अनुमान-ही-अनुमान

अनुमान-ही-अनुमान

कॉलोनी में कुछ घर छोड़कर नए किराएदार रहने आए। उनके आने से पहले चमचमाती नेमप्लेट लगी, फिर अगले दिन ट्रक से उनका सामान आया।

नेमप्लेट पर लिखा था—डॉ. सुदीप बनर्जी, डॉ. दीपा जैन। वाह! पति-पत्नी दोनों ही डॉक्टर। वैसे मामला लव मैरिज का लगता है। जरूर तभी जमा होगा, जब साथ-साथ पढ़ते होंगे।

एक दिन-रात मच्छी खानेवाला तो दूसरी आलू से भी परहेज करनेवाली। प्रेम से बँधे हैं। या तो मियाँ मच्छी खाना छोड़ेगा या बीवी मच्छी खाना सीखेगी। डॉक्टर को डॉक्टरनी बीवी चाहिए तो जात-पाँत क्या? अपनी जाति में कोई डॉक्टरनी न मिली होगी, तो क्या करता। अनुमानों के इतिहास के पन्नों को अपने-अपने नजरिए से पलटते पड़ोसियों के लिए यह बहुत ही रोचक विषय था।

नेमप्लेट के साथ अगर दोनों की कुंडलियाँ लगी होतीं तो वह भी पंडित को दिखाने से न चूकते। कारण पड़ोस में ही पंडित द्विवेदीजी जो रहते थे। उन्हें दिखाते तो कौन-से पैसे लगते। मान लो, अगर माँगते भी तो उन्हें समझा-बुझा देते, ‘यह कोई हमारा पर्सनल मैटर नहीं। इसमें आपका भी नफा है।’ अच्छे लोग होंगे तो नफा। अहंकारी या घमंडी या मुहँचढ़े हुए तो किस काम के?

आसपास के घरों में काम करनेवाली बाइयों ने ट्रक से सामान उतरते देखा तो कुछ देर खड़ी हो गईं और प्रार्थना करने लगीं, ‘हे भगवान, नए घर को काम म्हारे को ही मिले! डागदर है...मुँहमाँगे पैसे मिल जाएँगे।’ नए काम के लालच में उन्हें धूप का ताप ने भी न सताया।

सामने की लाइन में रहनेवाले बुजुर्ग देशपांडेजी सोचने लगे, काश! उम्रदराज कोई इस नए परिवार में हो तो सवेरे की सैर का आंनद दोगुना हो जाए। दूसरी ओर पड़ोसी बच्चे सोच रहे थे, एक और दोस्त आ जाए तो अपनी क्रिकेट टीम पूरी हो जाए। पास के ही घर में रहनेवाली नन्हीं उन्नति टकटकी लगा उस घर को निहारते हुए कल्पना कर रही थी—मेरे बराबर की कोई हो तो हम घर-घर खेलेंगे।

सारे पड़ोसियों के मन में लड्डू फूट रहे थे। रात-बेरात हम अब परेशान न होंगे। परेशानी में डॉक्टर की सेवाएँ उन्हें निःशुल्क मिला करेंगी।

इधर पंडितजी सोच रहे थे, कब मौका मिले कि वे डॉ. साहब के पास जाएँ और अपनी ज्योतिष विद्या के ज्ञान से उन्हें प्रभावित कर सकें। दूसरी ओर पास के तीन मंजिला बँगलेवाली केसरबेन भी यही सोच रही थीं—वे कब डॉ. दीपा को दिखाने जाएँ और वे तबीयत दिखाकर जब लौटेंगी तो उनसे बड़े प्रेस से ‘आवजों’ कहकर आएँगी।

आखिर पंडितजी का इंतजार खत्म हुआ और बी.पी. बढ़ने पर वे डॉ. बनर्जी के पास पहुँचे। इधर केसरबेन ने दबादबाकर भोजन किया और पेट में दर्द होने पर चलीं डॉ. दीपा के घर की ओर। डॉ. दीपा ने उनका चेकअप किया, उनसे बोली, ‘आंटी, आज आपने रोज की अपेक्षा कुछ अधिक तो नहीं खा लिया? इस उम्र में खाने पर कंट्रोल जरूरी है और रात में तो बिल्कुल हल्का भोजन ही लेना चाहिए, जैसे दूध और दलिया।’

‘डॉ.जी., कोई गोली-वोली...?’

‘हाँ आंटीजी, मैं आपका फुल चेकअप किए बगैर कुछ नहीं दे सकती। आजकल रिस्क बहुत है। उसके बाद ही ट्रीटमेंट दे सकूँगी।’

उधर पंडितजी को डॉ. साहब ने यह कहते गुडनाइट किया, ‘फ्रीजर में से आइसक्रीम रखी हो तो वह खा लें या ठंडा पानी पी लें। उससे भी बी.पी. में राहत मिलेगी। मैं अपना बैग क्लीनिक में भूल आया हूँ। बिना बी.पी. चेक किए कोई गोली नहीं दे सकता। आजकल साइड इफेक्ट का खतरा बढ़ गया है। सॉरी आप पहली बार आए और मैं पहली बार ही बैग भूल आया।’

उन्नति ने देखा कि उस घर में एक नन्हीं-मुन्नी आई है, जो अधिकतर दादी की गोद में होती है, घर-घर कैसे खेलेगी भला!

बच्चों के क्रिकेट के लिए कोई दोस्त उस घर में नहीं था। धत् तेरे की! क्रिकेट टीम अधूरी रह गए गई!

उधर देशपांडे साहब को पता चला कि डॉक्टर बनर्जी के तो पिता ही नहीं हैं। कोई बात नहीं, सुबह की सैर अकेले ही सही।

अनुमानों के इतिहास के पन्नों पर डॉ. दंपती ने मानो घड़ों पानी डाल दिया था।

नम्र निवेदन

‘‘मेरा एक काम करेंगे?’’ अपनी आवाज को रोज की अपेक्षा और भी धीमा करते हुए मैंने नरमाई से पूछा।

सरकारी दफ्तर में जब अर्जी दी जाती है, तब लिखना पड़ता है, ‘महोदय, सविनय निवेदन है कि...।’

पति को तो ऐसा नहीं कह सकते! इस कारण याद रखना पड़ता है कि उनसे कोई काम पड़ ही जाए तो किस लहजे में बात करनी चाहिए। एक बार ईश्वर से भी हम अकड़कर बात करने का साहस कर लेते हैं, पर पति परमेश्वर के पद की ऊँचाइयों को भला आज तक कोई नाप सका है!

पूर्व में घटी ऐसी ही घटना को मैं भूल नहीं पाती। एक बार मिल से लौटने पर उन्हें कोई काम याद दिला दिया तो सुनना पड़ा था, ‘घर में पाँव रखते ही तुम्हें मुझसे करवाने के काम याद आ जाते हैं। बारह घंटे की सख्त ड्यूटी से लौटा हूँ, ऑर्डर देने शुरू कर दिए। तुम्हारी तरह दोपहर में नींद नहीं निकालता। फोन पर गप्पें नहीं मारता। दलालों की खरी-खोटी और मजदूरों की बढ़ती अकड़ का सामना करता हूँ दिनभर।’

किंतु आज...आज तो जनाब नरम और दबी आवाज सुनकर गरम नहीं हुए, बल्कि शहद पगे शब्दों में प्रेमभाव से बोले, ‘‘हाँ-हाँ, कहो न! तुम्हारा हुकुम भला कोई टाल सकता है!’’

पिछले घटनाक्रम ने मुझे सिखा दिया था कि काम पड़ने पर किस तरह बातचीत करनी चाहिए, ‘‘गरमी बहुत है। आपके लिए ठंडा बनाना है, पर किचन के सिंक में एक छिपकली आकर बैठ गई है। नल खोलते ही उछलकर मेरे ऊपर आकर ऐसे गिरती है कि मैं डर जाती हूँ। बहुत देर उसका लिजलिजा स्पर्श मुझे डराए रहता है। बचपन में छिपकली शरीर पर गिरने के बाद माँ नहाने के लिए कहती थी। नहाने के बाद उसके लिजलिजे स्पर्श का असर खत्म हो जाता था।’’

पुरानी बात सुनकर मेरा हाथ खींचकर वे किचन में आए और बोले, ‘‘जोर-जोर से बात की जाए तो छिपकली अपने आप चली जाती है।’’

मैं अविश्वास से इनकी बात सुनती रही। सोचा, अगर उनकी बात में दम है तो मैं अपना रेडियो यहीं रखकर चलाया करूँगी, सिरदर्द ही खत्म।

इन्होंने फिर कहा, ‘‘तुम्हें डरने की जरूरत नहीं। यह कभी काटती नहीं है। बेफिक्र होकर तुम अपना काम करो।’’

‘‘काटती हो या न काटती हो, मुझे इससे क्या? उसकी उछलकूद और मेरे ऊपर झपटना मुझसे बर्दाश्त नहीं होता।’’

पर इसका हल इन्होंने नहीं बताया और टी.वी. देखने चले गए। मैंने अपना दिमाग दौड़ाया। बातों-बातों में पूछा, ‘‘नागपंचमी कब आएगी?’’

‘‘सब त्योहार अगस्त में आते हैं। क्या कुछ खास है, नागपंचमी पर, जो दो-तीन महीने पहले ही तुम्हें याद आ रही है?’’

‘‘सपेरे उस दिन साँप को लेकर आते हैं। हम कुछ दूर से ही सही, उसका स्पर्श और दर्शन करना अच्छा मानते हैं। जब नागदेवता इतने पूज्य हैं तो क्यों न एक नाग हम भी अपने घर में रख लें?’’

‘‘दिमाग खराब हो गया है क्या?’’ वे लगभग चिल्लाकर बोले।

‘‘नहीं-नहीं! एक अलग तरह के प्राणी को घर में रखने का मजा ही अलग रहेगा। डर किस बात का? काटेगा थोड़े ही न! सपेरे तो पकड़ते ही उनका जहर निकाल लेते हैं, फिर...।’’

मेरे तर्क को सुनकर ये उठकर फिर से किचन की ओर चल दिए और भुनभुनाते हुए बोले, ‘‘इससे तो छिपकली भगाना आसान है!’’

 

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