दीये के बहाने कुम्हारेण मावसी की यादें

दीये के बहाने कुम्हारेण मावसी की यादें

व्रत-त्योहार हों, उत्सव-पर्व हों, सबके कदम दौड़ पड़ते हैं, बाजार की ओर। यही महानगरों की सांस्कृतिक पहचान बन गई है। और एक मैं हूँ कि मेरी बचपन की स्मृतियाँ मेरा पल्ला पकड़कर मुझे गाँव की गलियों की ओर ही दौड़ाकर ले जाती हैं। अगर दीवाली पर्व हो, तो मेरी स्मृतियाँ और भी ज्यादा मतवाली हो जाती हैं, मुझे दौड़ा ले जाती हैं नदी किनारे की एक गली में, कुम्हारेण मावसी के घर की गली में।

कुम्हारेण मावसी का घर यानी दीवाली के अभिनंदन घर का पर्व। श्राद्धपक्ष बीतता कि सुबह से ही कुम्हार काका और कुम्हारेण मावसी नदी पार की मिट्टी का मुआयना करने चले जाते थे। बादल रीत गए थे। बरसात बीत गई थी। अब तो खदानें कुआर की घाम से तपकर सूख गई थीं। कुम्हार काका कुदाली से खदान की माटी खोदता था और मावसी खीड़ा (बड़ा टोकना) भरकर माटी गधे पर लादकर घर की ओर चल देती थी। घर आकर वह मिट्टी को लोहे के छलने पर डालकर छान लेती थी और गधे को वापस लेकर खदान पर चल देती थी। कुम्हार काका और कुम्हारेण मावसी का हमारा रिश्ता, उसकी संज्ञा कुछ बेमल लगती थी; किंतु यह बात सही थी कि बलराम कुम्हार गाँव के नाते से हमारा काका था और कुम्हारेण हमारी काकी न होकर हमारी मावसी लगती थी। वह मेरे मामा के गाँव की थीं, इस नाते वह हमारी माँ की बहन और इस गणित से वह हमारी मावसी होती थीं।

कुम्हारेण मावसी की एक बेटी अजब और दो लड़के थे। बहन भाइयों से मात्र दो-तीन साल बड़ी थी, उम्र कुल सात आठ साल रही होगी, पर वह अपनी उम्र से कुछ ज्यादा ही समझदार थी। घाघरी, पोलका (ब्लाउज) पहनती थी। उसके पोलके में टीन की, लोहे की पाँच गोदामें (बटनें) थीं, पर उनमें से मात्र बीच की एक गोदाम लगी रहती, जिससे पोलका उसके शरीर पर लटका रहता था। वह अपने भाइयों की इतनी तीमारदारी करती थी, इतना ध्यान रखती थी कि उसका पूरा वक्त उन्हीं में लगा रहता था। वह माटी की हंडली से दाल निकालती, पीतल की एक थाली में एक तरफ टूटे दीये का टेका लगाती। फिर दाल का पाल भरकर उसमें रोटा को (जुवार की रोट) बारीक मसकर भाइयों को खिलाती थी। उनको पानी पिलाती थी। बीच-बीच में उनकी बहती नाक को अपने घाघरे से पोंछ दिया करती थी, वह खुद भी उसी थाली में खाकर थाली को सूखी राख से माँजकर व्यवस्थित रख देती थी। वह पूरे समय भाइयों को खिलाती रहती थी, ताकि माँ-बाप बेफिक्री से काम कर सकें। छोटे भाई को देखो तो वह नंग-धडंग खेलता रहता और बड़ा भाई कुरता पहने रहता, जिसका बटन मोगरी की मार से टूटा हुआ रहता था। उसकी पूरी छाती खुली रहती थी। नीचे कभी पट्ट की चड्डी रहती और नहीं तो कोई शरम की बात नहीं होती थी, परंतु मावसी अपने बच्चों के प्रति बड़ी जागरूक रहती थी। उनके शरीर पर कीच-माटी का कवच चढ़ा रहता था, पर उनकी कमर में काले डोरे में छोटे-छोटे चाकू (बंद चाकू) बँधे रहते थे, जिससे उसके बेटों को किसी की नजर न लगे।

मावसी अपने बेटों को नजर न लगे, इसकी बड़ी चिंता रखती थी, किंतु इसके उलटे गाँव में जनश्रुति थी कि यदि कुम्हारेण किसी के बच्चों को देख ले और ‘हाय’ कह दे, तो वह बच्चा उलटियाँ करना शुरू कर देता और उलटियाँ कर-करके बेहाल हो जाता था। लोग यहाँ तक चोरी-छिपे कहते थे कि यदि कुम्हारेण किसी पशु को दूध दुहता देख ले, तो उसके पशु के दूध की धार बंद हो जाती थी। इतनी बुरी नजर थी उसकी, किंतु ऐसा कुछ प्रमाणित नहीं लगता था, यह तो योग-संयोग की ही बात होती होगी कि जैसे ‘कौए का बैठना हुआ और डाल का टूटना हुआ।’ कुम्हारेण मावसी का तो हमारे घर सदा ही आना-जाना लगा रहता था। हमारी आजी माँय तो घर के नन्हे-मुन्ने बच्चों को कुम्हारेण मावसी की गोद में देकर कहती थीं, ‘‘लऽ कुम्हारेण लाड़ी, नाना खलाड़लऽ।’’ और फिर मावसी बच्चे को गोद में लेकर खूब चूमा देकर कहती थी, ‘‘खूब पक्का हो जा, घड़े जैसा मजबूत हो जा।’’ इसके बावजूद भी हम देखते थे कि कुम्हारेण मावसी छोटे-छोटे बच्चोंवाले घर से दीये रखकर निकलती थी, तो उस घर का कोई भी व्यक्ति उसके पीछे जाकर चुपचाप उसके दाहिने पैर के नीचे की मिट्टी उठा लाता था और उससे बच्चे की नजर उतार देता था। हमें तो कभी भी ऐसा कुछ सच नहीं लगता था। हमको तो मावसी बड़ी ममतामयी लगती थी। जब काका चाक पर से दीया उतार के देते थे, तो मावसी उस दीये को अति लाड़ से सद्यजात शिशु की भाँति हौले से, वात्सल्य भाव से हाथ में लेती और बड़ी सावधानी से बिछी हुई राख पर सूखने को रख देती थी।

कुम्हारेण मावसी का घर हमारे घर से दूर था; किंतु दीवाली के अवसर पर उसकी दिनचर्या पर हमारी पूरी-पूरी निगरानी रहती थी। मुख्य कारण यह रहता था कि काका दीयों के साथ हमारे लिए घड़ा, बाल्टी, चकला-बेलन, कुंडा-चूल्हा, घट्टी आदि भी बनाते थे। जब से मिट्टी के थाले में मावसी नदी से घड़ा-दो घड़ा पानी लाकर डालकर मिट्टी को मक्खन जैसे मुलायम नहीं कर देती थी, हम उसके घर की आधी टूटी-फूटी दीवाल पर बैठकर यह सब नजारा देखते रहते थे। यह भी देखते थे कि काका कैसे चाक को लकड़ी से चला देते थे और चाक तेजी से घूमता रहता था। चाक पर रखी मिट्टी काका के हाथ से कैसे नए-नए रूप धरती थी। हमें यह सब देखकर बड़ा आनंद एवं विस्मय हुआ करता था।

मिट्टी के बड़े मटके, दुतली, माथणी, ढाकणी, ईंट कवेलू के भट्ठे तो नदी पार लगते थे; किंतु दीये का आवाँ काका अपने घर के पीछे खाली पड़े बाड़े में ही लगा लेते थे। गारा मिट्टी का काम चलता रहता था, और जब तक दीये पककर तैयार नहीं हो जाते थे, तब तक मावसी को अपनी सुध-बुध नहीं रहती थी। इस दौरान वह एक सरा लुंगड़ा (बिना लहँगे की साड़ी) ही पहनती थी। आधी से ज्यादा तो वह मिट्टी में ही सनी रहती थी; किंतु जैसे ही दीये आवाँ से पककर निकलते थे, वह उन्हें झाड़-झाड़कर रखती जाती थी। उसके बाद कहीं उसे अपना ध्यान आता था। काका तो काम के बाद घड़ी-दो घड़ी बीड़ी पीने के नाम पर सुस्ता लेते थे; किंतु मावसी काम निपटाकर सुस्ताने की बजाय घर का चूल्हा-चौका सँभालती थी।

छोटे-बड़े दीयों का ढेर लगाकर दूसरे दिन मुँह झाकले (उषाःकाल) में मावसी लोटे में मही माँगकर लाती थी और उसमें मिट्टी घोलकर, मट्टी से सने अपने बच्चों को लेकर नदी पर चल देती थी। समार घाट (सामनेवाला घाट) पर पानी कम रहता था। वह अपने बच्चों को लेकर यहीं आती थी। फिर वह बच्चों को पानी में खड़ा करके उन पर पानी छींटकर बच्चों पर जमे मिट्टी के थर को ऐसे निकालती थी, जैसे शरीर न होकर वह किसी वस्तु को रगड़ रही हो। उन्हें नहलाकर फिर वह अपना सिर मही-माटी से धोकर लकड़ी की काखई (कंघी) से बाल सुलझाकर घर आती थी।

काका भी नदी पर स्नान कर अपनी सफेद मटमैली साफ धोती के वांगे (खोल) में इक्कीस दीये मंदिर में रखकर आते थे।

काका के घर इस दिन पूरा भोजन बनता था। दोपहर में मावसी शृंगार करती थी। कच्ची दीवाल पर गोबर-माटी से जड़े टूटे काँच में मावसी अपना मुख निहारती थी। नाड़ा बाँधकर केश-विन्यास करती थी। वह लाल घाघरे पर हरी साड़ी पहनती थी। हाथ की चूड़ियों की मिट्टी निकलने पर वे चमचमा उठती थीं। पक्के रंग की मावसी के भाल पर पीले काँच की टीकी बड़ी तेजोमयी लगती थी। जिस व्यक्ति ने पहले कभी मावसी को नहीं देखा, वह व्यक्ति सोच भी नहीं सकता था, पहचान ही नहीं सकता था कि यही गोबर-माटी में सनी कुम्हारण है।

मावसी टोकना भरकर दीये लेकर घर से निकलती थी, तो सबसे पहले वह हमारे ही घर आती थी और आँगन में टोकना उतारकर तेज आवाज देती थी, ‘‘माँय, चलो अपना हाथ सी सगुण मोहरित करे।’’ हम भी अपनी संजय-दृष्टि से जान लेते थे कि मावसी घर से निकल चुकी है। अतः हम दरवाजे पर ही खड़े रहते थे। हमें दीयों से ज्यादा हमारे खिलौनों की प्रतीक्षा रहती थी।

कुम्हारेण मावसी चोमल दूर पटककर घाघरा फैलाकर बैठती और दोनों पैरों के बीच टोकना रखकर पाँच-पाँच की जोड़ बनाकर सूपड़े में दीये रखती जाती थी। साथ-ही-साथ दीयों की विशेषता भी गिनवाती जाती थी, ‘‘उम्दा पका है, गहरा है, एक बार तेल भर दो, तो पूरी रात झपक-झपक झपकते रहेंगे। न ढलकेगा, न झरपेगा, दिन उँग्या तक थिग भरा रहेगा।’’ दीये गढ़ते समय का वात्सल्य भाव अब मावसी के चेहरे पर अधिकार भाव बन जाता है। बाजार में भी कोई उसके दीये में खोट या कमीवेशी नहीं निकाल सकता, एकदम ताव से कहती थी, ‘‘बिरमाजी ने गढ़े हैं।’’ मावसी का हमारे घर व्यवहार प्रेममयी ही रहता था। हमारे घर दीये भी अधिक मात्र में देती थी। मावसी फिर हमारे खिलौने अलग से रखती थी। उसे गाँव से भाते में जुवार मिलती थी, पर हमारे घर से मावसी मूँग की दाल और चावल ही लेती थी। उन दिनों वस्तु का दाम नगद पैसे देकर नहीं चुकाया जाता था, भाता याने अनाज के रूप में सूपड़े में भरकर दिया जाता था।

मावसी हमारे घर से प्रसन्न और तृप्त होकर ही निकलती थी। हमारे घर उसका आना-जाना लगा ही रहता था। बड़ा परिवार था, साथ ही गाय-भैंस का भी बड़ा कुनबा था। दूध-दही की दोहनी, माथणी, दुतली, कुंडा, करवा, घड़ा, घड़ुला आदि की जरूरत पड़ती ही रहती थी। ब्याह-शादी के घड़े, तो अखंड जोत के दीवले, करवे सभी कुछ निरंतर चलता ही रहता था। विवाह के अवसर पर, अगर मानता का मंडप हुआ, तो गाजे-बाजे के साथ इक्कीस सुवाय इक्कीस घड़े ‘बेव’ के लेकर आती थी। कुम्हार के घर सीधा (सुपड़े में आटा, चावल, दाल, नमक, गुड़, घी आदि) लेकर जाते थे। कुम्हार काका को बधाकर तिलक लगाकर उसे टोपी और अँगोछा ओढ़ाते थे और मावसी को लुगड़ा, पोलका, नाड़ा, कुकु, गुड़पान आदि देते थे। और साथ ही विवाह में सम्मिलित होने का निमंत्रण भी देते थे। साथ में वे घड़े लेकर घर आते थे, तब उन्हें उन घड़ों का भाता दिया जाता था।

संक्रांत पर घड़ा-करवा रखने मावसी आती थी। तब भी वह मुँह से माँगती थी, ‘‘खिचड़ी के साथ तिल्ली के लड्डू जरा ज्यादा ही देना माँय।’’ वैशाख मास लगा कि दान के लिए घड़े लेना ही रहता था, फिर हमारी आजी माँय प्याऊ पर भी बड़े-बड़े घड़े रखवाती थी। कुल मिलाकर मावसी का पूरे साल हमारे घर से रिश्ता बना ही रहता था। मावसी भी अपना अधिकार समझती थी कि यह उसकी बहन की ससुराल है, अतः वह माँय से बड़े ही रुतबे से कहती थी, ‘‘माँय, दीवाली की रात काजल पाड़ोगे तो मेरे छोरों के लिए भी काजल पाड़ना, मैंने यह बड़ा दीया अलग से बनाया है। उनको नजर नईं लगे।’’ मावसी की ऐसी बातें सुनकर हमको हँसी भी आती थी कि काले-कलूटे नंग-धड़ंग घूमते-फिरते इसके बच्चों को कौन नजर लगाएगा; किंतु मावसी तो ममतामयी माटी में जान डालनेवाली कुम्हारण जो है। गाँव के लोग कुछ भी कहें, पर वह मेरी ननिहाल से आई मेरी माँ की प्यारी बहन थी।

दीवाली में पटाखे तो आनंद देते ही थे; किंतु कुम्हारण मावसी के दीयों का खेल भी हमारे लिए बड़ा रोमांचकारी होता था। संध्या को दीये जलाने के पूर्व उन दीयों को पानी में डुबोना होता था, दो घंटे पानी में भीगे रहने के बाद उन्हें निथारकर औंधा रख देते थे, ताकि दीये तेल न पिएँ। दीयों को पानी में डुबाने पर मिला आनंद अव्यक्त आनंद होता था। पच्चीस-पचास दीये जब बड़े भगोने के पानी में जैसे ही डाले जाते थे कि डालते ही छुन-छुन की कोमल रिदम पानी का हिलना, बुलबुलों का ऊपर आना, यह सब अनंत सुख देता था। आज भी दीयों को देखकर मन गुदगुदा जाता है। मन को आह्लादित कर जाते हैं। दीये तो अब भी आते हैं; किंतु वे इतने सजे-सजाए आते हैं कि उनमें तेल-बाती रखकर उन्हें जलाने की कल्पना से ही मन काँपता है, इतनी सुंदर कारीगरी, काँच-मोती टँके इन दीपकों को कोई कैसे जलाएगा। अगर उन दीपकों में एक बूँद भी पानी लग जाय या गिर जाए, तो उन दीयों का शृंगार उनका रूप ही बिगड़ जाएगा। मेरी कुम्हारण मावसी के दीये व उन दीयों की छुन-छुन की आवाज तथा उनकी अमर जोत याद आती है और साथ ही याद आती है वह कुम्हारेण मावसी।

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सुमन चौरे

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