महात्मा गांधी को समझें

महात्मा गांधी को समझें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में महात्मा गांधी का एक डिजिटल संग्रहालय बनवाया है। ‘महात्मा गांधी-१५०’ के अवसर पर उन्हें याद करने के लिए यह सबसे आधुनिक माध्यम हो गया है। इस संग्राहलय में एक सौ बीस देशों से लोग देखने आ चुके हैं। इसकी एक विषेशता है, वह यह कि संग्रहालय में नई पीढ़ी महात्मा गांधी के साथ सेल्फी ले सकती है। आनेवाला हर दर्शक ऐसा कर भी रहा है। इस संग्रहालय में गांधीजी की आवाज सुनी जा सकती है। दर्शक यहाँ आकर देख सकते हैं कि युवा गांधी ने कैसे महात्मा गांधी की यात्रा पूरी की।

ऐसे गांधीजी को उनके जीवनकाल में ही आदर और श्रद्धा से अनेक नामों से विभूषित किया गया। वे नाम उनके पर्याय बन गए हैं। चलन में बने हुए हैं। रवींद्रनाथ ठाकुर ने उन्हें ‘महात्मा’ कहा। नेताजी सुभाष चंद्र बोस उनसे स्वाधीनता संग्राम की पद्धति पर राजनीतिक रूप से असहमत थे, फिर भी युद्ध की रणभेरी बजाने से पहले उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ कहकर संबोधित किया। वह संबोधन विदेश की भूमि से था। गुजरात ने उन्हें प्यार से ‘बापू’ कहा। विंस्टन चर्चिल ने उन्हें ‘नंगा फकीर’ कहा। नेल्सन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग जैसी विभूतियों ने उन्हें ‘अहिंसा का पुजारी’ माना। वे उनके रास्ते पर चले। उनकी माँ उन्हें मुनिया पुकारती थी। इतिहासकार धर्मपाल की धारणा थी कि वे हनुमान रूप थे। एक समूह उनमें बुद्ध और ईसामसीह की छवि पाता है। ऐसी थी और आज भी है महात्मा गांधी की महिमा।

अल्बर्ट आइंस्टीन ने सच ही लिखा था कि ‘भावी पीढ़ियों को विश्वास ही न होगा कि इस धरती पर हाड़-मांस का कोई गांधी कभी जनमा भी था।’ महात्मा गांधी की विश्वव्यापी स्वीकार्यता ने आइंस्टीन के संदेह को मिटा दिया है। लेकिन गांधीजी के अनोखेपन पर विराम नहीं लगा है। तभी तो रामचंद्र गुहा एक संदर्भ का उल्लेख कर लिखते हैं कि ‘गांधी एक समस्या हैं। संविधानवादियों की नजर में वे धुर क्रांतिकारी हैं। मुस्लिम नेताओं के लिए सांप्रदायिक हिंदू हैं।’ गांधीजी के जाने के बाद उनकी परिभाषा का प्रश्न प्रारंभ से ही बना हुआ है। उन्हें अपने-अपने नजरिए से देखने और दिखाने का सिलसिला जो चल पड़ा, वह रुकने का नाम नहीं लेता। क्या कभी इस पर विराम लगेगा? यह प्रश्न गांधी के हर जिज्ञासु के सामने है। यह अधिक जटिल आज इसलिए भी अनुभव किया जा रहा है, क्योंकि गांधीजन कहलाने वाले और गांधी की रट लगानेवाले आज उन्हें मार्क्सवादी नजरिए से लोगों को समझाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे लोग गांधीजी के बारे में भ्रम ज्यादा फैला रहे हैं और उनसे प्रेरित करने का कार्य कम कर रहे हैं। एक बार किसी ने विनोबा से पूछा कि ‘उन्हें ‘गांधी’ कहा जाए या ‘गांधीजी’?’ विनोबा ने समझाया, ‘आप अगर उन्हें व्यक्ति मानते हों, एक पूज्य पुरुष के रूप में देखते हों तो ‘गांधीजी’ कहिए। लेकिन यदि उन्हें विचार मानते हों तो ‘गांधी’ कहना चाहिए।’

गांधीजी को समझने-समझाने में समस्या इसलिए खड़ी हुई है, क्योंकि उनके सहयोगियों ने परस्पर विरोधी व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं। वे आज भी कर रहे हैं। इससे गांधीजी की व्यापकता और स्वीकार्यता को मापा जा सकता है। यह समझा जा सकता है कि गांधीजी के बिना आज किसी भी धारा का काम नहीं चलेगा। इससे यह भी समझ सकते हैं कि गांधीजी को उनके सहयोगियों ने भी सही ढंग से नहीं समझा? स्वयं पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, ‘जहाँ तक गांधीजी का प्रश्न है, उनको समझ पाना बड़ा कठिन था। कभी-कभी उनकी भाषा एक औसत आधुनिक के लिए अबोध हो जाती थी। फिर भी हमें लगता था कि हम उनको इतनी अच्छी तरह से जानते ही हैं कि समझ सकें कि वह एक महान् और अनूठे आदमी और यशस्वी नेता हैं।’ इसमें नेहरू मान रहे हैं कि वे गांधीजी को समझ नहीं सके। वे उनका आदर जरूर करते थे। नेहरू के बारे में माना जाता है कि वे गांधी को समझ नहीं सके। लेकिन आचार्य जे.बी. कृपलानी तो उन चंद लोगों में से थे, जिन्हें समझा जाता था कि वे गांधीजी को पूरी तरह समझते थे। ऐसे कृपलानी ने ‘गांधी-जीवन और दर्शन’ में लिखा है कि ‘कभी-कभी ऐसा होता था कि गांधीजी सही कार्य करते थे, मगर सही कार्य करने के लिए वे ऐसे कारण गिनाते थे, जो अतार्किक लगते थे।’ यह अंश ‘सत्याग्रह स्थगित’ अध्याय में है। बात १९३४ की है। वही साल है, जब गांधीजी ने कांग्रेस छोड़ी थी। अपने लिए उन्होंने वे कार्य चुने, जिनका संबंध भारत के पुनर्निर्माण से है। उन कार्यों की महत्ता बनी हुई है।

विचारक बनवारी ने अपनी पुस्तक ‘भारत का स्वराज्य और महात्मा गांधी’ में लिखा है कि ‘वे (गांधीजी) अद्भुत सेनापति थे और उनकी बुद्धि को समझ पाना ब्रिटिश राज्य के लिए तो क्या, उनके अपने निकट सहयोगियों के लिए भी संभव नहीं था। जवाहरलाल नेहरू के लिए तो और भी कम, क्योंकि उन्होंने गांधीजी को हमेशा प्रतिकूल बुद्धि से ही देखा था।’ इस आधार पर माना जा सकता है कि गांधीजी को प्रतिकूल, अनुकूल और यथार्थ बुद्धि से देखने का जो क्रम उनके जीवन में प्रारंभ हुआ, वह आज भी जारी है। इसमें उनके सहयोगी, विरोधी और जिज्ञासु आदि सभी आते हैं। कभी गांधीजी व्यक्ति थे। व्यक्तिरूप गांधीजी कैसे महापुरुष बने, इसे विनोबा ने एक बार बताया, ‘गांधीजी जैसे इतने बड़े महापुरुष हमारे लिए हो गए। फिर भी भगवान् की कृपा है कि वे अलौकिक पुरुष पैदा नहीं हुए। शुकदेव जन्म से ही ज्ञानी थे। कपिल महामुनि जनमते ही माँ को उपदेश देने लगे। शंकराचार्य आठ वर्ष की उम्र में वेदाभ्यास पूरा करके भाष्य लिखने लगे। लेकिन गांधीजी ऐसी कोटि में पैदा नहीं हुए। वे सामान्य मानव थे। इस जीवन में उन्होंने कुछ प्राप्त किया, अपनी प्रत्यक्ष साधना और सत्य निष्ठा से किया।’ आज वे विचाररूप हैं। उनके विचार को जिज्ञासु भाव से समझने की आवश्यकता आज पहले से कहीं अधिक है।

गांधीजी के जाने के बाद वर्धा में जो सम्मेलन मार्च १९४८ में हुआ, उसमें देवदास गांधी ने पूछा, ‘मेरे सामने यह प्रश्न है कि अब बापू के बाद उनके कार्यक्रम और विचारों के बारे में मेरा मार्गदर्शन कौन कर सकता है? मैं जानना चाहता हूँ। उत्तर की जरूरत मेरे जैसे लाखों आदमियों को मालूम होती है।’ उन्होंने यह प्रश्न सेवाग्राम आश्रम में उपस्थित गांधीजी के निकटस्थ सहयोगियों के समक्ष रखा था। तारीख थी ११ मार्च, १९४८। जिस किसी के मन में प्रश्न हो कि आज गांधीजी को कैसे जानें? कौन थे मोहन दास गांधी? क्या महात्मा गांधी उनसे भिन्न थे? ऐसे प्रश्न विनोबा से भी पूछे गए। उनका कहना था, ‘वे तो रोज-रोज बदलते, पल-पल विकसित होते रहे हैं।’ तभी तो मोहन दास महात्मा गांधी बन सके। मूल प्रश्न यही है कि किस तरह और विचार की वह थाती क्या थी, जिससे महात्मा गांधी का व्यक्तित्व बना। इसे जो समझ लेगा, वह जान सकेगा कि मोहन दास कैसे महात्मा गांधी बने। इसे समझने-समझाने का सही परिपे्रक्ष्य में प्रयास कम ही हुआ है। गांधीजी को एक खाँचे में बिठाने की कोशिशें ज्यादा हुई हैं। उन्हें नए सिरे से समझने की जरूरत है। तभी अपने आस-पास की दुनिया के बारे में सही समझ पैदा होगी। सही समझ जिसे हो जाती है, वह स्वयं को उपलब्ध हो जाता है। यही गांधी के साथ हुआ। उस महात्मा गांधी का साक्षात् दर्शन भी स्वयं को उपलब्ध व्यक्ति कर सकेगा। उनसे तदाकार हो सकेगा।

मोहन दास गांधी प्रस्थान के व्यक्ति हैं। महात्मा गांधी मंजिल हैं। यही इनमें अंतर है। इस दृष्टि से मोहनदास गांधी हमेशा प्रासंगिक रहेंगे। लेकिन महात्मा गांधी तो हमेशा ही अकादमिक अध्ययन के विषय माने जाएँगे। पहले को जानना उनके साथ यात्रा करना है। दूसरे की व्याख्या संभव है, उनके साथ यात्रा नहीं। मोहन दास गांधी प्रेरक हैं। उनसे प्रेरणा प्राप्त की जा सकती है। लेकिन महात्मा गांधी को विभिन्न व्याख्याओं से जाना जा सकता है। मोहन दास को जीवन में उतारना संभव है। महात्मा गांधी आज होते तो क्या करते, यह बौद्धिक विमर्श का विषय है।

फ्रांसीसी मनीषी रोम्याँ रोलाँ ने महात्मा गांधी के बारे में इस तरह दुनिया को बताया, ‘महात्मा जिन्होंने विश्व सत्ता के साथ अपने को एकाकार कर दिया है।’ उन्होंने मोहन दास गांधी का भी एक शब्द चित्र बनाया। ‘शांत, काली आँखें। छोटा कद, दुबला शरीर, लंबोतरा चेहरा, सूप जैसे कान। माथे पर सफेद टोपी, पहनावे में साफ -धुले कपड़े, पैर नंगे। भोजन में भात और फल, पानी के सिवा और कुछ नहीं पीते। लेटते हैं जमीन पर, सोते हैं कम, काम करते हैं लगातार। शरीर की तो जैसे खोज-खबर ही नहीं रखते।’ वे यह भी बताते हैं कि ‘आदमी सरल शिशु जैसा है, अपने विरोधियों के साथ भी मधुर और विनयी, आंतरिकता में कहीं जरा-सी भी खोट नहीं है।’ उन्होंने लिखा कि ‘यही हैं वे व्यक्ति, जिन्होंने तीस करोड़ जनों को जगा दिया है, कँपा दिया है ब्रिटिश साम्राज्य को और आरंभ किया है मानव-राजनीति का एक ऐसा सशक्त आंदोलन, जिसकी तुलना लगभग दो हजार वर्षों के इतिहास में नहीं है।’

रोम्याँ रोलाँ दूसरे जीवनी लेखक थे। गांधीजी के पहले जीवनी लेखक जोसेफ जे डोक थे। उन्होंने भारत की यात्रा की थी। इसलिए गांधीजी के ‘चेहरे और देह की’ एक कल्पना उन्होंने कर रखी थी। जब मिले तो विस्मित हुए। आश्चर्य दूसरे पर होता है और विस्मय स्वयं पर। जोसेफ जे डोक भी खुद पर ही विस्मित हुए, क्योंकि उन्होंने जो देखा, वह उनकी कल्पना के विपरीत था। उनके शब्द हैं, ‘एक नाटा, सुकुमार और दुबला-पतला व्यक्ति मेरे सम्मुख खड़ा था, जिसका सुसंस्कृत और ईमानदार चेहरा मुझे देख रहा था। उसकी त्वचा और आँखें काली थीं, लेकिन चेहरे को दीपित करती हुई उसकी मुसकराहट तथा निर्भय दृष्टि किसी को भी अपने साथ बहा ले सकती थी।’

ऐसे महात्मा गांधी के बचपन की दो घटनाएँ हैं। पहली घटना नकल न करने की है। शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर जाइल्स का स्कूल में निरीक्षण था। हर छात्र को उनके सामने अंग्रेजी के पाँच शब्द लिखने थे। मोहन दास नकल करके सही शब्द लिख दें, इसका इशारा उनके अध्यापक ने किया। लेकिन वे ऐसा न करने के लिए कृतसंकल्प थे। अपनी आत्मकथा में गांधीजी ने लिखा है कि ‘मैं दूसरे लड़कों की पट्टी में देखकर चोरी करना कभी सीख न सका।’ दूसरी घटना थी। ‘शनिवार को खेल के घंटे से तुम गैर-हाजिर क्यों थे?’ प्रिंसिपल ने अपने सामने लाए गए चौदह साल के छात्र से यह पूछा। उसने जवाब दिया, ‘सर, मैं अपने पिताजी की सेवा में था।’ ‘मेरे पास घड़ी नहीं है, बादलों के कारण धोखा हुआ और समय का सही अंदाज नहीं लगा सका।’ जब मैं पहुँचा तो सब लड़के जा चुके थे।’ ‘झूठ बोल रहे हो?’ प्रधानाध्यापक ने रुखाई से कहा। १८८३ का वह साल था। जगह थी राजकोट। गुजरात की एक छोटी सी रियासत। वहाँ के एल्फ्रेड हाई स्कूल के प्रिसिंपल दोराबजी एदलजी गीमी अनुशासन के मामले में कठोर थे। यह उदाहरण मोहनदास गांधी का है। उस उम्र में भी चरित्र के प्रति ऐसी जागरूकता एक अनहोनी बात है। सत्य, ईमानदारी और दृढ़ निष्ठा उनमें बचपन से ही थी। महात्मा गांधी ने स्वयं यह स्वीकार किया है,‘जो भी सद्गुण आप मुझमें देखते हैं, वह मैंने अपनी माँ से पाए।’

‘बचपन में मोहन दास गांधी झिझक से भरे हुए, शर्मीले, लेकिन सत्यवादी और निष्ठावान थे। माता-पिता में उनकी गहरी श्रद्धा थी और स्कूली पढ़ाई के बाद वे अपने पिता की सेवा में जुट जाते थे। पढ़ाई-लिखाई में गांधी मंद नहीं थे, पर संकोची थे। उनके स्वभाव में आरंभ में जो झिझक और संकोच था, वह उनकी अंतर्मुखता के कारण था।’ ऐसे मोहन दास कानून की पढ़ाई के लिए लंदन गए। पढ़ाई पूरी की। लंदन में कानून की पढ़ाई के दौरान उन्होंने लंदन विश्वविद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा पास करने का निर्णय लिया। जिसमें एक विषय लैटिन भाषा का भी था। उस समय के उनके श्रम और लगन का विवरण पढ़कर कोई भी यह मानेगा कि वे अध्यवसायी थे और अपने हर काम को गंभीरतापूर्वक लेते थे।

शुरू में उनका खयाल था कि वह ‘अंग्रेज’ बन सकते हैं। इसलिए उन्होंने अपनी पोशाक बदली। वहाँ के रहन-सहन को अपनाया। थोड़े दिनों बाद ही उन्हें समझ में आ गया कि बीच की दीवार बहुत ऊँची है। लुई फिशर ने लिखा है कि ‘उन्होंने समझ लिया कि वे भारतीय ही रहेंगे और वे भारतीय हो गए।’ ऐसा क्यों हुआ और कैसे हुआ, इसे बनवारी ने समझाया है, ‘लंदन में उनकी सबसे बड़ी समस्या शाकाहार थी।...‘उन्हें एक शाकाहारी रेस्तराँ मिला और वे वहाँ के शाकाहारी आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने शाकाहार संबंधी साहित्य पढ़ा। वेजवाटर में, जहाँ वे कुछ दिन रहे थे, उन्होंने शाकाहारी क्लब की स्थापना की। उस समय के प्रसिद्ध शाकाहारी सर एडविन आरनोल्ड से संपर्क किया। वेजिटेरियन पत्रिका में नौ लेख लिखे। शाकाहार का प्रचार करनेवाले सम्मेलनों में गए।’ लंदन में पढ़ाई के दौरान ही सच्चे गांधी के लक्षण उभरने लगे थे।

वहाँ वे दो साल आठ महीने रहकर भारत लौटे। वकालत करने की सोची। लेकिन अनेक तरह की अड़चनों में वे पड़े रहे। एक बड़ी अड़चन यह थी कि वे इसे स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं थे कि वकालत पेशे में सबकुछ चलता है। वह अड़चन मनोवैज्ञानिक थी। उस उधेड़बुन के दौर में उन्हें दक्षिण अफ्रीका के एक मुकदमे में सहायता करने का प्रस्ताव मिला। वे पानी के जहाज पर सवार हुए। डरबन के लिए चल पड़े। वे १८९३ के मई में डरबन पहुँचे। वहाँ उनके मुवक्किल अब्दुल्ला सेठ उन्हें अदालत दिखाने ले गए। गांधी के सिर पर पगड़ी थी। यूरोपीय मजिस्ट्रेट ने पगड़ी उतारने का आदेश दिया। इसे अपमान समझकर उन्होंने इनकार कर दिया और अदालत से बाहर चले आए। स्थानीय समाचार-पत्रों में मजिस्ट्रेट के दुर्व्यवहार के बारे में खूब पत्र लिखे। रंगभेद के विरोध में वे आवाज उठा रहे थे। इस रूप में वे पत्रकार गांधी भी थे। वे वहाँ एक सप्ताह रुके। फिर प्रिटोरिया चले गए। जहाँ रहकर उन्हें अब्दुल्ला सेठ का मुकदमा लड़ना था। अब्दुल्ला सेठ नेटाल के सबसे धनी भारतीय व्यवसायियों में गिने जाते थे।

डरबन से प्रिटोरिया जाते हुए रास्ते में जो कुछ गुजरा, उसकी तुलना में डरबन वाली घटना कुछ नहीं थी। उन्हें पहले दर्जे की बोगी छोड़कर निचले दर्जे की आखिरी बोगी में जाने के लिए कहा गया। इनकार करने पर बड़ी बेहूदगी से उन्हें गाड़ी से उतार दिया गया। जहाँ वे ठिठुरती ठंड में रात गुजारते हुए उस शर्मनाक घटना पर सोचते रहे। रंगभेद और अपमान की उस घटना ने गांधी के सामने सवाल खड़े कर दिए। क्या यहाँ से भाग जाएँ? कब तक भागते रहेंगे? दूसरे सवाल ने उनके मन में निश्चय का भाव पैदा किया। डरबन से प्रिटोरिया की यात्रा पाँच दिनों की थी। उसमें अपमान के पचासों झटके उन्हें लगे। जिससे वे दक्षिण अफ्रीका में भारतीय लोगों की अपमानजनक जिंदगी की एक झलक खुद देख सके। वहाँ ऐसी घटना आम थी। नई बात थी, उन घटनाओं पर गांधीजी की प्रतिक्रिया और उसे समाप्त करने का संकल्प। उससे ही राजनीतिक गांधी का जन्म हुआ।

वे तब २४ साल के थे। जो देखा, उसके विरुद्ध संघर्ष छेड़ना सरल काम नहीं था। उन्होंने लंबे समय से रंगभेद सहते आ रहे भारतीय समाज को संगठित किया। उन्हें संघर्ष में उतार दिया। पूरे भारतीय समाज को पहली बार एक सूत्र में बाँधा। वहाँ बंबई के मुसलिम व्यापारी थे। उनके हिंदू और पारसी क्लर्क थे। गिरमिटिया मजदूर थे। दक्षिण अफ्रीका में ही पैदा हुए भारतीय ईसाई थे। दक्षिण अफ्रीका वे अब्दुल्ला सेठ के मुकदमे के सिलसिले में आए थे। पर उनकी इच्छा आपसी सुलह-सफाई से उनका मुकदमा समाप्त करवाना और उनमें समझौता करवा देना था। लंबी कोशिश के बाद वे इसमें सफल हुए, पंच समझौता अब्दुल्ला सेठ के पक्ष में गया। जो कठिनाइयाँ आईं, उन्हें दोनों ने साथ बैठकर सुलझा लिया।

यह काम निपटाकर उन्हें भारत लौटना था। अब्दुल्ला सेठ ने उनके लिए विदाई भोज का आयोजन किया। वहीं एक अखबार ‘नेटाल मर्करी’ में उन्होंने यह समाचार पढ़ा कि नेटाल की सरकार भारतीयों का मताधिकार समाप्त करने के लिए कानून बनाने जा रही है। उन्होंने सबको इस कानून के खतरों से अवगत कराया और उपस्थित लोगों के आग्रह पर भारतीय समाज की लड़ाई लड़ने के लिए वे एक महीने के लिए वहाँ रुक गए। गांधीजी का इसे चमत्कार ही कहेंगे कि उन्होंने विदाई समारोह को भारतीयों के विधेयक विरोधी आंदोलन की राजनैतिक समिति में परिवर्तित कर दिया।

भारतीयों की कानूनी स्थिति तो बुरी थी ही, लेकिन उन्हें रोज गोरों के हाथों जो अपमान सहने पड़ते थे, वे तो और भी कष्टदायी थे। भारतीय कोई भी क्यों न हो, ‘कुली’ नाम से पुकारा जाता था। भारतीय स्कूल-मास्टर ‘कुली स्कूल मास्टर’ था, भारतीय स्टोर-कीपर ‘कुली स्टोर-कीपर’ और भारतीय दुकानकार ‘कुली दुकानदार’। गांधीजी को ‘कुली बैरिस्टर’ कहा जाता था। जिन जहाज कंपनियों के मालिक भारतीय थे, उनके जहाजों को ‘कुली जहाज’ कहा जाता था। भारतीयों का वर्णन आमतौर पर ‘गाली के योग्य एशियाई गंदगी, बुराइयों के भंडार, भातखोर और गंदे कीट-पतंग खानेवालों के रूप में किया जाता था।’ उन विपरीत परिस्थितियों में गांधीजी ने जो संघर्ष छेड़ा, वह एक सिद्धांत की स्थापना के लिए था। कानून के समक्ष समानता का सिद्धांत। साम्राज्यवाद के शोषण की समाप्ति का सिद्धांत। भारतीय समाज की लड़ाई वहाँ लंबी चली—करीब २१ साल।

दक्षिण अफ्रीका में ही गांधीजी ने सत्याग्रह को खोजा और पाया। लोगों को प्रेरित किया कि वे अपने सत्य का आग्रह बनाए रखें। इसके लिए जो भी कष्ट सहना पड़े, उसे सहें। लेकिन हिंसा पर न उतरें। दक्षिण अफ्रीका में ही मोहन दास महात्मा गांधी बने। इसके लिए उन्होंने बीस साल तपस्या की। उसी काल में उन्होंने अपने सत्याग्रह दर्शन को विकसित किया। एक बार उनका मनोबल गिराने के लिए खतरनाक अपराधियों के साथ जेल में रखा गया। अपने मन को शांत रखने के लिए गांधीजी सारी रात गीता के श्लोक बोलते रहे। वहाँ प्राप्त सत्याग्रह और अहिंसा को ही उन्होंने भारत के स्वाधीनता संग्राम का मुख्य अस्त्र बनाया। महात्मा गांधी की महानता को समझ सकनेवाले पहले भारतीय थे—गोपालकृष्ण गोखले। इसके अनेक उदाहरण हैं। दक्षिण अफ्रीका की जिम्मेदारी पूरी कर गांधीजी १८ जुलाई, १९१४ को भारत वापस आ गए। जिस तरह थोड़े दिनों के लिए वे दक्षिण अफ्रीका गए थे, उसी तरह सिर्फ निलहे लोगों की दुर्दशा देखने चंपारण गए। दोनों जगह उन्हें सत्याग्रह में उतरना पड़ा। इससे उनके स्वभाव की एक विषेशता समझी जा सकती है। वह यह कि महात्मा गांधी जो काम हाथ में लेते थे, उसे जान की बाजी लगाकर पूरा करते थे। यही उन्होंने चंपारण में किया। हालाँकि महात्मा गांधी की महानता को सबसे पहले गोपालकृष्ण गोखले ने ही पहचाना था। लेकिन उन्हें भी यह संदेह था कि गांधी की दक्षिण अफ्रीका की अनोखी राजनीतिक शैली भारत में नहीं चलेगी। इसलिए उन्हें गोखले ने सलाह दी कि एक साल सिर्फ देश भ्रमण करें। कुछ न बोलें। ऐसा सोचनेवाले गोखले तब अकेले नहीं थे। देश के बड़े-बड़े राजनैतिक नेताओं को मानो यकीन था कि गांधी का सत्याग्रह भारत में नहीं चलेगा।

उस समय के बड़े नेताओं की उनके प्रयोगों के बारे में जो-जो आशंकाएँ थीं, वे गलत साबित हुईं। लीक से हटकर जो-जो तरीके उन्होंने अपनाएँ, उन पर शोध चल ही रहा है। वह चलता रहेगा। एक निष्कर्ष यह निकला है कि गांधीजी ने जो राजनैतिक जीवन अपनाया और प्रयोग किए, उसका आधार भारत की सभ्यतागत धारणाएँ थीं। उन्हें ही वे आत्मसात् कर बड़े राजनैतिक नेताओं को गलत साबित कर सके। ‘भारतीय सभ्यता स्वार्थों के समाहार के लिए नहीं, आचरण की शुद्धि के लिए नियम बनाती है। इसलिए वह मनुष्य को उन्नयन की ओर ले जाती है। उसे आत्मबल प्रदान करती है। यह आत्मबल ही गांधीजी के सत्याग्रह का आधार बना था। वे मानते थे कि आत्मबल से बड़ी-से-बड़ी हिंसक शक्ति को परास्त किया जा सकता है। उनके आश्रम जीवन का लक्ष्य यही आत्मबल पाना था। उन्होंने स्वयं को साक्षी माना।’ अपने मन की गवाही से गांधीजी ने अहिंसा को भारत के स्वाधीनता संग्राम का अस्त्र बनाया। अहिंसा को स्वाधीनता संग्राम के साधन के रूप में अपनाकर गांधीजी ने असहाय और असमर्थ हुए साधारण भारतीयों को समर्थ बना दिया। अहिंसा ने उन्हें आंतरिक शक्ति दी, नैतिक बल दिया और ब्रिटिश बर्बरता के भय से मुक्त कर दिया।

चंपारण सत्याग्रह की सफलता से महात्मा गांधी भारतीय राजनीति के केंद्र में पहुँच गए। उन्होंने कांग्रेस का विधान बनाया। उसका कायाकल्प प्रारंभ हुआ। नागपुर अधिवेशन से गांधीजी देश के सबसे बड़े नेता बने। वहाँ उन्होंने घोषणा की कि ‘अगर उनके असहयोग कार्यक्रम को ठीक से लागू किया गया तो एक वर्ष में देश को स्वराज्य मिल जाएगा।’ उन्होंने साल भर का एक कार्यक्रम दिया। उनके नेतृत्व में कांग्रेस उसे पूरा करने में लगी। कुछ लक्ष्य पूरे हुए और कुछ नहीं हो पाए। लेकिन उस छोटी सी अवधि में देश को जगा दिया। इससे स्वाधीनता पहुँच में दिखने लगी। उस महात्मा गांधी ने स्वाधीनता आंदोलन का नेतृत्व किया। उनकी मूल भावना थी कि ‘अगर भारत के लोग यूरोपीय सभ्यता के अधर्ममय स्वरूप को पहचानकर उससे नाता तोड़ लें तो स्वाधीनता उन्हें मिल ही जाएगी, वे अपनी सभ्यता को भी उत्कर्ष की ओर ले जा सकेंगे।’ मगर वे अनुभव कर चुके थे कि ‘भारत की सभ्यता का परंपरागत तंत्र जड़ हो गया है।’ इसलिए उन्होंने स्वाधीनता संग्राम के साथ-साथ भारतीय सभ्यता के पुनरुद्धार के मूल मंत्र खोजे। उसके लिए कार्यक्रम बनाया और प्रयोग किए। ‘वे मानते थे कि पंचायत भारतीय सभ्यता का आधार है। इसलिए जब भारत के भावी राजनैतिक स्वरूप पर बहस हुई तो उन्होंने पंचायत का ही उल्लेख किया।’

स्वाधीनता संग्राम में गांधीजी ने दस सत्याग्रह चलाए। ‘नमक’ सत्याग्रह अनोखा था। लाहौर कांग्रेस ने पुनः सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाने का निर्णय किया। लेकिन वह किस पर हो, इसका निश्चय नहीं हो पा रहा था। कांग्रेस नेतृत्व ने यह भार गांधीजी पर डाला। उन्होंने नमक को चुना। इस पर अंग्रेज अफसर ही नहीं बल्कि कांग्रेस के दिग्गज नेता मोतीलाल नेहरू आदि भी सुनकर चकित हुए, क्योंकि उन्हें भरोसा नहीं हो रहा था कि नमक पर सत्याग्रह हो सकता है। जो देश-दुनिया में एक बड़े और अनोखे आंदोलन के लिए भविष्य में याद किया जाएगा। दुनिया जानती है कि गांधी सही थे। उन्होंने नमक इसलिए चुना था, क्योंकि उसका हर आदमी से नाता है। अंग्रेजों के नमक कर से हर कोई खिन्न भी था। विरोध का तरीका जो गांधीजी ने बताया, वह इतना सरल था कि कोई भी हाथ में नमक लेकर बागी हो सकता था। १२ मार्च, १९३० को गांधीजी अपने सहयोगियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी के लिए निकले। उस सत्याग्रह ने साबित किया कि गांधी एक अनोखे राजनीतिक नेता हैं। वह सत्याग्रह तीन साल चला।

लोग यह तो याद रखते हैं कि १९३४ में गांधीजी ने कांग्रेस छोड़ दी थी। लेकिन अकसर इसे विस्मृत कर दिया जाता है कि उन्होंने ‘१९३७ में कांग्रेस से अपना निर्वासन समाप्त कर लिया था।’ उसके बाद वे कांग्रेस को अगले संग्राम के लिए तैयार करने लगे। कैसे गांधीजी वैचारिक स्तर पर भिन्न और मौलिक थे? यह इस अंश से स्पष्ट है, ‘गांधीजी की मूल दृष्टि यह थी कि भारत के लिए ब्रिटिश साम्राज्य और नाजियों में कोई भेद देखना व्यर्थ है। भारत को अपनी स्वतंत्रता और अपनी सभ्यता से सरोकार रखना चाहिए। उस समय अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के भौगोलिक और वैचारिक सभी तरह के विभाजनों को वे संदेह की दृष्टि से देखते थे। उन्हें पूँजीवादी और साम्यवादी विश्व का वर्गीकरण जितना निरर्थक लगता था, उतना ही यूरोप और एशिया का। उनका मानना था कि भारत को न पूंजीवादी आदर्शों से कोई मतलब है, न साम्यवादी आदर्शों से। उसे अपना रास्ता अपने स्वभाव और सभ्यता के अनुरूप स्वतंत्र रूप से तय करना है।’ गांधीजी की समझ यथार्थपरक थी। इसे यह अंश बताता है, ‘वे मानते थे कि एशिया के सभी देशों में सभ्यता संबंधी कोई एक रूपता नहीं है। इसलिए यूरोप बनाम एशिया की बात करना उचित नहीं है।’ महात्मा गांधी में वैचारिक स्पष्टता, यथार्थ दृष्टि और दृढ़ता उस समय भी बनी रही, जब उनके सहयोगी विचलित दिखते थे।

गांधीजी तो बहुत पहले ही विश्वयुद्ध के दौरान १९४२ में ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का आंदोलन छेड़ देना चाहते थे। कांग्रेस को समझाने और चेतावनी देने में उन्हें करीब सात महीने लगे। अंततः ७ जुलाई, १९४२ को उन्होंने वर्धा में जब यह चेतावनी दी कि वे अकेले ही आंदोलन चलाएँगे, तब कांग्रेस को निर्णय करना पड़ा। उसने ‘भारत छोड़ो’ का प्रस्ताव स्वीकार किया। उसे ही कांग्रेस महासमिति ने ८ अगस्त, १९४२ को स्वीकार किया। जिसके बाद रात में महात्मा गांधी सहित कांग्रेस के बड़े नेता गिरफ्तार कर लिये गए। गांधीजी जेल से छूटते ही भारत को अखंड रखने के मोर्चे पर सक्रिय हो गए। उन्होंने देख लिया था कि आजादी आ रही है, लेकिन अंग्रेज देश को बाँटने पर तुले हैं। अंग्रेजों की चाल को वे विफल करने के प्रयास में लगे। सबसे पहले उन्होंने जिन्ना से बात की। हालाँकि वे जानते थे कि भारत में सदियों पहले इस्लाम के आगमन से हिंदू-मुसलिम प्रश्न भारतीय जनजीवन में एक स्थायी तत्त्व बना हुआ है। उसे समस्या की बजाय शक्ति में रूपातंरित करने के उन्होंने अनेक प्रयास किए। लेकिन विश्वयुद्ध ने उनके प्रयासों पर पानी फेर दिया। हिटलर के पोलैंड पर हमले ने जिन्ना का हाथ मजबूत कर दिया। भारत में वायसराय ने जिन्ना को अपने जाल में फँसाया। कांग्रेस की सरकारों ने जब इस्तीफा दिया तो जिन्ना ने उसे अपने लिए मनचाहा उपहार माना। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी गांधीजी ने हिम्मत बनाए रखी। गांधीजी भारत के बँटवारे को रोकने का हर संभव प्रयास करते रहे। इसका प्रामाणिक विवरण उपलब्ध है।

भारत विभाजन पर कांग्रेस नेतृत्व की सहमति के बाद स्वतंत्रता तो आई, लेकिन शांति की बजाय कलह, हिंसा और मारकाट मचा। इसे गांधीजी ने भाँप लिया था। यह भी कारण था कि वे चाहते थे कि कांग्रेस जिन्ना के नेतृत्व में मंत्रिमंडल को स्वीकार कर ले। लार्ड माउंटबेटन को यह सलाह उन्होंने दी भी थी। लेकिन जब देख लिया कि भारत का बँटवारा टल नहीं सकता तो उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति में उपस्थित होकर कहा कि ‘बँटवारे से तो हम बच नहीं सकते, चाहे वह हमें कितना ही नापसंद हो।’ भारत विभाजन के बाद जो हिंसा का तांडव मचा, उसे रोकने के लिए गांधीजी ने इरादा बनाया। वे ७ सितंबर, १९४७ को दिल्ली पहुँचे। शाहदरा स्टेशन पर सरदार पटेल ने उनकी आगवानी की। वे पंजाब जाना चाहते थे। भंगी बस्ती में पुनः ठहरना चाहते थे। लेकिन उन्हें बिड़ला भवन में सरदार पटेल ने ठहराया। वे पंजाब भी नहीं जा सके। बिड़ला भवन में रहकर उन्होंने शांति और सौहार्द के प्रयास किए। उसी क्रम में ‘उन्होंने अपने अंतिम अस्त्र का सहारा लिया। उन्होंने १३ जनवरी, १९४८ से उपवास आरंभ किया और कहा कि जब तक पूरी तरह शांति स्थापित नहीं हो जाती, वे उपवास नहीं तोड़ेंगे।’

गांधीजी के उपवास का एक बड़ा कारण पाकिस्तान को ५५ करोड़ रुपए दिलवाना भी था। बँटवारे के समय पाकिस्तान के हिस्से में नगदी के ७५ करोड़ रुपए आए। भारत सरकार ने बीस करोड़ रुपए १४ अगस्त, १९४७ को ही दे दिए। शेष ५५ करोड़ रुपए भी दे दिया जाता, अगर पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला न कर दिया होता। गांधीजी के उपवास के तीसरे दिन १५ जनवरी की रात को नेहरू मंत्रिमंडल ने पाकिस्तान को ५५ करोड़ रुपए देने का निर्णय कर लिया। १८ जनवरी, १९४८ को सौ से ज्यादा लोग गांधीजी के चारों तरफ एकत्र हुए। वे विभिन्न समूहों, समुदायों और पंथों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उन लोगों ने शांति कायम करने का अपनी ओर से भरोसा दिया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने वह प्रतिज्ञा पढ़कर सुनाई। गांधीजी ने अपना अनशन तोड़ा। जिन्होंने उस समय उन्हें देखा तो पाया कि उनके चेहरे पर चमक है। मौलाना आजाद ने संतरे के रस का गिलास देकर अनशन तुड़वाया।

महात्मा गांधी का जीवन बच गया। लेकिन सिर्फ १२ दिन ही वे रह पाए। उन चंद दिनों में गांधीजी ने जो सोचा, जो सलाह दी और जो-जो योजनाएँ बनाईं, उनमें ही स्वाधीन भारत के महात्मा गांधी का दर्शन करना चाहिए। ‘सबसे पहले उन्होंने कांग्रेस के भविष्य के बारे में विचार करना आरंभ किया। कांग्रेस देश को स्वाधीनता दिलाने के लिए बनाई गई थी। यह दायित्व अब पूरा हो गया था। इसलिए गांधीजी चाहते थे कि अब कांग्रेस को भंग कर दिया जाना चाहिए। वे देश के जीवन में सरकार की केंद्रीय भूमिका नहीं देखते थे। वे चाहते थे कि राज्य केंद्रित राजनीति को वैचारिक दलों के लिए छोड़ दिया जाए।’ गांधीजी ने २९ जनवरी, १९४८ की रात को अपनी वसीयत लिखी, जिसमें कांग्रेस को भंग करने के अलावा अखिल भारत चरखा संघ, अखिल भारत ग्रामोद्योग संघ, हिंदुस्तानी तालीमी संघ, हरिजन सेवक संघ और गोसेवा संघ बनाने का विचार था। इन संगठनों के कार्य की रूपरेखा भी उन्होंने दी। वे अपने विचार पर अमल करते। उसे साकार करने के प्रयोग करते। जो-जो प्रयोग वे करते, उसे ही ‘गांधी-१५०’ में समझने की जरूरत है।

 

५/११८, वैशाली

गाजियाबाद-२०१०१० (उ.प्र.)
रामबहादुर राय

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