झिलमिल दीपावली

झिलमिल दीपावली

‘‘पापाजी! आप मेरे लिए पटाखे खरीदने कब चलेंगे? अगले सप्ताह ही तो दीपावली है।’’ शाम को पापा के ऑफिस से लौटते ही प्रियांशु ने उनका हाथ पकड़कर मायूसी से पूछा। मम्मी ने पापा के दूसरे हाथ से उनका बैग पकड़ते हुए कहा, ‘‘बेटा प्रियांशु, पापा अभी-अभी ऑफिस से आए हैं, उन्हें थोड़ा आराम तो करने दो।’’

इस पर प्रियांशु मुँह फुलाकर सोफे पर बैठ गया। पापा मुसकराते हुए उसके बगल में जाकर बैठ गए और उसके कंधे पर हाथ रखकर बोले, ‘‘अरे भाई! दीपावली तो अगले बुधवार को है। तुम्हें कल स्कूल जाना है। कल शाम को हम सब घर की सजावट का सामान लेने जाएँगे और संडे को तुम्हारे पटाखे खरीदेंगे, क्यों ठीक है न!’’

‘‘सच्ची!’’ प्रियांशु ने चहककर पूछा तो पापाजी ने उसके गाल थपथपाते हुए कहा, ‘‘मुच्ची!’’

इस पर प्रियांशु हँसते हुए पापा से लिपट गया। अगले दिन शाम को पापा के ऑफिस से लौटने के पहले ही प्रियांशु तैयार होकर बैठ गया। उसके हाथ में दो सूचियाँ थीं। एक में मम्मी ने घर की सजावट का सामान लिख रखा था और दूसरी उसने खुद तैयार की थी पटाखों की। वह बार-बार अपनी पटाखों की सूची पढ़ता और उसमें बदलाव करता। ‘इस बार छोटी नहीं बड़ी चकरी लूँगा। दो पैकेट फुलझड़ी नहीं, एक पैकेट फुलझड़ी और दो पैकेट अनार। ओह हो, मेहताब तो लिखा ही नहीं...’ अपने आपसे बात करता हुआ वह पटाखों की सूची बार-बार बदल रहा था। तभी पापा ऑफिस से आ गए। उन्होंने प्रियांशु से पूछा, ‘‘अरे बेटा! क्या कर रहे हो इतना मन लगाकर?’’ इस पर वह बोला, ‘‘ओह हो पापाजी पटाखों की सूची बना रहा हूँ।’’

‘‘पर पटाखे तो कल लेने जाना है, आज तो डेकोरेशन का सामान लाएँगे।’’ पापा ने याद दिलाया। ‘‘हाँ जी पापा, लेकिन सूची तो फाइनल करनी है न।’’ इस पर मम्मी-पापा मुसकरा पड़े। कुछ देर बाद जब पापा ने चाय पी ली तो वह मम्मी-पापा के साथ बाजार के लिए निकल पड़ा। अभी वे लोग गली के मोड़ पर ही पहुँचे थे कि किसी बच्चे ने जोर के धमाके वाला कोई पटाखा छुटा दिया। आवाज इतनी तेज थी कि प्रियांशु चिहुँककर मम्मी से लिपट गया। डरते हुए बोला, ‘‘मम्मी, जल्दी चलिए यहाँ से, मेरे तो कान सुन्न हो गए, इतनी तेज आवाज थी।’’ फिर पापा की उँगली कसकर पकड़कर आगे बढ़ने लगा। लेकिन हर तरफ से धूम-धड़ाके की आवाजें आ रही थीं। प्रियांशु ने अपने एक हाथ की उँगली से एक तरफ का कान बंद करते हुए पापा से पूछा, ‘‘पापा, पटाखे इतनी तेज आवाज वाले क्यों जलाते हैं?’’ पापा ने कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारी तरह बहुत से बच्चों को दीपावली पर धूम-धड़ाके वाले पटाखे जलाने में मजा आता है न।’’

‘‘लेकिन पापा, इससे तो बहुत शोर मचता है। दीपावली वाली रात को तो और शोर मचेगा।’’

पापा बोले, ‘‘हाँ बेटा, यह तो है।’’

इस पर प्रियांशु बोला, ‘‘पापा, इसीलिए मैं धमाकेवाले पटाखे नहीं जलाता, केवल रोशनीवाले जलाता हूँ चकरी, फुलझड़ी, अनार, मेहताब।’’ इसी बीच वे लोग एक दुकान पर पहुँचे, जहाँ मम्मी-पापा कुछ खरीदने लगे। प्रियांशु सड़क की ओर देखने लगा। अँधेरा हो चुका था। कुछ दूरी पर एक बच्चे ने बड़ा सा अनार जला दिया। उसकी रंग-बिरंगी रोशनी देखकर प्रियांशु बहुत खुश हुआ। मन-ही-मन सोचने लगा—कल मैं भी ऐसा बड़ा सा अनार खरीदूँगा। तभी अनार की रोशनी खत्म होने के साथ तेज धुआँ चारों तरफ फैल गया। धुआँ प्रियांशु की आँखों में भी लगा, उसे खाँसी आने लगी। पापा ने पलटकर पूछा, ‘‘क्या हुआ बेटा?’’

वह बोला, ‘‘पापाजी, अनार का धुआँ...’’ फिर खाँसने लगा। मम्मी ने घबराकर उसे अपनी गोद में उठा लिया और अपने रुमाल से गरम फूँक मारकर उसकी आँखों पर रखने लगीं। इससे उसे कुछ राहत मिली। कुछ देर बाद सब सामान खरीदकर वे लौटने लगे। रास्ते भर प्रियांशु शांत रहा। तेज धमाके की आवाजों और धुएँ से वह अब भी डर रहा था। घर पहुँचकर रात में खाते समय उसने पापा से पूछा, ‘‘पापा, सीको बम और सुतली बम से तेज आवाज होती है। चकरी, अनार से धुआँ होता है तो फिर हम दीपावली कैसे मनाएँ?’’

पापा ने पूछा, ‘‘क्यों क्या हुआ?’’

‘‘आज थोड़े से धुएँ और पटाखे की आवाज से हमें इतनी परेशानी हुई तो दीपावली वाली रात तो बहुत शोर मचेगा। खूब सारा धुआँ फैलेगा।’’

‘‘हाँ, सो तो है...’’ पापा ने जवाब दिया।

‘‘फिर इससे तो बहुत से लोगों को परेशानी होती होगी?’’ प्रियांशु ने पूछा तो मम्मी बोलीं, ‘‘हाँ, यही नहीं, इससे बहुत प्रदूषण भी फैलता है।’’

‘‘लेकिन फिर दीवाली कैसे मनाएँ, बिना पटाखों के?’’

पापा बोले, ‘‘बेटा, दीवाली का मतलब होता है हर ओर रोशनी फैलाना। दीपक से, मोमबत्तियों से, इलेक्ट्रिक बल्ब से अपने घर-आँगन सजा सकते हैं। लेकिन बच्चों को तो पटाखे छुटाने में ज्यादा मजा आता है। इसलिए वे ऐसा करते हैं।’’

पापा की बात प्रियांशु ने सुनी, पर कुछ नहीं बोला और खाना खाकर सोने चला गया। अगले दिन संडे था। उसी दिन उसे अपने पटाखे लेने जाना था। सुबह जब मम्मी ने उसे उठाया तो फटाफट फ्रेश होकर वह फिर अपनी पटाखों की सूची लेकर बैठ गया। यह देखकर मम्मी ने पूछा, ‘‘बेटा, तुम्हारी पटाखों की सूची तो कल ही तैयार हो गई थी, अब क्या कर रहे हो?’’

वह बोला, ‘‘नई सूची बना रहा हूँ।’’ कुछ देर बाद उसने नाश्ता करते समय मम्मी-पापा को अपनी नई सूची थमा दी। उन्होंने पढ़ना शुरू किया, ‘सुंदर डिजाइन वाले बड़े दीपक—६, छोटे-छोटे दीपक-१२, रंग-बिरंगी मोमबत्तियाँ-२०, झिलमिल करनेवाले नन्हे-नन्हे बल्ब—खूब सारे।’

सूची देखकर मम्मी-पापा मुसकरा उठे। पापा ने प्रियांशु को अपने सीने से लगा लिया।

दीपावली की रात प्रियांशु उत्साह-उमंग से उछल-उछलकर मोमबत्तियों और दीपकों से पूरे घर-आँगन को सजा रहा था। झिलमिलाती रोशनी में प्रियांशु का चेहरा कुछ ज्यादा ही दमक रहा था।

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विज्ञान भूषण

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