सरहद को प्रणाम-यात्रा

सरहद को प्रणाम-यात्रा

अपने बचपन में गाँव में फौजियों व उनको मिलनेवाले सम्मान को देखकर तथा उनसे सेना की जाँबाजी के किस्से-कहानियों को सुनकर बड़ा मन हुआ करता था कि बड़े होकर हम भी फौजी बनेंगे और देश की सरहद पर तैनात होकर दुश्मनों से भारतमाता की रक्षा करेंगे। फौज में तो भरती नहीं हो पाए, पर गाँव से दिल्ली आकर संघ की शाखा में जरूर भरती हो गए। फौजी के रूप में तो नहीं, पर आज संघ शाखा के माध्यम से सरहद पर जाने का बचपन का वह सपना पूरा हो रहा है। हुआ यों कि हमारे जिला कार्यवाह श्रीमान मेवारामजी ने बताया कि आपका नाम देश की सीमाओं पर राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु जनजागरण करनेवाले संगठन फिंस FINS (Forum for Integrated National Security) द्वारा आयोजित ‘सरहद को प्रणाम’ कार्यक्रम में जानेवाले जिले से चुने गए आठ कार्यकर्ताओं में शामिल किया गया है, क्या आप जाना चाहेंगे? जाने का दिन था रविवार, १८ नवंबर, २०१२। सुनकर पहले तो एकबारगी विश्वास ही नहीं हुआ, पर संघ की सूचनाएँ या योजनाएँ कभी अविश्वसनीय नहीं होतीं, इतनी समझ तो मुझे भी थी। बस यह खबर सुनकर मन गद्गद हो गया। मैंने जाने के लिए तुरंत हामी भर दी। जबकि अभी परिवार में बात करनी बाकी थी। पर विश्वास था कि अनुमति मिल जाएगी और मिल भी गई।

मेरे अलावा जिले से टोली प्रमुख के नाते वरिष्ठ कार्यकर्ता श्रीमान सुमितजी, जो सायं जिला कार्यवाह थे, रविजी, अनिलजी, कमलजी, नवीनजी, राजकुमारजी और नागेंद्रजी अपने जिला कंझावला की ओर से गौरवान्वित करनेवाली इस ‘सरहद को प्रणाम-यात्रा’ के लिए चुने गए थे। दस दिन बाद ही यानी १८ नवंबर को हमें प्रस्थान करना था, पर इंतजार के ये दस दिन दस साल के जितने लंबे मालूम पड़ते थे। मन तो बस जैसे जैसलमेर में ही पहुँच चुका था। वैसे अनदेखा था, पर भारत-पाकिस्तान के बीच हुए १९७१ के युद्ध पर बनी फिल्म ‘बार्डर’ में दिखाए गए दृश्यों के सहारे ही मन जैसलमेर में विचरण करने लगा था। लेकिन तन के जाए बिना बात कहाँ बननेवाली थी और तन के जाने का दिन १० दिन बाद तय था। जैसे-तैसे इंतजार की मुश्किल घड़ियाँ समाप्त हुईं और हम सब आ पहुँचे दिल्ली सराय रोहिल्ला रेलवे स्टेशन। जैसलमेर के लिए जैसलमेर एक्सप्रेस से इसके अपने नियत समय (सायं ५:५२) से थोड़ा विलंब से यह रोमांचक यात्रा शुरू हुई। हम तो अति उत्साह में समय से दो घंटा पूर्व ही स्टेशन पहुँच गए। जिला कार्यवाह श्रीमान मेवारामजी, जिला सह कार्यवाह राजिंद्र सिंहजी, प्रौढ़ जिला कार्यवाह श्रीमान अजितजी अपनी कार से हमें सराय रोहिल्ला स्टेशन तक विदा करने आए। जैसे फौजियों को सरहद पर तैनाती के लिए जाते समय विदा किया जाता है, वैसे ही हमें सरहद को प्रणाम-यात्रा पर जाने के लिए विदा किया जा रहा था। हमें भी कुछ ऐसा ही अहसास हो रहा था।

रेलगाड़ी पहले मंद-मंद-मंथर गति से अपने गंतव्य की ओर बढ़ी। दया बस्ती, पटेल नगर और कीर्ति नगर के बाद गाड़ी दिल्ली कैंट स्टेशन पहुँची तो एक बार फिर फौजी नजारा देखते ही मन में देशभक्ति की हिलोरें उठने लगीं। दिल्ली और गुरुग्राम पार करने तक तो हम शाखाओं में गाए जानेवाले ‘रक्तशिराओं में राणा का रह-रह आज हिलोरें लेता’, ‘चंदन है इस देश की माटी’, ‘हमको अपने भारत की माटी से अनुपम प्यार है’ गीत आदि गाते रहे। हमारे साथ अन्य सहयात्री भी हमारे स्वर में स्वर मिलाने लगे। जल्दी ही आस-पास के सहयात्रियों से घनिष्टता हो गई।

रेवाड़ी पहुँचकर हम सबने अपना-अपना टिफिन खोला। अहा! मात्रशक्ति के हाथों प्यार से बने भोजन रूपी प्रसाद की खुशबू पूरे डिब्बे में फैल गई। भोजन मंत्र के बाद सबने भोजन किया, फिर यात्रा के पूर्वानुमानों, जैसे कैसा होगा जैसलमेर और बार्डर फिल्म के दृश्यों की चर्चा रेल की बढ़ती गति के साथ-साथ बढ़ती चली गई। समय तो वैसे शयन का हो चला था, पर सभी की आँखों से नींद उतनी ही दूर थी, जितना दूर जैसलमेर। खैर, आखिर में तो नींद आनी ही थी, सो आई, पर कब आई, पता नहीं। अगली सुबह जब नींद खुली तो हम रंगलों राजस्थान की वादियों से गुजर रहे थे। नित्यकर्म से निवृत्त होकर सभी ने प्रार्थना की और फिर अल्पाहार लिया। मेरा मन तो यही सोच-सोचकर रोमांचित हो रहा था कि बॉर्डर (सीमा) का माहौल कैसा होगा, उस पार पाकिस्तान कैसा दिखता होगा आदि-आदि। ‘विजय की ओर बढ़ते जा रहे’ जैसे गीतों को गाते-गुनगुनाते हम धीरे-धीरे अपने गंतव्य की ओर बढ़ते जा रहे थे। आखिरकार जैसे ही सहयात्रियों ने बताया कि अब गाड़ी जैसलमेर पहुँचने वाली है, आप अपना सामान ठीक कर लो, वैसे ही मनमयूर जैसे नृत्य करने लगा। सभी बड़े खुश थे। जैसे ही रेलगाड़ी प्लेटफॉर्म पर पहुँची, वैसे ही ‘भारतमाता की जय’ के नारों से स्टेशन का वातावरण गूँज उठा। हमें लेने के लिए फिंस के कार्यकर्ता आए हुए थे। वे भी हमारे साथ भारतमाता के जयघोष में शामिल हो गए। प्लेटफॉर्म से निकलकर हम बस से अपने आधार कैंप के लिए रवाना हुए। बस में भी गीतों की स्वर लहरी जारी रही।

खूब मस्ती करते हुए हम रात्रि ८ बजे के आस-पास अपने आधार कैंप पहुँच गए। आधार कैंप पर देश के अलग-अलग स्थानों से ८-१० की टोली में आए दस दलों को वहाँ ठहराने की जूनियर हाई स्कूल के प्रांगण में उचित व्यवस्था की गई थी। रात्रि भोजन के बाद राजस्थानी लोक गायन का भी इंतजाम था, जिसकी धुन पर सभी कार्यकर्ता काफी देर तक नाचते रहे।

अगले दिन मंगलवार, २० नवंबर को सुबह के अल्पाहार के बाद सभी दलों से दो-दो कार्यकर्ता लेकर नए सिरे से टोलियाँ बनाई गईं। हरेक टोली को एक स्थानीय कार्यकर्ता गाइड के तौर पर दिया गया। दोपहर रामगढ़ में भोजन के उपरांत सभी टोलियाँ अलग-अलग सीमावर्ती गाँवों में व भारत-पाक बॉर्डर पर जाकर वहाँ के हालातों को जानने-समझने और राष्ट्रीय सुरक्षा का जनजागरण करने के लिए खुली जीपों में सवार होकर चल दी। सभी को रक्षा सूत्र दिए गए, जिनको हमें ग्रामीणों एवं सैनिकों की कलाई पर बाँधना था और सीमा से भारतमाता की पवित्र रज लेकर आनी थी। हमारे दल ने तनोट माता के दर्शन और सीमा दर्शन हेतु प्रस्थान किया। हमारा दल भी स्थानीय कार्यकर्ता प्रेम सिंह भाटीजी के मार्गदर्शन में अपने गंतव्य की ओर बढ़ चला। हाथों में तिरंगा लिये, दूर-दूर तक रेत के पहाड़ों के बीच बनी पक्की सड़क पर सरपट दौड़ती खुली जीप पर सवार हमारा दल थोड़ी देर बाद ही तनोट माता के मंदिर पहुँच गया। वहाँ स्थित प्रसाद की दुकानों से सबने प्रसाद लिया और माता के दर्शन के लिए अंदर प्रवेश किया। प्रवेश द्वारा पर ही विजय स्तंभ बना हुआ था। यह विजय स्तंभ १९७१ के भारत-पाक युद्ध में विजय का प्रतीक है। तनोट माता के बारे में भी प्रसिद्ध है कि युद्ध के दौरान पाक सेना ने जो गोले हमारे सेना और ग्रामीणों पर दागे थे, माता के प्रताप से उनमें से एक भी गोला नहीं फटा। वे सभी गोले आज भी मंदिर में रखे हुए हैं। जिनको हमने भी देखा। इसी कारण इस मंदिर की आस-पास ही नहीं वरन् दूर-दूर तक बहुत मान्यता है और सेना में भी तनोट माता का बहुत पूज्य भाव है। इसका अंदाजा इस बात से भी लगता है कि मंदिर में पूजा-आरती से लेकर संचालन की सारी व्यवस्था सीमा सुरक्षा बल (BSF) के द्वारा की जाती है। बाकायदा वहाँ इस काम के लिए सैनिकों की ड्यूटी लगती है। हमने मंदिर में ड्यूटी पर तैनात सैनिकों से बात की तो पता चला कि सैनिकों के मन में भी तनोट माता के प्रति गहरी आस्था है। वे वहाँ अपनी ड्यूटी लगना सौभाग्य मानते हैं। युद्ध के समय तो मंदिर बहुत छोटा था, जैसा कि बॉर्डर फिल्म में दिखाया गया है, पर युद्ध में मिली जीत के बाद सीमा सुरक्षा बल ने मंदिर को भव्य रूप दिया। आज मंदिर के आस-पास बड़ी संख्या में प्रसाद आदि की दुकानें हैं और बाहर से आनेवाले भक्तों के लिए होटल भी बने हुए हैं। माता के दर्शन के बाद हम आगे (१६ कि.मी.) बी.पी. ६०९ पोस्ट पर पहुँचे। वहाँ के सैनिकों और बी.एस.एफ. के जवानों से मिले।

वहाँ से सीमा की माटी एकत्र की और बबलियान पोस्ट पर तैनात बी.एस.एफ. के जवानों से वहाँ का हालचाल जाना तथा उन्हें रक्षा सूत्र बाँधे। चूँकि ‘सरहद को प्रणाम’ कार्यक्रम के आयोजकों ने सीमा तक जाने की पहले ही अनुमति ले रखी थी अन्यथा सामान्यतः वहाँ जाना प्रतिबंधित है। वहाँ जाकर देखा कि सीमा पर सुरक्षा की दृष्टि से कँटीले तारों से बार्डर पर दीवार बनाई हुई है। जिस पोस्ट पर हम थे, वहाँ पर गेट भी बना हुआ था और हमारी चौकी से थोड़ी दूर पर ही पाकिस्तान की चौकी भी बनी हुई थी। पर वहाँ कोई नजर नहीं आ रहा था। हमारे सैनिकों ने बताया कि पाक सैनिकों से अकसर उनका टकराव होता रहता है, क्योंकि पाक सैनिक घुसपैठ कराने की फिराक में लगे रहते हैं। लेकिन हमारे सैनिक उन्हें मुँहतोड़ जबाव देते हैं और उनके सभी नापाक मंसूबों को नाकाम करते रहते हैं। सीमा से हम अपने अब तक के जीवनकाल की सबसे सुखद अनुभूति लेकर हमारी जीप में वापस तनोट मंदिर पहुँचे और वहाँ से अब हमें खींया गाँव जाना है, जो यहाँ से करीब १०५ कि.मी. दूर है। हम शाम ५ बजे चले थे और प्रातः ७:३० बजे के करीब हम खींया गाँव पहुँच गए। हमारा पड़ाव एक विद्यालय में हुआ।

अलग-अलग दलों में हमें भोजन के लिए ले जाया गया। यहाँ हमारे मेजबान श्री हरिसिंह प्रजापति रहे। उनके घर एवं उस गाँव की भोजन व्यवस्था एवं उनका आतिथ्य देखकर हम भावविभोर हो गए। प्रातः शौचालय के लिए खुला मैदान और उस व्यवस्था का नया अनुभव प्राप्त हुआ। प्रातः उसी विद्यालय में नाश्ता करके हम अपने दल निर्देशक (गाइड) श्री प्रेम सिंह भाटीजी के मार्गदर्शन में गाँव-भ्रमण पर चल पड़े। खींया लगभग ४०० घरोंवाला और करीब २००० की आबादी वाला विकासशील गाँव है। सामान्य गाँवों की तरह तो नहीं, परंतु ग्रामीण बहुत स्नेही और कर्मठ हैं। यहाँ के लोग प्रायः अफीम का सेवन करते हैं और अतिथियों का स्वागत भी अफीम से ठीक उसी प्रकार करते हैं, जिस प्रकार हम दिल्ली में चाय से करते हैं। चूँकि यह आतिथ्य का अहम हिस्सा था, इसलिए न चाहते हुए भी गेहूँ के दाने के बराबर हमारे दल के सभी साथियों को अफीम खिलाई गई। डर था कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए, पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। पर मन में एक प्रश्न पैदा हुआ कि आखिर यह परंपरा क्यों पड़ी? पूछने पर कुछ संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। बस पीढ़ियों से परंपरा चली आ रही है। यह भी पता चला कि कृषि एवं पशुपालन ग्रामीणों का मुख्य व्यवसाय है। यहाँ विद्यालय की संख्या तीन है, जिनमें एक उच्च, एक बालिका और एक प्राथमिक विद्यालय है।

अस्पताल की सुविधा के साथ एक पशु चिकित्सालय भी है। यहाँ पर जल का अभाव है, जो दूर इंदिरा नहर से पाइपों या टैंकरों द्वारा लाया जाता है। बिजली की व्यवस्था बहुत उत्तम है। कुछ ब्राह्मण (पालीवाल) परिवार करीब दो-तीन सौ वर्ष पूर्व यहाँ से पलायन कर चुके हैं, किंतु उनके घर अब भी वैसे ही सुरक्षित हैं। कृषि वर्षाधारित है, अतः मौसमी बेरोजगारी बहुतायत में है। ग्रामीणों में धर्म के प्रति आस्था है। यहाँ दो मंदिर हैं और गाँववालों में बालिकाओं में शिक्षा के प्रति जागरूकता है।

उच्च शिक्षा के लिए छात्र जैसलमेर जाते हैं। यहाँ सरकारी योजनाओं के नाम पर सिर्फ दिखावा है। गाँव की जैसलमेर से दूरी ५६ कि.मी. है और गाँव तक पक्की सड़क जाती है। खाना बनाने/पकाने में ईंधन के रूप में ज्यादातर लकड़ी और उपलों की आगवाले चूल्हों का प्रचलन है। कुछ गैस उपभोक्ता भी हैं। यहाँ डीजल, पेट्रोल जैसलमेर से लाकर कुछ महँगे दामों पर बेचा जाता है। ग्रामीण अपने देश और भूमि को बेहद चाहते हैं। विपरीत हालात के बावजूद वे अपनी इस मातृभूमि को छोड़ना नहीं चाहते हैं।

गाँव के कई सारे ग्रामीणों को हमने रक्षा-सूत्र बाँधे और पत्रक दिए। इसके बाद हम यहाँ से चलकर दोपहर १२ बजे वाहन द्वारा खींवसर गाँव पहुँचे। हमने देखा कि यहाँ भी अफीम का दौर चल रहा था। मेजबान द्वारा हमारे भोजन की उत्तम व्यवस्था की गई थी। स्वादिष्ट एवं पौष्टिक भोजन ने हमें गाँववालों का आभारी बना दिया। खींवसर गाँव में हम ग्रामीणों की प्रेम एवं स्नेह की गंगा में आकंठ डूब गए। भोजन में वहाँ का स्थानीय प्रसिद्ध पकवान दाल-बाटी-चूरमा, जो देशी घी में डुबोकर परोसा गया था, के लाजबाव स्वाद का आनंद लिया। वहाँ के व्यक्ति भी भले हैं। घोटुआ मिठाई का स्वाद भी चखा। भोजनोपरांत सीमाजन कल्याण समिति के संगठन मंत्री भीख सिंह भाटी और लक्ष्मी नारायण भालाजी से बातें हुईं। गाँव में लोग घोड़ा भी रखते हैं।

यहाँ पर बंजर धरती, वनस्पति के नाम पर चारों तरफ कँटीली झाड़ियाँ और कठोर चट्टानें ही दिखाई दे रही थीं। खींवसर गाँव में घरों की संख्या २०० से ज्यादा है और कृषि एवं पशुपालन वहाँ का मुख्य व्यवसाय है। कृषि यहाँ वर्षाधारित है। ज्वार, चना एवं बाजरा ये मुख्य फसलें हैं तथा अफीम का चलन भी यहाँ खूब है। यहाँ प्राथमिक अस्पताल एवं विद्यालय उपलब्ध हैं। लड़कों के साथ-साथ लड़कियाँ भी स्कूल जाती हैं, जो एक नई एवं सराहनीय बात है। गाँव में कच्ची सड़कें हैं। कुछ घरों में टी.वी. भी दिखाई दिए। सरपंच तेजा रामजी ने विकास के लिए काफी कुछ प्रयास किए हैं। हमारी पदयात्रा के दौरान राह में कमलेशजी का परिवार मिला, जो अपना जीवनयापन खेतों और वृक्षों के नीचे करता है। वहाँ बेरी के बेर खाने को दिए और फिर चाय भी पिलाई। उन्होंने हमें धन्य कर दिया अपने स्नेहाशीष और प्रेम से।

यहाँ एक बात उल्लेखनीय है कि गरीब व्यक्ति भी अतिथि-सत्कार में कोई कमी नहीं करता है तथा यही परंपरा, जो शहरों में लुप्त हो चुकी है, इन भोलेभाले ग्रामीणों ने बरकरार रखी है। धीरे-धीरे हर ग्रामीण बच्चे-बूढ़ों सभी से मिलते-जुलते और रक्षा-सूत्र बाँधते हम लोग वहाँ से पैदल ही १० कि.मी. दूर गोगादेव गाँव की ओर चल पड़े।

थकान से चूर, फिर भी संचलन अंदाज में नारों का उद्घोष करते हुए हमने शाम को छह बजे गोगादेव गाँव में प्रवेश किया। यहाँ गाँव से बाहर खेलते बच्चों से मिले, अपने विषय में बताया और कुछ युवक भी मिले। फिर हमने गेमर सिंह भाटी का आतिथ्य स्वीकार करते हुए एक कक्ष (हॉल) में अपना पड़ाव डाला। चाय पीकर हम सब तरोताजा हुए और स्वयं का कुछ परिचय आदि कराया। हम प्रेम सिंहजी के निर्देशन में प्रातः से चल ही रहे थे, जो सुल्ताना गाँव के हैं। ७:३० बजे हमने भोजन का लुत्फ उठाया और फिर वहाँ के वातावरण एवं माहौल को समझने के लिए निकल पड़े।

गोगादेव गाँव में भी पानी की समान समस्या है, किंतु हर घर में भूमिगत पानी टैंक बनाया गया है। अब हमें समझ आ रहा था कि मरु प्रदेश में पानी की क्या कीमत है। वैसे पानी का मूल्य इनसे ज्यादा कोई और नहीं समझ सकता।

गाँव के मंडल महामंत्री (भाजपा) श्री गेमर सिंहजी ने हमें बताया कि यहाँ की जनसंख्या एक हजार से अधिक है। गाँव में बिजली की व्यवस्था है और लगभग सभी घरों में टी.वी. है। दो-तीन घर मुसलिमों के हैं, जो गाने-बजाने का काम करते हैं। यहाँ हमें पहली बार शौचालय देखने को मिला, अन्यथा सब लोग खुले में ही शौच करते हैं। शिक्षा का अलख यहाँ जगा हुआ है, बालिकाएँ भी विद्यालय जाती हैं। रात्रि को हम सब आपस में हँसी-ठिठोली करते और मेल-मिलाप करते बहुत अच्छा महसूस कर रहे थे। हमने अपने-अपने फोन तथा कैमरे चार्ज किए और कल सुबह के लिए योजनाओं पर विचार किया।

प्रातः ५ बजे ही दल ने रात्रि को अलविदा कह दिया और नित्य क्रिया से निवृत्त होकर चाय से दिन का प्रारंभ किया। गेमर सिंहजी ने सत्कार में कोई कमी नहीं छोड़ी थी, रात्रि में सभी के लिए स्वादिष्ट भोजन के बाद शयन के लिए आरामदायक बिस्तरों की व्यवस्था की गई थी। सुबह दलिया और छाछ का नाश्ता कराया। अब हमने गाँव में भ्रमण शुरू किया। गाँव के विद्यालय में गए। गाँव से युवकों का पलायन जारी है, जो जयपुर, मुंबई आदि शहरों में काम की तलाश में जाते हैं।

बिजली की व्यवस्था ठीक है। यहाँ मौसमी कृषि है तथा पशुपालन में गाय, भेड़-बकरियाँ पालते हैं। यहाँ सब लोगों से मिलने-जुलने के बाद अब हमें ९ कि.मी. आगे देवा गाँव जाना है। प्रेम सिंहजी एक कुशल निर्देशक और मार्गदर्शक के रूप में सदैव हमारे साथ हैं। राजस्थान का जैसलमेर स्वर्ण नगरी के रूप में क्यों विख्यात है, यह यहाँ आकर पता चल रहा है। घरों में बड़े-बड़े पत्थरों के बने किलेनुमा मकान और हर घर में एक बड़ा सा आँगन तथा घर में प्रवेश करने के लिए मुख्य द्वार के ऊपर कोई छत या बाधा नहीं है, जो यहाँ के राजपूतों की शान को दरशाता था। हमारी टोली के हर सदस्य के लिए राजस्थान दर्शन और सरहद को प्रणाम करने का यह अनुभव अविस्मरणीय है। तेज धूप, नुकीले-कँकरीले रास्ते और रेत से भरे मैदानों को रौंदते, जयघोष करते हम अपने पथ पर निरंतर देवा गाँव की ओर बढ़ते जा रहे हैं। आगे-आगे ध्वजवाहक तथा पीछे-पीछे हम। प्रेमजी हमें पानी की सुविधा दे रहे हैं। हम स्वयंसेवकों की हुँकार और उद्घोषों से पूरा देवा गाँव गूँज उठा। यहाँ भी हमने अपने संघ का और इस कार्यक्रम का अलख जगाया। गाँव शांत है और आपसी सौहार्द कायम है। गाँव में उच्च विद्यालय, चिकित्सालय एवं मुख्य सड़क भी है। हमें वहाँ के देवगढ़ किले को भी जानने का मौका मिला, जो तीन सौ वर्ष पुराना है। किले के बारे में कुछ विशेष बातें प्रचलित हैं, यथा घोड़ों की टापों की आवाज रात्रि में सुनाई देती है आदि। इस मौके पर गाँव में कुछ साथियों ने ऊँट की सवारी भी की। यहाँ के एक मंदिर में हम सबने विश्राम किया और श्री मोहनलाल चांडकजी ने हमें भूख से निजात दिलाई।

यहाँ के स्वयंसेवक मोहनलालजी ने बताया कि गाँव में ५०० के करीब घर हैं और यहाँ के लोग काफी खुशहाल हैं। दो कुएँ हैं और ट्यूबवेल भी हैं, जो फसलों की सिंचाई का आधार हैं। हमने कुछ कृषकों से भी मुलाकात की, जो प्याज की रोपाई कर रहे थे।

मौसम तो यहाँ के सभी गाँवों में एक जैसा ही है—शुष्क-गरम। जैसलमेर से ३८ कि.मी. दूर स्थित छोटा सा गाँव, जो बिना हरियाली और जल के अभाव के बावजूद अति सुंदर है। भोजन आदि तो हो ही गया, अतः अब हमने बस पकड़ी और बरमसर गाँव आ पहुँचे। शाम को ४ बजे गाँव में सबसे परिचय और फिर चाय का दौर चला। बरमसर गाँव मुख्य सड़क पर स्थित है, जो जैसलमेर से १६ कि.मी. दूर है। पेयजल अन्य गाँवों की तरह समान है, हर घर में पानी की टंकी है और बिजली की उत्तम व्यवस्था भी। हमने यहाँ का अच्छा अनुभव लिया। मेरे साथी राहुलजी और कुछ लोगों ने वहाँ की आशा दीदी सरोजजी से बातें कीं, जो बीकानेर से हैं और दो वर्षों से यहाँ महिला कल्याण के कार्य में लगी हैं। उन्होंने इस बात का खंडन किया कि यहाँ बाल विवाह होते हैं और बालिका-हत्या या भ्रूण-हत्याएँ होती हैं।

विद्यालय में अच्छी शिक्षा व्यवस्था है, लेकिन शिक्षा में ग्रामीणों की खास रुचि नहीं है। यहाँ २०० वर्ष पुराना माता का मंदिर भी है, जो बहुत प्रसिद्ध है। यहाँ के लोगों में धर्म के प्रति आस्था है और व्रत-त्योहार तथा कर्मकांडों में बहुत विश्वास करते हैं। गाँव के युवक पास ही १६ कि.मी. दूर जैसलमेर में मजदूरी करते हैं, जिसमें पत्थरों को तोड़ने का काम प्रमुख है। अधिकांश ग्रामीण नशे की गिरफ्त में हैं। सरोज दीदी ने हमें बताया कि मनोरंजन के लिए शराब की दुकान है, जो सर्वसाधारण बात है। यहाँ के लोग नशा तो करते हैं, लेकिन छुप-छुपकर नहीं। साफ दिलवाले और सच्चे ग्रामीण अपना संदेश हमें पहुँचा रहे थे कि हालात कैसे भी हो जाएँ, वे यह माटी, यह देश छोड़कर कहीं नहीं जाएँगे। इस राष्ट्रप्रेम, मातृभूमि के प्रति स्नेह को देखकर मैं तो नतमस्तक हो गया।

राहुल, रवि और तुषार पास के ही मंदिर होते हुए पवन-चक्की देखने गए। जैसलमेर में पवन चक्की बहुतायत में दिखीं। वहाँ से आकर हमने शाम को ६ बजे नखत सिंहजी के घर पर भोजन किया। राजस्थानी भोजन की खास बात है—घी का भरपूर प्रयोग और रोटी एवं दाल में मसाले। अब हमारा ‘सरहद को प्रणाम’ कार्यक्रम समापन की ओर बढ़ चला। सो भोजन करके हमने बस पकड़ी और जैसलमेर स्थित आदर्श विद्या मंदिर में आ गए। यहाँ अन्य सभी दल, जो आधार कैंप से अलग-अलग दिशाओं में गए थे, वे सभी यहाँ आकर मिल गए। यहाँ रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन सभी ने स्नान आदि के बाद अल्पाहार किया और फिर वहाँ का प्रसिद्ध किला, जैन मंदिर और बाबड़ी (झील) देखने गए। भ्रमण के बाद सभी को सायं ४ बजे तक वापस विद्यालय आना था, जहाँ से हमें सायं काल ६ बजे दिल्ली के लिए रेलगाड़ी पकड़नी थी। सभी खूब घूमे-फिरे, खरीदारी आदि की और तय समय पर वापस विद्यालय पहुँच गए। जहाँ हमें चाय-नाश्ते के बाद सफर के लिए भोजन के पैकेट दिए गए। कार्यकर्ता वाहनों से रेलवे स्टेशन तक हमें विदा करने आए। रेलवे स्टेशन पर विदा होते समय का माहौल जहाँ देशभक्ति के गीतों और दाल-बाटी-चूरमा, हम भारत के सूरमा जैसे जयघोषों से उल्लासपूर्ण था, वहीं इन पाँच दिनों में मिले अविस्मरणीय स्नेह और आतिथ्य करनेवाले साथियों से बिछड़ने की वेदना हृदय को बेचैन कर रही थी। सभी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी।

हम प्रेम सिंह भाटीजी का हार्दिक धन्यवाद करते हैं, जो प्रतिपल एक प्रहरीस्वरूप हमारी सेवा में तत्पर रहे। राजस्थान, जैसलमेरवासियों का हम कैसे शुक्रिया अदा करें, हमारे पास शब्द नहीं हैं। एक तरह से कहें कि हम इन सरहदवासी भाई-बहनों के स्नेह, सत्कार और आतिथ्य के सागर में संपूर्णतः डूब चुके थे। इस मरु प्रदेश की सीमांत गाँवों में जीवन जीने के हालात और परिस्थितियाँ कितनी भी कठोर सही, जीवन में भले ही कितनी ही जद्दोजहद है, पर इस मरूभूमि के सपूतों को कोई शिकायत नहीं, इन्हें अपनी भारत-भू पर गर्व है। कितने ही कष्ट सहकर ये अपनी मातृभूमि को छोड़कर सुविधाओं से लैस स्थानों पर जाना नहीं चाहते हैं। प्रणम्य है इनकी राष्ट्रभक्ति और वंदनीय है देश के प्रति इनका जज्बा।

हमारी इस यात्रा का मकसद कोई पिकनिक मनाने का नहीं था, अपितु सीमा पर तैनात सैनिकों, जो सालो-साल अपने परिजनों और प्रियजनों से दूर रहकर दिन-रात सरहद की सुरक्षा कर रहे हैं, जिसकी बदौलत हम अपने घरों, गाँवों और शहरों में सुरक्षित जीवन जी रहे हैं, उनसे मिलकर अपनेपन का एहसास कराना, उनके जज्बे को नमन करना तथा स्थानीय ग्रामीणों के जीवन-यापन को जानना-समझना कि कैसे वे पड़ोसी देश पाकिस्तान की नापाक हरकतों के बीच कठिन परिस्थितियों में रह रहे हैं। उन्हें यह अहसास कराने कि पूरा देश उनके साथ है, उनके जज्बे को नमन करता है अपितु हमें स्वयं को यह अहसास कराना कि हम जिस मजे से अपने घरों में रह रहे हैं, उसके पीछे सीमा पर खड़े सैनिक और सीमावर्ती ग्रामीणों की कठोर तपस्या भी एक संबल है। हमें इन तपस्वियों को याद रखना है, जरूरत के समय तन-मन-धन से उनके साथ खड़े रहना है। हमें खुशी है कि इस अद्भुत, अतुलनीय और अविस्मरणीय यात्रा के बाद में अपने भारतीय होने पर और ज्यादा गर्व की अनुभूति होने लगी और दुबारा एक बार फिर जाने की इच्छा जाग्रत् हो चुकी है।

एफ-१८, प्रेमनगर-१, किराड़ी

दिल्ली-११००८६

दूरभाष : ८१७८३२५७३५
—प्रमोद कुमार

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