वो टपकती झोंपड़ी

पिछले दो दिनों से बरसात का पानी थमने का नाम ही न ले रहा था, तूफानी हवाओं ने तो जाने कितना आतंक ही मचा रखा था, दो वॉट के एल.ई.डी. बल्ब में भला दम ही कितना होता है। बार-बार भड़भड़ाते कच्चे दरवाजे बचपन की नींद को उजाड़ देने पर उतारू थे, अल्लाह की दुआओं के अलावा वसीम के पास इस तूफानी बरसात मे प्रकृति के कहर से बचने का कोई उपाय भी न था। खुद तो सह गया, पर दिनभर के चौका-बरतन कर थकी माँ के मुँह पर टूटे छप्पर से टपकते हुए पानी को देखकर किसी प्रकार से पीली फटी बरसाती से अपने घर को बचाने का निरर्थक प्रयास कर रहा था, पर उस तूफानी रात में बरसाती भी क्या काम आती, जब गरीब की जिंदगी में ही छेद होते हैं, बदन ऊपर से ढको तो नीचे से नंगा और नीचे से ढक दो तो ऊपर से नंगा हो जाता है।

आज वसीम का भी कुछ ऐसा ही हाल हो रहा था, वह नहीं चाहता था कि टपकते पानी से माँ को नजला-जुकाम या निमोनिया हो जाए, पर तूफानी हवाओं ने भी आज बरसात के साथ मिलकर जिद ही ठान रखी थी, देखते-ही-देखते फटी पीली बरसाती सौ फुट दूर जा पड़ी, अब तो सिसकने के अलावा उसके पास कोई और उपाय भी न था, डर था कि उसकी हिचकियों से माँ कहीं जग न जाए।

टूटे छप्पर के बीच में पुराना कपड़ा लगा टपकते पानी के नीचे बाल्टी रख, वह बच्चा तूफान कम होने के लिए दोनों हथेलियों को चेहरे के पास लाकर रातभर अल्लाह से दुआएँ करता रहा।

सुबह तूफान थमने पर उन दोनों माँ-बेटों ने मसजिद में शरण ली, रातभर की घटना रह-रहकर उसके बाल मन को झकझोर रही थी, तभी अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाकर अल्लाह मियाँ का सदका करता हुए तो बुदबुदाया—‘‘अल्लाह, तेरे एक के लिए इतना बड़ा मकान?’’ उस बच्चे के लिए यह बात रहस्य थी, पर वह आश्चर्यचकित हो, फिर-फिर बुदबुदाया, ‘‘अल्लाह, तेरे एक के इतना बड़ा मकान?’’ पर अबकी दफा वहाँ आते-जाते हुए लोगों को देखकर उसका यह भोला सा सवाल मुँह के अंदर ही चिपककर रह गया।

 

७/२०२, स्वरूप नगर, कानपुर

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लता कादंबरी

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