सेवड़ाफुली की काँवरें

सेवड़ाफुली की काँवरें

साझूम रहा है सावन। लहरा रहे हैं धानी आँचल। लोचनों में तरंगित है हरापन। रिमझिम-रिमझिम बरस रहे हैं धाराधर। नदी-नाले-पुष्कर-जलाशय पुलकित हैं। महीतल के किसी भी अक्षांश-देशांतर के मिलन-बिंदु पर खड़ा अवधी-भोजपुरी क्षेत्र का मानुष गा उठता है—‘कइसे खेलइ जइबू सावन मा कजरिया, बदरिया घिरि आई ननदी।’

यद्यपि भारत की सभी नदियाँ देवनदियाँ हैं। सभी जल तीर्थजल है। सभी शिवधाम कैलास हैं। सभी शिवलिंग ज्योतिर्लिंग और सभी ज्योतिर्लिंग शिव के साक्षात् विग्रह हैं।

तथापि देवापगा (आपगा = नदी) गंगा की महिमा अतुल्य है तथा श्रावण मास में झारखंड के देवघर स्थित वैद्यनाथ (शिव) को जल चढ़ाने का माहात्म्य अनन्य। प्राणिमात्र की वेदना के सभी प्रारूपों को हरनेवाला परम वैद्य—वैद्यनाथ!

शिवभक्त सावन के महीने में श्रद्धाभिभूत होकर शिवलिंगों का जलाभिषेक करते हैं। ये वही परम देवता हैं, जो विश्वमांगल्य के लिए सर्वनाशी हलाहल को नेत्र निमीलित कर गटागट पी जाते हैं और नीलकंठ की संज्ञा धारण करते हैं। भारतीय करुणा उस करुणाकर के अनुग्रह का विस्मरण कैसे कर सकती है? धार्मिक एवं आध्यात्मिक आस्था प्रतिवर्ष श्रावण मास में सदाशिव का जलाभिषेक कर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करती है। स्वामी की काया पर विषज्वाला का प्रभाव कुछ तो कम हो! सपने में भी अकृतज्ञ नहीं है भारतीयता।

श्रावण मास में यों तो भारत के सभी शिवधामों में जलाभिषेक-पर्व अपने-अपने स्थानीय रंग में मनाया जाता है, किंतु वैद्यनाथ धाम का जलाभिषेक-पर्व धार्मिक विश्वपर्व में रूपांतरित हो गया है।

गेरुए वस्त्रधारी काँवरिए हरिद्वार, वाराणसी आदि गंगातीर्थों से जलपात्रों में जल भरते हैं और अपने-अपने अंचलों में स्थापित शिवलिंगों को जल चढ़ाने के उपलक्ष्य में पदयात्राएँ करते हैं। भारत के सभी १२ ज्योतिर्लिंगों में केवल काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग गंगा पर अवस्थित है। शेष ११ ज्योतिर्लिंग भागीरथी से दूर, बहुत दूर स्थित हैं। वैद्यनाथ धाम बिहार के सुल्तानगंज की गंगा से लगभग १२८ किलोमीटर दूरी पर विराजमान है।

वैद्यनाथ धाम की तीर्थयात्रा के काँवरिए सुल्तानगंज की जाह्नवी नदी से जल-कलश भरते हैं और काँवर को अपने स्कंध पर धारण कर देवघर की यात्रा पर ‘हर-हर महादेव’ का महोच्चार कर पैदल निकल पड़ते हैं। शिवभक्तों और काँवरियों का यह आनंद-मार्ग है। देवयान है यह, जो उनको उस महेश्वर के द्वार पर ले जाकर उतार देता है, जिसके भाल पर चंद्रमा सुशोभित है। उस चंद्रशेखर की कृपा से श्यामल मन उज्ज्वल नीलमणि क्यों नहीं होगा? अपने शीर्ष पर जो गांगेय प्रवाह धारण करता है, उसके अनुग्रह से प्रतिकूल ग्रह-नक्षत्र क्यों नहीं अनुकूल होंगे? जिसका देह कैलास भस्मस्नात है, उसकी अनुकंपा से सकल दुःस्वप्न, निखिल दुश्चिंताएँ क्यों नहीं भस्म होंगी?

मार्ग में उल्लास-पर्व लेकर चल रहा यह जन-अरण्य मानो गंगा की एक धारा है, जो स्वयं जलाभिषेक की आकांक्षा से देवघर की ओर मुड़ गई है। शिवभक्तों ने वैद्यनाथ धाम को कैलास-मानसरोवर के रूप में कल्पित कर लिया है। आरोहण मार्ग के इन मुहूर्तों में उनके जीवन के सारे अभाव महाभाव में परावर्तित हो गए हैं। काँवरियों की निगूढ़ नाभि के प्रतिध्वनित करते हुए उठ रहे हैं—‘बोल बम आशुतोष, मुझे समस्त अभिशापों से रिक्त करो।’

ओम नमः शिवाय!

पैदल ही अइबो हम दुआरी, हे भोलेनाथ! (हे सदाशिव! हम तुम्हारे द्वार पैदल ही आ रहे हैं।)

अवधी क्षेत्र का एक काँवरिया रामचंद्र साकेती का लिखा गीत गाता जा रहा है—

मेरा देवता मगन है मेरी वंदना से पहले।

मुझे भीख मिल गई है मेरी याचना से पहले॥

मृत्युंजय श्लोक सुनते ही प्राणों के सुग्गे पुलकित हो उठे हैं—

चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः।

(मैं चंद्रशेखर की शरण लेता हूँ, यमराज मेरा क्या करेगा?)

 

थकानें परास्त। तृष्णाएँ पराहत। बुभुक्षाएँ लुंठित। वज्रदेही हो गए हैं काँवरिए। इस देवमार्ग में न कोई स्पर्धा, न कहीं होड़। न कोई किसी से आगे निकलना चाहता है, न कोई किसी को पीछे छोड़कर बढ़ जाना चाहता है। इस महीतल पर हम सब एक ही परिवार के सदस्य हैं। विराट् है मेरा कुटुंब।

स्थान-स्थान पर सरकारी व्यवस्थाएँ, स्वयंसेवी संस्थाएँ तथा मठों-पीठों के सौजन्य से अन्नक्षेत्र, उपाहार-गृह, विश्राम-शिविर आदि हैं।

किसी किशोर काँवरिया के लोचन-पथ में किसी किशोरी की कटि-तिर्यकता इंद्रधनुष-सी प्रकट हुई और उसी मुहूर्त में जीवन की सकल शाप-मूर्च्छाएँ प्रकंपित हुईं और धराशायी हो गईं। तिर्यकताएँ बड़े-बड़े भवार्णव (भवसागर) पार करा देती हैं।

बिहार की राजधानी पटना, जो काँवर-शिल्प तथा काँवर-व्यापार का प्रमुख केंद्र है। यहाँ मोटे तौर पर दो प्रकार की काँवर बनती हैं—साधारण और विशेष। साधारण काँवर का मूल्य ढाई-तीन सौ से ढाई-तीन हजार रुपए तक होता है। विशेष काँवर का उच्चतम मूल्य पैंतीस-चालीस हजार को भी उत्तीर्ण कर सकता है। छोटा आदमी बनाम बड़ा आदमी, निम्नवर्ग बनाम उच्चवर्ग, सर्वजीता बनाम सर्वहारा, तेजस्वी वर्ग—वैषम्य कहाँ नहीं है? धर्म और अध्यात्म के निलय में नीलांजन सरीसृप (सर्प) निवास करते हैं।

मामूली काँवरें पटना के आस-पास अधर-उधर के बाँस की फट्टियों से ही बनाई जाती हैं। ऐसी काँवरों में लोच नहीं होती। उनकी मजबूती की भी कोई गारंटी नहीं होती है। संदिग्ध होती हैं बाँस की वे फट्टियाँ। उनसे बनी काँवरें अधिक भार नहीं वहन कर सकतीं। वे कहीं भी दगा दे सकती हैं। इसलिए उनकी सजावट के सामान, पीतल की घंटियों को छोड़कर बाकी प्लास्टिक के बने होते हैं, जो कोलकाता से खरीदे जाते हैं।

विशेष काँवर की हैसियत बड़ी होती है। यही वह काँवर है, जो ‘पटनिया काँवर’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसकी साज-सज्जा में मूल्यवान् उपकरण लगाए जाते हैं। पटनिया शिल्प अनुगृहीत है उत्तर प्रदेश के उन मुरादाबादी मुसलिम कलाकारों का, जो पीतल के पात्रों को अपनी कलाएँ समर्पित करते हैं। पीतल के कलश मानो सागर-मंथन से निकले अमृत-कलश के वंशज हों। पीतल के शिवलिंग-ज्योतिर्लिंगों के नवीन संस्करण, पीतल की शिवमूर्तियाँ—समाधिस्थ महेश्वर, पीतल का त्रिशूल—तीनों प्रकार के शूलों को विदीर्ण करनेवाला होता है, पीतल की घंटियाँ, जिनकी घनघनाहट सुनकर अभिशाप प्रकंपित हो उठते हैं तथा पीतल के साँप और बिच्छू—सर्वभूतों को आत्मवत् देखो।

अद्भुत हैं इन काँवरों में लगी बाँस की फट्टियाँ। ये इतना सारा भार कैसे वहन कर लेती हैं! इतनी लचकदार, इतनी बलिष्ठ! ये यहाँ-वहाँ के बाँस की फट्टियाँ नहीं, बल्कि सेवड़ाफुली की फट्टियाँ हैं ये।

सेवड़ाफुली है कहाँ? सेवड़ाफुली पश्चिम बंगाल के हुगली जिले स्थित में एक जगह है। गंगा तट पर बसा एक खेतिहर गाँव, जो हावड़ा स्टेशन से लगभग ४० किलोमीटर उत्तर-पश्चिम तथा लोकल टे्रन से ३० से ३५ मिनट की दूरी पर है।

सावन आने से पहले ही पटना के काँवर-व्यापारी सेवड़ाफुली पहुँच जाते हैं और बाँस की फट्टियों का ऑर्डर प्रस्तुत करते हैं। ऑर्डर लेते ही वहाँ के फट्टी निर्माता उत्तर बंगाल के बाँस विशेषों को कटवाकर घर लाते हैं और अपने पोखरों के पानी में सिराते हैं। इन्हीं किन्हीं मुहूर्तों में बंगाल का जादू बाउल गीत गुनगुनाता हुआ बाँसों के अंतःकरण में प्रवेश करता है। जलवायु से बड़ा जादू और क्या है? ४० किलोमीटर के अंतराल पर स्थित तारकेश्वर धाम के नाथ की अनुकंपा का प्रभाव भी तो है सिराए गए बाँसों पर। निश्चित अवधि के बाद बाँस पोखर से बाहर लाए जाते हैं, तदुपरांत बाँसों को खंड-खंड करके फट्टियाँ निकाली जाती हैं। फट्टी निर्माता निराशा के क्षणों में भी अपने शिल्प में कोई शिथिलता नहीं दिखाना। धर्मादेश है पटनिया ऑर्डर।

और फिर पटना के शिल्पकारों के सम्मुख उपस्थित होती हैं सेवड़ाफुली की बाँस-फट्टियाँ। शिल्पकार का शिल्प फट्टियों को काँवरों में रूपांतरित करता है। काँवरों पर मुरादाबादी उपकरण अलंकृत होते हैं। मखमली धागे काँवरों पर कलात्मक शैली में बाँधे जाते हैं।

इस प्रकार बाँस की फट्टियों को अंतिम रूप देनेवाला पटनिया शिल्प सारा श्रेय प्राप्त करता है।

जब काँवरें काँवरियों के स्कंधों पर आरोहण करती हैं और लहराती हुई मार्ग पर निकलती हैं तो ऐसा लगता है, मानो अपार पारावार में भागीरथी विहार कर रही हों।

बड़े जीवट की हैं ये फट्टियाँ। कितनी जुझारू हैं ये। ये रास्ते में किसी को धोखा नहीं देतीं एवं बीच भँवर में छोड़कर चली नहीं आतीं। हर कामार्थी को उसके धु्रव तक पहुँचाती हैं। कहती नहीं, करके दिखाती हैं।

संदिग्ध नहीं, अविश्वसनीय नहीं, बड़ी प्रामाणिक हैं सेवड़ाफुली की फट्टियाँ!

२०/३ शिंदे नगर, बावधन

एन.डी.ए. रोड, पुणे-४११०२१

दूरभाष : ०२०-२२९५२२३८
—श्रीकांत उपाध्याय

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