पाठ्यक्रम में रचनाओं का चयन

पाठ्यक्रम में रचनाओं का चयन

हुत दिनों से प्रदेश में हाई स्कूल स्तर के हिंदी पाठ्यक्रम को बदलने पर विचार चल रहा था। विचार कौन कर रहा था? सरकार को करना चाहिए, परंतु वह नहीं कर रही थी। सरकार के पास करने के लिए कई काम हैं। सरकार में जो मंत्री हैं, उन्हें सड़क, बाँध, भवन आदि बनवाने में ज्यादा दिलचस्पी है। इन विभागों में ज्यादा बजट है, इसलिए सरकार के कद्दावर मंत्री इन्हीं विभागों में हैं। दूसरी पंक्ति के मंत्रियों की उद्योग, माइनिंग और आबकारी जैसे विभागों में दिलचस्पी है। तीसरी श्रेणी के मंत्री शिक्षा, संस्कृति और पर्यटन टाइप के साधारण विभागों में खपा दिए जाते हैं। अभी जो शिक्षा मंत्री हैं, वे पी.डब्ल्यू.डी. मंत्री होना चाहते थे। नहीं हो पाए। मुख्यमंत्री को उन्होंने कई प्रकार के ऑफर दिए थे, परंतु उनकी कोई चाल न चली और उन्हें शिक्षा विभाग लेकर ही संतुष्ट होना पड़ा। वे शिक्षा मंत्री जरूर हैं, परंतु उनका मन दूसरे बड़े विभागों में रमता है। वे इस फिराक में रहते हैं कि जब भी मंत्रिमंडल में परिवर्तन हो, वे कुछ ऊँचे पायदान पर चढ़ जाएँ। कोई अच्छा सा विभाग उन्हें मिले तो बात बने। इस प्रकार शिक्षा मंत्री को क्यों दिलचस्पी होगी कि हाई स्कूल स्तर में हिंदी का पाठ्यक्रम बदला जाए? उनके अनुसार तो प्रदेश में सबकुछ ठीक चल रहा है।

पाठ्यक्रम बदलने का विचार प्रदेश के कुछ लेखकों, कवियों, विचारकों और बुद्धिजीवी टाइप लोगों का है। ये लोग आए दिन सरकार को परेशान करते रहते हैं। कल तो इस संदर्भ में एक डेलीगेशन मुख्यमंत्री तक से मिल आया। मुख्यमंत्री इस विषय में क्या कहते? उनके सिर पर बहुत चिंताएँ हैं। दो साल बाद प्रदेश में विधानसभा चुनाव हैं। विपक्षी आजकल पार्लियामेंट में सरकार की बहुत खिंचाई कर रहे हैं। मुख्यमंत्री अपनी पार्टी में सबको संतुष्ट करने में लगे हुए हैं। वे किसी को निराश नहीं करना चाहते। सबके हित में उनका हित है। वे बुद्धिजीवियों को भी प्रसन्न रखना चाहते हैं। उन्होंने पाठ्यक्रम बदलने के लिए शिक्षा मंत्री को एक कमेटी गठन करने के निर्देश जारी कर दिए। बुद्धिजीवी प्रसन्न हुए।

शिक्षा मंत्री की पाठ्यक्रम बदलने जैसे किसी काम में कोई रुचि नहीं थी। उन्हें मालूम नहीं था कि पुराना पाठ्यक्रम क्या है और ये बुद्धिजीवी टाइप लोग उसे क्यों बदलना चाहते हैं? डेलीगेशन में जो लोग मुख्यमंत्री से मिलने गए थे, उन्हें एक दिन शिक्षा मंत्री महोदय ने अपने कार्यालय में बुलाकर एक मीटिंग रखी। मीटिंग में लेखकों, कवियों, विचारकों और बुद्धिजीवियों ने मंत्रीजी को समझाया, ‘‘यह पाठ्यक्रम जो पढ़ाया जा रहा है, वर्षों पुराना है। तब से अब तक हिंदी साहित्य में बहुत विकास हो गया है। साहित्य में नए विचार आए हैं। नई प्रवृत्तियों ने जन्म लिया है। इधर जो नए साहित्यकार उभरकर आए हैं, उन्हें पाठ्यक्रम में कब शामिल किया जाएगा? इस प्रकार कई गंभीर कारण हैं, जिनकी वजह से अब पुराना पाठ्यक्रम बदलना जरूरी हो गया है।’’

शिक्षा मंत्री को लगा कि सचमुच शिक्षा के क्षेत्र में ये बुद्धिजीवी कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन करना चाहते हैं। करना चाहते हैं तो करें। किसने रोका है? मंत्री महोदय ने उपस्थित सभी लोगों से विचार-विमर्श कर इस संदर्भ में एक कमेटी बनाने का प्रस्ताव पेश किया। अब गेंद बुद्धिजीवियों के पाले में थी, जिसे हर कोई लूट लेना चाहता था। पाठ्यक्रम निर्धारण कमेटी में कौन-कौन हो, इस बात पर बड़ी गहमा-गहमी भी हुई। बहुत देर तक इस बात पर बुद्धिजीवियों में गरमागरम बहस चलती रही, परंतु वे एकमत नहीं हो पाए। पूरी बहस में विचारधारा वाले कवि-लेखक हॉबी थे, इसलिए एक नाम उस गु्रप से रखना पड़ा। विचारधारा विरोधी लोगों ने भी अपने तर्कों से मंत्रीजी को प्रभावित किया, इसलिए एक नाम उनके ग्रुप से भी रख लिया गया। एक आचार्य टाइप आदमी भी इस कमेटी हो, जो कमेटी की अध्यक्षता करे, ऐसा मंत्रीजी चाहते थे। उन्होंने एक सेवानिवृत्त हिंदी के विभागाध्यक्ष का नाम सुझाया। कभी मंत्रीजी उनके स्टूडेंट रह चुके थे, इसलिए नाम तुरंत फाइनल हो गया। अब युवा वर्ग की ओर से भी तो किसी का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। मंत्रीजी ने यहाँ अपनी सूझबूझ से एक युवा कवयित्री का नाम सुझाया। इससे कमेटी में महिला और युवा वर्ग दोनों का एक साथ प्रतिनिधित्व हो गया। मंत्रीजी की मर्जी का विरोध करने का जोखिम किसी ने नहीं लिया। इस प्रकार नए पाठ्यक्रम निर्धारण के लिए एक कमेटी अस्तित्व में आई।

कुछ दिनों पश्चात् इस कमेटी की पहली बैठक बुलाई गई। सबसे पहले विचारधारा वाले लेखक मुखरित हुए, ‘‘हमें पुराने पाठ्यक्रम को पूरी तरह बदलना है। जो रचनाएँ अभी तक इस पाठ्यक्रम में पढ़ाई जा रही थीं, वे सब सामंतवादी व्यवस्था की पोषक हैं, उनके स्थान पर हमें प्रगतिशील मूल्योंवाली रचनाएँ पाठ्यक्रम में सम्मिलित करनी होंगी। इस संदर्भ में मैंने कुछ कविताओं, कहानियों और निबंधों का चयन किया है। ये रचनाएँ नई पीढ़ी को एक वैज्ञानिक सोच प्रदान करने में सक्षम हैं। इसलिए इनका पाठ्यक्रम में लगाया जाना बहुत जरूरी है।’’ इतना कहकर उन्होंने रचनाओं की एक फाइल आगे बढ़ाई।

विरोधी विचारधारावाले लेखक, जिन्होंने अभी तक फाइल ठीक से देखी भी नहीं थी, बोले, ‘‘हमें नई पीढ़ी को अपने देश के गौरवशाली अतीत से परिचित कराना है। इस फाइल में ऐसी कोई रचना नहीं है, जो हमारे सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित हो। वैज्ञानिक सोच के नाम पर हम अपनी विरासत को नहीं नकार सकते। कुछ लेखक एवं उनकी रचनाओं का चयन मैंने भी किया है। इन रचनाओं में भारतीय संस्कृति का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसलिए इन रचनाओं का पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना बहुत जरूरी है। नई पीढ़ियों को हमें अच्छे संस्कार भी तो प्रदान करने हैं, जो मेरे द्वारा चयनित इन रचनाओं द्वारा ही संभव हो सकता है।’’

कमेटी में जो युवा कवयित्री थीं, वे भी चहकीं, ‘‘देखिए, आप लोगों के मतभेद कभी समाप्त नहीं हो सकते। नई पीढ़ी को हमें नए विचार भी तो प्रदान करने हैं, जो मेरे द्वारा चयनित इन रचनाओं द्वारा ही संभव हो सकता है।’’

आचार्यजी, जो इस कमेटी के अध्यक्ष थे, उन्होंने तीनों फाइलों को सरसरी निगाह से देखा, फिर बोले, ‘‘आप लोग इतना ध्यान रखिए कि हमें कोई विचारधारा विद्यार्थियों पर नहीं थोपनी है। हमें उनका भविष्य बनाना है। हम ऐसा पाठ्यक्रम बनाना चाहते हैं, जिसे पढ़कर बच्चे देश के अच्छे नागरिक बनें। मैंने स्वयं जीवन में बहुत साहित्य लिखा है, जिसकी सर्वत्र सराहना हुई है। मेरे पढ़ाए हुए विद्यार्थी आज सरकार में मिनिस्टर हैं। इसलिए आप लोग मिलकर ऐसी रचनाओं का चयन करें, जिन्हें पढ़कर विद्यार्थी आगे बढ़ें और जीवन में कुछ करके दिखाएँ। आपके द्वारा चयनित ये रचनाएँ मैं पढ़ूँगा। अगली मीटिंग में हम पाठ्यक्रम का प्रारूप तय कर लेंगे।’’ इतना कहकर वे उठ गए और आज की मीटिंग समाप्त हुई।

अब तक साहित्यिक हलकों में यह खबर अच्छी तरह व्याप्त हो गई थी कि प्रदेश में हिंदी का नया पाठ्यक्रम बनाया जा रहा है, जिसके लिए चार लोगों की कमेटी सरकार ने बनाई है। कमेटी के कर्ताधर्ताओं के नाम जितने छुपाए गए, उतने वे जग जाहिर हुए। कौन लेखक नहीं चाहता कि उसकी रचना पाठ्यक्रम में शामिल हो? लेखकों ने कमेटी के सदस्यों को पटाना प्रारंभ कर दिया। विचारधारा वाले अपने लेखक को घेरने लगे। हर कोई अपनी रचना को कालजयी बताता और कहता कि इसमें नए विचारों और मूल्यों की स्थापना है, इसे जरूर कोर्स में लगाया जाना चाहिए। उधर विचारधारा विरोधी खेमे में भी हलचल तेज थी। उस ग्रुप के लेखक आपस में बातें करते, विद्यार्थियों पर कोई विचारधारा थोपना ठीक नहीं है। देश का गौरव, महान् संस्कृति और परंपराओं के विषय में नई पीढ़ी को जरूर बताया जाना चाहिए। कमेटी में इसके लिए सतर्क रहना पड़ेगा। कहीं विचारधारा वाले हाबी न हो जाएँ। यदि उनकी चली तो वे संगठन वाले लेखकों की रचनाएँ, चाहे वे कैसी भी हों, कोर्स में लगवा देंगे। इसलिए जरा ध्यान रखिएगा और अपने मित्र लेखकों को भूलिएगा मत। लोगों ने अपने पक्षवाले कमेटी मेंबर को समझाया।

इधर कई युवा लेखकों ने कवयित्रीजी से संपर्क किया और उन्हें अपनी नई से नई रचनाएँ दिखाईं। युवा वर्ग साहित्य में बुजुर्गों की धाँधली से असंतुष्ट रहा है। ये पुरानी पीढ़ीवाले हमें तवज्जो नहीं देते और लगातार नहसीत देते रहते हैं कि अभी और कलम घिसो। इस शरारत को आप कमेटी में चुनौती दीजिए और पाठ्यक्रम में अधिक-से-अधिक युवा लेखकों की रचनाएँ सम्मिलित करवाइए। आपके रहते युवा साहित्यकारों के हितों पर आँच नहीं आनी चाहिए।

अगली मीटिंग में खूब घमासान हुआ। विचारधारा वाले अड़ गए, ‘‘हमारे द्वारा तैयार की गई लेखकों और उनकी रचनाओं की सूची फाइनल की जाए।’’ विरोधी विचारधारा वाले मेंबर ने बाँहें चढ़ा लीं, ‘‘ऐसा नहीं हो सकता। तुम्हारी सूची में अत्यंत साधारण लेखक और उनकी घटिया रचनाएँ हैं। हम जो सूची बनाकर लाए हैं, इसे स्वीकृत किया जाए। इसमें महत्त्वपूर्ण लेखकों की महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं।’’ युवा कवियित्री भी पीछे नहीं रहीं। उन्होंने आगे बढ़कर ऊँचे स्वर में कहा, ‘‘मैं आप लोगों की बदमाशी नहीं चलने दूँगी। आप लोग नए लेखन को हमेशा उपेक्षित करते आए हैं। यह सरासर नाइनसाफी है। नई पीढ़ी को नए विचारों की जरूरत है, जो नए लेखन में भरपूर है। इसलिए युवा वर्ग के लेखकों की रचनाएँ ही पाठ्यक्रम में शामिल की जाएँ।’’

आचार्यश्री भी अपनी और अपने चेले-चपाटियों की कुछ रचनाएँ उत्साहपूर्वक लाए थे कि वे तो कमेटी के अध्यक्ष हैं, इसलिए वे इन रचनाओं को कोर्स में अवश्य लगवा लेंगे। उधर मीटिंग में हंगामा होते हुए देखकर वे बोले, ‘‘आप लोग इस तरह बहसबाजी करते रहेंगे, तो नए पाठ्यक्रम का निर्धारण कभी नहीं हो पाएगा। मेरा एक सुझाव है कि आप लोग अपने-अपने लेखकों एवं उनकी रचनाओं के नाम इस बॉक्स में गुप्त रूप से डाल दीजिए। मैं भी ऐसा ही करता हूँ। किसी विद्यार्थी को बुलाकर इसमें से दस परचियाँ निकलवा लेते हैं, जो नाम आ जाएँगे, उन्हें पाठ्यक्रम में रख लिया जाएगा। बोलो मंजूर है? सबने मौन स्वीकृति दे दी। इस प्रकार एक छात्र को बुलाकर बॉक्स में से दस परचियाँ निकलवा ली गईं और नए पाठ्यक्रम का मसौदा तैयार हो गया।

बाद में अध्यक्ष सहित कमेटी के सभी सदस्य असंतुष्टि का रोना रोते रहे। नया पाठ्यक्रम किसी को पसंद नहीं आया। परंतु उसे बनाने का इससे अच्छा उपाय क्या हो सकता था?

 

३७६-बी, आर-सेक्टर, महालक्ष्मी नगर, इंदौर-१०

दूरभाष : ९४२५१६७००३

अश्विनी कुमार दुबे

हमारे संकलन