लाडो की विदाई

शादी ठीक से निपट गई थी और अब विदाई हो रही थी। माँग में सिंदूर, माथे पर बिंदिया, पैरों में आलता, गहनों से लदी लाडो ने आईने में निहारा तो खुद पर मुग्ध हो गई, लेकिन घर की दहलीज से बाहर आते हुए रो पड़ी। एक-एक कदम आगे बढ़ाना उसे भारी लग रहा था। अभी तक सब रस्में वह हँसते-हँसते निभा रही थी, लेकिन इस पल अंदर से जैसे आवाज आई—‘अब ससुराल ही उसका घर होगा। सबकुछ छूट रहा है—घर-अँगना, खिलौने, सखियाँ, बचपन की यादें।’ पिता को जार-जार रोते हुए पहली बार देखा तो उसकी आँखें भी बरस पड़ीं।

बुआ ने कहा, ‘‘लाडो, अपनी हथेलियों में ये चावल व गेहूँ ले तथा अपने ऊपर से पीछे की तरफ बिखेर दे और बोल, ‘माँ, आज तक जो भी तुम्हारे यहाँ खाया-पहना, सब यहीं छोड़े जा रही हूँ।’’’

बड़ी सी नथ को सँभालते हुए लाडो धीमे स्वर में बोली, ‘‘बुआ, क्या कह रही हो; भला ऐसा कैसे हो सकता है? मैं यह नहीं कहूँगी।’’

‘‘लाडो, कहना माना करो। इसका बहुत गहरा मतलब होवे है। मैंने, तेरी माँ ने, दादी-नानी, सबने अपनी ससुराल को विदा होते हुए यही कहा था। यह रीत है। चल, जल्दी निभा, विदाई का मुहूर्त निकला जा रहा है।’’

लाडो अपने को मुश्किल से सँभाल पा रही थी। भीगी आँखों और रुँधे गले से अटकते-अटकते हुए बोली, ‘‘माँ! मैंने जो भी...तेरे यहाँ खाया-पिया...पहना-ओढ़ा है...’’ फिर रुलाई फूट पड़ी। तनिक रुककर धीमी आवाज में बोली, ‘‘उसका कर्ज जीवन भर नहीं उतार सकती।’’

बुआ को रीत टूटने से एक बार गुस्सा तो आया, लेकिन फिर बड़े प्यार से लाड़ो के सिर को चूमते हुए भीगी आँखों से बोली, ‘‘लाडो, बिल्कुल सच कहा तूने। मैं चाहकर भी ऐसा न कह सकी थी।’’

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सविता इंद्र गुप्ता

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