तुम्हारी माँ कहाँ है

तुम्हारी माँ कहाँ है

‘‘माँ,मेरी माँ कहाँ है?’’

स्कूल से लौटा छोटा बच्चा उदास-उदास सा अपनी माँ के पास आया और लिपट गया।

‘‘व्हाट बॉय, तू क्या बोलता है? हम तुम्हारी मम्मी है। और देखो डियर, गंदे बच्चों की तरह माँ-माँ नहीं करते, मम्मा या मम्मी कहते हैं।’’

‘‘नहीं माँ, मेरी माँ कहाँ है’’ बच्चा सुबकने लगा।

‘‘ओह डियर, तुमको क्या हो गया है, हम तुम्हारा मम्मी है।’’ कहकर माँ ने आया को पुकारा, ‘‘देखो, बेबी को ले जाओ, हाथ-मुँह धुलाओ और नाश्ता दो!’’ फिर उसने बच्चे को अपने से थोड़ा दूर करके साड़ी की क्रीज ठीक की, जूड़े पर हाथ फेरा, सेंटेड रूमाल निकालकर धीरे-धीरे रूजभरे गालों पर फिराया।

आया आई, लेकिन बच्चा उसके साथ नहीं आया, बस्ता पटककर जिद के साथ खड़ा रहा और माँ से बोला, ‘‘नहीं माँ, ठीक-ठीक बोलो, तुम्हीं मेरी माँ हो? आज हमारे स्कूल में एक स्पीकर आए थे, कह रहे थे कि तुम लोगों की माताएँ तो गाँवों में हैं, खेतों में काम करती हैं, पत्थर तोड़ती हैं, लोहा पीटती हैं और भूखों मरती हैं, पैदा होते ही उनकी संतानें उनसे छीन ली जाती हैं, और सात समुंदर पार बैठी हुई एक अंग्रेज औरत के इशारे पर ये औरतें, जिन्हें तुम लोग माताएँ समझते हो, तुम्हें असली माता को भूल जाने की शिक्षा देती हैं। वास्वत में ये माताएँ नहीं, आयाएँ हैं, जो उस अंग्रेज महिला की सेवा के लिए तुम लोगों को तैयार करती हैं। वह अंग्रेज महिला इन आयाओं और तुम सबकी मालकिन है। बच्चो! जानते हो, वह कौन है?—अंग्रेजी!’’

‘‘व्हाट नॉनसेंस! दीज स्टुपिड हिंदीवालाज ऑलवेज टॉक समथिंग वेरी फनी। आई एम योर मम्मी बेबी।’’

‘‘नहीं-नहीं, वे कह रहे थे कि तुम लोग तो आयाएँ हो, और आया बनने में बहुत बड़े सम्मान का अनुभव करती हो।’’

‘‘ओह गॉड, तुम्हारे प्रिंसिपल साहब ऐसे-ऐसे रस्टिक लोगों को बोलने के लिए कैसे एलाउ करते हैं! तुम्हारे स्कूल में ये हिंदी-फिंदी वाले कैसे बोलने चले आते हैं? हम अपने बच्चों को इन स्कूलों में, इतनी लंबी-लंबी फीस देकर इसलिए पढ़ाता है कि ये बच्चे देसी लोगों और देसी भाषाओं की गंदगी से बचे रहें। इसके लिए हम लंबा-चौड़ा डोनेशन भी देता है, क्या यह सब सीखने के लिए? कल हम तुम्हारे प्रिंसिपल से पूछता है कि यह सब क्या हो रहा है।’’

तब तक उसी स्कूल की बड़ी क्लास में पढ़नेवाला पड़ोसी लड़का एक इंगलिश गीत गुनगुनाता हुआ वहीं आ पहुँचा, ‘‘आई लव यू एंड यू लव मी।’’

‘‘अरे मुकी, तुम्हारे स्कूल में आज यह कौन हिंदीवाला गाली बक गया और तुम्हारे प्रिंसिपल साहब ने इस हिंदीवाला को बोलने के लिए कैसे बुला लिया था? और बुला भी लिया तो निकाल क्यों नहीं दिया?’’

‘‘ओह आंटी, वह हिंदीवाला नहीं था, वह कोई रूसी स्कॉलर था, और यहाँ एंबेसी में कल्चरल अटैची है। प्रिंसिपल ने किसी खास ‘परपज’ से बुलाया होगा। उन्हें क्या मालूम था, वह स्कूल में आकर हिंदी-हिंदी चिल्लाने लगेगा। आंटी, वह कितनी बढ़िया हिंदी बोलता था! उससे लड़कों ने चिल्लाकर कहा, ‘अंग्रेजी में बोलो!’ तो बोला, ‘मुझे या तो रूसी आती है या हिंदी। हमारे देश का कोई भी नागरिक अंग्रेजी बोलता-जानता नहीं है, वह भी नहीं बोलता। अंग्रेजी बोलने में वह शर्म और अपमान अनुभव करता है।’ आंटी, वह कहता था कि तुम लोग अमरबेल हो, जिसकी अपनी जड़ें नहीं होतीं, जो पेड़ों पर फैलकर उनका रस चूस-चूसकर हरी होती रहती है, अपनी जमीन से उसका कोई वास्ता नहीं होता।’’

‘‘व्हाट अमरबेल, मुकी?’’

‘‘अमरबेल नहीं जानतीं आप आंटी। इसे अंग्रेजी में डाडर कहते हैं।

‘‘ओ आई सी, दैट ब्लडी प्लांट?’’

‘‘हाँ, आंटी, वह भी उसे ब्लडी प्लांट ही कह रहा था।’’

‘‘सॉरी बॉय, वह ब्लडी प्लांट नहीं है, आइडियल प्लांट है!’’

‘‘हाँ आंटी, वह भी कह रहा था कि वह प्लांट तुम्हारे वर्ग का आइडियल प्लांट है।’’

‘‘ओह नो-नो बॉय, लीव दिस अनवांटेड रेफरेंस—एंड लेट दैट रशन स्कॉलर गो टू हेल। एंड यू गो टू स्वीटी, शी माइट बी वेटिंग फॉर यू।’’

‘‘आल राइट आंटी।’’ कहकर मुकी मस्ती से गाता हुआ स्वीटी की ओर चल पड़ा...आई लव यू एंड यू लव मी...’’ अंदर जाकर अपने हिप्पी-कट बालों को एक झटका देकर पुकारा, ‘स्वी...टी!’

‘हल्लो मुकी’, स्वीटी की आवाज थी, मुकी सीटी बजाता हुआ अंदर जा पहुँचा और जाकर ग्रामोफोन पर एक इंगलिश रेकार्ड लगा दिया और दोनों रेकार्ड की धुन पर अलमस्त होकर ट्विस्ट करने लगे।

छोटा लड़का नाश्ता करने के बाद वहाँ आ गया और अपनी बहन से पूछने लगा, ‘‘जीजी, मेरी माँ कहाँ है?’’

मुकी हँसने लगा, और स्वीटी ने डाँटते हुए कहा, ‘‘यू कंट्री बॉय, कांट प्रोनाउंस सिस्टर ऑर स्वीटी? जीजी...यह जीजी क्या होता है? और ऐसा उलटा-पुलटा सवाल क्यों पूछता है बाबा? मम्मी तो अपने घर पर ही है!’’

मुकी ने हँसते हुए स्कूल में घटी घटना बता दी; और उसके साथ स्वीटी भी हँसने लगी, फिर दोनों रेकार्ड की धुन पर कमर और सिर हिला-हिलाकर ट्विस्ट करने लगे। और वह लड़का उदास सा दूसरी ओर भटक गया।

और ऐसे ही तमाम छोटे-छोटे बच्चे अपनी असली माँ से कटे हुए देश में भटक रहे हैं। वे पैदा होते ही सौंप दिए जाते हैं एक अप-टू-डेट आया के हाथ, जो पाल-पोसकर उन्हें समझाती है कि तुम देशी नहीं, विदेशी बच्चे हो। लेकिन यह लड़का विदेश का पूरा रंग चढ़ने के पहले ही अपनी माँ की पूछताछ करने लगा। यही तो इसकी बेचैनी है, यही तो इसके भटकाव का कारण है।

उस रूसी विद्वान् ने कहा था कि तुम्हारी माँ तो भारत के गाँवों में है, शहरों के कारखानों में है—खेतों में काम करती हुई। पत्थर तोड़ती हुई, मिट्टी की हँसी हँसती हुई, मिट्टी की व्यथा रोती हुई मिट्टी की ताकत उसकी ताकत है—वही अन्न पैदा करती है, जिसे तुम लोग खाते हो; और वही वस्त्र बुनती है, जिसे तुम लोग पहनते हो; वही वे सारे सामान बनाती है, जिसे तुम लोग काम में लाते हो और जिससे अपने को सजाते हो। लेकिन तुम लोग उसे नहीं जानते। अंग्रेजी के आदेश पर ये आयाएँ तुम्हें सिखाती हैं कि तुम लोग उसे भूल जाओ; और तुम भूलते ही नहीं, उसका मजाक भी उड़ाते हो, उसे गाली देते हो; कोशिश करते हो कि वह भूखी मरती रहे। कितना अभागा होता है वह बच्चा, जो मातृविहीन होता है; और उससे भी अभागा वह बच्चा होता है, जो माँ के जीवित होते हुए भी उससे वंचित होता है; और उससे भी अभागा वह होता है, जो दूसरे की माँ को माँ समझकर, अपनी माँ के होने का अहसास ही नहीं कर पाता। तुम लोग अभी नशे में हो; जब कभी नशा टूटेगा और कभी वापस लौटोगे तो मालूम पड़ेगा कि तुमने और तुम्हारे देश ने कितना खोया है! गुलामी चाहे शारीरिक हो, चाहे मानसिक, उसमें आदमी विकास नहीं कर सकता। यह सच है कि तुम्हारा देश आजाद हो गया है, लेकिन तुम्हारा मन अभी आजाद नहीं हुआ है—वह अभी अंग्रेजी और अंग्रेजियत की दासता से बुरी तरह जकड़ा हुआ है।

कितना सच कहा था उस विद्वान ने! इसीलिए सारे समाजवादी देशों ने और अन्य बहुत से देशों ने भी आजादी के साथ-साथ भाषा के प्रश्न को अपरिहार्य भाव से जोड़ रखा है। भाषा की आजादी के बिना देश की आजादी की कल्पना भी नहीं की जा सकती। भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है—वह हमारे चरित्र का एक अंग है; वह हमारी अनुभूति, हमारी चिंतना और हमारे जीवनसंघर्ष में रची-बसी होती है। वह अपने साहित्य में, देश की आत्मीयता का रस और अपनी मिट्टी की ऊर्जा सजाए रहती है, इसीलिए जो व्यक्ति अपनी भाषा से जुड़ता है, स्वभावतः उसका चरित्र देश के संदर्भ में निर्मित होता है। वह भाषा हमें अपने में निहित देश की धरती की गंध, ऊर्जा, सांस्कृतिक परंपरा, तत्कालीन जन-जीवन की सारी खुरदरी और स्निग्ध चेतना रो पड़ती है, और हमें एक राष्ट्रीय चरित्र प्रदान करती है। आज राष्ट्रीय चेतना से जोड़नेवाली इन भारतीय भाषाओं को गँवारू, मटमैली मानकर उपेक्षा की जाती है, राष्ट्रीयता की बुनियाद के बिना ही एक अरूप अंतरराष्ट्रीय या सार्वभौम चेतना का स्वाँग भरनेवाली अंग्रेजी की पूजा होती है। अंग्रेजी का फटा ढोल देशवासियों के गले में लटका दिया जाता है। जो लोग इस ढोल को अप्रासंगिक और अनावश्यक बोझ समझकर बजाने से इनकार करते हैं, उनके लिए मान लिया जाता है कि उनकी अंतरराष्ट्रीय चेतना की खिड़की नहीं खुली है और वे इस देश में बसने लायक नहीं हैं।

किंतु चेतना और सभ्यता की बातें तो ऊपरी हैं, इन चेहरों के पीछे जो असली चेहरा है, वह है पैसे का चेहरा। एक विशेष सुविधाजीवी वर्ग का विकृत आर्थिक चेहरा सभ्यता और अंतरराष्ट्रीय चेतना के नकली चेहरे से ढका है। अंग्रेजी कुछ गिने-चुने लोगों को पद देती है और पैसा देती है। वर्तमान भारतीय समाज-व्यवस्था में रुतबा तो देती ही है किंतु रुतबा तो अमूर्त वस्तु है; मूर्त और ठोस वस्तु तो है पद और पैसा। और अंततोगत्वा पद का भी संबंध अधिकार और अधिकार का संबंध पैसे से ही होता है। राष्ट्रीय चरित्र से हीन और अभी भी दास मानसिकता वाला एक वर्ग यह जरूर जानता है कि अंग्रेजी में फिसलते रहने से, और अंग्रेजी चाल-ढाल में ढलकर सामान्य जन से कटकर जीते रहने से फिलहाल गौरव तो प्राप्त होता है, किंतु वह गौरव एक दिन में समाप्त हो जाए, उसकी सारी अभिजात संस्कृति व सभ्यता, नफासत एवं हवाई बड़प्पन का चोला एक क्षण में सरककर उसे नंगा व निःसत्त्व कर दे यदि अंग्रेजी के द्वारा प्राप्त होनेवाली सुविधाएँ और समृद्धि उसे प्राप्त न हों। अंग्रेजी के आग्रह के पीछे कुछ लोगों की यह सुविधाभोगी और अर्थमूलक चेतना है और इस चेतना को बेशर्मी से जिलाने का प्रयत्न करती रहती है, अपने को समाजवादी कहनेवाली सरकार, जनवादी कहे जानेवाले नेता और राष्ट्रीय शिक्षा का झूठा दम भरनेवाले शिक्षाशास्त्री। अंग्रेजी के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय ज्ञान सभ्यता और चेतना की खिड़की खोलने के पीछे सुविधाजीवी वर्ग का एक विराट् और कुत्सित षड्यंत्र काम कर रहा है; और इस षड्यंत्र में शामिल हैं मंत्री, नेता, उच्च व्यवसायी, उच्च सरकारी अफसर और छोटे-बड़े शिक्षाशास्त्री। और विडंबना यह है कि मंच पर भारतीय भाषाओं के हित का ढिंढोरा पीटनेवाले भारतीय भाषाओं के शिक्षक भी व्यवहार में अंग्रेजी की हिमायत ही नहीं करते, अपने बच्चों की चाल-ढाल को भी अंगे्रजियत में सराबोर करने की चेष्टा करते रहते हैं, ताकि वे तो भारतीय भाषाओं के नेता बनकर कमाएँ और बेटा अंग्रेजी अफसर होकर पद और धन-लाभ करे। यह दोहरा चेहरा केवल भाषा के ही क्षेत्र में नहीं है, समस्त राष्ट्रीय समस्याओं के क्षेत्र में है। इसलिए पूरा देश बड़ी-बड़ी जनवादी घोषणाओं के बावजूद निरंतर समस्याओं में उलझता ही जा रहा है।

अंग्रेजी विशेष वर्ग को पद और पैसा देती है, इसीलिए इस वर्ग ने (जो सरकार में हैं, प्रभावशाली उच्च समाज में हैं) अंग्रेजी के ज्ञान को ही प्रतिभा या मेधा का पर्याय मान लिया है। यदि एक क्षण के लिए इसे मेधा का पर्याय मान लिया जाए, तो सामाजिक समानता का डंका पीटनेवाली इस समाजवादी सरकार से पूछा जा सकता है कि उसने देहातों में इस मेधा यानी अंग्रेजी-शिक्षा और वातावरण की निर्मित का क्या प्रयत्न किया है, और खेती-बाड़ी, धूल-कीचड़, गरीबी और अभाव में पलकर पढ़नेवाले देहाती वातावरण के बच्चों को शहरी स्कूलों के निकट और शहर के सामान्य स्कूलों को शहर के पब्लिक स्कूलों के निकट लाने का प्रयत्न किया है। देश के इतने बड़े देहाती क्षेत्र ने क्या अपराध किया है कि उसे अंग्रेजी ज्ञान वाली मेधा के वरदान से वंचित किया जा रहा है। सरकार सुविधाओं और वातावरण की इतनी भयानक असमानता के होते हुए भी प्रतियोगिताओं में दोनों के अंग्रेजी ज्ञान का समान स्तर कैसे पाना चाहती है? क्या यह सरकार आई.ए.एस., पी.सी.एस. आदि प्रतियोगी परीक्षाओं में इंग्लिश को मेधा का पर्याय बनाकर निहायत बेशर्मी के साथ इतने बड़े देश की विराट् किसान-मजदूर जनता का खुलेआम अपमान नहीं कर रही है। क्या यह उसका कुत्सित षड्यंत्र नहीं है कि अधिकांश किसानों और मजदूरों के बेटे नौकरी में चपरासी, क्लर्क, प्राइमरी या मिडिल स्कूल के शिक्षक, सिपाही, पहरेदार बनकर रह जाएँ और कलक्टर, कमिश्नर, राजदूत, राज्यपाल, सेक्रेटरी आदि अनेक उच्च पदों पर वे बच्चे आसीन हों, जिनमें से अधिकांश को यह नहीं मालूम कि त्रिवेंद्रम कहाँ है, उड़ीसा कहाँ है, विवेकानंद कौन थे, हमारा रक्षा मंत्री कौन है, हमारे भारतीय पर्व कौन-कौन से हैं, कौन-कौन हमारे सांस्कृतिक और साहित्यिक नेता हुए हैं और गाँव का वास्तविक जीवन क्या है, ‘कामसूत्र’ के वात्स्यायन और ‘शेखर एक जीवनी’ के वात्स्यायन एक ही व्यक्ति हैं या दो हैं? लेकिन नहीं, अंग्रेजी को मेधा का पर्याय मानना, झूठ और न्यस्त स्वार्थ वाले वर्गों का कुत्सित षड्यंत्र है। मेधा रचनात्मक होती है, और रचनात्मकता का संबंध अपनी भाषा और परिवेश से होता है, वह दूसरों की भाषा, साहित्य और जीवन-पद्धतियों की नकल से नहीं आती। अंग्रेजी यदि शान मात्र देती, तो भी गनीमत थी! वह हमें अंग्रेजियत देती है, हमें अपने परिवेश और परंपरा से कटना ही नहीं, उनका मजाक उड़ाना सिखाती है; वह अपने परिवेश की मिट्टी से अपने देश के अनुकूल नई रचना करने के स्थान पर, बने-बनाए विदेशी माल का आयात करना सिखाती है; और आयात पर कोई टैक्स नहीं लगता, इसलिए वह माल अप्रतिबंधित रूप से बाजार में आता रहता है। कितने शर्म और दुःख की बात है कि जब अनेक देश अपनी-अपनी भाषाओं के माध्यम से सोचने-विचारने और नई रचना की शक्ति का अप्रतिहत भाव से विकास कर रहे हैं, तब हमारे देश में भारतीय भाषाओं को सोच-विचार और रचना में बाधक मानकर उनके समर्थकों को हीन और हेय दृष्टि से देखा जाता है। हिंदी में शोध गं्रथ तथा एम.ए. का प्रश्न-पत्र लिखनेवाले अन्य विषयों के छात्रों को दंडित होना पड़ता है। जब एक ओर इस तरह के लोग अपनी भाषा के माध्यम से देश की रचनात्मक शक्ति के विकास के लिए जूझ रहे हैं; तब दूसरी ओर अंग्रेजी के दत्तक पुत्र लोग शीशे के कमरे में बैठकर पद और पैसे का उपयोग कर रहे हैं, और खिड़की से झाँककर, राह चलनेवाली देशी-गँवार जनता के सिर पर मुसकराकर थूक देते हैं, और थूकने के बाद भी सभ्य और सुसंस्कृत होने का अपना गौरव अक्षुण्ण रखते हैं।

मेधा या प्रतिभा क्या है? आज भारत इतने वर्षों में भी इसकी सही परिभाषा नहीं बना सका, इसलिए एक छोटा-सा वर्ग असली प्रतिभा का उपहास कर अपने प्रतिभा-भास के सहारे विशाल जनसमूह का अपमान करता चला आ रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं में ओठ बना-बनाकर बोली जाती हुई अंग्रेजी और उसके साथ-साथ मुँह खोलने, बाल और टाई ठीक करने, चम्मच और काँटा उठाने, आँख मिचकाने, बात-बात में थैंक्स और सॉरी कहने की अदा प्रतिभा का प्रतीक बन गई है। यहाँ तक कि फौजी प्रतियोगिताएँ भी इस अदाकारी से मुक्त नहीं हो सकी हैं। प्रतियोगी की शारीरिक और मानसिक शक्ति कितनी है, संकट के समय वह क्या सोचता है, उनसे मुक्त होने या जूझने के लिए उसके मस्तिष्क में क्या योजनाएँ उगती हैं, उन्हें कैसे क्रियान्वित किया जा सकता है, देश की जमीन के प्रति उसका अनुराग कितना झूठा या सच्चा है, अपने इतिहास-भूगोल और वर्तमान जीवन-यथार्थ का उसे कितना ज्ञान है, वह युद्ध की प्रणालियों से कितना परिचित है—आदि बातों से ही उसकी मेधा की पहचान हो सकती है, और फिर कितनी विचित्र बात है कि जीवन में अनेक संकटों से निरंतर जूझते रहनेवाले संकट झेलने के अयोग्य, और शीशों के कमरों में से ताजा-ताजा निकले हुए अंग्रेजी कुमार लोग योग्य मान लिये जाते हैं।

अजीब विडंबना है कि अंग्रेजी के माध्यम से पालित-पोषित और शिक्षित बालकों में अधिकांश का संबंध नगरों और विदेशी जीवन-पद्धतियों से होता है। उन्हें शुरू से ही देशीपन की उपेक्षा करना सिखाया जाता है। वे ही अंग्रेजी की बैसाखी के सहारे जब जनता के अफसर बनते हैं, तो जनता के साथ उनका कितना लगाव हो सकता है—इसे समझा जा सकता है। गाँव और सामान्य जनता को भुनाना और घृणा करना ही इनका चरित्र होता है। वे गाँवों की जनता के दुःख-दर्द को समझने के स्थान पर उसका मजाक उड़ाते हैं और बड़े बने रहते हैं। आखिर इस देश में यह सब कब तक चलता रहेगा? जनता के नाम की माला जपनेवाले वामपंथी भी तो इस प्रश्न पर नहीं सोचते। जब रूसी स्कॉलर इस देश में आकर इस देश की असली माँ की तलाश करता है, तब हमारे देशी साम्यवादी, देश-विदेश दोनों में अपनी विदेशी माँ या मालकिन का आँचल पकड़े घूमते हैं, इस देश के वामपंथी हों या दक्षिणपंथी, इस क्षेत्र में सबके चेहरे एक से हैं और अन्य देशों के स्वभाषा-प्रेम को देखते हुए भी उनके बीच भी वे बेशर्मी से अपनी भाषा की उपेक्षा करते रहते हैं।

‘‘तुम्हारी माँ कहाँ है?’’ पूछता है एक रूसी, एक चेक, एक चीनी, एक जापानी, एक जर्मन, एक फ्रेंच और हमारा देशभक्त अंग्रेजी की ओर इशारा करके कहता है, ‘ये रहीं मेरी मम्मी!’ और दाँत निपोर देता है।

और वह विदेशी हँसता हुआ कहता है, ‘‘...नहीं, यह तुम्हारी माँ नहीं है, यह तो विदेशी मालकिन है! तुम्हारी माँ तो खेतों में काम कर रही है, कारखानों, में कोयला झोंक रही है, वह सुबह की लाली और सावन की हरियाली उगा रही है, वह गीतांजलि और गोदान लिख रही है; वह ट्विस्ट नहीं गरबा, भाँगड़ा, भरतनाट्यम, कथकली नाच रही है; वह पहाड़ों, जंगलों और समुद्रों के सौंदर्य लिख रही है, ऊसरों और रेगिस्थानों की उजाड़ गाथा सुन रही है, वह भूख और बेकारी से घायल लोगों का दर्द गा रही है, वह कोटि-कोटि उठी हुई बाँहों के समवेत संघर्ष की अटूट जिजीविषा चित्रित कर रही है।’’

‘‘नहीं-नहीं, यह गँवार देशी औरत मेरी माँ नहीं हो सकती।’’ हमारा देशभक्त बेशर्मी से चिल्लाता है और वह विदेशी-उपहास और करुणा भरी हँसी हँस देता है।

‘‘माँ, मेरी माँ कहाँ है?’’ वह बच्चा फिर लौट आया है और अपनी मम्मी से पूछ रहा है, लेकिन उसे उत्तर नहीं मिलता, उसके स्वर में दर्द है और आँखों में असीम भटकाव।

आर-३८, वाणी विहार

उत्तम नगर, नई दिल्ली-११००५९

दूरभाष ः ९२११३८७२१०

रामदरश मिश्र

 

 

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