मेरे उत्प्रेरक मास्साब

मेरे उत्प्रेरक मास्साब

हर बालक की प्रथम गुरु उसकी माता होती है या फिर पिता। घर के वातावरण में बालक पल-पोसकर विद्यार्जन के लिए विद्यालय में प्रवेश कर शिक्षक (गुरुजी) के शरणागत हो जाता है। गुरु अपने शिष्य को कच्चे घड़े के समान ठोक-पीटकर, बिना कोई हानि पहुँचाए उसके टेढ़ेपन, यानी अवगुणों को दूर कर अज्ञान के अँधेरे से निकालकर ज्ञान के उजाले में ले आते हैं। यह परम सत्य है कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं होता है। पौराणिक ग्रंथों, संत-मुनियों ने एक स्वर से गुरु की महिमा का गान किया है, उसकी महत्ता बतलाई है।

गुरु (शिक्षक) अपने शिष्य के ज्ञानचक्षु खोल देते हैं। उसका संस्कार कर नया जीवन देते हैं, इसलिए गुरु को ‘पारस’ भी कहा जाता है। सांसारिक ज्ञान ही नहीं, सद्गुरु तो ईश्वर से भी मिला देता है। परंतु गुरु जीवनपर्यंत गुरु ही रहता है। बिना किसी अपेक्षा के ताउम्र विद्यादान करता रहता है। गुरु से ज्ञान प्राप्त शिष्य अपनी प्रवृत्ति के अनुसार कोई इंजीनियर बनता है, तो कोई न्यायाधीश, कोई वैज्ञानिक तो कोई मंत्री, संतरी और देश का नायक। यह लोक प्रहेलिका वैसे तो ‘कुम्हार के चाक’ के लिए कही गई है, परंतु गुरु के गुणों को बताने में यह ज्यादा मुखर है—‘चलत-चलत बूढ़े भए, चले न एकऊ कोस। उनके जाये ऐसे भए, जो पहुँचे देस-विदेस॥’ गुरु के गुण अनंत हैं, उन्हें गिन पाना, लिख पाना असंभव है। संत कबीर ने कहा भी है, ‘सब धरती कागद करूँ, लेखनि सब बनराय। सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुन लिखा न जाय॥’

मेरे शिक्षा-काल में गुरु (मास्साब) तो बहुत से रहे, पर उनमें से बहुत थोड़े से गुरु ही मेरे हृदय में पूज्य स्थान बना पाए। आज भी उनका एक दर्शन पाने की मन में तीव्र अकुलाहट रहती है। उनका कहा एक-एक शब्द मेरे कानों में उसी रूप में आज भी सुनाई देता है। उनका स्मरण करते हुए मैं विह्वल हो जाता हूँ। किसी ने ठीक ही कहा है कि अच्छे गुरु और अच्छे मित्र भाग्य से ही मिलते हैं। मेरी प्राथमिक शिक्षा बेसिक प्राइमरी पाठशाला जरारा में हुई। मेरा गाँव मीरपुर तनिक छोटा और जरारा गाँव विशाल है। दोनों के बीच से बंबा (राजबहा) बहता है, नहीं तो इन्हें जुड़वाँ कह सकते हैं। ये दोनों गाँव बुलंदशहर जनपद में अंतिम छोर पर हैं।

उन दिनों जरारा गाँव के मास्साब पं. सत्यदेव शर्मा गाँव की प्राथमिक शाला में ही पहली कक्षा को पढ़ाते थे। वे दोनों गाँवों में घूम-घूमकर पाँच साल के बच्चों के नाम पाठशाला की पहली कक्षा में लिख लिया करते थे। उन दिनों जो अभिभावक अपने बच्चों का नाम पाठशाला में लिखवाते थे, तो उस खुशी में पूरे विद्यालय में गुड़ या बताशे बाँटते थे। हलकीकद-काठी के सत्यदेव शर्मा मास्साब से ही मैंने अक्षर ज्ञान प्राप्त किया। वे हर समय अपनी जीभ निकाले रहते थे और किसी भी गलती पर बच्चे की टूँड़ी (नाभि) पकड़कर उठा देते थे। इससे बच्चे उनसे बहुत डरते थे।

पहली कक्षा में केवल अक्षर-ज्ञान कराया जाता था। मास्साब हमारी पट्टी (तख्ती) पर खड़िया से एक ओर अ, आ, इ, ई तो दूसरी ओर गिनती लिख देते। हम खड़िया के घोल से उन अक्षरों के ऊपर कलम चलाकर लिखना सीखते थे। दिन में कई बार तख्ती पोतकर फिर-फिर लिखने का अभ्यास चलता था। अपनी पट्टी को चिकना बनाने के लिए मैं तवे की कालिख और दूध के झाग लगाकर लेपन करता; कभी-कभी ग्वारपाठा से चिकना करता था। पट्टी को सुखाने केलिए हम धूप में खड़े होकर पट्टी को दाएँ-बाएँ हिलाते हुए गाते थे—‘सूख-सूख पट्टी, चंदन गट्टी, कारौ छोटा लाऊँगौ, तोईपे चढ़ाऊँगौ।’ जिस दिन गुरुजी तहसील में तनख्वाह लेने जाते थे, शाला में देर से ही आते थे। तब शरारती बच्चे अपनी पट्टी (तख्ती) को सुखाते हुए गाते थे—‘तख्ती पे तख्ती, तख्ती पे नौन, पंडितजी मर गए, पढ़ाए कौन?’ पंडितजी (गुरुजी) ही हमें सरपत की कलम बनाकर देते थे, इसके लिए वे एक छोटा चाकू अपने कुरते की जेब में रखते थे। कक्षा एक के लिए कोई पुस्तक उन दिनों नहीं होती थी। पर वर्णमाला और गिनती की एक छोटी पुस्तिका बाजार में मिलती थी। जिसके पिछले कवर पर बंदर और दो बिल्लियों वाली कहानी छपी होती थी। इसकी कीमत दस नए पैसे थी। आज की अपेक्षा उन दिनों की प्राथमिक शिक्षा बेहद कारगर एवं सस्ती थी। उस समय यूनीफॉर्म का भी कोई खर्चा नहीं था। मेरे विद्यालय की अपनी कोई जगह तथा इमारत नहीं थी। जरारा गाँव के लगभग बीचोबीच एक ठाकुर साहब की कच्ची ईंटों की बनी ऊँची सी पुरानी चौपाल थी। उसमें एक लंबा कमरा तथा एक बरामदा तो था ही, पर चबूतरा काफी बड़ा था। पाँचवीं कक्षा बरामदे में तो बाकी कक्षाएँ चबूतरे पर लगती थीं।

हमेशा चौथी कक्षा को पढ़ानेवाले पं. रामहेत शर्मा साक्षात् सांदीपनि गुरु के अवतार थे। वे साइकिल पर खुरियावली गाँव से आते थे। सादा सूती कमीज और पाजामा पहने गौर वर्ण के गुरुजी का ललाट तेज से देदीप्यमान रहता था। अब उनकी कमर हलकी सी झुक गई थी। वे कभी दुःखी नहीं होते थे। अपने शिक्षक जीवन में उन्होंने कभी किसी बालक की पिटाई नहीं की। पूरे विद्यालय में उनके बराबर सम्मान किसी गुरु का नहीं था। यहाँ तक कि उम्र में बड़े मुख्याध्यापकजी भी उनको सम्मान से ‘बड़े बाबू’ कहा करते थे। किसी बालक को समझाते-बताते मास्साब जब हलकान हो जाते तो बस इतना ही कहते थे, ‘तेरे दिमाग में क्या भूसा भरा है?’ एक साधु पुरुष के सारे गुण उनमें थे। वे इस ढंग से पढ़ाते थे कि सब दिमाग में अमिट हो बैठ जाता।

जब मैं तीसरी कक्षा में आया तब उस साल की बरसात में कमरे तथा बरामदे की छत गिर गई तो तीसरी कक्षा सत्यदेव शर्मा मास्साब के घेर (जहाँ गाय-भैंस रखी जाती हैं) में, कक्षा चार गाँव के सिरे पर एक ठाकुरजी के घेर पर नीम के पेड़ की छाँव में तथा कक्षा दो पंडितजी के घेर के सामने एक विशाल नीम का पेड़ था, उसकी छाया में लगने लगी। यहाँ पास में ही कुआँ था। प्यास लगने पर कुएँ पर जाते तो कोई-न-कोई पानी पिला देता था। उस समय चुल्लू से पानी पीने में कितना आनंद आता था, हाथ कुहनी तक भीग जाते थे। बारिश होने पर सब बच्चों की छुट्टी कर दी जाती थी। इतने पर भी कोई बालक घर के जरूरी काम से छुट्टी कर लेता, तो गुरुजी दो-चार हट्टे-कट्टे लड़के भेजकर उसे पकड़वाकर मँगवा लेते। मास्साब पढ़ाई के प्रति गंभीर थे, बालकों की उपस्थिति तथा अनुशासन वे बनाए रखते थे।

हम बच्चे अपने घरों से टाट का एक-एक बोरा लेकर जाते, गुरुजी चारपाई पर बैठते थे, हम पंक्तिबद्ध अपने-अपने बोरे बिछा लेते। टाट के फर्श तो हमें छठी कक्षा में नसीब हुए थे। हमेशा चौथी कक्षा को पढ़ानेवाले पं. रामहेत शर्मा साक्षात् सांदीपनि गुरु के अवतार थे। वे साइकिल पर खुरियावली गाँव से आते थे। सादा सूती कमीज और पाजामा पहने गौर वर्ण के गुरुजी का ललाट तेज से देदीप्यमान रहता था। अब उनकी कमर हलकी सी झुक गई थी। वे कभी दुःखी नहीं होते थे। अपने शिक्षक जीवन में उन्होंने कभी किसी बालक की पिटाई नहीं की। पूरे विद्यालय में उनके बराबर सम्मान किसी गुरु का नहीं था। यहाँ तक कि उम्र में बड़े मुख्याध्यापकजी भी उनको सम्मान से ‘बड़े बाबू’ कहा करते थे। किसी बालक को समझाते-बताते मास्साब जब हलकान हो जाते तो बस इतना ही कहते थे, ‘तेरे दिमाग में क्या भूसा भरा है?’ एक साधु पुरुष के सारे गुण उनमें थे। वे इस ढंग से पढ़ाते थे कि सब दिमाग में अमिट हो बैठ जाता। मेरा दावा है कि जो विद्यार्थी उनसे नहीं पढ़ सका तो का दुनिया का कोई शिक्षक नहीं पढ़ा सकता। अन्य शिक्षकों की तरह वे किसी से भेदभाव नहीं करते थे। केवल वे ही थे, जो समय-समय पर प्रेरक कहानियाँ सुनाया करते थे। शायद संतकवि सुंदरदासजी ने यह दोहा मेरे इन्हीं गुरु केलिए रचा है—

सद्गुरु सुधा समुद्र है,

सुधामयी हैं नैन।

नख-शिख सुधा स्वरूप पुनि, सुधा सु बरसत बैन॥

हम जब तक विद्यालय में रहते, कभी फुरसत नहीं होती थी। प्रातः स्कूल में प्रार्थना के बाद ही इमला, फिर पुस्तक पाठ, उसके प्रश्न-उत्तर, बारी-बारी से दूसरे विषय, फिर गणित। हर सप्ताह अलग-अलग विषय का टेस्ट होता था। छुट्टी होने से आधा घंटा पहले हर कक्षा कतार में खड़ी होकर पहली कक्षा में गिनती तो दूसरी कक्षाओं में पहाड़े पढ़े जाते थे। पहले एक या दो नियत छात्र ऊँची आवाज में बोलते, बाद में पूरी कक्षा हाथ उठा-उठाकर फुल वॉल्यूम में दोहराती थी। इससे दूर-दूर हमारे घरवालों को भी पता लग जाता था कि अब छुट्टी होनेवाली है। हर शनिवार को बालसभा जरूर होती थी। सभी कक्षाओं के बालक-बालिकाएँ इकट्ठा बैठते थे। कविता, गीत, चौपाई, हास्य, वाद-विवाद तथा बाद में अंत्याक्षरी होती थी। अंत्याक्षरी के लिए तो कई लड़के-लड़कियों ने रामचरितमानस का गुटका खरीद लिया था और बहुत सारी चौपाई-दोहा कंठस्थ कर लिए थे। मुझे याद है, चौथी कक्षा में पढ़ रहा मेरे गाँव का एक लड़का भूदेव ‘रण बीच चौकड़ी भर-भर कर’ कविता को तलवार की जगह हाथ में एक लकड़ी लेकर अभिनय करते हुए इस अंदाज में सुनाता था, जैसे वह खुद चेतक हो और हल्दीघाटी के मैदान में अपना पराक्रम दिखा रहा हो। सब बच्चे ही नहीं, अध्यापक भी खूब हँसते थे।

सुरजाबली गाँव के कक्षा दो को पढ़ानेवाले मास्साब रमेशचंद्र सिंह राघव अत्यंत रुआबदार थे। उनसे बच्चे ही नहीं, बच्चों के पिता भी डरते थे। उन दिनों फीस दस पैसा लगती थी। गरीबी का आलम ऐसा था कि ज्यादातर बच्चे समय पर फीस नहीं दे पाते थे। रमेश मास्साब हर तीसरे दिन बच्चों को फीस के लिए दौड़ाते थे।

जब मैं तीसरी कक्षा में आया तब दो-तीन मास्साब लगातार जल्दी-जल्दी बदलते रहे, इस बीच एक मैडम भी पढ़ाने आईं। अंत में मैं राजबीर सिंह मास्साब का शिष्य रहा। वे बनैल गाँव, जहाँ के संघ के सरसंघचालक रज्जू भैया थे, से साइकिल पर आया करते थे। मास्साब मुझे प्यार से कालू कहते थे। वे भी बच्चों की पिटाई न कर, केवल पढ़ाई पर ध्यान देते थे। उनका पहनावा बड़ा सादा था, रंगीन कमीज और सफेद पायजामा। गरमियों में पसीने से लथपथ हो जाते थे, तो मेरे सहपाठी रवींद्र से एक लोटा पीने का पानी मँगाते थे, क्योंकि उसका घर पास में ही था। इसी दौरान हमारे विद्यालय में एक नए मास्टरजी आए। वे खूब मोटे थे, एकदम गोल-मटोल! नाम था शंकरलाल शर्मा। वे साबतगढ़ गाँव से साइकिल पर ही आते थे। उनकी साइकिल सबसे दुरुस्त हालत में होती थी। पाजामा साइकिल की चैन में न आ जाए, इसलिए उसे टाँगों पर लपेटकर उन पर लोहे की चूड़ियाँ चढ़ा लेते थे। वे काला चश्मा लगाते थे और बड़ी नजाकत से रहते थे। उनके कुरता-पाजामा स्पॉटलैस रहते थे। उनकी आवाज बड़ी सुरीली थी। वे आशुकवि थे, देखते-देखते ही कविता बना देते थे। वे हमारे विद्यालय में बहुत कम समय तक रहे, पर उन दिनों बालसभा की रौनक इतनी बढ़ गई थी कि क्या कहने!

उन्होंने रामायण, महाभारत और अच्छी सीख देनेवाले लोक-प्रसंगों को इतने आसान गीत और कविताओं में रच दिया कि जो बच्चे विद्यालय आने से कतराते थे, वे भी नियमित आने लगे। बालसभा में तो आसपास के घरों के औरत-मर्द भी इकट्ठा हो जाते थे। उन दिनों भादों के महीने में गणेश चतुर्थी मनाई जाती थी। गुरुजी बड़े उत्साह के साथ अपने शिष्यों के घर जाते थे। इस पर्व को हम बच्चे अपनी भाषा में ‘चट्टा चौथ’ कहते थे। चट्टा एक प्रकार की एक-डेढ़ फीट की दो लकड़ी होती थीं, जिन्हें रंग-बिरंगी रँगकर उस अवसर पर बजाया करते थे। कुछ बच्चे बाजार से बनी-बनाई ही खरीद लेते थे। हमारे घरों में इस अवसर पर माँ-बहनें आँगन लीपकर खूब साफ-सफाई करती थीं, उस दिन ज्यादातर घरवाले अपने-अपने घर पर ही रहते थे, उनके बच्चों के गुरुजन जो आनेवाले होते थे, तो उनके स्वागत और सेवा का अवसर मिलता था। जो मास्साब जिस कक्षा को पढ़ाते थे, उसकी गुरु दक्षिणा वही लेते थे। शिष्य यानी हम साफ-सुथरे थाल में हलदी-चावल से गुरुजी का तिलक कर उनके चरण-स्पर्श कर आशीष लेते, फिर घरवाले गुरुजी को दक्षिणा भेंट करते। जिसकी जैसी सामर्थ्य होती—एक रुपया, दो रुपया, पाँच रुपया भी। कम दक्षिणा पर गुरुजी रूठ भी जाते, पर मान-मनुहार करने पर जल्दी मान भी जाते थे। सही मायने में यह ‘गुरुपूजा’ का पर्व होता था।

इस साल तो शंकरलाल मास्साब ने इस अवसर के लिए इतने गीत, कविता आदि तैयार करवाए थे कि जिस घर में जाते तो छात्रों की अलग-अलग टोलियाँ खड़े होकर अपने-अपने गीत, कविता आदि पूरा जोर लगाकर सुनातीं। शंकरलाल मास्साब ने छंदोबद्ध एक नई रामायण चौपाई-दोहों के साथ इतनी सरल भाषा में रच दी थी। इसकी कुछ पंक्तियाँ अभी तक मेरी स्मृति में हैं। लंका कांड का प्रसंग है—

मेघनाद जूझन चला, मारी सान घुमाय।

लछमन के तन में लगी, गिरा धरन गस खाय॥

लंका से एक वैद बुलाया। लछमन भैया उसे दिखाया॥

देख वैद ने नाड़ी उसकी। हम पर दवा नहीं है इसकी॥

जल्दी से संजीवन लाओ। जरा घोंटकर इसे पिलाओ॥

संजीवन हम कहाँ से लावें। इसका पता आप बतलावें॥

संजीवन पर्वत पर होय। तैसे जले दीये की लोय॥

रात-रात में लाओ उखाड़। प्रात होत लछमन का काल॥

हनुमानजी संजीवन बूटी लाने के लिए उड़ चले—

हनुमान से ऐसा कीना। सूरज पकड़ गाल में दीना॥

हनुमान ने मारी किलकार। आधा पर्वत लिया उखाड़॥

हाथ पे रखकर पर्वत लाए। अवधपुरी के रस्ते आए॥

भरत ने देखा यह क्या आया। उठा धनुष एक बाण चलाया॥

बाण के मारे मैं लँगडाऊँ। अब पर्वत कैसे ले जाऊँ॥

भरतजी सारी व्यथा-कथा सुनकर कातर स्वर में बोले—

हनूमान तू मत कर शंका।

बैठ बाण पहुँचाऊँ गढ़ लंका॥

इसी प्रकार कक्षा चार के दो छात्रों को काले-गोरे के भेदभाव पर सीख देनेवाला एक गीत कंठस्थ कराया था, जो थोड़ा सा मेरी स्मृति में रह गया है—

एक पुरुष की दो थीं नारी,

पहली गोरी दूजी काली।

आया तीजों का त्योहार,

दोनों करन लगीं सिंगार।

गोरी कहे तेरे साथ न झूलूँ,

तेरा रंग है बहुत ही काला।

हे गोरी! तोय शरम न आवे,

काले रंग को बुरा बतावे।

काले हैं तेरे सिर के बाल।

इन्हें सिर से देय उतार।

काली हैं तेरी आँख की पुतली,

इन्हें फोड़कर हो जा अंधी।

काली भैंस बाँध ले द्वार,

जिसका दूध पिए घरबार।

काला हाथी हौदेदार,

इसको रखते इज्जतदार।

मेरी ही कक्षा के दो छात्रों को मास्टरजी ने हरिश्चंद्र-तारामती प्रसंग पर बनाई अपनी एक रचना कंठस्थ कराई थी; इसकी कुछ ही पंक्तियाँ मेरी स्मृति में हैं। काशी में रानी तारामती अपने पुत्र रोहताश्व का मृत शरीर लेकर श्मशान पर आती है, जहाँ राजा हरिश्चंद्र चंडाल की नौकरी कर रहे थे—

लेकर मुरद घाट पर आई,

ना कुछ देने को वह लाई।

पहले टका खोलकर रख दो,

पीछे गती कुमर की कर लो।

राजाजी यह चीर है, ओढ़े खड़ी अगार।

और तो मुझ पर कुछ नहीं, इसमें से लो आधा फार॥

तब राजा ने किया इरादा,

फाड़ चीर रानी का आधा।

घर-घर जाते हुए हर एक के आँगन में ये सब गीत, नाट्य-गीत, कविता आदि पूरे जोश में गाए जाते। जलपान में गुरुजी को मीठा दूध पीने के लिए दिया जाता और सब बच्चों को गुड़ या बताशे बाँटे जाते। तब हमारी खुशी का ठिकाना न था। एकदम साफ-सुथरे या नए कपड़े पहनकर गुरुजी के साथ गाँव-गाँव घूमने में कितना आनंद था, सो कैसे कहूँ! गुरुजी को दक्षिणा भेंट हो जाने के बाद सब मास्साब अपने शिष्य तथा उसके परिवार वालों को आशीर्वाद देते थे। इस बार तो नए मास्साबजी ने आशीर्वाद के वचन भी कविता में रच दिए थे, जिन्हें कक्षा पाँच के दो छात्र खड़े होकर गुरुजी की ओर से गाते थे—

चट्टा चौथ भादों में आई,

सबके मन में खुशी मनाई।

गणेश चौथ का दिन अलबेला,

खुशी रहे पंडितजी का चेला।

उमर बढ़े और विद्या आवे,

अपने बड़ों का नाम कमावे।

बढ़े कुटुम परिवार तुम्हारा,

तुमने रक्खा मान हमारा।

और ये आशीर्वचन होते ही हम सब बच्चे अगले घर की ओर दौड़ पड़ते थे। जिस लड़के का घर अगले क्रम में होता था, वह तैयारी के लिए पहले ही अपने घर चला जाता था। फिर यही सब प्रक्रिया वहाँ दोहराई जाती थी। इस तरह गाँव-गाँव घूमते हुए दो-तीन दिन बड़े आनंद के साथ बीत जाते। हर शनिवार की बालसभा में नए मास्साब अपने नए बनाए गीत या कविता जरूर सुनाया करते थे। अब कहाँ हैं ऐसे रचनात्मक अध्यापक, जैसे हमारे शंकरलाल मास्साब थे। प्राथमिक शाला की ये तीनों विभूतियाँ आज भी मेरे मन-मंदिर में विराजमान हैं।

कक्षा पाँचवीं पास करके मैं इसी गाँव के जूनियर हाई स्कूल में पढ़ने के लिए गया। आठवीं तक के इस स्कूल में सर्वश्री केशवदेव शर्मा, नानक चंद गुप्ता, बाबू खाँ तथा धर्मपाल सिंह मेरे माननीय अध्यापक थे। इनमें आदरणीय धर्मपाल सिंह को मैं अपना आदर्श गुरु मानता हूँ। उनके प्रति मेरा पूज्य भाव आज भी बना हुआ है। वे डी.पी. सिंह नाम से बड़े सुंदर हस्ताक्षर किया करते थे। अपनी पढ़ाई पूरी करके वे सरकारी विद्यालय में नौकरी के इंतजार में थे। जब मैं छठी कक्षा में यहाँ पहुँचा, उसी वर्ष वे यहाँ पढ़ाने आए थे और छठी कक्षा के अध्यापक बनाए गए। जाति से वे धोबी थे, परंतु उनके जैसा सच्चरित्र, परिश्रमी, कर्तव्यपरायण और सदैव अपने शिष्यों के उत्थान की सोचनेवाला कोई दूसरा न था। उनकी हस्तलिपि बड़ी सुंदर थी। वे स्वयं अपने विषय की पूरी तैयारी करके आते थे। कक्षा में एक मिनट का समय भी बरबाद नहीं होने देते थे।

मुझे अच्छी तरह स्मरण है, डी.पी. सिंह मास्साब जब मेज के पास खड़े होकर पढ़ाते थे तो उनके दोनों गालों में गड्ढे हो जाते थे। उनके पढ़ाते समय कक्षा में नीम शांति बनी रहती थी। उन्होंने मुझे कक्षा आठ तक पढ़ाया, पर मेरे हृदय में उनके प्रति आदर कक्षा छठी से ही उमड़ने लगा था। पढ़ाते समय उनकी दृष्टि मेरे ऊपर ही रहती थी। मेरे जीवन में आए वे मेरे सबसे आदर्श गुरु हैं। मैंने उन्हें कभी निराश नहीं किया, हर कक्षा में अव्वल आता रहा। अब उनके एक बार दर्शन कैसे हों, इसकी हूक मेरे मन में हमेशा उठती है। वे मेरे जीवन में न आते तो मैं पढ़ाई में इतना अच्छा नहीं हो पाता। मैं बाद में जहाँ भी पढ़ने गया, हर कक्षा में अब्बल रहा तो इसका श्रेय उन्हीं को जाता है। अगली कक्षा में जाने पर सुंदर लिखावट वाली मेरी कॉपियाँ वे मुझसे ले लिया करते थे। मेरे बाद में मेरे गाँव के बालक-बालिकाएँ जब वहाँ पढ़ रहे थे, तब डी.पी. सिंह मास्साब इनको मेरी कॉपियाँ दिखाकर मेरे व्यवहार की प्रशंसा करते, उन्हें मेरे जैसा बनने के लिए प्रेरित करते थे। यह सब मेरे छोटे भाई-बहन और मोहल्ले के बालक मुझे बताया करते थे। बाद में मैंने सुना कि किसी सरकारी विद्यालय में उनकी नियुक्ति हो गई। वे छात्र-छात्राएँ बड़े ही भाग्यशाली रहे होंगे, जिन्होंने उनसे शिक्षा प्राप्त की होगी।

ऐसे गुरुओं के बारे में ही तो कहा गया है, ‘गुरौ प्रणामो हि शिवाय जायते।’ अर्थात् गुरु को किया गया प्रणाम भी कल्याणकारी होता है। वेद-पुराण, ऋषि-मनीषियों ने गुरु की महिमा एक स्वर में ऐसे ही नहीं गाई है। स्कंद पुराण के अंतर्गत ‘गुरुगीता’ में ठीक ही कहा गया है—‘ध्यान मूलं गुरोर्मूर्तिः पूजा मूलं गुरोः पदम्। मन्त्र मूलं गुरुवाक्यं मोक्ष मूलं गुरोः कृपा॥’ अर्थात् ध्यान का आदि कारण गुरुमूर्ति है। गुरु के चरण पूजा के मुख्य स्थान हैं। गुरु का वाक्य सब मंत्रों का मूल है और गुरु की कृपा मुक्ति का कारण है। अपने जीवन में आए ऐसे महान् गुरुओं के चरणों में विनयावनत हो बारंबार प्रणाम निवेदित करता हूँ। शिष्य अपने गुरु के ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकता है। पौराणिक ग्रंथों में कहा गया है—

एकमपि अक्षरमस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत्।

पृथिव्यां नास्ति तद् द्रव्यं तद् दत्त्वा ह्यनृणी भवेत्॥

अर्थात् कोई गुरु अपने शिष्य को एक भी अक्षर का ज्ञान देता है तो पूरी पृथ्वी पर ऐसी कोई वस्तु या धन नहीं, जिससे शिष्य अपने गुरु का ऋण उतार सके।

 

जी-३२६, अध्यापक नगर

नांगलोई, दिल्ली-११००४१

दूरभाष : ९८६८५२५७४१
—प्रेमपाल शर्मा

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