जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद ३७० का उदय और अस्त

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद ३७० का उदय और अस्त

सुपरिचित लेखक। हि.प्र. विश्वविद्यालय के धर्मशाला क्षेत्रीय केंद्र के निदेशक और भीमराव आंबेडकर पीठ के अध्यक्ष रहे। हि.प्र. में दीनदयाल उपाध्याय महाविद्यालय की स्थापना की। लगभग दो दर्जन से अधिक देशों की यात्रा, पंद्रह से भी अधिक पुस्तकें प्रकाशित। संप्रति भारत-तिब्बत सहयोग मंच के अखिल भारतीय कार्यकारी राष्ट्रीय संरक्षक और दिल्ली में ‘हिंदुस्थान समाचार’ के निदेशक।

जम्मू-कश्मीर में पिछले दिनों इतिहास का एक नया अध्याय लिखा गया। संघीय संविधान में से विवादास्पद अनुच्छेद ३७० को प्रभावहीन बना दिया गया है। यह अनुच्छेद संघीय संविधान और जम्मू-कश्मीर के बीच दीवार बनकर खड़ा था। संविधान देश के नागरिकों को जो अधिकार देता है, वे जम्मू-कश्मीर में इस अनुच्छेद के कारण नहीं पहुँच पाते थे। इस अनुच्छेद का लाभ उठाकर राज्य की सत्ता पर गिनती के शेखों, सैयदों, पीरजादों, मुफ्तियों, मौलवियों और मीरवायजों ने कब्जा जमा लिया था और सत्ता का उपयोग लोकहित के लिए नहीं बल्कि अपने इस लघु समुदाय के हितों के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। राज्य में आनेवाले बजट का बड़ा हिस्सा इन चंद परिवारों और उनके सगे-संबंधियों की जेब में चला जाता था। यह बहुत ही शातिराना तरीके से प्रदेश की सत्ता-व्यवस्था का अपहरण कहा जा सकता है। यह नए प्रकार की तानाशाही थी, जिसमें आम कश्मीरियों को लूटा जा रहा था और उन्हें अनुच्छेद ३७० का ड्रग एडिक्ट बनाकर पता भी नहीं चलने दिया जा रहा था। यह लघु समुदाय जानता था कि यदि आम कश्मीरी ३७० के नशे से बाहर आ गया तो वह इस गिरोह की करतूतों से वाकिफ हो जाएगा और सत्ता इनके हाथ से छीन लेगा। इन शेखों और सैयदों ने आम कश्मीरी के हाथ में ३७० का झुनझुना दे रखा था, जिसे वे बजाते रहते थे और पिछवाड़े में बैठे ये शेख, सैयद और पीरजादे एक ओर लूट-खसूट करते रहते थे तो दूसरी ओर अलगाववादियों की भाषा बोलकर केंद्र सरकार को डराते रहते थे।

अनुच्छेद ३७० था तो अस्थायी, लेकिन कांग्रेस सरकार ने अपने व्यवहार से इसको स्थायी बनाने की कोशिश बराबर जारी रखी थी। यह ध्यान रखना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर में सोनिया कांग्रेस और नेशनल कांग्रेस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। पंडित नेहरू तो नेशनल कॉन्फ्रेंरस को जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस की शाखा ही बताते थे, इसलिए बहुत साल तक प्रदेश में कांग्रेस की शाखा खोली ही नहीं गई थी। बाद में एक बार नेशनल कॉन्फ्रेंस का कांग्रेस में विलय भी हो गया था। इसलिए अनुच्छेद ३७० को बनाए रखने में कांग्रेस के भी वही स्वार्थ थे, जो शेखों-सैयदों के इस समूह के थे। इस पूरे परिदृश्य में शेखों और सैयदों को छोड़कर बाकी सभी राज्य निवासी पिस रहे थे। राज्य में बारह जनजातियाँ हैं, जिनको इन शेखों और सैयदों ने कोई अधिकार नहीं दिए हैं। जबकि देश के अन्य राज्यों में इन जनजातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिलता है। जम्मू-कश्मीर विधानसभा में इन जनजातियों के लिए कोई सीट सुरक्षित नहीं है, जबकि शेष राज्यों की विधानसभाओं में जनजातियों के लिए उनकी जनसंख्या के हिसाब से सीटें आरक्षित हैं। यही स्थिति अनुसूचित जातियों की है। उनकी हालत तो अमानवीय है। दलितों को, जो राज्य निवासी प्रमाण-पत्र जारी किया हुआ है, उसमें अंकित है कि ये केवल सफाई-सेवक का काम कर सकते हैं। दलितों के अधिकारों के लिए बाबासाहेब आंबेडकर जीवन भर संघर्ष करते रहे और संविधान में उनको सभी प्रकार के अधिकार मुहैया करवाए, लेकिन जम्मू-कश्मीर की सरकार दलितों को ये अधिकार देने के लिए तैयार नहीं थी। इतना ही नहीं, वह जन्म के आधार पर काम की एक नई वर्ण-व्यवस्था तैयार कर रही थी, जिसका शिकार वहाँ का दलित समाज हो रहा था।

१९४७ में विभाजन के समय लाखों लोग पश्चिमी पंजाब से पूर्वी पंजाब, दिल्ली और अन्य प्रदेशों में गए। उन्हें भारत सरकार और राज्यों की सरकारों ने सभी प्रकार की सहायता प्रदान की। पाकिस्तान में रह गई संपत्ति का मुआवजा भी उन्हें दिया। पश्चिमी पंजाब के दो जिले स्यालकोट और रावलपिंडि जम्मू-कश्मीर के नजदीक थे। वहाँ से लाखों पंजाबी जम्मू-कश्मीर में आ गए। लेकिन आज ७० साल बाद भी उनको वहाँ का स्थायी निवासी नहीं माना जा रहा। वे जो संपत्ति वहाँ छोड़ आए थे, उसका मुआवजा देने की बात तो दूर, उनके बच्चों को प्रदेश के व्यावसायिक शिक्षा संस्थानों में प्रवेश नहीं दिया जा रहा। वे राज्य में नौकरी नहीं कर सकते। विधानसभा व पंचायतों में चुनाव लड़ने की बात तो दूर, वहाँ वोट तक नहीं दे सकते। अनुच्छेद ३७० ने शेखों और सैयदों के कुछ परिवारों, मुल्ला-मौलवियों, मीरवायजों और पीरजादों को छोड़कर शेष निवासियों के लिए राज्य को एक बड़ा यातना शिविर बना रखा था। लद्दाख के लोग तो ३७० की व्यवस्था से इतने दुःखी थे कि उन्होंने १९४८ में ही यह प्रस्ताव पारित किया था कि लद्दाख को पूर्वी पंजाब में शामिल कर दिया जाए, लेकिन वे कश्मीर के साथ मिलने को तैयार नहीं हैं।

छह अगस्त को राष्ट्रपति ने राज्यसभा की अनुशंसा को स्वीकार करते हुए छह अगस्त को अनुच्छेद ३७० के सभी हिस्सों को निरस्त करते हुए इस अनुच्छेद को नया रूप दिया। इस नए रूप में अनुच्छेद ३७० में प्रावधान है कि पूरा संघीय संविधान जम्मू-कश्मीर में भी लागू होगा। इस प्रकार जम्मू कश्मीर के निवासियों के साथ पिछले सत्तर साल से हो रहे अन्याय का अंत हो गया। राजनीति शास्त्र के विद्वान् प्रदेश के लोगों के साथ हो रहे इसी अन्याय को ही राज्य का स्पेशल दर्जा कहकर प्रचारित कर रहे थे।

अनुच्छेद ३७० संघीय संविधान में चोर दरवाजे से ही डाला गया था। बाबासाहेब आंबेडकर ने तो इसे हाथ लगाने से भी इनकार कर दिया था, तब इसे नेहरू ने अपने मित्र गोपालस्वामी आयंगर से संविधान सभा में पेश करवाया था। दरअसल यह अनुच्छेद पंडित नेहरू और उनके मित्र शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के षड्यंत्र का परिणाम था। शेख अब्दुल्ला नेहरू को ब्लैकमेल कर रहे थे और भारतीय संविधान की आड़ में जम्मू-कश्मीर को अपनी जागीर की तरह इस्तेमाल करना चाहते थे। अनुच्छेद ३७० उसमें शेख की सहायता कर रहा था। यह आज तक रहस्य बना हुआ है कि नेहरूजी शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के सामने किसलिए झुके रहते थे? यदि थोड़ा और पीछे जाएँ तो कहा जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर का यह षड्यंत्र नेहरू, माउंटबेटन दंपती और शेख अब्दुल्ला द्वारा अलग-अलग चरणों में अभिनीत किया गया था।

अनुच्छेद ३७० में ही व्यवस्था है कि इसका अंत किस प्रकार होगा। उसमें कहा गया है कि गणराज्य के राष्ट्रपति अधिसूचना जारी कर इस अनुच्छेद को समाप्त कर सकते हैं, शर्त केवल इतनी है कि उसकी अनुशंसा राज्य की संविधान सभा करे। लेकिन १९५७ में राज्य की विधानसभा की आयु समाप्त हो गई और वह समाप्त हो गई। इसलिए कुछ हाईपर एक्टिव किस्म के बुद्धिजीवियों ने कहना शुरू कर दिया कि संविधान सभा तो अपनी उम्र भोगकर मर गई है, इसलिए जब तक सूर्य-चंद्रमा कायम रहेंगे, तब तक इस अनुच्छेद को हाथ नहीं लगाया जा सकता। अब यह अनुच्छेद अमर हो गया है। लेकिन उनके दुर्भाग्य से जब बाबासाहेब आंबेडकर ने यह संविधान बनाया था तो उन्होंने शेष सभी व्यवस्थाएँ इसमें शामिल कर दी थीं, लेकिन किसी हिस्से या अनुच्छेद को अमर बनाने का तांत्रिक सूत्र इसमें नहीं डाला था। आंबेडकर संविधान को एक जीवंत व्यवस्था मानते थे, न कि विभिन्न अनुच्छेदों को अमर बनाने का लेख लगाकर तैयार किया गया कोई भुतहा अजायबघर। राष्ट्रपति ने महज इतना ही किया कि अनुच्छेद ३७० में ही निहित उपधाराओं का उपयोग करते हुए राज्य की संविधान सभा के स्थान पर राज्य की विधानसभा कर दिया। इतना तो जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हसनैन (जो आजकल नेशनल कॉन्फ्रेंरस के सांसद हैं) जानते ही होंगे कम जब जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन होता है तो सरकार की ओर से संस्तुतियाँ राज्यपाल ही करते हैं। राष्ट्रपति ने अनुच्छेद ३७०(३) का प्रयोग करते हुए इस अनुच्छेद की कालबाह्य हो चुकी अधिकांश व्यवस्थाओं को समाप्त कर दिया।

वैसे भी कभी-न-कभी तो जम्मू-कश्मीर को इस षड्यंत्र से मुक्ति मिलनी ही थी। लेकिन इसके लिए जिस साहस की जरूरत थी, वह अब तक की सरकारों में से किसी ने नहीं दिखाया। नरेंद्र मोदी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने इस षड्यंत्र का अंत कर दिया, जिसकी शुरुआत नेहरू, माउंटबेटन दंपती और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने ७० साल पहले की थी। इसके लिए निश्चय ही मोदी बधाई के पात्र हैं।

लेकिन जबसे राष्ट्रपति ने संघीय संविधान के अनुच्छेद ३७० द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए जम्मू-कश्मीर राज्य में संविधान को लागू कर दिया और संसद् ने गृहमंत्री अमित शाह द्वारा तद् विषयक प्रस्ताव को भारी बहुमत से पारित कर दिया, तब से सोनिया कांग्रेस और पाकिस्तान में खलबली मची हुई है। अनुच्छेद ३७० में राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त है कि वे संघीय संविधान को आंशिक रूप से या फिर उसकी संपूर्णता में लागू कर सकते हैं। यदि वे चाहें तो इस अनुच्छेद को समाप्त भी कर सकते हैं। लेकिन इन दोनों कामों के लिए उन्हें जम्मू-कश्मीर सरकार की अनुशंसा चाहिए। इस अनुच्छेद ने संसद् द्वारा पारित अधिनियमों को जम्मू कश्मीर राज्य में जाने से रोका हुआ था। संसद् के वही अधिनियम राज्य में लागू हो सकते थे, जिनके लिए जम्मू कश्मीर की सरकार सहमत हो। जम्मू-कश्मीर सरकार से क्या अभिप्रेत है, इसकी व्याख्या भी इस अनुच्छेद में है। इसके अनुसार सरकार से अभिप्राय सदरे रियासत अर्थात् राज्यपाल से है। राज्यपाल को अपने मंत्रिमंडल की अनुशंसा पर चलना होता है। अनुच्छेद ३७०(३) में यह भी प्रावधान है कि यदि राष्ट्रपति चाहें तो वे यह पूरा अनुच्छेद निरस्त कर सकते हैं या फिर इसे संशोधित रूप में लागू कर सकते हैं। शर्त केवल इतनी है कि राष्ट्रपति को इसके लिए राज्य की संविधान सभा की सिफारिश चाहिए। अनुच्छेद ३७० राष्ट्रपति को उपरोक्त सभी विषयों से संबंधित अधिसूचना जारी करने का अधिकार देती है।

छह अगस्त को राष्ट्रपति ने राज्यसभा की अनुशंसा को स्वीकार करते हुए छह अगस्त को अनुच्छेद ३७० के सभी हिस्सों को निरस्त करते हुए इस अनुच्छेद को नया रूप दिया। इस नए रूप में अनुच्छेद ३७० में प्रावधान है कि पूरा संघीय संविधान जम्मू-कश्मीर में भी लागू होगा। इस प्रकार जम्मू कश्मीर के निवासियों के साथ पिछले सत्तर साल से हो रहे अन्याय का अंत हो गया। राजनीति शास्त्र के विद्वान् प्रदेश के लोगों के साथ हो रहे इसी अन्याय को ही राज्य का स्पेशल दर्जा कहकर प्रचारित कर रहे थे। यदि इस व्यवस्था को राज्य का विशेष दर्जा मान लिया जाए तो इसका लाभ प्रदेश के एक हिस्से कश्मीर घाटी में शेखों, सैयदों, मुफ्तियों, मीरवायजों, मौलवियों और पीरजादों को मिल रहा था। इन सभी ने मिलकर प्रदेश की राजनीति, व्यवसाय और मसजिदों पर कब्जा कर रखा था। प्रदेश में अलगाववाद और आतंकवाद का संचालन कर रहे गिरोहों पर भी एक प्रकार से इन्हीं का कब्जा है। वे आतंकवाद के नाम पर विदेशों से पैसा एकत्र करते थे; उससे संपत्ति भी अर्जित करते थे और अपने शरीफजादों को विदेशों के महँगे विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए भी भेजते थे। इन समुदायों को अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अनुच्छेद ३७० की बैसाखियों की सख्त जरूरत थी। इसीलिए ये सभी इस अनुच्छेद को कश्मीर की पहचान के साथ जोड़कर आम कश्मीरी का भावात्मक शोषण कर रहे थे।

उधर पाकिस्तान को इस अनुच्छेद की सर्वाधिक आवश्यकता थी। वह इस अनुच्छेद की व्याख्या जम्मू-कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच विवादित क्षेत्र सिद्ध करता था। अब यदि यह प्रदेश देश के बाकी प्रदेशों या केंद्रशासित क्षेत्रों की तरह हो जाता है तो पाकिस्तान के बीच विवाद का विषय तो इतना ही बचता है कि १९४७ में जब पाकिस्तान ने भारत पर सैनिक हमला करके जम्मू-कश्मीर के जिस एक-तिहाई हिस्से पर कब्जा कर लिया था, उस पर दोनों देश आपस में बातचीत करें। अभी तक पाकिस्तान अनुच्छेद ३७० की व्याख्या यह कहकर करता था कि भारत स्वयं भी जम्मू-कश्मीर को अपना स्थायी हिस्सा नहीं मानता, इसीलिए उसने अपने संविधान में इस राज्य की व्यवस्था के लिए यह विशेष अनुच्छेद बनाया हुआ है और नहीं भारत का संघीय संविधान प्रदेश पर पूरी तरह लागू होता है। अभी तक जम्मू-कश्मीर के लिए यह व्यवस्था थी कि वहाँ के भूगोल में संसद् दखलंदाजी नहीं कर सकती। शेष सभी प्रांतों का पुनर्गठन हो सकता था और होता भी रहा है, लेकिन जम्मू-कश्मीर के भूगोल को छेड़ा तक नहीं जा सकता था। लेकिन अनुच्छेद ३७० के प्रावधान बदल जाने के कारण संसद् ने जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन अधिनियम पारित कर उसे दो केंद्र शासित क्षेत्रों में तब्दील कर दिया है। अब लद्दाख, चंडीगढ़, दिल्ली और पुदुच्चेरी की तरह अलग केंद्र शासित प्रदेश होगा।

अब पूर्व अनुच्छेद ३७० का स्वरूप बदल जाने और राज्य का भाषा के आधार पर पुनर्गठन हो जाने से जम्मू-कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की सारी व्याख्याएँ केवल अप्रासंगिक ही नहीं हुईं बल्कि इतिहास का हिस्सा बन गई हैं। पाकिस्तान का अपना हित इसी में था कि जम्मू-कश्मीर विवादित हिस्सा रहे। यह स्थिति वहाँ के कुछ राजनैतिक दलों को अनुकूल पड़ती थी और वहाँ की सेना को भी अनुकूल थी। दरअसल जम्मू-कश्मीर का विवादित बने रहना पाकिस्तान के राष्ट्रीय हितों और सामरिक हितों के लिए लाभदायक था। लेकिन भारत के लिए यह स्थिति धीरे-धीरे आत्मघाती बनती जा रही थी। यह आश्चर्य का विषय है कि भारत में भी कुछ राजनैतिक दल जम्मू-कश्मीर को इसी दृष्टि से देखते थे।

जाहिर था पाकिस्तान अनुच्छेद ३७० को समाप्त करने के प्रश्न को लेकर दुनिया भर में शोर मचाता और उसने मचाया भी। उसे आशा रही होगी कि अमेरिका और ब्रिटेन, जो अब तक पाकिस्तान का उपयोग भारत के खिलाफ अपने हितों की पूर्ति के लिए करते आए हैं, अब भी इस नए मामले में उसका समर्थन करेंगे। पाकिस्तान को आशा रही होगी कि अमेरिका आजकल अफगानिस्तान में फँसी अपनी पूँछ छुड़ाने के लिए तालिबान के साथ बातचीत कर रहा है। पूँछ छुड़ाने में उसे पाकिस्तान की सहायता की जरूरत पड़ेगी। इसलिए पाकिस्तान अमेरिका पर दबाव बना लेगा। लेकिन अमेरिका, दोनों देशों को बातचीत करनी चाहिए, इससे एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा। इंग्लैंड भी शिमला समझौता या द्विपक्षीय रणनीति पर अटक गया। यूएई ने तो स्पष्ट ही कहा कि यह भारत का आंतरिक मामला है। रूस ने भी यही दोहराया। चीन लद्दाख के मुद्दे पर जरूर कुछ खाँसता रहा, लेकिन कुल मिलाकर वह द्विपक्षीय बातचीत के गिर्द घूमने लगा। यहाँ तक कि एक भी अरब देश ने इस मामले पर पाकिस्तान का समर्थन करना उचित नहीं समझा। पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र संघ में मामला ले जाने की बात कहने जरूर लगा है, लेकिन जमीनी हालात को देखते हुए कहा जा सकता है, वह वहाँ अकेला ही रिरियाते हुए पकड़ा जाएगा। मोटे तौर पर वर्तमान अंतरराष्ट्रीय राजनीति की विवशताएँ या यथार्थ के चलते पाकिस्तान इस मामले में अकेला रह गया है। कोई भी देश आखिर यह कैसे कह सकता है कि भारतीय संसद् अपने संविधान में वैधानिक ढंग से हस्तक्षेप नहीं कर सकती। इसी प्रकार के तर्क लेकर एक सज्जन अनुच्छेद ३७० की घरवापसी के लिए उच्चतम न्यायालय तक जा पहुँचे। वे न्यायालय से गुहार लगा रहे थे कि उनकी याचिका को आपातकालीन मानकर तुरंत सुनवाई की जाए। उनको डर था कि तब तक पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र संघ पहुँच जाएगा। तब न्यायाधीश ने पूछा कि संयुक्त राष्ट्र क्या भारतीय संसद् द्वारा पारित किए गए पर स्थगन आदेश जारी कर देगा? स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र भारत के आंतरिक संसदीय मामलों में तो दखलंदाजी नहीं कर सकता। वैसे भी अब वे दिन हवा हो गए हैं, जब भारत ‘कमजोर की जोरू सब की भाभी’ हुआ करती थी। अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में पाकिस्तान अकेला पड़ गया था कि तभी उसे एक ऐसे इलाके से सहायता मिली, जिसकी उसने कल्पना भी न की होगी।

पाकिस्तान को सहायता या कुमुद पहुँचाने वाला यह समूह सोनिया कांग्रेस का पाकिस्तान सैल कहा जा सकता है। अपनी भाषा में पार्टी शायद उसे अपना अंतरराष्ट्रीय सैल ही कहती होगी। लेकिन लगता है उसकी पूरी रणनीति इस संकट काल में किसी भी तरह पाकिस्तान को अनुच्छेद ३७० के मुद्दे पर निरंतर सहायता पहुँचाते रहना है, ताकि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कहीं पाकिस्तान निराश होकर अनुच्छेद ३७० का मुद्दा छोड़ न दे।

पाकिस्तान को सहायता या कुमुद पहुँचाने वाला यह समूह सोनिया कांग्रेस का पाकिस्तान सैल कहा जा सकता है। अपनी भाषा में पार्टी शायद उसे अपना अंतरराष्ट्रीय सैल ही कहती होगी। लेकिन लगता है उसकी पूरी रणनीति इस संकट काल में किसी भी तरह पाकिस्तान को अनुच्छेद ३७० के मुद्दे पर निरंतर सहायता पहुँचाते रहना है, ताकि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कहीं पाकिस्तान निराश होकर अनुच्छेद ३७० का मुद्दा छोड़ न दे।

इस अभियान की शुरुआत स्वयं राहुल गांधी ने की। उन्हें इसके लिए सहायता बी.बी.सी. इत्यादि ने मुहैया करवाई। बी.बी.सी. इस समय पूरी निष्ठा से ये अफवाहें फैलाने में लगा हुआ है। न्यूयॉर्क टाइम्स यही काम अपने संपादकीय लेखों के माध्यम से कर रहा है। राहुल गांधी ने कहा कि कश्मीर घाटी में लोग प्रदर्शन कर रहे हैं और लोग विद्रोह पर उतर आए हैं। सरकार वहाँ लोगों का दमन कर रही है। चिदंबरम ने इस मामले को और आगे बढ़ाया, उसने कहा कि जम्मू-कश्मीर यदि हिंदू बहुल होता तो मोदी सरकार उस ओर देखती भी नहीं। जम्मू-कश्मीर को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है कि वहाँ मुसलमान रहते हैं। उनके अनुसार कश्मीर में तानाशाही है और लोकतंत्र का गला लगभग दबा ही दिया गया है। दिग्विजय उससे भी आगे गए। उनका भारतीय मीडिया पर विश्वास नहीं है। उनके अनुसार यह बिका हुआ है। कश्मीर का सच जानना है तो एक बार ब्रिटेन की शरण में ही जाना होगा। कश्मीर की असली हालत वहीं से जानी जा सकती है। वहाँ बीबीसी डॉट काम कश्मीर के बारे में बता रहा है। दिग्विजय के अनुसार वहाँ से पता चल रहा है कि कश्मीर को किस प्रकार एक बड़ी जेल में बदल दिया गया है। फिर अंत में शशि थरूर नमूदार हुए। उनका कहना था कि मोदी सरकार ने कश्मीर को फिलस्तीन में बदल लिया है और भारत से कश्मीर छिन जाएगा।

पाकिस्तान जिस सहायता के लिए दुनिया भर में गुहार लगा रहा था और वह उसे मिल नहीं रही थी, वही सहायता उसे भारत के ही सबसे पुराने राजनैतिक दल से प्राप्त हुई। अंधा क्या माँगे दो आँखें! आज पाकिस्तान की सरकार और उसका मीडिया सोनिया कांग्रेस के इन्हीं नेताओं के बयानों का ढोल पीट रहा है। यह स्थिति तब है जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान कह रहे हैं कि अनुच्छेद ३७० के मामले पर उनका देश किसी भी हद तक जा सकता है। उसने कहा है कि अब फिर से पुलवामा जैसे आतंकी आक्रमण हो सकते हैं। पाकिस्तान ने सीमा पर युद्धास्त्र लाने शुरू कर दिए हैं। आतंकियों को वह भारत में घुसाने की फिराक में है। समझौता एक्सप्रेस और स्ती की बस वापस आ गई हैं। इस्लामाबाद ने १३ भारतीय राजनयिकों को वापस भेज दिया है और भारत से राजनयिक संबंधों का दर्जा कम कर दिया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान को जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद ३७० बना रहने से कितना राजनैतिक, कूटनीति और सामरिक लाभ मिलता होगा, जिसके छिन जाने से वह इतना बौखलाया हुआ है।

दरअसल अनुच्छेद ३७० उस जमीन में से पैदा हुआ था, जिसकी जुताई पंडित जवाहर लाल नहरू और माउंटबेटन दंपती के संयुक्त षड्यंत्र ने की थी। माउंटबेटन दंपती पूरा जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान को देने के लिए प्रयासरत थे। उनके लिए यह प्रश्न ब्रिटेन के भविष्य की रणनीति और पाकिस्तान के भविष्य से जुड़ा हुआ था। लेकिन इसके रास्ते में उस समय के जम्मू-कश्मीर नरेश महाराजा हरि सिंह चट्टान बनकर खड़े थे। अब माउंटबेटन दंपती के पास एक ही रास्ता बचा था, पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर पर हमला कर उसे हथिया ले और भारत उसका विरोध न करे। यह आसान रास्ता था, क्योंकि उस समय भारत की सेना के प्रमुख और पाकिस्तान की सेना के प्रमुख अंग्रेज ही थे और दोनों ब्रिटेन के हितों के संरक्षण हेतु निष्ठावान थे। उन दिनों ब्रिटेन का हित पाकिस्तान को लाभ पहुँचाने और भारत के स्थल मार्ग को शेष विश्व, खासकर मध्य एशिया से काटने में ही था। यह तभी संभव था, यदि जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान में चला जाता। इसके लिए पाकिस्तान ने कबायलियों की आड़ में जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया, यहाँ तक तो सब ठीक चला, लेकिन भला नेहरू इसका विरोध न करें, यह कैसे संभव हो सकता था?

माउंटबेटन दंपती जानते थे कि नेहरू तब तक जम्मू-कश्मीर में सेना नहीं भेजेंगे, जब तक महाराजा हरि सिंह नेहरू के मित्र शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को सत्ता नहीं सौंप देंगे। नेहरू सचमुच इस बात पर अड़ गए। उस समय माउंटबेटन दंपती की खुशी का अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन महाराजा हरि सिंह को राज्य का प्रशासक बनाकर माउंटबेटन दंपती का यह तुरुप का पत्ता भी छीन लिया। देश की सेना जम्मू-कश्मीर में गई और उसने विपरीत परिस्थितियों में भी आक्रांताओं को पीछे खदेड़ना शुरू कर दिया। अब माउंटबेटन दंपती की सारी योजना धरी-धराई रह गई। परंतु माउंटबेटन दंपती नेहरू के साथ इतने लंबे अंतरंग संसर्ग से एक बात समझ गए थे कि उनकी दो कमजोरियाँ हैं। पहली अंतरराष्ट्रवाद और दूसरा हिंदू-मुसलिम के नाम का सैक्युलिरिज्म। नेहरू मामूली से घरेलू प्रश्न को भी अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाकर बच्चों की तरह उससे खेलते थे। उस पर नृत्य करते थे। ने चाहते थे कि देश के लोग उन्हें अंतरराष्ट्रीय धुनों पर थिरकते देखें। माउंटबेटन दंपती ने उनकी इसी कमजोरी का लाभ उठाकर उन्हें समझाया कि वे जम्मू-कश्मीर के प्रश्न को सुरक्षा परिषद् में ले जाएँ और परिषद् को बताएँ कि जम्मू-कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच विवादास्पद प्रश्न है, दरअसल सुरक्षा परिषद् इसका निर्णय करे।

माउंटबेटन दंपती ने कमजोरी के इन क्षणों में नेहरू को विश्वास दिला दिया कि भारत का पक्ष इस मामले में मजबूत है, इसलिए सुरक्षा परिषद् में भारत जीत जाएगा और नेहरू की अंतरराष्ट्रीय छवि को चार चाँद लग जाएँगे। नेहरू माउंटबेटन दंपती के इस धोखे में आ गए और सरदार पटेल के विरोध के बावजूद मामला सुरक्षा परिषद् में ले गए। सुरक्षा परिषद् में ब्रिटेन की साम्राज्यवादी ताकतों के लिए सबसे अहम प्रश्न था कि किसी तरह भारतीय सेना आगे बढ़ने से रुक जाए, ताकि जम्मू-कश्मीर का सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्षेत्र पाकिस्तान के कब्जे में ही रहने दिया जाए। यह ब्रिटेन की भविष्य की रणनीति का हिस्सा था। लेकिन इसके लिए नेहरू को तैयार करना तो शायद माउंटबेटन दंपती के लिए भी मुश्किल था। इस मोड़ पर माउंटबेटन दंपती ने नेहरू को खेलने के लिए उनकी मनपसंद का दूसरा खिलौना दिया। हिंदू-मुसलिम यानी सैक्युलिरिज्म का खिलौना। माउंटबेटन दंपती ने नेहरू को समझाया कि जम्मू-कश्मीर राज्य मुसलिम बहुल प्रदेश है। यदि मुसलमान स्वयं आकर उन्हें कहें कि वे भारत में ही रहना चाहते हैं तो नेहरू की कितनी बड़ी जीत होगी। यह जिन्ना के मुँह पर तमाचा होगा और नेहरू की अंतरराष्ट्रीय छवि आकाश को भी चीरकर पंख देगी। इस मरहले पर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला पेश किए गए।

शेख मोहम्मद अब्दुल्ला कह रहे हैं कि हम दो राष्ट्र सिद्धांत के खिलाफ हैं और भारत के साथ रहना चाहते हैं। नेहरू प्रसन्न हुए, किरपा आनी शुरू हुई और उन्होंने युद्ध विराम की घोषणा कर दी। सामरिक लिहाज से सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में ही रहा। अपना काम निपटाकर और नेहरू के हाथ में दो खिलौने पकड़ाकर माउंटबेटन दंपती अपने वतन वापस चले गए। जम्मू-कश्मीर को लेकर मोटा-मोटा काम उन्होंने निपटा दिया था। लेकिन अभी भी एक पेंच फँसा हुआ था। संघीय संविधान सारे देश पर लागू होनेवाला था। यदि वह जम्मू-कश्मीर पर भी लागू हो गया तो माउंटबेटन दंपती की सारी मेहनत बेकार चली जाती। रणनीति तो किसी तरह जम्मू-कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच विवादास्पद क्षेत्र दिखाना था, ताकि निर्णय का अधिकार सुरक्षा परिषद् के हाथ रहे और वह समय-असमय भारत की बाँह इसी बहाने मरोड़ता रहे। इस मरहले पर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला सक्रिय हुए। अनुच्छेद ३७० की कल्पना की गई। तर्क भी यही दिया गया कि जम्मू-कश्मीर में अभी विवाद चला हुआ है। मामला सुरक्षा परिषद् में लंबित है। इसलिए अभी संघीय संविधान वहाँ लागू नहीं किया जाना चाहिए, नहीं तो अंतरराष्ट्रीय जगत् में भारत की छवि खराब होगी।

स्पष्ट था, माउंटबेटन दंपती जो खिलौना नेहरू को दे गए थे, वे उसे कुशलता से बजा रहे थे। लेकिन सुरक्षा परिषद् में निश्चय ही भारत जीतेगा और तब पूरा संविधान जम्मू-कश्मीर में भी लागू हो जाएगा। इसलिए अनुच्छेद ३७० अस्थायी है। लेकिन शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने पूरे प्रश्न को हिंदू-मुसलिम शब्दावली में ही गाया। नेहरू ने भी अपनी प्रकृति और स्वभाव के अनुसार इसे हिंदू-मुसलिम का प्रश्न बनाकर तथाकथित सैक्युलरिजम की धुनों से जोड़ दिया, जबकि इस प्रश्न के और अनेक पहलू हो सकते हैं, लेकिन हिंदू-मुसलिम की अवधारणा से इसका कुछ लेना-देना नहीं है। इंदिरा गांधी समझ गई थीं कि उनके पिता जम्मू-कश्मीर के मामले में माउंटबेटन दंपती के षड्यंत्र का शिकार हो गए थे। बेटी को अपने बाप के इस पाप को किसी भी तरह धोना था। इंदिरा गांधी को जैसे ही इसका पहला अवसर मिला, उन्होंने शिमला समझौता में जम्मू-कश्मीर पर से अंतरराष्ट्रीयता का मुलम्मा उतार दिया और पाँच अगस्त को अनुच्छेद ३७० को निरस्त कर मोदी सरकार ने माउंटबेटन दंपती और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला द्वारा शुरू किए गए इस राष्ट्रघाती प्रकरण को सदा के लिए समाप्त कर दिया। चाहिए तो यह था कि इंदिरा गांधी की विरासत को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस इसका समर्थन करती।

लेकिन आश्चर्य की बात है कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस इंदिरा गांधी की विरासत को छोड़कर आज भी उसी षड्यंत्र को स्थायी रखने के प्रयास में अडिग दिखाई दे रही है, जिसके बीज माउंटबेटन दंपती ने बोए थे। पाकिस्तान को आज जिस समर्थन व तर्कों की सबसे ज्यादा जरूरत थी, वे सभी उसे सोनिया कांग्रेस भारत में ही बैठकर मुहैया करवा रही है। दरअसल सोनिया कांग्रेस ने इसकी शुरुआत छह अगस्त को राज्यसभा में ही कर दी थी, जब गृहमंत्री अमित शाह ने अनुच्छेद ३७० को लेकर संकल्प प्रस्तुत किया था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद और अधीर रंजन चौधरी ने संसद् में इस विषय को लेकर जो भाषण दिया था, यदि उसके भाषणकर्ता के नाम की घोषणा न की जाए तो उसे कोई भी किसी पाकिस्तानी प्रतिनिधि का भाषण कह सकता है।

यह स्थिति १९४८ में सुरक्षा परिषद् में भी पैदा हुई थी, जब भारत के प्रतिनिधि गोपालस्वामी आयंगर परिषद् में भारत का पक्ष रख रहे थे। तब किसी ने टिप्पणी की थी कि यदि श्रोता को यह न पता हो कि बोलनेवाला भारत का प्रतिनिधि है, तो वह इनके भाषण को सुनकर सही कहेगा कि पाकिस्तान का प्रतिनिधि बोल रहा है। आज ७९ साल बाद भी कांग्रेस वहीं कि वहीं खड़ी है, जबकि देश बहुत आगे निकल गया है। ऐसे समय में सारे देश को एक साथ होना चाहिए था। लेकिन सोनिया कांग्रेस इस समय भी पाकिस्तान के साथ जा खड़ी हुई है और उसके सभी वरिष्ठ नेता वही भाषा बोल रहे हैं, जो पाकिस्तान बोल रहा है।

 

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कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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