कॉफी हाउस की बहस और कट मनी

कॉफी हाउस की बहस और कट मनी

स दिन कॉफी हाउस में वाक्युद्ध छिड़ा था कि देश के सामने महत्त्वपूर्ण मुद्दे क्या हैं? कुछ की मान्यता है कि जो सड़क पर प्रमुखता से होता है, वह शारीरिक मार-पीट है और जो बुद्धिजीवियों में हमेशा की रीत है, वह शाब्दिक वाद-विवाद है। यह वाद-विवाद कॉफी हाउस की विशेषता है। इसकी एक गौरवशाली परंपरा है। इससे यह भी साबित होता है कि जहाँ एक से अधिक भारतीय होंगे, वहाँ अनवरत चर्चा में होना ही होना। इसका एक और महत्त्वपूर्ण तत्त्व यह है कि वार्त्ता कभी निजी नहीं, देश और विश्व के मसलों की हो। कुछ चीन के प्रशंसक हैं तो कई अमेरिका के आलोचक। अमेरिका को कॉफी पी-पीकर कोसना वर्तमान का एक लोकप्रिय फैशन है। प्रगतिशीलों से प्रारंभ होकर यह आज भी चालू है। लोग हैं कि हिंदी-चीनी भाई-भाई के जन-जन में विश्वास के बावजूद उन्नीस सौ बासठ के चीनी आक्रमण तक को याद नहीं रखते हैं। आज भी चीन हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की राह में रोड़े अटकाने से बाज नहीं आता है, चाहे वह सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता हो अथवा अन्य कोई अहम अंतरराष्ट्रीय कमेटी। जहाँ पहले हम पचास-साठ के दशक में उसके आर्थिक प्रतियोगी बनने की कूबत रखते थे, आज हमारी वह हैसियत भी नहीं है, न वैज्ञानिक शोध में, न विकास में, न व्यापार में।

वह रूस से लेकर योरोप-अमेरिका और एशिया-अफ्रीका तक हमको पटखनी देने पर आमादा है। हमें सतत सताने को उसने अपने विशेष चमचे पाकिस्तानी साँड़ को छुट्टा छोड़ रखा है, जो मुसल्सल जम्मू-कश्मीर में आतंक के निर्यात में व्यस्त है। ले-देके हमारे पास हमारी प्रजातांत्रिक विरासत है, शांति की परंपरा है, गौरवमय अतीत है। हम इन्हीं पर इतराते रहते हैं। देखने में आया है कि शान बखारने को हर मुल्क के पास अपना-अपना झुनझुना है। हर देश उसी को बजाने में मगन है।

फिलहाल हम दूसरों के समान कॉफी हाउस के एक संक्रामक रोग ‘भटकाव’ से ग्रस्त हैं। बात महत्त्वपूर्ण मुद्दों की है और भटक गई है, दुनिया के दादा, दबंग, देशों पर। इस समय युद्ध, स्तर पर बहस बढ़ती बेरोजगारी की हो रही है। एक अपनी ओर से समस्या पेश करते हैं, ‘‘कभी आठ-नौ बजे सुबह तक यहाँ सामने आइए तो आपको चद्दर ओढ़े ढेरों गठरियाँ नजर आएँगी। यह गठरी न होकर, आकस्मिक काम की तलाश में आए इनसान हैं। कुछ काम पाकर विदा हो जाते हैं, बाकी कल के इंतजार में। हम तो मानते हैं कि स्थिति भयावह है। विकास शहर का हो या देश का, उसको मापने का एक तरीका रोजगार की उपलब्धता है। शहर में भले अस्पताल बने, घर या सड़क, आकस्मिक मजदूरों की दरकार तो रहना ही रहना। रोजाना कुछ गठरियों का निराश लौटना सिद्ध करता है कि कहीं-न-कहीं विकास की गति धीमी है। वह दौड़ नहीं रहा है, लँगड़ा रहा है। कौन कहे, लँगड़ाते-लँगड़ाते हाँफ भी रहा हो।’’

वह आगे कुछ बोल पाते कि दूसरे बहसिए ने उन्हें बीच में ही टोक दिया, ‘‘गठरी बताकर आप आदमी के अपमान पर क्यों तुले हैं? आज बेरोजगार हैं तो क्या हुआ? दूसरों के दान-चंदे पर तो नहीं पल रहा, उलटा अपनी कमाई पर ही जीवित है। आपसे उसने क्या मदद माँगी? या आपने की, कि उसके इनसान होने के गौरव को ठेस पहुँचा रहे हैं?’’ वह भी, अपनी बात समाप्त करते-करते रोक दिए गए ‘‘यह जो आपने चंदे की बात कही, इसमें लेशमात्र भी सच नहीं है। हमने चंदे से और गाँठ की पूँजी लगाकर ‘निर्धन कल्याण मंच’ बनाए हैं। रैन बसेरे स्थापित किए हैं। आप चंदे पर गुजारा करने के निराधार आरोप लगाकर हमारी समाज सेवा का मखौल उड़ा रहे हैं? क्यों न एक दिन, बजाय खोखली बातें करने के, किसी गरीब की सहायता करके देखिए, मन में कितना संतोष मिलता है। जो स्वयं व्यंग्य के पात्र हैं, उन्हें दूसरों पर व्यंग्य करने का क्या अधिकार है?’’ बहसियों ने आश्चर्य से देखा कि दो विवाद के घायल बाँहें चढ़ाने की मुद्रा में हैं। उनके कॉफी के कप-प्लेट पर आराम फरमा रहे हैं। उनकी भौंहें कुछ आक्रामक अंदाज में ऊपर चढ़ी हैं। सबके बीच-बचाव के कोरस ने अमन-चैन का प्रयास किया। ‘‘हम समस्या का सोचें। बेरोजगारी एक व्यापक मर्ज है। भाषा में अंतर संभव है। न इनसानी गौरव का प्रश्न है, न किसी पर लांछन लगाने का।’’

बुद्धिजीवी शौर्य का दशनार्थ प्रदर्शन भले कर लें, बाँहे चढ़ाकर या भृकुटि के माध्यम से अथवा बँधी मुट्ठी से मुक्का तानकर, पर वास्तविकता में न उनकी टाँगें उठती हैं, न हाथ। उनका जीवन-दर्शन है कि चलने का काम जुबान का है, न मुक्के का, न हाथ-पैर का।

यों भी भ्रष्ट का अपराध क्या है? सब वसूली कर रहे हैं, वह न करे तो अपवाद बनकर ‘न माया मिली न राम’ वाला किस्सा होगा। या ऐसे भी जो सरकार बड़ी-बड़ी रकम का भुगतान चाहता है, उसने यह राशि जनता से ही ठगी है। इस ठगी में से बाबू फाइल आगे बढ़ाने को उनसे कुछ वसूल रहा है। वसूली अब एक स्थापित परंपरा है। सब यही करते हैं, वह इसका अनुपालन क्यों न करे?

सुलह-संधि में देर क्यों लगती? बेरोजगारी पर दूसरे सर्वथा नए दृष्टिकोण से ज्ञान देने लगे। ‘‘देखिए, यह कोरा भ्रम है कि सरकारी नौकरी ही रोजगार है। अधिकतर जो रोजगार का रोना है, वह इसी अभाव का है। पान की दुकान हो या चाट की, अथवा चाय-नमकीन के ठेले, क्या यह सब बाबूगीरी से बेहतर नहीं हैं? कभी-कभी तो लगता है कि इन तथाकथित बेरोजगारों की आमदनी ईमानदार सरकारी बाबू से कहीं अधिक है।’’ एक अन्य ने उनकी इस धारणा की धज्जियाँ उड़ाईं, ‘‘बाबू को आप क्या समझते हैं? वह सर्व शक्तिशाली है। उसकी टिप्पणी-नोटिंग का खंडन कठिन है। अंग्रेजों द्वारा बनाया गया सिस्टम अंग्रेजी के समान अब भी हम पर हावी है। बाबू का भ्रष्ट होना स्वाभाविक है, यह उसकी शक्ति का मानक जो ठहरा है, उसकी टिप्पणी के बिना फाइल का वही हाल है, जो आई.सी.यू. के मरीज का है। वह खुद चलने में असमर्थ है। आगे कैसे बढ़े? बाबू ही उसका डॉक्टर है, तारनहार है, जीवित रखने की सक्षम ताकत। नहीं तो वह विवश, लाचार, मृतप्राय सेक्शन की मेज की दराज में कैद हैं। यदि वह उसे जीवित कर, चलने में समर्थ बनाता है तो समुचित वसूली क्यों न करे? बाबू की ऊपरी आमदनी इसी अधिकार की आय है।

आजादी के बाद से पदनाम तक तो बदले नहीं हैं। मूल ढाँचे से कुछ छेड़-छाड़ भले हुई हो, कोई ठोस बदलाव नहीं आया है। इसीलिए लोग रोजगार से अधिक नौकरी के इच्छुक हैं। बाबू की कमाई किसी भी ठेलेवाले से अधिक है। आयकर वेतन पर भले हो, इस ‘आमदनी’ पर नहीं है।

कॉफी हाउस की रोज की बहस का अंत इसी ‘नौकरी बनाम रोजगार’ के मुद्दे पर हो गया। कौन कहे, बहसिए कब इस मुद्दे पर फिर युद्धरत हों? उनकी बहस के मुद्दों की तो कोई कमी नहीं है। आमदनी वेतन से कहीं अधिक है। इसीलिए बाबू बनने के प्रशिक्षण केंद्र हैं, जो उन्हें लिखित परीक्षा का प्रशिक्षण देते हैं। इतना ही नहीं, इसके गैस-पेपर भी बनते हैं। कई गैंग हैं, जो पूरे वक्त इसके प्रश्न-पत्र ‘आउट’ करने में लगे हैं। इनकी कीमत हजारों में है। कोई गंभीरता से अनुमान लगाए कि बाबू की लिखित परीक्षा कितने धंधों को जन्म देती है?

भारत में ठेकेदारी की प्रथा एक पुरानी परंपरा है। यह मुगलों के समय से प्रचलित है। वर्तमान में यह जीवन के हर क्षेत्र में लोकप्रिय हैं। परीक्षा से लेकर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं तक। कुछ धंधेवाले ऐसे हैं कि वे चार-पाँच लाख का ठेका लेते हैं, बाबू की नौकरी दिलवाने का। यह ऐसी सेवा है, जो नौकरी के हर क्षेत्र में उपलब्ध है। बाबू के प्रश्न-पत्र से लेकर उसके सही उत्तर तक का ठेका उनका है। इधर साक्षात्कार तो बंद है, वरना ठेकेदार उसका जिम्मा भी लेते थे। एक बार एकमुश्त राशि दे दी तो प्रत्याशी की हर चिंता समाप्त। उसके पश्चात् लिखित परीक्षा में उसका प्राथमिकता सूची में आना निश्चित।

जहाँ पुलिस के सिपाही से लेकर प्राथमिक स्कूल के शिक्षक और सरकार के बाबू तक का चयन इसी ठेकेदारी पर निर्भर है, वहाँ भ्रष्टाचार स्वाभाविक और अनिवार्य है। सांसद अपने चुनाव के खर्चे की वसूली में लगा है, वहीं सरकारी सेवक अपनी प्रवेश-राशि का। जनता का कचूमर निकलना भी निश्चित है, चक्की के इन दो पाटों के बीच। विचारणीय विषय यह है कि जहाँ शासकीय गंगा का उद्गम ही करप्शन के गंदे नाले से हुआ है, वहाँ पावन, पवित्र, कार्यकुशल, भ्रष्टाचार-मुक्त व्यवस्था होने की अपेक्षा कैसे की जाए? कॉफी हाउस में इस ठेके के विषय में चर्चा शायद ही कभी हो। वहाँ भ्रष्टाचार के विरोध में बहसिए मुखर हैं। वह भी इतने जोश में कि कॉफी हाउस की छत को कँपकँपी आ जाए। पर उनमें ठेके की भरती का कोई जिक्र नहीं है। कभी-कभी संदेह होता है कि इन बहस में अग्रसर बुद्धिजीवियों में कोई प्रश्न-पत्र आउट करने अथवा उसका उत्तर बनाने का सरगना या फिर ठेकेदार तो नहीं है?

यों ऐसा संदेह करने का हमारे पास कोई साक्ष्य नहीं है। कभी कभी प्रतीत होता है कि सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा करना क्या वांछनीय है? फिर लगता है कि क्या हमने कभी सोचा भी था कि भारतियों में यह मुमकिन भी है? हम भी कभी लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के बाद बाबू बने थे, पर तब ऐसी अफवाह तक नहीं हुआ करती थी। ऐसा नहीं कि करप्शन न हो। किंतु भ्रष्ट बाबू दफ्तर में चिह्नित थे। अधिकतर लोग उनसे बच के रहते। अब तो सुनते हैं कि यदि कोई ईमानदार है तो वह सहज ही शिकायतों का सुपात्र है। भ्रष्टों का नेटवर्क इतना प्रभावी है कि वह सी.बी.आई. से लेकर सांसदों तक फैला है। इधर सांसद का ईमानदार के विरुद्ध फर्जी किस्म की शिकायत का पत्र आया, उधर जाँच शुरू। कैसे इस खतरे को दफ्तर के बाहर फेंककर ऐसी सजा दिलवाई जाए कि इसे बाबा-नाना याद आ जाएँ? नहीं तो यह एक गंदी मछली, कार्यालय के पूरे ताल को ईमानदारी से प्रदूषित करेगी। कुछ भ्रष्ट ज्ञानी पढ़े-लिखे हैं। वे चाहते हैं कि शब्दकोश से ईमान नामक शब्द ही हटा दिया जाए। न रहेगा ईमान, न बचेगा ईमानदार।

यों भी भ्रष्ट का अपराध क्या है? सब वसूली कर रहे हैं, वह न करे तो अपवाद बनकर ‘न माया मिली न राम’ वाला किस्सा होगा। या ऐसे भी जो सरकार बड़ी-बड़ी रकम का भुगतान चाहता है, उसने यह राशि जनता से ही ठगी है। इस ठगी में से बाबू फाइल आगे बढ़ाने को उनसे कुछ वसूल रहा है। वसूली अब एक स्थापित परंपरा है। सब यही करते हैं, वह इसका अनुपालन क्यों न करे? बाबू की वसूली जनता से की गई ठगी में समाजवाद लाने का स्वागतयोग्य प्रयास है। उसने जनता से लूटा तो बाबू यानी समर्पित जनसेवक उससे क्यों न लूटे? जनता को वरना थोड़ा-बहुत न्याय भी कैसे मिलेगा? यदि कोई विचार करे तो इस निर्णय पर पहुँचे कि बाबू एक जज है, जो अपने कानून के अनुसार जनता के साथ इनसाफ कर रहा है।

कई बार इनसाफ में वह दूसरों का हिस्सा भी वसूलने को विवश है। यह बड़े अधिकारी हैं, जिनकी छवि कैश को हाथ लगाने की नहीं है। कोई यकीन नहीं करता है कि उनका भी इस धंधे में योगदान है? वह सबकी दृष्टि में ऐसे सदाचारी हैं, जिनसे कदाचारियों की शिकायत की जा सकती है। कोई शिकायत आए तो वह उसे गंभीरता और ध्यान देकर सुनते हैं। उनका निष्कर्ष यही रहता है, ‘‘आपके आरोप निराधार नहीं हैं। हम उनकी पूरी लगन से जाँच करेंगे। हम आपको समुचित कार्रवाई का आश्वासन देते हैं।’’

जाँच के परिणाम से वह स्वयं परिचित हैं। जाँच की आवश्यकता ही क्या है? फिर भी औपचारिकता निभाई जाती है। परिणाम अपेक्षित ही निकलना है। दफ्तर में ऐसा कुछ होता ही नहीं है। हर बिल, जिस समय आता है, उसे क्रमवार निबटाया जाता है।

हर दफ्तर में एक शायर या कवि होना तुक्कड़ों की बढ़ती आबादी का प्रतीक है। इस दफ्तर का शायर ‘रिसीट-डिस्पैच’ के काम का स्वामी है। वहाँ भी उसे कुछ चढ़ावा मिल ही जाता है। उसने गालिब के एक शेर में सुधारकर लिखा है—

रगों में दौड़ने-फिरने के हम रहे कायल,

जो आँख से ही न झाँके वो घूस ही क्या है!

सरकारी कर्मचारियों की रगों में अब खून नहीं, घूस प्रवाहित हो रही है। कैसे आशा की जाए कि कोई भी सरकार इसका अंत करने में सफल होगी? शायर का समय भी कॉफी हाउस की चर्चा में बीतता है पर वह भी दफ्तर की इस असलियत का उल्लेख नहीं करता है। घर की बात का ढिंढोरा बाजार में कैसे पीटा जाए? वह वहाँ उपस्थिति दूसरों को विश्वास दिलाता है कि कार्यालय का भ्रष्टाचार कुछ शिकायती और व्यवस्था विरोधी व्यक्तियों द्वारा व्यर्थ की उड़ाई अफवाहों की पतंगें हैं। ऐसी सब पतंगें इस शासन में कट चुकी हैं और उनका कतई अस्तित्व नहीं है।

बंगाल ने देश के हर बौद्धिक आंदोलन का हमेशा नेतृत्व किया है। कैसे संभव था कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वह चूक जाए? कॉफी हाउस के बुद्धिजीवियों का विश्वास है कि पश्चिमी बंगाल के प्रशासन में भ्रष्टाचार का स्थान ही नहीं है। वहाँ सरकार ने यह शुभ काम पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने को उन्हें सौंप दिया है। वहाँ इसे करप्शन न कहकर ‘कट मनी’ कहा जाता है। इससे कार्यकर्ताओं की पार्टी के प्रतिनिष्ठा में वृद्धि होती है। ‘‘पार्टी और उसके नेता इसका कितना खयाल रखते हैं कि हर केंद्रीय या राज्य की योजना में लाभान्वित होनेवाले, जब तक ‘कट मनी’ हमें नहीं देते हैं, संबद्ध आदेश पारित नहीं होता है।’’ वहाँ लुक-छिपकर ऐसी वारदातें नहीं करने की परिपाटी है। जो होता है, खुलेआम होता है। इससे अधिक पारदर्शिता किसी और राज्य में है क्या? अपना तो मत है कि सबसे पारदर्शी प्रशासन अगर कहीं है तो वह बंगाल में है।

उपरोक्त विचार बुद्धिजीवियों द्वारा ‘कट-मनी’ की अवधारणा पर व्यक्त किए गए हैं। इस पर हुई चर्चा का पटाक्षेप करते हुए एक अक्ल के अव्वल ने निष्कर्ष सुनाया है कि इसमें कोई भ्रष्टाचार नहीं है। सरकारी सहायता जनता को उपलब्ध है, बस उसे पार्टी वर्कर को, नियत दर के अनुसार, ‘कट-मनी’ देनी है। बाकी का काम वर्कर का है। वह दौड़-भागकर, डाँट-डपट से अधिकारियों को चेताकर जरूरी आदेश जारी करवाता है। अधिकारी भी इस निर्देश से परिचित हैं कि ‘कट-मनी’ मिलने का तथ्य वर्कर बताए, तो तत्काल उचित आदेश उपलब्ध हो। भ्रष्टाचार उन्मूलन की दिशा में यह एक महत्त्वपूर्ण कदम है। इसका अनुकरण हर सेक्युलर दल का कर्तव्य है।

९/५, राणा प्रताप मार्ग

लखनऊ-२२६००१

दूरभाष ः ९४१५३४८४३८

गोपाल चतुर्वेदी

हमारे संकलन