बुंदेलखंड का झैंझी-टेसू

बुंदेलखंड का झैंझी-टेसू

भारतीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा में लोक का अपना महत्त्व है। निश्चित रूप से लोक की विशुद्ध आत्मा गाँवों में आज भी सुरक्षित है। यद्यपि उत्तर-आधुनिकता के दौर में अन्य लोककलाओं की तरह लोक-साहित्य भी संक्रमित होकर अस्तित्व के लिए संघर्षरत है, फिर भी सुदूर ग्रामीण अंचलों के निम्न वर्गीय लोग अपनी इस थाती को निरंतर संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। लोककला एवं लोक-साहित्य से जुड़े रहने में उच्च वर्ग अपनी तौहीन समझता रहा है, पर दूसरों के जुड़ाव को हलके-फुलके ढंग से मान्यता भी दे रहा है, जबकि निम्न वर्ग इनसे जुड़कर गर्व का अनुभव करता है, क्योंकि इनमें मनुष्य का जातीय विकास सुरक्षित है। ग्रिम के अनुसार, ‘लोकगीत जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए रचा गया काव्य होता है। इसलिए इसे सुरक्षित रहना चाहिए। लोकगीत में लोक-संस्कृति का जीवंत रहना आवश्यक है।’

लोक-साहित्य में किसी भी अंचल के लोक का जीवन धड़कता है। अन्य प्रांतों के साहित्य की तरह ही बुंदेली लोक-साहित्य भी जीवंत और समृद्ध है। बुंदेलखंड में अनेक धार्मिक त्योहार मनाए जाते हैं। चैत्र एवं क्वार में नवदुर्गा पूजा के अवसर पर अनेक देवीगीत गाए जाते हैं। कार्तिक स्नान में कतकियारीं राधा-कृष्ण के गीत गाती हैं। क्वार के महीने में कुँआरी लड़कियाँ सुअटा का त्योहार मनाती हैं। नवरात्र में मनाए जाने के कारण इसे नौरता (नवरात) भी कहा जाता है। क्वार कृष्णपक्ष की प्रतिपदा (पड़वा) से अमावस्या तक ब्रह्ममुहूर्त में जागकर मुहल्ले की लड़कियाँ एकत्र होकर दीवार पर गोबर की थपकियाँ (टिपकियाँ) लगाती हैं, उनमें फूल भी चिपकाती हैं तथा गीत गाती हैं। इन गीतों में वे एक-दूसरे के नाम भी जोड़ती जाती हैं। यथा—

खैर बमुरियाँ खैर बमुरियाँ, लसहरे लेत खजूर रे!

लहरें लेत सरिता बाई सी बिटिया, उन्हीं के ससुरा दूर के।

आज पठै दये, नउआ लिवउआ, परों पठैदये बीर रे!

जाय जो पहुँचे बाग-बगैचा, सौ घोड़ा असबार रे!

जाय जो पहुँचे गाँव के गौड़े-गाँव के लोग डराय रे!

तुम जिन डरियो, तुम जिन डरियो, बहन लिबाउन आय रे!

कुँआरी लड़कियाँ एकत्र होकर अमावस्या के दिन सूखे काँटोंवाली बबूल की डाली को फूल-पत्तियों से सजाती हैं। एक डलिया में गोबर की टिपकियाँ रखती हैं। फूलों से सजी वह डार ‘मामुलिया’ कहलाती है। मोहल्ले के एक छोटे से लड़के को वह डार पकड़ाकर एवं अन्य सभी लड़कियाँ भी उसे पकड़कर, जो-जो फूल उसमें लगे हैं, उनके नाम ले-लेकर गीत गाती हैं—

मामुलिया के आए लिबउआ, ठुमुक चली मेरी मामुलिया।

काँटों के ऊपर हलदी, अक्षत, फूल-फल अर्पित कर परिक्रमा करती हुई उसे जल में सिरा (समर्पित) कर देती हैं, गीत गाती हैं—

ल्याओ-ल्याओ चंपा के फूल, सजाओ मेरी मामुलिया।

इसी तरह—

चिकनी मामुलिया के चीकने पतौआ, बरा तरै लागी अथैया।

कै बारी भौजी, बरा तरैं लागी अथैयाँ

मीठी कचरिया के मीठे जो बीजा, मीठे ससुरजी के बोल।

मामुलिया सिराने के पश्चात् किसी खेत से वह बालक, जो साथ में जाता है, गौरा एवं सुअटा बनाने हेतु मिट्टी ले आता है। अब क्वार की शुक्लपक्ष की प्रतिपदा (पड़वा) से शुक्लपक्ष की नवमी तक लड़कियाँ प्रातःकाल उठकर मिट्टी की गौरा बनाती हैं। तीन गौरा इकट्ठी करके उनपर ऊपर से एक गौरा और रख देती हैं। नौ दिन तक यह कार्यक्रम चलता है। आठवें दिन शाम को उबले हुए ज्वार, बाजरा, गेहूँ का ‘हपकूँ’ कार्यक्रम चलता है। उबले हुए अनाजों को ‘कुहरी’ कहते हैं। गौरा स्थल पर सभी लड़कियाँ मिलकर गुड़ से कुहरी खाती हुई समवेत स्वर में गायन करती हैं—

गौर को पेट पिरानौ, बरेदी भैया हपकूँ।

इस पंक्ति को सभी एकसाथ कहकर कोहरी मुँह में डालकर चबाती जाती हैं और पंक्ति का वाचन करती हैं।

नौवें दिन मामुलिया की तरह ही मिट्टी के गौरों को भी नदी, तालाब या नहर में सिरा दिया जाता है। गौर माता पार्वती की प्रतीक है। लड़कियाँ दूध, दही, हलदी, अक्षत से गौर पूजन करती हैं; सूर्य भगवान् को अर्घ्य देती हैं और गाती हैं—

उठो-उठो सूरज भैया, भोर भए नारे सुअटा।

मालिन ठाड़ी दरबार, कौन शहर की बेटी मालिनी नारै सुअटा।

कौन शहर को फूल, इंदरगढ़ की बेटी मालिनी, नारै सुअटा।

उठो-उठो पप्पू भैया, भोर भये नारै सुअटा, मालिन ठाड़ी दरबार।

नौवें दिन गौर सिराने के बाद उसी स्थान पर दीवार के सहारे लड़कियाँ खेत से लाई हुई मिट्टी से नौरता (सुअटा) बनाती हैं। यह राक्षस जैसा होता है। इसे वे मोरपंख, कौड़ियों, चूड़ियों और पैसों आदि से सजाती हैं। इन सात दिनों तक लड़कियाँ झैंझी और लड़के टेसू माँगते हैं। यह क्रम क्वार की पूर्णिमा तक चलता है।

एक मटकी में छेद कर, उसमें राख भरकर, दीपक जलाकर रख दिया जाता है। झैंझी को सिर पर रखकर लड़कियाँ समूह में नाचती हैं और गाती हैं। इनका साथ बड़ी-बूढ़ी भी देती हैं। मुहल्ले के छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियाँ भी सम्मिलित होकर देर रात तक नाचते-गाते हैं। लड़कियाँ गाने के साथ झैंझी को चारों ओर से थपथपाती हैं, इससे झैंझी के अंदर रखा दीपक झिलमिलाता है और ऐसा प्रतीत होता है, मानो झैंझी नृत्य कर रही हो। घर-घर जाकर लड़कियाँ नृत्य करती हैं, गाती हैं और अनाज या रुपया-पैसा माँगती हैं। यही रुपया-पैसा सुअटा के विवाह के खर्च में काम आता है। झैंझी गीत है—

सात लरी का झूमका नारै लुअटा।

धरो रे धरो महकाय तुम लियों पप्पू भैया, मोल को नारै सुअटा।

तुम्हारी दुलइया लला लाड़री नारै सुअटा।

पलका से पाँव न दे, पलका उतारा भैया पीढ़िया नारै सुअटा।

बिछियन की झनकार, कौन बड़े के बाजन बिछिया नारै सुअटा।

कौन बड़े की बाँक, ससुरा बड़े के बाजन बिछिया नारै सुअटा।

बाबुल बड़े की बाँक नाचत टूटे बाजन बिछिया

कूदत टूटी बाँकी बाँक नारै सुअटा।

जब माँगने पर अनाज या रुपया-पैसा मिल जाता है तो वे जी भरकर उसे अशीसती हैं—

इतनी आखत हमें दयी नारै सुअटा, इतनी दुलइया तेरी जोग।

दूधन-पूतन घर भरै नारै सुअटा,

लरका खाबै घिया-पुरी नारै सुअटा।

बहुएँ खाबैं खिचरी दूध।

झैंझी के समूह-गीत के आसपास ही बड़ी-बूढ़ी भी चौपालों पर बैठकर, उनके साथ गाकर, सम्मिलित होकर या समूह-नृत्य के साथ वातावरण को और भी मनमोहक बना देती हैं—

दो-दो पतउन बन गए हो, मेरे पिया गए परदेश मखन प्यारे गेंडुआ।

बारह बरस में पिया लौटा अइयो, बैठे बरद की डार।

मेरे घर कहियो जाय धोय-माँज गेंडुआ भरे पियो पिया जल नीर।

मखन प्यारे गेंडुआ, गेंडुआ उतार धना वहाँ धरी।

कहो दुःख-सुख की बात, मखन प्यारे गेंडुआ।

मइया तुम्हारी पिया अति बुरी है,

गिन-गिन रोटी दे, मखन प्यारे गेंडुआ।

झैंझी के संबंध में एक दंतकथा के अनुसार यह नरकासुर दैत्य की कन्या है। बबू्रवाहन (टेसू) जब महाभारत युद्ध लड़ने चला तो रास्ते में झैंझी से उसकी भेंट हुई। उसे देखकर टेसू ने उससे विवाह करने की प्रतिज्ञा कर ली। लेकिन दुर्भाग्यवश विवाह के पूर्व शरद पूर्णिमा के दिन श्रीकृष्णजी ने उसका सिर काट दिया, क्योंकि यह कौरव सेना की ओर से लड़नेवाला था।

किशोर टेसू बनाते हैं। दो लकड़ियों का क्रॉस बनाते हुए लकड़ियों के मिलन-बिंदु पर तेल का दीपक रखते हैं और उसे जलाते हैं। लड़के इसे रंग-रोगन लगाकर सुसज्जित कर लेते हैं और फिर इसे लेकर दरवाजे-दरवाजे रुपया-पैसा, अनाज माँगते हैं। कहा जाता है कि टेसू महाभारत काल के घटोत्कच का बेटा था, इसीलिए झैंझी-टेसू का विवाह मिट्टी-गोबर से बने दीवार पर स्थित घटोत्कच के समक्ष करते हैं। घटोत्कच को कौड़ियाँ एवं मोरपंख चिपकाकर सजाया जाता है। सातवीं भाँवर के पहले ही टेसू का सिर तो उखाड़ा ही जाता है, साथ ही घटोत्कच का सिर भी काटकर लड़के ले जाते हैं। इसमें लगी कौड़ियों को घर ले जाकर सँभालकर रखते हैं, क्योंकि ये कौड़िया शुभ मानी जाती हैं। टेसू अर्थात् बबू्रवाहन अर्थात् बर्बरीक, जो कि महापराक्रमी था, जिसका सिर श्रीकृष्णजी ने काट दिया था। युद्ध देखने के लिए उसका सिर उसके कहे अनुसार किसी ऊँचे वृक्ष की टहनी पर अटका दिया गया था। इसी लोककथा के आधार पर बाँस की लकड़ियों पर बर्बरीक के सिर को लगाकर माँगने की परंपरा चल पड़ी। कहा जाता है कि टेसू वृक्ष पर लटका महाभारत को देखता रहा। श्रीकृष्णजी द्वारा सिर काटे जाने से इसकी शादी इसकी प्रेमिका झैंझी से नहीं हो पाई थी। अतः इसी अतृप्त आत्मा की शांति के लिए इसकी प्रेमिका झैंझी से इसकी शादी कराई जाती है। विवाह हिंदू परंपरा के अनुसार होता है। पंडितजी गाँव के मुहल्ले-मुहल्ले जाकर विवाह कराते हैं। संपन्न लोग बाकायदा लोगों को भोज देते हैं। कुछ लोग भीगे दौल, गुड़, बतासे आदि का प्रसाद खिलाते हैं। बच्चे पटाखे, फुलझड़ी आदि आतिशबाजी करते हैं। महिलाएँ बन्ना-बन्नी गाती हैं। थाली, चम्मच बजाते हुए बच्चे टेसू लेकर झैंझी के घर आकर पंडित के समक्ष दोनों का विवाह कराते हैं। ये लड़के बराती की भूमिका में होते हैं। लड़के टेसू लेकर जब घर-घर माँगने जाते हैं तो टेसू गीत गाते हैं, ये शुद्ध मनोरंजक होते हैं—

मेरा टेसू यहीं खड़ा, खाने को माँगे दहीबड़ा।

इसी तरह—टेसू अगड़ करै, टेसू झगड़ करै,

टेसू लेई के टरै।

एक अन्य गीत है—

बब्बा रे बब्बा!

बब्बा ने खाई पाती, बब्बा हो गए हाथी।

हाथी ने चीरी गैल, बब्बा हो गए बैल।

बैल को फूटो मनिया, बब्बा हो गए बनिया।

बनिया ने बाँटी सिन्नी, बब्बा हो गए हिन्नी।

हिन्नी उचक गई खेत में, बब्बा सटक गए पेट में।

लड़कियों की तरह ही लड़के भी आशीष गीत गाते हैं—

हिन्न खुरी भई, हिन्न खुरी, हिन्ना माँगे तीन खुरी,

तीन घुरी को पहिया, देहरी दूध जमैया,

देहरी पे बैठो कूकरा, खुशी रहे तेरो पूतरा।

सुअटा के संबंध में अनेक दंत-कथाएँ हैं। एक कथा के अनुसार सुअटा राक्षस कन्याओं का अपहरण करता था। इस अत्याचार से बचने हेतु कन्याओं ने पार्वती का नौ दिन तक व्रत किया। पार्वतीजी ने उस सुअटा का वध करके कन्याओं की रक्षा की। तभी से सुअटा इसी राक्षस के आकार का बनाया जाता है। पास में ही शिव-पार्वती की आकृति बनती है और प्रतिदन गौरा बनाकर इसकी पूजा की जाती है। सुअटा के दाएँ-बाएँ चंद्रमा और सूरज बनते हैं। प्रथम चार दिन दूध-पानी से पूजा होती है, शेष तीन दिन दूध तथा कुम्हड़े के फूलों से। प्रातःकाल कन्याएँ उसके पास बैठकर गीत गाती हैं। इसे ‘काँय’ डालना कहते हैं। इसमें कन्याएँ अपने भाई एवं पिता का नाम ले-लेकर गीत गाती हैं। इन गीतों में संबंधों की मिठास और ऊष्मा बहुत ही हृदयस्पर्शी है—

हेमा चललू की कुअँरि लड़पती नारै सुअटा,

खेल लौ माई बाबुल के धाम।

जब टुरि जैहों बेटी सासरैं, सास न खेलन देई,

रात पिसाबैं पीसनो, दिन के गुबर की हेल।

सूरज की मैया जो बहै, नारै सुअटा,

मोरे सूरज कहाँ को जाएँ सुआ हो।

ससुराल की परवशता, परतंत्रता, बंदिशों एवं विवशता का सजीव चित्रांकन इस लोकगीत में हुआ है। जो कन्याएँ नौरता खेलती हैं, वे पूर्णिमा तक नमक, मिर्च, खटाई आदि का सेवन नहीं करतीं। मुहल्ले की ये कन्याएँ सूर्योदय से पूर्व स्नान कर, नौरता के पास बैठकर गीत गाती हैं। गौर चढ़ाने के पश्चात् नौरता के पास गड्ढे में गौर रखकर, उसमें दृष्टि डालकर गौर की परछाईं देखने का उपक्रम करती हैं और गीत गाती हैं—

अपनी गौर की झाँई देखूँ, झाँई देखूँ,

का ओढ़ती देखूँ, का महरतीं देखूँ।

चुनरी ओढ़ती देखूँ, बिछुआ जहरती देखूँ।

अंत में गौर से अपने माता-पिता, भाई-बहन एवं भाभी के लिए सुख-समृद्धि की कामना करती हैं—

गौर री गौर खेल किवरियाँ, बाहर ठाढ़ी तेरी पूजन हारी।

गौर पूजतरि बेटी आई सुभद्रा, गौर पुजतरि बेटी का फल माँगै।

मातु-पिता को राजु जु मागै, भैंसन की जोड़ी माँगै।

भाभी की गोद भतीजो माँगै।

पूर्णिमा के दिन लड़कियाँ झैंझीगीत गाती हैं और सुअटा के विवाह के पूर्व बड़ी-बूढ़ी औरतें समूह-गीत गाती हैं। एक गीत प्रस्तुत है—

एक सुआ बेर लैजाये, बहू को मन बेरन पै।

जाए तो कहियो उन ससुर बड़े सौ, अँगना में बिरिया लगाय।

सास हमारी बड़ी बरैलू, अँगना की बिरिया कटाय।

इस गीत में आगे जेठानी-देवरानी, ननद आदि के नाम लेकर गीत आगे बढ़ता रहता है। गाँवों में शरद पूर्णिमा की पूरी रात ‘रतजगा’ होता है। एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार भौमासुर राक्षस से मुक्ति पाने हेतु नारदजी ने एक चाल चली। उससे कहा कि तुम यदि १०८ लड़कियों से विवाह कर लो तो तुम कृष्ण भगवान् बन जाओगे। अतः उसने १०८ लड़कियों का हरण किया। इन लड़कियों में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न की प्रेमिका भी थी। भौमासुर ने उन लड़कियों के साथ प्रद्युम्न को भी कैद कर लिया। नारदजी ने यह समाचार द्वारका जाकर श्रीकृष्णजी को सुनाया तो उन्होंने वहाँ जाकर तुरंत ही प्रद्युम्न एवं उन १०८ कन्याओं को भी उसकी कैद से मुक्त कराया। श्रीकृष्ण ने इन्हें अपनाकर समाज में सम्मानित स्थान दिलाया और भौमासुर को मार डाला। यह शरद पूर्णिमा का ही दिन था। मरते समय भौमासुर ने श्रीकृष्ण से कहा कि मेरी इच्छा तो अधूरी ही रह गई, तो श्रीकृष्ण ने कहा कि मैं कुँआरी कन्याओं से तेरी पूजा-अर्चना कराऊँगा। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। भौमासुर का विवाह पूरा नहीं हो पाता है और कृष्ण रूपी लड़के विवाह के मध्य ही सुअटा का सिर काटकर ले जाते हैं।

मरते समय भौमासुर ने श्रीकृष्ण से कहा कि मेरी इच्छा तो अधूरी ही रह गई, तो श्रीकृष्ण ने कहा कि मैं कुँआरी कन्याओं से तेरी पूजा-अर्चना कराऊँगा। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। भौमासुर का विवाह पूरा नहीं हो पाता है और कृष्ण रूपी लड़के विवाह के मध्य ही सुअटा का सिर काटकर ले जाते हैं।

विवाह के पश्चात् लड़कियाँ एक साल और नौरता का खेल खेलती हैं। इस वर्ष के खेल को ‘सुअटा-उजाड़ना’ कहते हैं। ‘सुअटा उजाड़ते’ समय पंडितजी लड़कियों से चंद्रमा-सूरज आदि ग्रहों का पूजन व संकल्प कराते हैं। साथ ही भौमासुर से भी संकल्प कराते हैं कि अब इन लड़कियों ने तुम्हारे पैर पूज दिए हैं, अतः अब इन्हें छोड़ दो। इसके बाद झिंझिया के ऊपर रखे शक्करपारे नौरता उजाड़नेवाली विवाहित लड़कियाँ फोड़कर आपस में प्रसादस्वरूप मिलकर खा जाती हैं, इसके बाद वे नौरता खेलना बंद कर देती हैं। सुअटा, टेसू एवं झैंझी के संबंध में अनेक पौराणिक कथाएँ एवं किंवदंतियाँ बुंदेली एवं अन्य हिंदी भाषी समाजों में प्रचलित हैं। इन कथाओं की इस बाल-खेल से उनकी संगति बैठती है या नहीं, यह भी एक शोध का विषय है। पूरे क्वार महीने तक चलनेवाले इस बाल-खेल में बड़े-बूढ़े भी पूरी तन्मयता और हर्षोल्लास से जुड़ते हैं। इस खेल में गीत, नृत्य, लोककथाओं की त्रिवेणी, लोक-जीवन को सहज, सरल और सरस बना देती है। अभावों गरीबी, उपेक्षा एवं पीड़ाओं को भूलकर वे सब एक हो जाते हैं। इस समय वे जाति-पाँति, ईर्ष्या-द्वेष, छुआछूत, अमीरी-गरीबी एवं सांप्रदायिकता जैसे अनेक मनोविकारों को भूलकर बच्चों के इस खेल में सम्मिलित होते हैं। क्वार के इस माह में रोज ही देर रात तक लोग मस्ती में झूमते रहते हैं, वे गाते हैं और नृत्य करते हैं। बच्चों की टोलियाँ घर-घर टेसू माँगने निकलती हैं और बच्चियों की टोलियाँ झैंझी। इन नृत्यों और गीतों को देखकर-सुनकर जो हर्षातिरेक होता है, वह छलक-छलक पड़ता है। टेसू गीतों की अलमस्त तान, निराली छटा लोगों को खूब हँसाती है। इन गीतों का रचयिता कौन है? यह किसी को पता नहीं। लेकिन सदियों से लोगों की जबान पर ये गीत संरक्षित हैं। न इनकी कोई लय है, न कोई राग। ये तो कहीं की ईंट और कहीं का रोड़ा हैं, लेकिन ये गीत सबको मस्त कर देते हैं। एक टेसू गीत है—‘टेसू मूते घर बह जाए, नौंन कौ डबला धरो रह जाए।’ लड़कों के टेसू गीतों में उन्हीं जैसी मस्ती, अल्हड़ता और खिलंदड़पन है, जबकि लड़कियों के झैंझी, मामुलिया और सुअटा-गीतों में उन्हीं जैसी सुशीलता, शांति, गंभीरता, प्रेम और निश्छलता है। गौरा-गीत में कहा गया है कि बेटी का विवाह यदि दूर होता है तो इतनी दूर लिवाने कौन जाएगा? गीत के बोल हैं—

को बेटी तोय लिबाउ न जैहें?

तो बेटी कहती है—‘‘मुझे अपने सूरज-चंदा जैसे भाइयों पर पूरा विश्वास है। वे मुझे लेने आएँगे, साथ ही रास्ते में यदि उजड़े हुए बाग होंगे तो वे उन्हें हरा-भरा बनाएँगे, फूटे तालाबों को ठीक करेंगे, वृद्धों एवं निराश्रितों को भोजन कराएँगे और पक्षियों को दाना चुगाएँगे।’’ इस तरह इन गीतों में बहन का भाई के प्रति अटूट विश्वास के साथ ही लोक-कल्याण की भावना भी सन्निहित है—

उजड़े बाग उगाउत जैहें, अंध कुआँ उघराउत जैहें।

फूटे ताल बँधाउत जैहें, बूढ़ी डुकरिया जिमाउत जैहें।

इन गीतों में जहाँ एक ओर भैया-भाभी, माता-पिता के प्रति स्नेह-प्रेम, विश्वास और आशीषों की सुखद अभिव्यक्ति हुई है, वहीं दूसरी ओर ननद-सास, जेठ-जेठानी, देवर-देवरानी के प्रति तकरारें भी मार्मिक और हृदयस्पर्शी हैं—

चार खूँट को चौंतरा बा पै बेटा खेलन जाए,

खेलकूद बेटी घर कौ चली है, भाभी ने बोले हैं बोल।

ऐसे बोल न बोल मेरी भाभी, हम परदेशी चिरैया,

आज बसैं भाभी तेरी नगरिया, कल बसैं कहूँ और।

तो भाभी ने डारौ पीसनों (अनाज) चिरई झाँकन न आय,

फिर मैया ने डारौ पीसनौ, उड़ चिरई चुग जाए।

इन गीतों में जो भाव-प्रवणता और संवेदना है, वैसी लब्ध-प्रतिष्ठित और स्थापित कवियों के गीत, गजल और कविताओं में भी नहीं मिलती। ये अनाम गीतकार किसी विश्वविद्यालय में साहित्य नहीं पढ़े। साहित्य पढ़े-लिखे विद्वान् कृत्रिम और दिखावटी जीवन जीते हैं, इसलिए उनके काव्य में कृत्रिमता और उबाऊपन होता है। काव्य, अलंकारों के बोझ तले दबा और पांडित्य का कवच पहने उनका साहित्य दुरूह हो जाता है, जबकि लोकगीत सीधा-सच्चा जीवन जीनेवाला कोई लोक-जन ही बनाता है, इसमें लोक की सच्ची अनुभूति होती है, बनावटीपन नहीं। वे समवेत होकर जीते हैं, एकाकी नहीं। इसलिए इनमें अनुभूति की सच्ची तीव्रता और संवेदना का अविकल प्रवाह रहता है। इसलिए ये सहज और संप्रेषणीय होते हैं। इनमें अनुभव की गहनता और जीवन की सरसता का अद्भुत समिश्रण होता है। इन गीतों के संरक्षण में महिलाओं की महती भूमिका है।

टी.वी. चैनलों की अपसंस्कृति के कारण हमारी संस्कृति और लोकधर्मिता का बहुत तेजी के साथ क्षरण हो रहा है। हमें लोकधर्मिता की अपनी पहचान बनाए रखने हेतु सतत जागरूक होना होगा। आज का इलेक्ट्रॉनिक युग तो इसके संरक्षण एवं प्रसार-प्रचार हेतु सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, साथ ही संपूर्ण भारत के लोक-साहित्य को विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रम में सम्मिलित कर हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रख सकते हैं। सोशल मीडिया को भी इसमें रुचि लेनी होगी। आवश्यकता है, दृढ़-संकल्प और सक्रिय प्रयास की।

 

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अवधेश कुमार चंसौलिया

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