श में अनेक देशों के राष्ट्राध्यक्ष एवं प्रधानमंत्रियों को स्थिति से अवगत कराते रहे हैं। इमरान की झुँझलाहट ने बकवास का रूप ले लिया। उन्हें मानना पड़ा कि पाकिस्तान की बात अन्य देश नहीं सुन रहे हैं। उन्होंने आणविक युद्ध की संभावना का जिक्र किया। तरह-तरह के अपशब्द प्रधानमंत्री मोदी के लिए कहे। यह उनके संस्कारों का ही सूचक है। अधिकतर देश भारत के दृष्टिकोण को समझते हैं। केवल टर्की और मलेशिया के प्रधानमंत्री ने भारत के जम्मू-कश्मीर विषयक कदम की आलोचना की। इसका उत्तर भारत ने दे दिया। कुर्दों के विरुद्ध टर्की की काररवाई पर भारत ने टिप्पणी की। भारत आवश्यकतानुसार और काररवाई करेगा। मलेशिया के प्रधानमंत्री का भाषण आश्चर्यजनक था। उनसे प्रधानमंत्री मोदी की बातचीत हो चुकी थी। भारत मलेशिया के पाम ऑयल का सबसे बड़ा खरीददार है। शायद भारत के लिए अब यह संभव न हो। कुछ और कदम भी उठाए जा सकते हैं, जिसका मलेशिया की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पडे़गा। जहाँ तक चीन का प्रश्न है, वह तो पाकिस्तान को अच्छे और बुरे दोनों समय का दोस्त मानता है। चीन भारत को न्यूक्लियर सप्लायर गु्रप में शामिल करने का विरोध करता है। सुरक्षा परिषद् में भारत को स्थायी सदस्यता मिले, चीन इसका भी विरोधी है। हालाँकि भारत ने ही सबसे पहले चीन को सुरक्षा परिषद् की सदस्यता की पेशकश की थी।

इसी परिपे्रक्ष्य में हमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मलप्पुरम में हुई अनौपचारिक वार्त्ता को देखना होगा। एक बडे़ पड़ोसी देश से सहयोग और समझौते के रास्ते तो हमेशा तलाश करने होंगे। यह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की माँग है। साथ ही सतर्कता एक राष्ट्रीय कर्तव्य है।

मलप्पुरम में राष्ट्रपति शी का भव्य आतिथ्य

बुहान के बाद दूसरी अनौपचारिक बैठक प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी के बीच मलप्पुरम में हुई। बुहान की सद्भावना को बरकरार रखना और बढ़ाना भी आवश्यक है। चीन के साथ अनेक विषयों पर मतभेद भी हुए। मलप्पुरम एक प्राचीन ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल है। प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति शी का बडे़ उत्साह से स्वागत किया, मेहमानदारी की। वे स्वयं अपने अतिथि को मलप्पुरम के महत्त्व को बतलाने के लिए साथ ले गए। प्रधानमंत्री मोदी ने तमिलनाडु की वेष्ठि पहनी हुई थी। उनको कहाँ क्या कैसे वस्त्र पहनने चाहिए, इसका बड़ा भान या समझ है। यह सब टी.वी. पर दिखाया गया और समाचार-पत्रों में भी आया। इस अनौपचारिक बैठक में प्रयास यह था कि सहअस्तित्व व सहयोग के स्तर को और ऊपर उठाया जाए। मतभेदों को दूर करते हुए बातचीत में जम्मू-कश्मीर का मसला नहीं उठाया गया। सबसे महत्त्वपूर्ण निर्णय था एक नई व्यवस्था की स्थापना करना, जो व्यापार एवं निवेश के मामलों को सुलझा सके। आतंकवाद के विषय में बातचीत हुई। चीन ने भारत को आश्वासन दिया कि बढ़ते हुए व्यापारिक असंतुलन को कम किया जाएगा। भारत का निर्यात किस प्रकार बढ़ाया जा सकता है, इस पर बातचीत हुई। दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों की अलग से बैठकें हुईं। भारत के प्रतिनिधिमंडल में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस. जयशंकर प्रमुख थे। मोदी और शी के बीच सुरक्षा सहयोग के बारे में बातचीत हुई। बैठक बडे़ सौहार्दपूर्ण और आशावाद के वातावरण में संपन्न हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह बैठक चीन और भारत के संबंधों में एक नए युग की प्रवर्तक होगी। शी ने कहा कि बातचीत खुले दिल से हुई। २०२० का वर्ष भारत और चीन के बीच सांस्कृतिक एवं ‘पीपुल टू पीपुल’ अर्थात् जन-जन के बीच का कहा जाएगा। तब भारत अपना ७५वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाएगा, साथ ही चीन भी विदेशी प्रभाव से मुक्त रिपब्लिक ऑफ चाइना के स्थापना की ७०वीं जयंती को रेखांकित करेगा। यह कथन ‘अगली शताब्दी एशिया की शताब्दी कही जाएगी’ तभी संभव होगा, जब एशिया के दो देश, जिनकी अति प्राचीन सभ्यताएँ हैं, सहयोग-सहकार एवं अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार व्यवहार करेंगे।

विश्वव्यापी मंदी और भारत

देश मंदी के दौरे से गुजर रहा है। यह मंदी विश्वव्यापी है। कम या अधिक सभी देशों के सामने यह समस्या है। विश्व में भारत पाँचवीं या चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है। इसीलिए हमारे लिए यह एक चिंता का विषय है। प्रधानमंत्री मोदी ने देश के समाने तीन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य रखा है। इसे प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि हर क्षेत्र का सहयोग मिले। बेरोजगारी, किसानों के कष्ट, अन्य समस्याएँ पिछले पाँच वर्ष में ही पैदा नहीं हुई हैं। सरकार अपनी अनेक योजनाओं द्वारा उनके निराकरण के लिए प्रयत्नशील है, ताकि रोजगार के नए-नए मार्ग निकल सकें। अनुभव के बाद उनमें जो खामियाँ हैं, उनको दूर करने की भी चेष्टा हो रही है। जहाँ तक देश के आर्थिक मूलभूत तत्त्वों की बात है, वे पूर्णतया सुरक्षित हैं। इस बात को क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संगठन भी मानते हैं और उनका भी आकलन है कि भारत की आर्थिक प्रगति एक वर्ष बाद पुनः गति पकड़ेगी। प्रधानमंत्री ने परिवार नियोजन का जो प्रश्न उठाया है, अधिकतर राजनीतिक दल आपातकाल के अनुभव के बाद से उससे कतराते रहे हैं। किंतु यह एक समस्या है, जिसका सामना संवेदनशीलता और सुविचारित ढंग से करना होगा। इसमें राज्य सरकारों की भूमिका अहम है। पॉपुलेशन मिशन की स्थापना वाजपेयीजी की सरकार के समय की गई थी, पर वह अपने लक्ष्य-प्राप्ति में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त नहीं कर पाई है। इस पर पुनर्विचार करना होगा। केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि ने कैसे जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की है, यह हिंदीभाषी प्रदेशों की सरकारों को गंभीरता से समझकर उनसे नसीहत लेनी चाहिए।

मंदी से निपटने के लिए विभिन्न क्षेत्रों की समस्याओं के अध्ययन के पश्चात्, वहाँ के भागीदारों और स्टेकहोल्डर्स से विचार-विमर्श कर वित्त मंत्री नए-नए कार्यक्रमों और सुविधाओं की व्यवस्था कर रही हैं। बहुत सी सुविधाएँ उद्योग समूहों को दी जा रही हैं। कर आदि में छूट दी गई है, जो मानसिक बाधा पैदा कर रहे थे। भारत के बजट को ‘गैंबल इन मानसून’ कहा जाता है, अर्थात् मानसून कैसा है, उस पर आर्थिक व्यवस्था की गति निर्भर करती है। इस वर्ष का मानसून बहुत ही विचित्र, अस्थिर रहा है—कहीं बाढ़, कहीं सूखा। यही नहीं, कुछ स्थानों पर दो-दो बार बाढ़ आई। ऐसे प्राकृतिक कोप समय-समय पर आते रहते हैं, उनसे जूझने की तैयारी मजबूत होनी चाहिए। खेद है कि दुर्घटना के समय तो बहुत सक्रियता दिखती है और फिर वही शिथिलता पसर जाती है। यह चक्र चलता रहता है, पर उसके कुप्रभाव से बचने के लिए प्रशासनिक क्षमता विकसित होनी चाहिए।

मंदी की समस्या के समाधान के लिए माँग पक्ष तथा आपूर्ति पक्ष, दोनों की कठिनाइयाँ देखना जरूरी है। सरकार इसके लिए कोशिश कर रही है। जो माल बनाते हैं, वे क्या चाहते हैं और जहाँ इस माल की खपत होती है, खरीदारों को क्या दिक्कतें हैं, उनको देखना भी जरूरी होता है। सरकार ने यह नीति अपनाई है। रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में कमी की है। मकान बनाने, खरीदने अथवा अन्य वस्तुओं के लिए नए नियम और सुविधाएँ घोषित की हैं। प्रयत्न है कि त्योहारों के इस मौसम में उसमें गतिशीलता आए, माँग और आपूर्ति में संतुलन बैठ सके, यह प्रयोग जारी है।

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अर्थव्यवस्था में कुछ बड़े परिवर्तन आने चाहिए, जैसे अनिवेश या डिसइनवेस्टमेंट को बढ़ावा देना चाहिए। बहुत से जो सरकारी उपक्रम हैं, उनको निजी सेक्टर में देना चाहिए। उनका मत है कि सरकार की आर्थिक सुधारों की गति शनैः-शनैः वाली है, जो अधिक कारगर और फायदेमंद नहीं है। हम समझते हैं कि सरकार दोनों रास्तों के समन्वय का प्रयास कर रही है, कहीं धीरे-धीरे और कहीं तेज गति से। कोई भी सरकार नहीं चाहेगी कि ऐसा परिवर्तन एक झटके में हो, जिससे राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता व असंतोष पैदा हो। फिर भी हम समझते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को इस दिशा में और अधिक विचार-विमर्श करना पड़ेगा। बहुत से विशेषज्ञ, जो प्रधानमंत्री के प्रशंसक हैं, जैसे विख्यात अर्थशास्त्री जगदीश भगवती, उनका भी कहना है कि कुछ बड़े कदम उठाए जाने चाहिए, निराशा का कोई प्रश्न नहीं है, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था के मौलिक तत्त्व सही और मजबूत हैं। इससे देश में विश्वास का वातावरण निर्मित होगा। इस विषय में पत्र-पत्रिकाओं में काफी वाद-विवाद चल रहा है। यह अच्छा है, क्योंकि हर पहलू के विषय में जानने के बाद ही एक उचित निर्णय लिया जा सकता है।

डॉ. स्वामी और उनकी पुस्तक

इस विषय में डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की एक नई पुस्तक ‘Reset: Reclaiming India’s Economic Legacy’ (एलेफ-रूपा, दिल्ली) प्रकाशित हुई है। डॉ. स्वामी अर्थशास्त्र के विद्वान् हैं। उन्होंने हावर्ड में पढ़ाया है। चीन की अर्थव्यवस्था का उनका गहरा अध्ययन है। वे चंद्रशेखर मंत्रिमंडल में मंत्री रहे और आज राज्यसभा के सदस्य हैं। डॉ. स्वामी अपना दृष्टिकोण, अपने विचार स्पष्टता से ही नहीं, कभी-कभी जरूरत से अधिक खरेपन से रखते हैं। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में उन्होंने छह अध्यायों में स्थिति का विश्लेषण किया है और अपने सुझाव रखे हैं। क्यों और कैसे, जो हमारा हक था, हमारी थाती थी, उसको हमने खोया और कैसे प्राप्त किया जा सकता है! भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरियाँ और भविष्य की संभावनाएँ, दोनों डॉ. स्वामी ने रेखांकित की हैं। पुस्तक विचारोत्तेजक है। यह पुस्तक न केवल अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों को, वरन् नीति-निर्धारकों को भी पढ़नी चाहिए। अपने विचारों और तर्कों को उन्होंने आँकड़ों के साथ प्रस्तुत किया है। यह आवश्यक नहीं है कि उनके विवेचन या उनके सुझावों से हर व्यक्ति शत-प्रतिशत सहमत हो, पर इससे तो इनकार नहीं किया जा सकता है कि अपनी सोच के अनुसार उन्होंने एक विचारणीय दस्तावेज प्रस्तुत किया है। नीति आयोग का ध्यान इस पुस्तक के प्रति आकर्षित होना चाहिए। डॉ. स्वामी के व्यक्तित्व में एक स्वाभाविक अक्खड़पन है, पर अर्थशास्त्र की समस्याओं में उनकी गहरी पैठ है, यह मानना पड़ेगा। उनकी भाषा की तल्खी अथवा कहीं-कहीं विचारों की कटुता के प्रस्तुतीकरण से भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है। पुस्तक की भूमिका में उन्होंने अपनी सोच के संकेत दिए हैं। प्रकाशक एक सामयिक और विचारशील पुस्तक के प्रकाशन के लिए साधुवाद के पात्र हैं।

भ्रष्टाचार और प्रशासनिक क्षमता

हाल ही में समाचार आया है कि स्विस सरकार ने करार के अनुसार भारतीय नागरिकों के खातों की और जानकारी भारत सरकार को दी है। कर-चोरी का पैसा स्विट्जरलैंड के बैंकों में जमा होता रहा है। इन खातों की जाँच-पड़ताल वित्त मंत्रालय कर रहा है, और जानकारी शीघ्र ही सामने आएगी। भ्रष्टाचार, कर-चोरी और मादक वस्तुओं की तस्करी तथा व्यापारियों और अन्य पेशेवरों से डरा-धमकाकर धन वसूलने का अवैध पैसा स्विस बैंकों में जमा होता रहा है। पहले वे उसकी जानकारी नहीं देते थे। अब स्थिति में परिवर्तन आता जान पड़ता है। खाताधारकों में भारत के राजनेताओं, भ्रष्ट अधिकारियों और उद्योगपतियों आदि के नामों की अफवाहें उड़ती रही हैं। सरकार चेष्टा कर रही है, शीर्ष न्यायालय का दबाव भी है और नरेंद्र मोदी सरकार काफी समय से क्रियाशील है, पर संतोषजनक नतीजे नहीं निकल पाए हैं। यह रोग पुराना है। शायद वह अब संभव हो सकेगा।

भ्रष्टाचार तेरे रूप अनेक

भारतीय नागरिकों को कितना धन विदेशी बैंकों में जमा है। इसका आकलन करना कठिन है। अलग-अलग आँकड़े आते हैं। कुछ आँकड़े बहुत बढ़ा-चढ़ाकर भी दिए गए हैं। जो भी हो, यह तो स्पष्ट है कि देश की आर्थिक व्यवस्था पर इसका हानिकर प्रभाव पड़ता है। यही नहीं, साधारण जनता अपने कर आदि का कानून और नियमों के अनुसार भुगतान करती है, इससे उनका सरकार के प्रति मोहभंग होता है। यह लोकतंत्र के लिए गंभीर समस्या बन सकती है।

इस प्रकार के प्रकरणों में प्रशासन की कार्यक्षमता पर भी प्रश्न उठते हैं। राजनेताओं, अधिकारियों, उद्योगपतियों एवं व्यापारियों तथा अपराधियों की साँठ-गाँठ और मिलीभगत की भी चर्चा प्रायः होती है। जैसे-जैसे इलाज की कोशिश होती है, बीमारी बढ़ती जाती है। इसका बुरा प्रभाव है कि आम जन व सरकार के बीच अविश्वास की खाई और चौड़ी होती जाती है। आवाज उठती है, सभी चोर हैं। समाचार मिलते हैं कि भ्रष्टाचार पंचायतों तक पहुँच गया है। एक ओर माँग कि अधिकारों का विकेंद्रीकरण हो, दूसरी ओर भ्रष्टाचार का विकेंद्रीकरण। न्यायपालिका, जिसका हम सब अत्यंत आदर करते हैं, वह भी अछूती नहीं रही। सर्वोच्च न्यायालय के कुछ पूर्व न्यायाधीशों के नाम सर्वोच्च न्यायालय को दिए गए थे। वे नाम कुछ पत्रिकाओं में भी आए थे, पर उसके विषय में कोई जानकारी नहीं कि आगे हुआ क्या? उड़ीसा के एक निवर्तमान जज एक मेडिकल कॉलेज की अनुचित सहायता करने की कोशिश में अब कानून के शिकंजे में हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश से शिकायतों के कारण उनका मुकदमे सुनने का अधिकार मुख्य न्यायाधीश ने वापस ले लिया। अब शायद उनके खिलाफ विधिवत् जाँच हो रही है।

कुछ न्यायाधीशों ने इस्तीफा देकर अपने बचने का रास्ता निकाल लिया। सेवानिवृत्ति के बाद की सुविधाएँ तो उन्हें मिलती ही रहेंगी। ऐसे और बहुत से उदाहरण हैं। किंतु अभी भी जनता न्यायालय के प्रति आशा भरी निगाहों से देखती है, क्योंकि न्याय का वही अंतिम सहारा है। केंद्र सरकार ने भी कुछ आई.ए.एस. और आई.पी.एस. अधिकारियों को संविधान के एक विशेष अनुच्छेद के तहत सरकारी सेवा से निकाल दिया है। सरकार ने दो-तीन दर्जन इनकम टैक्स, एक्साइज और कस्टम (सीमा शुल्क) विभाग के अधिकारियों के खिलाफ काररवाई की है। यह अच्छा कदम है। साधारण जनता को प्रतीत होता है कि सरकार की यह काररवाई उनकी शंकाओं की पुष्टि करती है। ऐसी नकारात्मक सोच के निराकरण की आवश्यकता है।

इसी मास अक्तूबर में दक्षिण अफ्रीका में भ्रष्टाचार का एक बड़ा नेटवर्क चलाने वाले भारतीय मूल के तीन बंधुओं—अजय गुप्ता, अतुल गुप्ता, रजिश गुप्ता और उनके सहयोगी सलीम इसा पर पाबंदी लगाई है। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्राध्यक्ष को तो इनके साथ भ्रष्टाचार में संलिप्त होने के समाचार आते ही जनांदोलन के कारण इस्तीफा देना पड़ा। अब गुप्ता बंधुओं ने अपना कारोबार दुबई में स्थानांतरित कर लिया है। ऐसे लोगों के कारण भारतीय व्यापारी और उद्योगपति, जो नियमानुसार काम करते हैं, व्यर्थ में शंका के घेरे में आते हैं। ये गुप्ता बंधु कुछ समय पहले परिवार में बड़ी शान-शौकत से दो शादियाँ करने के कारण सुर्खियों में थे। सब कानून और नियमों को तोड़कर विवाह-कार्यक्रम उत्तराखंड में संपन्न हुआ था। पर्यावरण का पूरी तरह निषेध किया गया। उनके वैवाहिक कार्यक्रम के कारण प्रदूषण बुरी तरह बढ़ा। अपने पैसे के रुआब अथवा राजनेताओं और अधिकारियों की साँठ-गाँठ के कारण उनको ऐसे कार्यक्रम करने की इजाजत मिली, जो प्रतिबंधित थे। स्थानीय लोगों ने जब आंदोलन किया, तब प्रशासन की नींद टूटी। कुछ नोटिस दिए गए, जुरमाने देने के कुछ आदेश जिलाधिकारी तथा अन्य संबंधित अधिकारियों ने जारी किए। आगे हुआ क्या, कुछ पता नहीं।

उत्तराखंड पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है, किंतु जब शादी का आयोजन हो रहा था, तब अधिकारी सो रहे थे या कानून और नियमों की अवहेलना की ओर से आँखे मूँदकर शादी में मालपुआ खा रहे थे। जैसे सत्ता के मद में चूर सांसद या विधायक अपने को कानून से ऊपर समझने लगते हैं, उसी प्रकार धन के मद में चूर गुप्ता बंधु जैसे लोग अपने को कानून से ऊपर मानते हैं। वे समझते हैं कि सबकुछ और हर कोई पैसे से खरीदा जा सकता है। इस भ्रम को तोड़ने की आवश्यकता है। सरकार और अधिकारियों का तो यह सीधा दायित्व है, लेकिन समाज को ऐसे लोगों की प्रतारणा करनी होगी। जहाँ गरीब बच्चे और माताएँ कुपोषण के शिकार हों, गाँवों और दूरदराज के क्षेत्रों में समुचित चिकित्सा का अभाव हो, वहाँ इस प्रकार का दिखावे का खानपान एक पाप है, एक घृणित अपराध है। प्रधानमंत्री मोदी की स्वच्छता, प्रदूषण रोकने, खाद्य पदार्थ बरबाद न हों, इन सब अपीलों की अवमानना, अवहेलना है। खुशी के अवसर पर पहले लोग दान देते थे, गरीबों को खाना खिलाते थे। आज इस प्रकार के धनवान अपना झूठा बड़प्पन दिखाने और नियमों के उल्लंघन को अपना अधिकार मानते हैं। जब कानून स्वयं को असहाय महसूस करने लगे तो जन-जागरण और जन-आंदोलन का ही मार्ग दिखाई देता है।

कितना नैराश्य का वातावरण दिखाई देता है, जब पढ़ते हैं कि फोर्टिस हेल्थ केयर के पूर्व प्रवर्तक शिवेंदर सिंह एवं तीन अन्य व्यक्तियों को रेलिगेयर फिनवेस्ट लिमिटेड के कोष में २३९७ करोड़ के कथित हेराफेरी के आरोप में दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने गिरफ्तार किया है। साथ ही शिवेंदर के बड़े भाई मालवेंदर सिंह, जो फरार चल रहे हैं, उनके खिलाफ ‘लुक आउट नोटिस’ जारी था, वह भी पकडे़ गए हैं। पंजाब-महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक के घोटाले के समाचार आए हैं। एक एच.डी.आई.एल. नामक कंपनी को कर्ज दिया गया। दोनों के ऑडिटर एक थे। ऐसे में हेराफेरी का काम आसान हो जाता है। पी.एम.सी. के उच्चाधिकारी जेल में हैं और पी.एम.सी. के उपभोक्ता सकते में। पी.सी.एम. के तीन खातेधारकों की सदमे में हृदयाघात से मृत्यु हो गई। एच.डी.आई.एल. के अध्यक्ष के बारे में टीवी और अखबारों में तसवीरें आई थीं। उनमें एक थी समंदर पर बना दो एकड़ में विशाल मकान, जिसमें बाईस कमरे हैं। समझा जा सकता है कि कैसे आमजन के पैसे का दुरुपयोग होता है और उनके विश्वास को धक्का लगता है। कुछ राजनेताओं के नाम भी आए हैं, पर उनका कहना है कि यह राजनीति से प्रेरित है। राजनीति से प्रेरित वाक्य तो राजनीतिज्ञों का कवच बन गया है।

गाजियाबाद में एक जमीन के आवंटन के घोटाले में करीब ३७ छोटे-बड़े अधिकारी चिह्नित किए गए हैं, जिनमें कुछ रिटायर हो चुके हैं। अधिकतर अधिकारी इंजीनियर हैं, जिनकी पढ़ाई पर जनता का धन व्यय होता है, इस आशा से कि वे देश के विकास में साझेदार होंगे। इसी प्रकार का प्रकरण नोएडा के शाहबेरी का है, जहाँ १७ जुलाई, २०१८ में निर्माणाधीन इमारत के गिरने से नौ लोगों की मौत हो गई। इसके निर्माण में न ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से मंजूरी ली गई और न सुरक्षा मानकों का ध्यान रखा गया। अब इन बिल्डरों की ३० करोड़ की संपत्ति कुर्क की गई है। केरल में भी शीर्ष न्यायालय के आदेश और बार-बार रुग्णता प्रकट करने के बाद वे इमारतें गिराई जा रही हैं, जो समुद्री किनारे के नियंत्रक नियमों की अनदेखी करके बनाई गई थीं। आखिर ऐसी नौबत आती क्यों है? ऐसे मामलों का जिक्र करना व्यर्थ है। सवाल यह है कि जब अनधिकृत रूप से मकान बनते हैं, सरकारी जमीन पर नाजायज कब्जा होता है, तब संबंधित अधिकारी क्यों हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहते हैं। यह सब यकायक नहीं हो जाता है। इसीलिए सवाल खड़ा होता है—शासन की अक्षमता या गठबंधन का। निगरानी का भी अभाव है। यह भी स्मरण रखना है कि अदालतों के आदेश से या स्वयं प्रशासन के द्वारा जब तोड़-फोड़ होती है तो जन-संपत्ति का ही नुकसान होता है। दिल्ली में करीब ५० सांसदों ने नोटिसों के बाद भी सरकारी आवास खाली नहीं किए। कुछ सांसदों को अतिथि के नाते फ्लैट दिए गए थे, वे भी डरे हुए हैं। सरकार को मजबूरी में पुलिस द्वारा ये मकान खाली कराने पड़ रहे हैं। इससे सांसदों की छवि कैसी बनेगी, इन लोगों को कोई चिंता नहीं है। बेशर्मी ही इनका सहारा है। आश्चर्यजनक यह है कि कमलनाथ, जो अब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी, जिनके पास मकानों की, सुविधाओं की कमी नहीं है, उन्होंने भी एक मास के अंदर अपने दिल्ली के निवास-स्थान खाली नहीं किए। खाली तब किए जब नोटिस मिले और जबरदस्ती पुलिस द्वारा खाली कराने की धमकी प्राप्त हुई। आज के सांसद होटलों में या अन्य स्थानों में ठहरे हुए हैं। कैसी नैतिकता है ऐसे लोगों की? राज्य सरकारों और केंद्र सरकार को भ्रष्टाचार की समस्या से निपटने के लिए कमर कसनी पड़ेगी। अधिकारियों की लापरवाही, अक्षमता और मिलीभगत पर नकेल लगानी होगी। समय-समय पर निगरानी की व्यवस्था करनी होगी। इन मामलों की जाँच में शिथिलता नहीं होनी चाहिए। साथ-ही-साथ कोई भी पार्टी हो, राजनीतिक हस्तक्षेप रोकने के लिए आत्मनियंत्रण करना होगा। विशेषज्ञों और प्रशासन में सुधार के सुझाव समय-समय पर अनेक कमीशनों ने दिए हैं। अभाव है तो राजनीतिक इच्छाशक्ति का, सुझावों का नहीं। अगर राजनीतिक स्तर पर इच्छाशक्ति दृढ़ होगी, तभी इस दिशा में सार्थक कार्यान्वयन संभव है। वैसे रामभरोसे तो हम हैं ही।

राजनाथ सिंह और राजनीति

राजनाथ सिंह का स्थान आज देश के प्रमुख राजनेताओं में है। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहली सरकार में वे गृहमंत्री रहे और अब वे रक्षा मंत्री हैं। दोनों मंत्रालय अत्यंत संवेदनशील हैं और एक-दूसरे के पूरक, जहाँ तक देश की शांति-व्यवस्था और सीमाओं की सुरक्षा का प्रश्न है, राजनाथ सिंह का प्रोटोकॉल अथवा कैबिनेट की वरिष्ठता के क्रम में प्रधानमंत्री के उपरांत दूसरा स्थान है। ऐसे राजनेता के व्यक्तित्व और पृष्ठभूमि जानने के विषय में उत्सुकता स्वाभाविक है। यह संतोष का विषय है कि पहली बार राजनाथ सिंह की अंग्रेजी में लिखित विस्तृत जीवनी प्रकाशित हुई है। पुस्तक के लेखक हैं गौतम चिंतामणि और प्रकाशक हैं पेंगुइन रैंडम हाउस। लेखक मुख्यतः फिल्म हिस्टोरियन हैं और इस क्षेत्र में उनकी कई पुस्तकें हैं। उससे हटकर पहली बार लेखक ने एक राजनीतिज्ञ की जीवनी लिखने का प्रयास किया है। वे सी.वाई. चिंतामणि के प्रपौत्र हैं, जो अपने समय के प्रसिद्ध लेखक व पत्रकार रहे। पं. मालवीय एवं मोतीलाल नेहरू द्वारा स्थापित इलाहाबाद (अब प्रयागराज) ‘द लीडर’ पत्र के वे अंत समय तक संपादक रहे। वे कुछ समय संयुक्त प्रांत में शिक्षा मंत्री रहे, पर सरकार से मतभेद होने पर इस्तीफा दे दिया। उनके लेखन की विश्वसनीयता का पता इस बात से चलता है कि श्री सी.वाई. चिंतामणि की टिप्पणियाँ विदेशों के समाचार-पत्रों में भी छपती थीं और ब्रिटिश संसद् में भी उद्धृत होती थीं। वे उदार दल के विशिष्ट नेताओं में से थे। उन्होंने कई पुस्तकों का संपादन किया एवं लिखीं भी।

गौतम चिंतामणि ने अपनी पुस्तक राजनाथ सिंह की जीवनी का नामकरण किया है—‘राजनीति’, क्योंकि लेखक का मत है कि राजनाथ सिंह की रजानीति मूल्यों से प्रेरित है। वे राजनीति को जनसेवा का साधन मानते हैं, अपने स्वार्थ का नहीं। उनका विश्वास नीति में है, अनीति में नहीं। उनका जन्म एक साधारण किसान राजपूत परिवार में १० जुलाई, १९५१ को मामौरा गाँव में हुआ, जो उस समय वाराणासी जिले में था, अब चंदौली में। उनके पिता रामवदन सिंह एक स्वतंत्रता सेनानी थे। वे प्रतिष्ठावान व आत्मसम्मानी व्यक्ति थे, जिनका आदर जिले भर के लोग करते थे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पं. कमलापति त्रिपाठी से उनके बड़े नजदीकी संबंध थे, पर स्वतंत्र भारत में वे राजनीतिक जीवन से अलग हो गए। त्रिपाठीजी साल में एक-दो बार अवश्य उनके यहाँ आते थे। उनके बहुत कोशिश करने पर भी रामवदन सिंह ने राजनीति में भागीदारी स्वीकार नहीं की। उनके तीन पुत्र और चार कन्याएँ थीं।

राजनाथ सिंह की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई। उनके पिता हर विषय पर जानकारी देते थे। देश के इतिहास, स्वराज संघर्ष, संस्कृति और विरासत के संबंध में विशद जानकारी पिता से प्राप्त हुई। इससे राजनाथ सिंह की अधिकाधिक जानने व समझने की उत्सुकता को बल मिला। अनुशासन और संस्कार तथा सिद्धांतप्रियता के गुण उन्हें अपने पिता से प्राप्त हुए। अपनी माता गुजराती देवी के सबसे कनिष्ठ पुत्र होने के कारण वे विशेष प्रेम, लाड़-दुलार के पात्र रहे। बचपन में काफी स्वच्छंदता से रहने के उपरांत भी वे और उनके भाई-बहन न उच्छृंखल हुए और न किसी प्रकार की बुराइयों के शिकार। माँ-बाप के नैतिक मूल्यों का प्रभाव राजनाथ की जीवनशैली पर अमिट होकर उनका मार्गदर्शक बना।

राजनाथ सिंह एक मेधावी छात्र थे। इंटरमीडिएट की परीक्षा में तीन नंबरों की कमी से प्रथम श्रेणी से वंचित रहे। विज्ञान में रुचि थी। उन्होंने एम.एस-सी. भौतिक-शास्त्र में की और फिर वे पोस्ट ग्रैजुएट कॉलेज, मिरजापुर में शिक्षक बने। स्कूल के दिनों में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाने लगे। गोरखपुर विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करते हुए ए.बी.वी.पी. से जुड़ गए। १९७७ में सावित्री देवी से विवाह हुआ। राजनाथ सिंह के राजनीतिक जीवन पर दृष्टि डालने पर पता चलता है कि हर जगह वे सीढ़ी-दर-सीढ़ी चलते गए। वे न केवल अपने गाँव से जुड़े रहे, बल्कि हर क्षेत्र में राजनाथ ने अपने को जमीनी हकीकत से अवगत रखा। इस प्रकार उनके भविष्य में राजनीतिक जीवन के लिए एक मजबूत पृष्ठभूमि निर्मित होती गई। वे १९६९ में गोरखपुर डिवीजन के संगठन मंत्री; १९७४ में भारतीय जनसंघ मिरजापुर इकाई के जनरल सेक्रेटरी बने। अपनी निष्ठा, कार्यकुशलता, संगठन क्षमता तथा सिद्धांतों के प्रति दृढ़ता के कारण आगे बढ़ते रहे। आपातकाल में वे मिरजापुर में गिरफ्तार हुए तो उन्हें नैनी जेल में रखा गया। उनकी ममतामयी माँ के फिर उन्हें दर्शन नहीं हो सके, चूँकि राजनाथ सिंह ने पैरोल की शर्तों पर रिहा होने से इनकार कर दिया था। बहुत कम राजनेताओं के जीवन में अनुभवों की विविधता दिखाई देती है। वे जिले से राज्य स्तर, राज्य स्तर से अखिल भारतीय स्तर पर पहुँचे, ए.बी.वी.पी. में भी ऐसा हुआ और इस प्रकार उनका परिचय-क्षेत्र भी विस्तृत होता रहा। एक कठिन समय में जब उत्तर प्रदेश के शासन में एक शिथिलता आ गई थी और अगले चुनाव आने वाले थे, तब भाजपा हाईकमान ने राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया। केंद्र में वाजपेयीजी के मंत्रिमंडल में कई मंत्रालयों के मंत्री रहे और सफलतापूर्वक कार्य किया। उनको एक शिकायत यही रही कि जल्दी-जल्दी परिवर्तनों के कारण हाथ में लिये गए कार्यक्रमों और पहल की सफलता का वे स्वयं आकलन न कर सके। इसको समझने के लिए पूरी पुस्तक पढ़ना जरूरी है। विस्तार में यहाँ चर्चा संभव नहीं है। इसी प्रकार दो बार अत्यंत विवादास्पद समय में उन्हें भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद सँभालना पड़ा, एक बार आडवाणीजी के बाद और दूसरी बार नितिन गडकरी के बाद। अपनी सक्रियता, योग्यता और परिश्रम के बल पर राजनाथ सिंह का अपना स्थान राजनीतिक क्षेत्र में स्वयमेव बनता गया। २०१४ के आम चुनाव के समय भी कार्यकर्ताओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए कि अगर एनडीए सरकार बनाने में सफल हो तो प्रधानमंत्री पद के लिए किसे प्रस्तावित किया जाए, यह एक यक्षप्रश्न था। राजनाथ सिंह ने अनेक कठिनाइयों के बीच शालीनता और चातुर्य से इस प्रश्न के समाधान का रास्ता निकाला। यह सब पुस्तक में विस्तार से रेखांकित है। राजनाथ सिंह मृदुभाषी हैं, किंतु उनकी सोच में स्पष्टता है और वाणी में संतुलन। उनकी सफलता का यह एक बड़ा कारण है।

पिछले चार-पाँच दशकों की भारतीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश की रजानीति एवं भाजपा के अपने उतार-चढ़ाव तथा निष्कर्षों के बीच में गौतम चिंतामणि द्वारा लिखित राजनाथ की जीवनी का अपना महत्त्व है। एक विशाल परिदृश्य में एक सौम्य, किंतु कार्यकुशल तथा दूरदृष्टि वाले व्यक्ति को उभरता देख सकते हैं। एक व्यक्ति के चित्रांकन के साथ-साथ भारतीय तथा उत्तर प्रदेश की रजानीति का भी चित्रांकन है, विशेषतया भाजपा के संदर्भ में। समकालीन भारतीय राजनीति को समझने के लिए यह पुस्तक उपयोगी है। यह उत्तम होगा, यदि इस ग्रंथ का अनुवाद शीघ्र ही हिंदी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में आए, ताकि अधिक-से-अधिक लोग राजनाथ सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व के संबंध में सही जानकारी प्राप्त कर सकें।

कुछ पत्र-पत्रिकाओं की चर्चा

लोकतंत्र का ‘पाँचवाँ स्तंभ’ पिछले तेरह वर्षों से प्रकाशित हो रही है। संस्थापक संपादक श्रीमती मृदुला सिन्हा थीं। वे आज गोवा की राज्यपाल हैं। उनको जनजीवन का लंबा अनुभव है। वे एक जानी-मानी साहित्यकार, उपन्यासकार, कहानीकार और विचारक हैं। उन्होंने जो मानक ‘पाँचवाँ स्तंभ’ के लिए रखे थे, उनका अनुसरण निरंतर हो रहा है; यह प्रसन्नता का विषय है। यह तेरह वर्षों से प्रकाशित हो रही है। साहित्य और संस्कृति के अतिरिक्त इसमें जनता के सरोकारों के विषय में लेख प्रकाशित होते हैं। अक्तूबर २०१९ का अंक महात्मा गांधी की १५०वीं जयंती को समर्पित है। गांधीजी के जीवन, उनकी सोच और उनके कार्यकलापों के विषय में अत्यंत पठनीय सामग्री संगृहीत है।

‘यथावत’ मासिक पत्रिका का १६-३० सितंबर का अंक हमारे सामने है। रामबहादुर राय का आलेख ‘मील का पत्थर-१९३४’ कांग्रेस और देश के इतिहास के अनछुए पक्ष को उजागर करता है। ‘यथावत’ में सभी रचनाएँ स्तरीय रहती हैं। इस अंक में विशेषतया इसरो की उपलब्धियों और चंद्रयान-२ के विषय में प्रचुर सामग्री है। अन्य विषयों के अतिरिक्त, चंद्रयान-२ के विषय में जो लेख हैं, वे जानकारी से भरपूर और स्थायी महत्त्व के हैं। इसरो के लैंडर विक्रम से चाँद पर उतरने से ठीक पहले संपर्क टूट गया, जिससे हतोत्साहित इसरो के अधिकारियों का मनोबल दृढ़ करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी का जो उद्बोधन था, उसके मुख्य अंश दिए गए हैं। इस स्तंभ में भी उसकी चर्चा की गई थी। प्रधानमंत्री का उद्बोधन वैज्ञानिकों और संपूर्ण देश के लिए संजीवनी साबित हुआ। उनके शब्दों ‘आज चंद्रमा को छूने की हमारी इच्छाशक्ति और दृढ़ हुई है, संकल्प और प्रबल हुआ है।’ ने वैज्ञानिकों में एक नई ऊर्जा, नूतन उत्साह पैदा कर दिया। नैराश्य के बादल छँट गए। यह उनकी प्रेरक क्षमता और प्रत्युत्पन्न संवेदना का एक उदाहरण है।

‘आधुनिक साहित्य’ त्रैमासिक पत्रिका है, जिसे विश्व हिंदी परिषद् पिछले आठ साल से प्रकाशित कर रही है। यह द्विभाषी भी है। कभी अंग्रेजी के लेख भी छपते हैं। इसमें साहित्य के विषय में सारगर्भित लेख रहते हैं। जुलाई-दिसंबर संयुक्तांक में भी गांधीजी से संबंधित लेख हैं। अन्य अच्छी सामग्री है, विशेषकर भारतीय अंतरराष्ट्रीय संबंध परिषद् के अध्यक्ष विनय सहस्रबुद्धे का साक्षात्कार, जो सोचने के लिए बहुत सारे बिंदु प्रस्तुत करता है। हरेंद्र प्रताप से संपादक ने गांधीवाद के विषय में जो साक्षात्कार लिया, वह भी उत्तम है। ‘आधुनिक साहित्य’ के इस वर्ष के पिछले दो अंक भी देखने को मिले। हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं, विशेषतया कॉलेज व विश्वविद्यालय के स्तर पर यह द्विभाषी त्रैमासिक उपयोगी है।

गुरु नानकदेव की ५५०वीं जयंती

इस वर्ष १२ नवंबर को एक महान् आध्यात्मिक विभूति का जन्मदिवस है। पूरे विश्व में, खासकर भारत में विविध आयोजनों की व्यवस्था हो रही है। उनके शांति, समता, सेवा, साधना, संस्कार, सहिष्णुता, विनम्रता और मातृभाव के संदेश की आज संपूर्ण मानव जाति को आवश्यकता है। गुरुनानक देव के चरणों में नमन करते हुए उनके दो वचन उद्धृत करना चाहेंगे। कथनी और करनी के मतभेद के इस युग में उनका कथन कि ‘सत्य महान् है, पर उससे महानतर है सत्य के अनुसार जीवनयापन करना।’ दूसरा वचन है—‘ओ नानक, घास की तरह छोटे रहो, दूसरे पौधे सूख जाएँगे, किंतु घास हरी-भरी रहेगी।’ पद, धन और सत्ता के मद में चूर आज के समय में गुरुनानक देव द्वारा विनम्रता का यह सबको संदेश है। श्री लालबहादुर शास्त्री ने अपनी डेस्क पर यह वाक्य लिखकर रखा हुआ था, जो वास्तव में शास्त्रीजी के जीवनदर्शन को प्रदर्शित करता है। काश, इसका मर्म आज हम सब समझ सकें।


 

(त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी)

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