कोई बात तो है

कोई बात तो है

हाकवि वेदव्यास महाभारत में लिखते हैं—यत्र भारते, तत्र भारते। अर्थात् जो महाभारत में नहीं है, वह भारतवर्ष में नहीं है। जो भारत में है, वह सर्वत्र है। भारतीय राष्ट्रीयता का बोध और उसके सांस्कृतिक चिंतन का पाठ इससे प्राप्त होता है। राष्ट्र क्या है? उसकी संस्कृति क्या है? वस्तुतः ये दोनों मिलकर संपूर्ण विश्व में अपनी पहचान स्थापित करते हैं। अन्यथा छह अरब की दुनिया की भीड़ में गुम हो जाने के सिवाय क्या है? राष्ट्र का निजत्व होता है। गुणधर्म होता है। उसकी पहचान, आकृति, अस्मिता और स्वरूप होता है। भारतीय राष्ट्रीयता के लिए वंदेमातरम् का उद्घोष अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। आदि शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन की विराट् दृष्टि ने ही तो आनेवाली पीढ़ियों को चमत्कृत कर दिशा दी। स्वतंत्रता संग्राम की ताकत हमारे पूर्वजों से मिली है। इसमें साहित्य की भूमिका अन्यतम रही है। सत्य एक है। विद्वानों और मनीषियों ने उसे अपने-अपने ढंग से अभिव्यक्त किया है।

एकं सद् विप्राः बहुधा वदन्ति।

भारतीय साहित्य में मनुष्य को श्रेष्ठ माना है। हमारे ऋषि कहते हैं—धरती पर मनुष्य से श्रेष्ठ कोई नहीं है। मनुष्यता की सार्थकता त्याग की प्रवृत्ति में है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का बोध यही मार्ग प्रशस्त करता है। जैसा मेरा आत्मतत्त्व है, वैसा ही सृष्टि के प्रत्येक प्राणी—चींटी से लेकर मनुष्य तक में वह आत्मतत्त्व है। चराचर जगत् का अस्तित्व उसकी ‘अस्ति’ में स्वीकार करने की भारतीय परंपरा रही है। प्रकृति से मानव ने बहुत कुछ सीखा है। हमारे साहित्य ने प्रकृति के उदात्त रूप की पहचान की है। एक चिड़िया दूसरी चिड़िया के घोंसले का तिनका नहीं लेती है। वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते हैं। नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीती हैं। यह प्रकृति की सहज प्रवृत्ति है। मनुष्य को भी उसी के अनुरूप आचरण करना चाहिए। यह प्रकृति धर्म के साथ ही सृष्टि धर्म भी है। धर्म के दस लक्षण निर्देशित करते हुए कहा गया है—

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचम् इन्द्रयनिग्रहः।

धीर्विद्या सत्यम् अक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥

हमारे मनीषियों ने अपने साहित्य में इन प्रश्नों पर विचार किया कि चिड़िया शाम को पुनः अपने घोंसले में लौटकर क्यों आती है? संतरों में रस भरनेवाला कौन है? नदी के जल में तृप्ति कौन भरता है? तितली के पंखों पर रँगोली कौन मांड गया है? धान की बालियों में दूधिया रस कौन भर गया है? कली को पुष्प किसने बना दिया है? सूरज की किरणों में ताप किसने भरा है? चाँदनी में शीतलता कौन घोल गया है? आशय यह है कि प्रकृति भी मनुष्य की जीवन-साधना की पूरक है। यह जीवन एक साधन है। इसके माध्यम से मनुष्य मोक्ष के द्वार तक पहुँच सकता है। हमारे ऋषियों ने अपने समकाल में इन विषयों पर चिंतन कर अपने सृष्टिहितकारी निष्कर्ष संस्कृति और साहित्य में रूपायित किए हैं। विष्णु पुराण में वर्णन है—

समुद्रस्योत्तरे भागे, हिमाद्रेश्चैव दक्षिणे।

वर्षे तद भारतं नाम, भारतीयत्रसन्ततिः॥

समुद्र के उत्तरभाव एवं हिमालय के दक्षिण में बसे भू-भाग एवं संस्कृति क्षेत्र का नाम भारतवर्ष है। उसकी संतति या प्रजा भारतीय है। वेद में भारतभूमि की वंदना की गई है। उसे माता की गरिमा से विभूषित किया गया है। ऋषि प्रार्थना करता है, ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।’ यह सब अपनी पीढी़ को बताया जाना चाहिए। महाकवि कालीदास ‘कुरसंभवम्’ के प्रथम स्वर्ग के प्रथम श्लोक में भारत के सिर पर सजे हिमालय को पृथ्वी का मानदंड कहते हुए भारतराष्ट्र की वंदना करते हैं—

अस्त्युश्ररस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।

पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः॥

हमारे मनीषियों ने कामना की है कि हम कल्याण मार्ग के पथिक हों, ‘स्वस्ति पन्थामनुचरेम।’ विचारणी है कि वेदों से लेकर उपनिषदों, पुराणों और महाकवियों को इस भारतवर्ष की कल्याणकारी चिंतन संपदा में जड़-चेतन हितकारी तत्त्वों का अवश्य अनुभव-दर्शन हुआ होगा। तब ही तो वे अपने अनुभवों को शब्द-शब्द अर्थों में अभिव्यक्त कर सकते हैं। महात्मा गांधी ने कहा था—भारत में चाहे अंग्रेज रह जाएँ, पर अंग्रेजियत चली जाए। दुर्भाग्य से अंग्रेजियत रह गई है। १५ फरवरी, १९२० मैकाले ने भारत में अंग्रेजी शिक्षा की नींव रखी। उसने भारत से ब्रिटेन जाकर ब्रिटेन की संसद् में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कहा कि मुझे पूरे भारतवर्ष में एक भी भिखारी नहीं दिखाई दिया। जर्मनी का विद्वान् सॉपेनहावर कहता है—‘‘मुझे अपने जीवन में शांति भारतीय उपनिषदों से प्राप्त हुई है। मृत्यु के बाद भी परमशांति मुझे उपनिषदों से ही प्राप्त होगी। मुझे अगला जीवन भारत में मिले, ताकि मैं उपनिषदों का और गहराई से अध्ययन कर सकूँ।’’ आवश्यकता है कि भारतवर्ष के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में भारतवर्ष की सांस्कृतिक विरासत, ग्राम्यजीवन की सहजता, लोकजीवन में व्याप्त वैज्ञानिकता को भी स्थान मिलना चाहिए, अन्यथा हम अपने अतीत को कैसे याद रख पाएँगे?

स्वतंत्रता के बाद हमने अपने गाँवों को पिछड़ा घोषित कर दिया। उनकी ज्ञान-परंपरा की अवहेलना और तिरष्कार किया, जबकि वास्तविकता यह है कि हमारे गाँवों के पास सदियों से मिट्टी से संबंधित ज्ञान है। वर्षा का पूर्वानुमान करना आता है। कम पानी में फसल लेने की तकनीक का उनके पास अनुभव है। पक्षियों की आवाज से और जीवों तथा पशुओं की क्रियाओं को देखकर भूकंप या प्राकृतिक आपदा का उन्हें आभास हो जाता है। पशुओं की वाणी से उनकी बात समझ लेते हैं। १९४७ के बाद हमारे देश की प्रकृति, आकृति, खगोल, भूगोल सबकी उपेक्षा की जाती रही है। परिणाम में भारत गुम हो गया है। इंडिया आ गया है। विश्व की दौड़ में हम भारत बनकर जाएँ या भीड़ बनकर? यह अब भी तय कर लें। अभी भी समय है। जब जागो, तब सवेरा।

यजुर्वेद में कहा गया है कि हम राष्ट्र के पुरोहित हैं—वयं राष्टे्र, जागृताम् पुरोहिताः। हम भोग में भी त्याग का आचरण करते हैं। विश्व के प्राणी सुखी हों, ऐसी उदात्त भावना हमारे पास है। हम प्रकृति के सहचर हैं। प्रकृति से रस ग्रहण कर जीवन को गति प्रदान करते हैं। पश्चिम की दृष्टि मनुष्य का प्रकृति पर आधिपत्य जमाने की है। यह भोग दृष्टि है। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का ज्ञान हमें हमारे साहित्य ने करवाया है। राम, कृष्ण, वाल्मीकि, वेदव्यास का व्यक्तित्व हमें साहित्य की देन है। शरीर नश्वर है। कर्म ही जीवन है। आत्मा का विस्तार ही मानुषभाव है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की क्रियात्मक परिणति और प्राप्ति जीवन का परम लक्ष्य है। ज्ञान, इच्छा और क्रिया का समन्वय इस लक्ष्य की प्राप्ति में परम सहायक हैं। यह सब हमारे साहित्य में लिखा गया है। समय-समय पर मनीषियों चिंतकों ने भी भारतवर्ष को अनुकूल दिशा-दर्शन किया है। आदि शंकराचार्य ने बारह वर्ष की उम्र में वेदांत का अध्ययन कर सोलह वर्ष की उम्र में ब्रह्मसूत्र, उपनिषदों और श्रीमद्भगवद् गीता के आधार पर प्रस्थानत्रयी का प्रवर्तन किया। वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना तो की ही, भारत की अखंडता को भी सुदृढ़ किया है।

हमारी परंपरा से विकसित साहित्य ही इस देश का अपना साहित्य कहलाएगा। आयातित ज्ञान के बल पर हम खड़े नहीं हो सकते हैं। ज्ञान का आयात हो, परंतु विवेक के साथ हो। सत्साहित्य की रचना होनी चाहिए। कई बार ऐसी रचनाएँ, जिन्हें साहित्य की संज्ञा दी जाती है; उन्हें अपने शयनकक्ष में भी पढ़ने में शर्म आती है। साहित्यकार चर्चा में रहना चाहते हैं या राष्ट्र को समृद्ध करना चाहते हैं? यह गंभीरता से विचारणीय है कि वीणापाणि के मंदिर में बाँसुरी बजाएँ या कानफाड़ू डी.जे. बजाकर नग्नता का प्रदर्शन करें। मेरे देश ने अपने लोगों को कपड़े पहनाने में दस हजार वर्षों का समय लगाया है। बॉलीवुड ने मात्र दस सालों में हमारी पीढ़ियों को प्रायः नंगा कर दिया है।

आचार्य नरेंद्र देव कहते हैं—संस्कृति मनुष्य के चित्त की खेती है। हजारीप्रसाद द्ववेदी ने संस्कृति को मनुष्य के चिंतन की उपज कहा है। हमारी दृष्टि में सम्यक् कृति ही संस्कृति है। हमारे कार्यों से अपने हित के साथ ही दूसरे का भी हित हो, यही संस्कृति है। संस्कृत साहित्य और संत साहित्य ने यही तो दिया है। हमारा चिंतन मात्र देह तक सीमित नहीं है। स्थूल जगत् से परे हम यह विचार करते हैं कि मैं कौन हूँ? हमारा प्रत्यभिज्ञा दर्शन स्वयं की पहचान पर बल देता है। हम आत्मतत्त्व की खोज में लगे रहे हैं। मृत्यु के बाद शरीर को भूख नहीं लगती है। मृत शरीर को जलाने या गाढ़ने से कुछ अंतर नहीं पड़ता है। आखिर हृदय की धड़कन कैसे बंद हो जाती है? हमारी साँसों का हिसाब कौन रखता है? इन प्रश्नों के उत्तर हम अनंत काल से खोजते आ रहे हैं।

आज हम पश्चिम विचारकों की दृष्टि से भारतीय संस्कृति को देखने-परखने की कुचेष्टा कर रहे हैं। यह ठीक वैसे ही है, जैसे मीटर से दूध और लीटर से कपड़ा मापा जाए। इस देश की जलवायु, प्रकृति, रीति-रिवाज, परंपरा सब पश्चिम से भिन्न है। दूसरे की संस्कृति से अपनी संस्कृति की पारख-परख कैसे की जा सकती है? वाल्मीकि के करुणा-काव्य से सृष्टि की महान् रचना रामायण का जन्म होता है। हमारे यहाँ गाँव में मृत्यु होने पर चूल्हा तक नहीं जलता है। बेटी की विदाई में ग्रामवासी आँसू बहाते हैं। यह विराटबोध और आत्मप्रसार ही तो हमारी संपत्ति है।

स्वामी विवेकानंद ने तीस वर्ष की उम्र में अपने ज्ञान से दुनिया को चमत्कृत कर दिया है। उन्होंने बारह सौ वर्षों बाद आदि शंकराचार्य की परंपरा को संवाहित किया है। यह भी स्पष्ट किया है कि मनुष्य ही श्रेष्ठ है। मनुष्य का अस्तित्व मानवता की पराकाष्ठा तक पहुँचने में है। उसका लक्ष्य आत्मतत्त्व को पहचानना है। राष्ट्रदेवता की आराधना करते हुए ही इस लक्ष्य को प्राप्त करना श्रेयष्कर है।

पश्चिम के विज्ञान और पूर्व के ज्ञान के समन्वय पर बल देनेवाला स्वामी विवेकानंद का व्याख्यान भारत को दुनिया में सिरमौर बनाता है। १९१३ में विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर को उनकी अनुपम कृति ‘गीतांजलि’ पर नोबेल पुरस्कार मिलता है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारतभारती’ राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में जनचेतना जाग्रत् करती है। १९१६ में चंद्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ कहानी उस शाश्वत वचन को प्रमाणित करती है, जिसमें कहा गया है, ‘रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाय पर वचन न जाई।’ ‘साकेत’ का यह कथन भी विचारणीय है, ‘संदेश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया, इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।’ ‘साकेत’ एक विमाता को सम्मान दिलानेवाला महाकाव्य है। यह साहित्य समकाल में लिखा गया है, जो हमारी परंपरा से प्रभावित और प्रमाणित है। निराला की अमर कविता ‘राम की शक्ति पूजा’ भी अपने अंदर रामत्व को जगाने का प्रयास है। ‘कामायनी’ बीसवीं शताब्दी का ऐसा महाकाव्य है, जो मानव विकास की शाश्वत यात्रा को शब्दायित करता है। दिनकर, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, निर्मल वर्मा, सबने भारतीय परंपरा को आगे बढ़ाया है। इनको साहित्य के सूत्र वैदिक ऋषियों से प्राप्त हुए हैं। राष्ट्र को सांस्कृतिक दृष्टि से उन्नत बनाने में साहित्य का योगदान अतुल्य है।

आजाद नगर

खंडवा-४५०००१ (म.प्र.)

दूरभाष : ९४२५३४२७४८
—श्रीराम परिहार

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