छाया रहा अँधेरा

छाया रहा अँधेरा

अगणित दीप जलाए अब तक

फिर भी छाया रहा अँधेरा,

कितने दीप धरे देहरी पर

आँगन में फिर भी अँधियारा।

 

बहुत बने मंदिर-देवालय

रत्न-जड़ित भगवान् हो गए

श्रद्धा पर पहरा पूजा का

आस्था को भी भ्रम ने घेरा,

कर्मकांड के आडंबर में

फँसी भक्ति की पावन धारा

कितने यत्न किए साधक ने

मिटा न अंतर का अँधियारा,

अगणित दीये जलाए अब तक

फिर भी छाया रहा अँधेरा।

 

कौन किसे कहता-समझाता

सबकी अपनी कथा अलग है

सोने-चाँदी के पलड़ों में

तुलते सबके मानदंड हैं,

किसको फुरसत है जो देखे

दर्द भरे रिश्तों की काया

कौन झुकी पलकों के नीचे

पढ़ता दुःस्वप्नों की छाया

जितने बंधन जोड़े मन के

उतना अधिक रहा पछतावा,

अगणित दीप जलाए अब तक

फिर भी छाया रहा अँधेरा।

 

शुष्क हवा के हर झोंके ने

छीने सारे पत्र विहँसकर,

ठूँठ रह गया वृक्ष दीन

यों अपना सुंदर रूप गँवाकर,

वर्तमान पर तेज धूप सा

तपता रहा साक्ष्य बेचारा

फिर वसंत आने की आशा में

भटका मौसम का मारा,

अगणित दीप जलाए अब तक

फिर भी छाया रहा अँधेरा

कितने दीप धरे देहरी पर

आँगन में फिर भी अँधियारा।

 

बी-३/२०१, निर्मल छाया टावर्स

वी.आई.पी. रोड, जीरकपुर-१४०६०३ (पंजाब)

दूरभाष ः ०९८७६२६९३६४

लक्ष्मी रूपल

हमारे संकलन