खामोशी के खयाल

खामोशी के खयाल

वि दृढ़ निश्चयी है। जबसे उसने सुना है कि उसके पूववर्ती कवि ने ‘सन्नाटे के छंद’ बुने थे, उसका भी संकल्प है कि वह ‘खामोशी के खयाल’ बुनेगा। उसने विश्व के सब कवियों को अंग्रेजी में अनुवाद के माध्यम से पढ़ा है। बस भारतीय कवियों, विशेषकर गीत-कविता से उसे चिढ़ है। कविता हो तो वैचारिक हो। यह क्या उल्टी-सीधी तुकें मिलाकर मंच से गाते रहते हैं? या ताली बजवाने को चुटकुले सुनाते हैं। जनता भी आनंद लेती है इन स्तरहीन रचनाओं का। कवि का प्रश्न है कि इनका क्या बौद्धिक या वैचारिक योगदान है? इन्होंने सस्ते मनोरंजन के अलावा देश की किस परंपरा को सुदृढ़ किया है? उसके साथी कवि और वह कभी ‘शून्य में जीवन’ खोजते हैं, कभी ‘हिंसा में बुद्ध’। जबसे उसकी ‘कोहरे में कोयल’ की प्रशंसा हुई है, उसने जटिल विचारों को शब्द देने का इरादा किया है। उसे कौन समझाए कि कोहरा जाड़े में पड़ता है और तब कौआ भले काँव-काँव करे, कोयल की कूक बसंत तक नहीं सुनाई पड़ती है। उसके पास इसका स्पष्ट और सीधा उत्तर है, ‘‘यही तो कविता की विशेषता है। जो है वह नहीं है, और जो नहीं है, वह है। तभी तो कवि कोहरे में कोयल की कल्पना कर रहा है। तभी तो जाड़े की ठिठुरती भोर में कवि के अंतर में कोयल की कूक का सुखदायी विचार उभर रहा है।’’

यों उसे ‘खामोशी के खयाल’ से बहुत अपेक्षाएँ हैं। उसे विश्वास है कि यह कविता बहुआयामी होगी। ‘खयाल’ गायन की शैली भी है। वह इसके आरोह-अवरोह से प्रभावित है। खयाल का आशय मन की विचार-प्रक्रिया से भी है। वह दोनों को शब्दों के माध्यम से कागज पर उकेरेगा। पाठक और साथी कवि उसकी प्रतिभा से चमत्कृत होंगे। उसके खेमे के आलोचक यह सिद्ध करने में जुटेंगे कि कैसे ‘खामोशी के खयाल’ ‘सन्नाटे के छंद’ से अधिक गूढ़ अर्थवान और विस्तृत इंगित समेटे है। इसमें नया प्रयोग भी है और शास्त्रीय राग भी। कविता के भविष्य की अनंत और उज्ज्वल संभावनाएँ इसमें निहित हैं। यह रचना अपने आप में बौद्धिक कविता की कसौटी बनेगी। इसी मानक पर रचनाओं का परीक्षण होगा कि वह खरी है अथवा खोटी? कविता कहलाने योग्य भी है कि नहीं? वास्तव में जो कविता जितनी सामान्य पाठक की समझ के परे है, उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। यह विचार इस कविता की सृजन की प्राथमिक शर्त है। उसे वैचारिक कविता इसी आधार पर ही कहा जाता है। इसमें क्या विचार है, यह कहना कठिन है? जो इसके अदृश्य विचारों की सफल तलाश कर ले, वही एक श्रेष्ठ और गुणी पाठक है।

कुछ वैचारिक कविता के कवि शहर में गाँठ के पूरे और अक्ल के कोरे ऐसे धन-पशुओं की खोज में हैं, जिन्हें पटा-फँसाकर कुछ चंदे की जुगाड़ की जाए। इससे उनकी योजना ‘शीर्ष कवि’ और ‘पाठक- श्रेष्ठ’ के पुरस्कार घोषित करने और देने की है। इससे ‘विचार’ कविता लोकप्रिय होगी। इन पुरस्कारों में अनौपचारिक प्रावधान है कि पुरस्कार इसी लिखित अंडरटेकिंग पर दिया जाएगा कि उसकी पूरी राशि वह आयोजनकर्ताओं को समारोह के बाद वापस कर दे। वह शॉल, श्रीफल और फ्रेम में जड़ित पुरस्कार प्रमाण-पत्र अपने पास रखने को स्वतंत्र है। अभी कल के अखबारों में यह समाचार सुर्खियों में छपा है कि ‘वैचारिक कविता’ के संगठन ‘विचार संघ’ ने यह घोषणा की है कि वह आनेवाले वर्ष में होली के पावन अवसर पर उल्लेखनीय और महत्त्वपूर्ण वैचारिक कवि की शीर्ष कविता सम्मान से अलंकृत करेगा। इसे ‘बदलूराम सम्मान’ से जाना जाएगा। इसकी राशि एक लाख रुपए होगी। इसके अतिरिक्त संस्था वैचारिक कविता के पाठकों को भी प्रोत्साहित करने पाठक-श्रेष्ठ का भी सम्मान देगी, जिसकी राशि पचास हजार रुपए निश्चित की गई है। इच्छुक कवि और पाठक पुरस्कार के प्रकाशित आवेदन-पत्र क्रमशः पचास और पच्चीस रुपए में संस्था के कार्यालय से प्राप्त कर सकते हैं।

यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि पुरस्कार की ललक और लालच के रोग से हर भारतीय पीड़ित है। कुछ ही दिनों में सौ-दो सौ आवेदन समाप्त हो गए और इस बार कुल जमा पाँच सौ आवेदनों और ‘अंडरटेकिंग’ के प्रकाशन का आदेश जारी किया गया। इससे जुड़ी धनराशि इतनी प्रचुर थी कि इससे भविष्य के आयोजन का खर्चा ही नहीं, संगठन के सदस्यों के व्हिस्की-रम का प्रबंध भी हो गया।

वह घर से फिर खामोशी खोजने चल पड़ा। कुत्ते फिर भौंके। बत्तियाँ फिर जलीं, पर चौकीदार ने रोशनी की ओर मुँह उठाकर उत्तर दिया, ‘‘मोहल्ले का ही है।’’ इस बार उसने राजपथ तक जाने का इरादा मुल्तवी कर घर के पास के चणक्यपुरी के पार्क में सन्नाटे को अनुभव करने का निश्चय किया था। उसने सोचा था कि वहीं किसी बेंच पर पसर लेगा और खामोशी के खयाल बुनेगा। अपने घर के दो कमरों के फ्लैट में रहकर उसे यह अनुमान तो अवश्य था कि वह किसी महत्त्वपूर्ण इलाके में रहता है, पर उसे यह अंदाज नहीं था कि पुलिस भी उसी अनुपात में यहाँ सक्रिय है।

 

देखने में आया है कि विचार कविता का सृजन अधिकतर कुछ पीकर ही होना संभव है। यह द्रव्य चाय के अलावा कुछ भी हो सकता है। अधिकतर ऐसे रचनाकारों की मान्यता है कि कैसी भी कविता की प्रेरणा के लिए चाय पूर्ण तरह से अनुपयुक्त है। कोई अन्य पेय या कन्या ही इस प्रेरणा को देने में समर्थ है। इनको पीकर या देखकर ही अदृश्य, ओज, अनबूझ विचारों का जन्म होता है। यही विचार कविता के इस नए-नवेले सृजन के हेतु जिम्मेदार हैं। अन्य और इस विशेष कविता में एक ही समानता है। दोनों के प्रेरक-तत्त्व समान हैं। इसके इतर इनमें कोई भी समानता नहीं है। एक में विचारों का तथाकथित समुद्र है, दूसरे में तुकबंदी की पोखर। कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली नाम का ग्वाला। फिर उन्हें ध्यान आया कि कविता लिखने के पहले शोर से खामोशी को कहाँ खोजें? बिना उसे भोगे और अनुभव किए उसके खयाल कैसे बुनेंगे? महानगर का यह आलम है कि दिन और रात को शोर से कभी भी निजात नहीं है। जैसे हमारे घर में मक्खी-मच्छर से। उन्होंने गहन और गंभीर चिंतन किया और इस नतीजे पर पहुँचे कि अर्धरात्रि के बाद शायद स्थिति दिन से बेहतर हो? बस फिर क्या था।

उसने अपने गंजे सिर को पी कैप से ढका और साहस कर घर से निकल लिया। अपने मोहल्ले से सड़क तक पहुँचते-पहुँचते कुत्तों ने आसमान सिर पर उठा लिया। कई घरों में बत्ती जल गई और लोग कुछ असामान्य होने के डर से नीचे झाँकने लगे। कई ने तो ‘कौन है’ कहकर उसे चुनौती भी दी। इसी बीच मोहल्ले के चौकीदार का, गृहवासियों का स्वर सुनकर कर्तव्य-बोध अचानक जागा। उसने हाथ का डंडा बजाते हुए सवाल किया, ‘कौन है बे?’ कवि ने अपना नाम बताया। चौकीदार ने पता पूछा और फिर उस कवि को घर ले जाकर पत्नी से पुष्टि की कि यह वही है, जो होने का दावा कर रहा है। पत्नी यों तो पति से दुःखी और त्रस्त थी, पर इतनी भी नहीं कि उसके अस्तित्व को ही नकार दे। कम-से-कम इस महँगाई के माहौल में, कुछ मदद तो है, वरना सिर्फ पत्नी के वेतन से घर खर्च के स्कूटर का एक ही पहिया चल पाता। यों सब्जी भी आधी-अधूरी ही सही, ले तो आता है। पत्नी ने कुछ बुझे स्वर में कवि का अमन वर्मा होना माना। चौकीदार ने डंडा पीटकर जैसे उसे फिर से अपने गंतव्य की ओर जाने की अनुमति दी।

वह घर से फिर खामोशी खोजने चल पड़ा। कुत्ते फिर भौंके। बत्तियाँ फिर जलीं, पर चौकीदार ने रोशनी की ओर मुँह उठाकर उत्तर दिया, ‘‘मोहल्ले का ही है।’’ इस बार उसने राजपथ तक जाने का इरादा मुल्तवी कर घर के पास के चणक्यपुरी के पार्क में सन्नाटे को अनुभव करने का निश्चय किया था। उसने सोचा था कि वहीं किसी बेंच पर पसर लेगा और खामोशी के खयाल बुनेगा। अपने घर के दो कमरों के फ्लैट में रहकर उसे यह अनुमान तो अवश्य था कि वह किसी महत्त्वपूर्ण इलाके में रहता है, पर उसे यह अंदाज नहीं था कि पुलिस भी उसी अनुपात में यहाँ सक्रिय है। नहीं तो अन्य बस्तियों में तो खाकी हत्या, अपहरण या डकैती के बाद ही नजर आती है। रात को पार्क के पास अकेले भटकते देखकर एक सिपहिए ने उसे धर दबोचा। कवि की घिग्घी बँध गई। वह ‘खामोशी, खामोशी’ बुदबुदाता रहा और कानून-व्यवस्था का प्रतिनिधि उसकी माँ-बहन से रिश्ता जोड़ते हुए उसे थाने की ओर घसीटता रहा। थाने के अंदर प्रवेश करते ही उसका स्वागत सिपहियों ने सम्मिलित थप्पड़-मुक्कों से किया। शारीरिक दंड से उसके आँसू निकल आए।

उसे चीख-चीखकर रोते देखकर एक निरीक्षक किस्म के इनसान ने उसकी पिटाई बंद करने के निर्देश के साथ यह हुक्म भी दिया कि पता करो, यह है कौन? उसने सुबक-सुबककर अपना अता-पता बताया। पुलिस उसी पते पर कवि को ले गई, जहाँ रात को दूसरी बार पत्नी ने अपने पति के दर्शन किए। पहली बार वह सही-सलामत लग रहा था, इस बार कुछ पिटित-घायल। उसके चेहरे पर लाल-नीले निशान थे और आँखें कुछ सूज सी गई थीं। पुलिसवालों ने पत्नी से कुछ सवाल किए। मसलन यह सिलबिल्ला इनसान किस दफ्तर में है? इसका पहचान-पत्र कहाँ है? क्या यह ऐसी ही पागलपन की हरकतें करता रहता है? अमन वर्मा का पहचान-पत्र शासन की मोहर के साथ देखकर उनके बाबू होने और इस टूटे-फूटे आदमी से मिलान कर, उन्हें विश्वास हो गया कि यह कोई चोर न होकर थोड़ा पागल टाइप इनसान है, जो महानगर की चिल्ल-पों में खामोशी तलाशने जैसी ऊलजलूल हरकत में व्यस्त है। कोई आधी रात के बाद किसी पार्क के सामने पाया जाए तो उसे सामान्य व्यक्ति समझने की मूर्खता तो कोई शायद ही करे। यों पुलिस को भी लगा कि इधर गैर-कानूनी वारदात रात के अँधेरे से हटकर दिन के उजाले में शिफ्ट हो गई हैं। इन हालात में इस पागल को छोड़ना ही उचित है। चलते-चलते पुलिसियों ने कवि के एक प्यार भरी घौल लगाई और ‘रात को बाहर न भटकने की’ सलाह के साथ जीप पर बैठकर विदा हो लिये।

तब से कवि इस एकाकी चिंतन में मग्न है कि क्या पता उन दिनों जब सन्नाटे का छंद बुना गया था, महानगर में शोर के बीच मौन क्या संभव रहा होगा? आज तो ऐसी कल्पना भी कठिन है। इधर तो खामोशी का पलभर का अंतराल भी मुश्किल है। फिर भी कवि अपने इरादे के पक्के थे। उन्हें पुलिसियों के अनुभव से अपने निश्चय से विरत नहीं किया। उलटे उसने घर की बालकनी में रात को जागकर खामोशी का खयाल जीने की ठानी। पत्नी ने रात को घर से निकलने पर बैन लगा दिया, तब से यहीं बालकनी में रतजगा मुमकिन था। रात के सन्नाटे में यहाँ भी मच्छरों की भिनभिन, चौकीदार की लाठी की ठकठक और कुत्तों के भौंक के कोरस ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। ‘खामोशी के खयाल’ अब भी सबसे चर्चित अनलिखी रचना है। उसके पूर्ववर्ती कवि तो ‘सन्नाटे का छंद’ बुनकर प्रसिद्ध हुए, हमारे बौद्धिक कवि की तो अलिखित रचना ही कालजयी सिद्ध हो गई।

उसके आलोचक मित्र ‘खामोशी के खयाल’ पर छपा लेख कवि को भेंट देते शिकायत की, ‘‘और सब तो ठीक है। जब तक यह पाठ्य-पुस्तकों में न छपेगी, इसे देश के भविष्य के नागरिक कैसे पढ़ेंगे? आपको कल के युवा कैसे इस कालजयी रचना के बिना याद करेंगे? आज आपसे प्रार्थना है कि कृपया इसे जल्दी से लिपिबद्ध करिए, जिससे यह पाठ्यक्रम की शोभा बने।’’ कवि आलोचक का सम्मान करता था। उसने कई लेख लिखे थे कवि के विषय में। कवि को लगा कि इससे वह मन की बात कर सकता है। वह दरियादिली दिखाकर आलोचक को ‘ढाबा-किंग’ ले गया। वहाँ दोनों ने कड़क चाय के संवाद के दौरान चर्चा की। ‘आपको मेरी ‘गटर की गंध’ रचना का स्मरण है? कवि ने आलोचक से प्रश्न किया। आलोचक चहका, ‘‘क्यों नहीं! गटर की गंध ने तो काव्य-जगत् में हलचल मचा दी थी।’’

‘‘यही तथ्य तो हम आपको याद दिलाना चाहते हैं। अभी तक संसार भर में प्रकाशित रचनाओं ने धूम मचाई है। ‘गटर की गंध’ में मैंने गटर नाली, मेन-होल किस-किस का व्यक्तिगत अनुभव नहीं किया? तब कहीं जाकर यह रचना लिखी गई। अभी तक मेरी नासिका में वह बास बसी है। ‘खामोशी के खयाल’ भी भोगे हुए यथार्थ का प्रतिफल है। खामोशी की खोज में हमने क्या-क्या नहीं किया? पुलिस से जूझे, मोहल्ले के चौकीदार से उलझे। इसके वाबजूद खामोशी वास्तव में मिली नहीं, उसकी कल्पना ने मन में रचना रची। इसकी विषय-वस्तु का विस्तार तो मैं आपसे निवेदित कर चुका हूँ। मेरी इकलौती इच्छा है कि यह विश्व की अकेली रचना बने, जो अनलिखी रहकर नाम कमाए। यह आपके सक्रिय सहयोग से ही संभव है।’’

आलोचक ने अपने गुरुतर दायित्व को स्वीकार करते मुंडी हिलाई। तबसे वह और उनका खेमा इस अप्रकाशित रचना को उसका स्थान दिलाने में जुट गया। कई निर्गुट साहित्यकार इस अलिखित रचना और रचनाकार को खेमेबाजी के ज्वलंत उदाहरण के बतौर देखते हैं। उनका मानना है कि कोई एक दिन में आठ-दस रचनाएँ उगलता है और कोई अलिखित रचना के कारण चर्चा में है। दोनों ही लेखक प्रतिभा के अभाव के आदर्श नमूने हैं। ऐसी दुर्घटनाएँ हिंदी में ही क्यों होती हैं?

 

९/५, राणा प्रताप मार्ग

लखनऊ-२२६००१

दूरभाष : ९४१५३४८४३८
गोपाल चतुर्वेदी

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