पाँच तारीख

पाँच तारीख

लेखक व फिल्म निर्माता। हिंदी और अंग्रेजी पर समान अधिकार। ‘अजनबी शहर अजनबी रास्ते’ (यात्रा संस्मरण), ‘बंद खिड़की से टकराती चीख’ (कहानी-संग्रह) तथा ‘सरहद जीरो मील’ एवं अंग्रेजी में कई शोधपरक पुस्तकों का लेखन। देश-विदेश में भारतीय कला और संस्कृति पर व्याख्यान। संप्रति वेदांत पर गहराई से अध्ययनरत।

सुबह नाश्ते में उसके सामने पूड़ी और भुजिया के साथ सेवई की कटोरी रख दी गई तो उसने समझ लिया कि आज पाँच तारीख है। हर महीने की पाँच तारीख को अगर छुट्टी न हुई तो उसे बैंक जाना होता है। यह सिलसिला सालों से यों ही चल रहा है। बल्कि यह कहें कि जब से वह पेंशनयाफ्ता हुआ है, तब से ही।

अपने पोपले मुँह में पूड़ी को नरम करने के लिए उसे सेवई साथ-साथ खानी पड़ती है। और दिन चाहे जो भी होता हो, पर आज के दिन तो उसे दूसरी परसन भी मिलती है। गरमागरम पूड़ियों के साथ भुजिया और सेवई का आनंद कोई उससे पूछे। इस एक दिन वह छककर खा लेता है।

आज भी जब वह खा रहा था तो उसकी नजरें परसन पर ही लगी हुई थीं। छोटी बहू पूड़ियाँ तलने में लगी थी और मझली उसे एक-एक कर पूड़ियाँ परोसती जाती थी। पेट तो उसका भर गया, पर मन न अघाया था। उसे छोटी बहू की आवाज सुनाई पड़ी—‘और कितना खाएँगे बाबूजी?’

मझली बोली, ‘तले जाओ, पेट नहीं, घड़ा जो है।’

इन तानों का अब उसपर कोई असर नहीं होता था। पेट घड़ा हो, न हो, मन तो उलटा घड़ा जरूर हो गया था, चिकना घड़ा। पत्नी को गुजरे चार साल बीत चुके थे। उसके रहते वह अपनी मनमरजी चला भी लेता था, पर अब तो उसकी पसंदगी-नापसंदगी का खयाल रखनेवाला कोई नहीं था।

ऐसे में इस पाँच तारीख का उसकी जिंदगी में वही महत्त्व था, जो चातक के लिए स्वाति नक्षत्र का। पूड़ियों के छनने की आवाज थम गई तो उसने समझ लिया कि अब बस हो चला है। मन समझ ले तो समझ ले, पर यह चटोरी जीभ भला कहाँ मानती है। फिसल ही तो गई—‘थोड़ा सेवई और मिलेगा बहू?’

‘हाँ, हाँ! काहे नहीं! बेटा आपका आ ही रहा है नाश्ता करने, उसके साथ एक बार फिर और जिम लीजिएगा आप भी।’ मझली ने ताना मारते हुए कहा।

इसके बाद वह वहाँ बैठा न रह सका। उठा, अपनी थाली उठाई और आँगन के किनारे लगे हैंडपंप पर लगा उसे धोने। उसे याद है, दीवाली पर मिले बोनस के पैसों से उसने यह हैंडपंप लगवाया था। इस बात को छह-सात सात तो जरूर हो गए। इसके बाद किसी ने उसका वाशर तक नहीं बदला।

खड़खड़ाते हैंडपंप के चलने की आवाज के बीच उसे मोतिया का कुंकियाना सुनाई पड़ा। कोई और दिन होता तो वह अपनी थाली में बच रही चीकट रोटी को उसके सामने रख आता, पर आज पाँच तारीख को तो उसकी थाली बिना धोए ही शीशे के मानिंद दिखाई पड़ती है, एकदम चमाचम।

जूठी थाली धोकर उसने कोने में रख दी और फिर अपनी कोठरी की तरफ बढ़ गया। एक-एक कमरा जोड़कर उसने यह छोटा सा मकान पूरा किया था। किरानी की नौकरी में वेतन ठीक-ठाक मिल जाता था, फिर भी पासबुक में पैसे जमा नहीं रह पाते थे। वेतन का एक हिस्सा खान-पान और मकान भाड़े पर निकल जाता तो एक हिस्सा बच्चों की पढ़ाई पर। कभी-कभार कुछ बचता भी तो न जाने कैसे किसी-न-किसी बच्चे को कोई बीमारी दबोच लेती और बचे हुए पैसे उसमें निकल जाते थे। बीबी चाहती थी कि शहर में उनका अपना घर हो, पर बीबी को समझा-बुझाकर उसने गाँव में अपने हिस्से की जमीन पर नया मकान बना लिया।

अपने तीनों बेटों को उसने अपने हिसाब से अच्छा पढ़ाया था, शहर के इंगलिश स्कूल में। भले ही बेटी की पढ़ाई उसे बीच में ही छुड़वा देनी पड़ी थी। बेटी ने कभी शिकायत नहीं की, और बेटों ने कभी उपकार नहीं माना। बड़े बेटे को नौकरी दिलाने के लिए उसे अपना पी.एफ. निकालना पड़ा और नौकरी के लगते ही वह अपनी बीबी-बच्चों को लेकर अलग हो गया।

रिटायरमेंट पर मिली पी.एफ. की शेष राशि से उसने बेटी की शादी कर दी, लेकिन भाइयों को यह नागवार गुजरा। इसे लेकर आज भी वे फब्तियाँ कसते हैं—‘बेटी के हाथ पीले करने में आपने जो इतने पैसे खर्च डाले, उनसे हमें नौकरी नहीं दिला सकते थे क्या? कुछ और नहीं तो शहर में रुक ही जाते रिटायर होने के बाद। हम खुद से ही वहाँ कुछ नहीं कर लेते क्या?’

पहले तो वह उन्हें तर्क देकर चुप कराने की कोशिश भी करता था, पर अब खुद चुप रह जाता है। बेटों की देखा-देखी बहुएँ भी बोलने लगी हैं अब तो। गनीमत इतनी भर है कि बेटों की तरह वे सीधे-सीधे उसे संबोधित नहीं करतीं, बल्कि एक-दूसरे से ऐसे बोलती हैं कि सुनाई उसे ही पड़े। किस-किस के मुँह लगे वह।

कोई और दिन होता तो कोठरी में उसके जाते ही उसे भुला दिया जाता, पर आज मझला बेटा उसके लिए कोठरी के बाहर इंतजार कर रहा था—‘बाबूजी, तैयार होने में औउर देर है का?’

बेटे की हाँक सुनकर जल्दी से उसने चप्पल डालनी चाही तो उसका फीता फाँस से निकल गया। काँपते हाथों से वह जब तक फीता कसता, बेटे की आवाज फिर से सुनाई पड़ी, ‘माँ के पास थोड़े ही ना जा रहे हैं अभिए, जो लगे सजने-सँवरने। केतना देर औउर बाहर खड़ा कराएँगे हमको?’

बिना कुछ बोले वह बेटे के पीछे-पीछे घर से निकल गया। दरवाजे पर रिक्शावान खड़ा था, हरेक पाँच तारीख के जैसे। रिक्शा पर चढ़ते-चढ़ते उसको अपना पेट फूलता हुआ महसूस हुआ। बड़े ही झिझक के साथ उसने बेटे से कहा, ‘थोड़ा रुक जाते तो हम मैदान हो लेते जरा।’

बेटे ने गुरेरकर उनकी तरफ देखा और गुर्राते स्वर में कहा, ‘इतना जो भखिएगा तो यही होगा ना। पहले ही आप बड़ी देर कर चुके हैं। अब चलिए भी। देर हो गया तो लाइन लंबा लग जाएगा वहाँ पर। लौटकर चले जाइएगा दिसा-मैदान।’

पेट दबाकर वह रिक्शे पर चढ़ बैठा। दूसरी तरफ से बेटा आकर बैठ रहा। इसके साथ ही रिक्शा चल पड़ा। बताने की जरूरत उसे नहीं थी कि कहाँ जाना है। पाँच तारीख को पिछले कई सालों से यही सिलसिला जो चल रहा था। खुद ही रिक्शावान सुबह नौ बजे उनके घर के आगे रिक्शा लगा देता। उसे दस मिनट भी इंतजार नहीं करना पड़ता था और बाप-बेटे घर से बाहर निकलकर उसके रिक्शे पर बैठ रहते थे।

न बताने की जरूरत पड़ती थी और न ही पूछने की। स्टेट बैंक के सामने रिक्शा लगाते ही बाप-बेटा उतर जाते थे और फिर आध-पौन घंटे बाद वे बाहर निकलते तो बाप अकेला ही घर लौटता था। रास्ते में हलवाई की दुकान पर जरूर रुकता था। खुद भी जलेबी खाता और रिक्शावान को भी खिलाता था। फिर दोनों चाय पीते। बाप हलवाई की तरफ सौ का नोट सरका देता था और बाकी के रुपए लेकर फिर रिक्शे पर सवार हो जाता था। घर पर उतरने पर रिक्शावान के हाथ में वह बाकी के सारे रुपए थमा देता था। पूरे साठ रुपए होते थे वे। रिक्शावान कहता भी कि इतने पैसे थोड़े ही न हुए, पर वह यह कहकर उसे चुप करा देता था कि अब जबकि उसे घर से कहीं निकलना ही नहीं तो वह खुद इन पैसों का करेगा क्या?

आज भी स्टेट बैंक पर रुकते ही बेटा छलाँग मारकर रिक्शे से उतर पड़ा। हमेशा की तरह बाप को रिक्शावान ने सहारा देकर उतारा। उतरने में उसकी चप्पल का फीता फिर से निकल गया। उसने रुककर फीता लगा लेना चाहा तो बेटे ने कड़ककर कहा, ‘अब चलिएगा भी कि यहीं समाधि लगाइएगा?’

यह सुनकर वह हाथ में चप्पल पकड़े हुए ही बेटे के पीछे लपक पड़ा। बेटे ने फिर डपटा, ‘बुढ़ा गए, पर चप्पल पहनने का सऊर नहीं आया।’

चप्पल को अपने पैरों में किसी तरह फँसाकर वह घिसटते कदमों से फिर बढ़ चला। हमेशा की तरह आज भी बैंक में बड़ी भीड़ थी। जितने पेंशनभोगियों का खाता इस बैंक शाखा में था, उन सभी को आना पड़ता था अपने जीवित होने का प्रमाण बनकर। ज्यादातर के बेटे भी उनके साथ होते थे। बैंक को तो वे अपने जीवित होने का प्रमाण देते ही थे, अपने साथियों के जीवित होने की खबर भी उन्हें लग जाती थी। नहीं तो और किसी दिन उनका मिलना-जुलना कहाँ हो पाता था! वैसे बात तो आज के दिन भी कोई किसी से नहीं कर पाता था। बात करता भी तो करता क्या? सबकी एक सी जिंदगी थी और एक सा दर्द।

जीवित होने की पुष्टि के तौर पर उसके दस्तखत करते ही रुपए उसके हाथ में दे दिए गए, पर गिनती करने के लिए बेटे ने उनसे तुरंत ले भी लिये। दो हजार, चार हजार, छह हजार, आठ हजार, साढ़े आठ हजार और ये नौ हजार। दो-दो हजार के चार कड़कड़ाते नोट और पाँच-पाँच सौ के दो नए नोट। बेटे ने साधिकार वे रुपए अपनी जेब में डाल लिये। यह भी हमेशा की तरह ही। फिर अपनी ढोकली में से कुछ तुड़े-मुड़े नोट निकालकर पिता की हथेली में डाल दिए। चश्मे के टूटे शीशे को धोती की कोर से साफ करते हुए उसने देखा, एक नोट की जगह पर चार नोट थे आज। दस, बीस, तीस, पचास। उसने तुरंत फिर गिना। दस...बीस...तीस...पचास। नहीं, उससे गिनने में कोई गलती नहीं हुई थी। दस-दस के तीन नोट और बीस का एक नोट, कुल इतने ही थे।

उसके पैसे गिनते-गिनते तक बेटा बैंक से निकल चुका था। इतने पैसों में जलेबी और चाय की सोचना भी फिजूल था। वैसे भी उसका पेट फिर से गुड़गुड़ाने लगा था। बाहर निकला तो रिक्शावान उसके इंतजार में खड़ा था। बिना कुछ कहे ही उसने रिक्शावान को सारे रुपए पकड़ा दिए और खुद पैदल चल पड़ा। रिक्शावान बिना कुछ समझे ही उसे उलटी दिशा में जाते हुए देखता रहा। शायद उसकी आँखों को धोखा हुआ हो, पर बाबूजी की मटमैली धोती पर उसे पीला बदबूदार रंग चढ़ता दिखाई दिया। वह अबूझ उन्हें यों ही जाते हुए देखता रहा।

इसके बाद पाँच तारीख को उनके घर में कभी पूड़ी-भुजिया और सेवई बनाने की जरूरत नहीं हुई और न ही रिक्शे की।

१४०२ त्रिशूल, कौशांबी, गाजियाबाद-२०१०१०

दूरभाष : ९२१२३७०७११
रंजन कुमार सिंह

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