अनुच्छेद ३७० निरस्त : एक ऐतिहासिक निर्णय

रेंद्र मोदी सरकार द्वारा संविधान के ३७० अनुच्छेद को निरस्त करने के निर्णय के उपरांत देश में काफी विवाद प्रारंभ हो गया। इस महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक निर्णय के दूरगामी प्रभावों एवं किन परिस्थितियों में ३७० अनुच्छेद संविधान में शामिल किया गया था, का उचित आकलन इस विवाद के वातावरण में नहीं हो पा रहा है। समाचार-पत्रों में पक्ष और विपक्ष में नित्यप्रति लेख प्रकाशित हो रहे हैं। यद्यपि कहने के लिए विरोध करनेवालों के द्वारा कानूनी तर्क दिए जा रहे हैं, किंतु उनपर वोटबैंक की राजनीति एवं विरोधी दलों की अपनी-अपनी असफलताओं की छाया स्पष्ट दिखाई देती है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि विरोधी दलों में बहुजन समाज पार्टी ने सरकार के निर्णय का स्वागत किया, किंतु समाजवादी पार्टी, डी.एम.के., तृणमूल कांग्रेस ने विरोध किया। बीजू जनता दल, जो एन.डी.ए. में शामिल नहीं है, ने भी इसका समर्थन किया। आश्चर्य की बात है कि केजरीवाल और उनकी पार्टी ने भी अनुच्छेद ३७० तथा ३५ए के निरस्त करने में सहमति प्रकट की और संसद् में भी समर्थन किया। प्रायः सभी विरोधी पार्टियों में काफी लोग ३७० हटाने के निर्णय का स्वागत कर रहे हैं। एन.पी.सी. के अध्यक्ष स्वयं शरद पवार ने इसकी आलोचना की, वहीं उनके भतीजे और दो नंबर के नेता अजित पवार ने निर्णय का समर्थन किया। कांग्रेस में सबसे अधिक तिलमिलाहट थी। कांग्रेस के बहुत से नए व युवा तथा पुराने नेताओं ने अपने-अपने ढंग से मोदी सरकार के निर्णय का स्वागत किया।

इस पूरे मामले से प्रारंभ से जुड़े रहे, जम्मू-कशमीर के सदरे रियासत रहे और बाद में राज्यपाल रहे डॉ. कर्ण सिंह ने इस निर्णय का स्वागत किया। कांग्रेस पार्टी के लोकसभा में नेता अधीर चौधरी ने तो जम्मू-कश्मीर के मामले को अंतरराष्ट्रीय विवादास्पद मामला कहकर सोनिया गांधी को भी भौंचक्का कर दिया, क्योंकि कांग्रेस का स्टैंड भी शिमला समझौते के बाद से रहा ही है कि यह विवाद भारत और पाकिस्तान के बीच का है और इसे आपसी बातचीत द्वारा ही सुलझाया जा सकता है। किसी तीसरे देश के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। बाद में अधीर चौधरी अपनी सफाई देते रहे कि उनको गलत समझा गया। उनका मंतव्य दूसरा था। मजे की बात यह है कि एन.डी.ए. का राज्यसभा में बहुमत न होते हुए भी यह बिल आसानी से और अच्छे मतों से पारित हो गया। कांग्रेस के अधिकतर और अन्य सांसद भी चाहते थे कि अनुच्छेद ३७० निरस्त हो जाए। वे भी जानते थे कि देश की जनता वास्तव में क्या चाहती है। देश के मूड़ का आकलन करनेवाले टी.वी. चैनलों पर आ रहे नतीजों से यह स्पष्ट हो जाता है।

देश की जनता भली-भाँति जानती है कि देश की अखंडता, एकता और समता की दृष्टि से यह एक महत्त्वपूर्ण कदम है। अनुच्छेद ३७० के माध्यम से एक विशेष दर्जा या स्पेशल स्टेटस की बात करके केवल अलगाववाद की मानसिकता को ही बल मिलता रहा है। जम्मू-कश्मीर भारत के अभिन्न भाग हैं। इस भावना का प्रतिरोध ही हो रहा था। अनुच्छेद ३७० के समाप्त हो जाने के कारण पूरे भारत के नागरिक एक हैं, उनके अधिकार एक से हैं, दायित्व एक से हैं, यह भावना मजबूती और शीघ्रता से पनपने लगेगी। गृहमंत्री अमित शाह ने इस संबंध में दोनों सदनों में इस बात को बहुत अच्छी तरह रखा भी। ३५ए का निरस्त होना भी लाजिमी था। यह एक विचित्र प्रावधान था, जिसके अंतर्गत जम्मू-कश्मीर का निवासी यदि गैर-कश्मीरी के साथ शादी करता तो उसकी जायदाद उसी की बनी रहती और उसकी संतान भी हकदार होती, किंतु यदि एक कश्मीरी लड़की किसी दूसरे राज्य के निवासी से विवाह करती तो उसको अपनी पैतृक जायदाद से वंचित होना पड़ेगा। जब भारत ब्रिटिश राज्य और देशी राज्यों में बँटा था, तब तरह की भेदभाव वाली व्यवस्था को कोई औचित्य रहा होगा। अब जब भारत का संविधान हर नागरिक को समान अधिकार देता है, तो इस प्रकार का भेदभाव कब तक बर्दाश्त किया जा सकता। यह कश्मीर की महिलाओं के प्रति सरासर अन्याय था। यही नहीं, जम्मू-कश्मीर का रहनेवाला अब सच्चे मायने में भारतीय नागरिक है, चाहे महिला हो, चाहे पुरुष हो। अब उसके वही अधिकार हैं, जो देश में कहीं भी रहनेवाले भारतीय नागरिक के हैं। बहुत से कानून जो नागरिकों के हित में हैं, जैसे शिक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार, जो देश के अन्य भागों में नागरिकों को उपलब्ध हैं, वे जम्मू-कश्मीर में अभी तक वहाँ के नागरिकों को प्राप्त नहीं थे। अब वहाँ का नागरिक एक संकुचित दायरे से निकलकर बड़ी और खुली हवा के वातावरण में साँस ले सकता है।

पाकिस्तान के जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण के बाद जब वहाँ के महाराज हरि सिंह ने भारत में शामिल होने के दस्तावेज पर दस्तखत कर दिए, तभी भारत की सेनाएँ संवैधानिक रूप से जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा के लिए भेजी जा सकीं, और बड़ी कठिनाइयों का सामना करते हुए, अपनी जान की बाजी लगाकर भारतीय सैनिकों ने जम्मू-कश्मीर को सुरक्षा प्रदान की। क्या इस बलिदान की कोई कीमत हो सकती है? भारत ने उसके उपरांत करोड़ों नहीं, अरबों की संख्या में धन जम्मू-कश्मीर के विकास के लिए उपलब्ध कराया तथा वहाँ का विकास हो, वहाँ के गरीब, वंचित और निःसहाय निवासियों को राहत मिले, परंतु उस धन का लाभ गरीब जनता को तो थोड़ा-बहुत ही मिला, लेकिन वहाँ सत्ता पर काबिज महानुभाव मालामाल हो गए। यही नहीं, समय-समय पर जनता के असंतोष के नाम पर केंद्र सरकार से अधिक धनराशि की माँग करते रहे। जनता के लिए आए इस धन के दुरुपयोग पर न कोई रोक लगी और न किसी प्रकार की जिम्मेदारी तय करने के लिए प्रयत्न हुए। किस प्रकार दो-तीन परिवार सत्ता के बल पर मालामाल हो गए, जम्मू-कश्मीर में यह एक खुला रहस्य है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने राष्ट्र के नाम संदेश में अत्यंत सुविचारित एवं संतुलित ढंग से अनुच्छेद ३७० के हटने के बाद किस प्रकार, किस भाँति और कितने लाभ जम्मू-कश्मीर के निवासियों को होंगे, बताने की पूरी कोशिश की। उनका संदेश पूरे देश को था, ताकि हर कोई समझ सके कि ऐसे निर्णय की आवश्यकता क्यों थी, पर उससे अधिक उनका प्रयास था कि कश्मीर की जनता, जिसको कुछ नेता भुलावे में रख रहे हैं, गुमराह कर रहे हैं, उनको पता चल सके कि वह किस प्रकार लाभान्वित होगी। स्वार्थी तत्त्व तो विशेष दर्जे के नाम पर उनको भ्रम में रखना ही चाहते हैं, ताकि वे स्वयं गुलछर्रे उड़ाते रहें।

संविधान में अनुच्छेद ३७० को अस्थायी कहा गया है। यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ अथवा राज्यों के शामिल होने का जो दस्तावेज है, कश्मीर के लिए वह हूबहू उसी तरह का है, जैसा कि अन्य राज्यों का और जिस प्रकार महाराजा हरिसिंह ने हस्ताक्षर किए तथा स्वीकार किया। जब जम्मू-कशमीर हिंदुस्तान में शामिल हुआ, उस समय अनुच्छेद ३७० का वजूद नहीं था। जब शेख अब्दुल्ला संविधान सभा के सदस्य बने, उनकी जिद पर यह संविधान में उल्लखित हुआ। अतएव यह १९५२ में प्रभावी हुआ, जब संविधान लागू हुआ। अनुच्छेद ३७० के अंर्तगत जम्मू-कश्मीर राज्य को एक अलग संविधान सभा, एक अलग झंडा और शुरू में जम्मू-कश्मीर विधानसभा को अधिकार और बाद में विधानसभा को दिया गया वह अधिकार कि वे चाहें तभी भारतीय संसद् का कोई भी कानून वहाँ लागू हो सकेगा। महाराजा हरिसिंह ने भारत में सम्मिलित होने के जिस मजमून पर हस्ताक्षर किए थे, उसमें डिफेंस (सुरक्षा), विदेश संबंधी मामले तथा कम्यूनिकेशन ही भारत की संसद् के अधिकार में थे; किसी अन्य कानून को लागू करने के लिए वहाँ की विधानसभा की मंजूरी अनिवार्य थी। उस समय के कानून मंत्री डॉ. अंबेडकर इस प्रावधान के सख्त खिलाफ थे। कांग्रेस के संसदीय दल में भी इसका बड़ा विरोध था। कश्मीर मामलों के मंत्री गोपालस्वामी आयंगर ने प्रधानमंत्री नेहरूजी को, जो विदेश गए हुए, जब यह स्थिति बताई तो इस गुत्थी को सुलझाने के लिए उन्होंने सरदार पटेल के पास जाने को कहा। सरदार पटेल के सामने भी संसदीय दल में मुखर विरोध हुआ, पर सरदार पटेल ने सदस्यों को समझाया कि प्रधानमंत्री विदेश गए हुए हैं, उनके प्रस्ताव को ऐसे समय में स्वीकार न करना नेहरूजी की अवमानना होगी। इस प्रकार सरदार पटेल के प्रभाव के कारण ही संसदीय दल ने स्वीकृति दे दी थी।

नेहरू ने भी स्वयं संसद् में २७ नवंबर, १९६३ को इस बात को दोहराया कि यह एक अस्थाई प्रावधान है, स्थायी नहीं है और धीरे-धीरे समय रहते समाप्त हो जाएगा। ३७० को समाप्त करने की माँग समय-समय पर उठती रही। १९६४ में प्रकाशवीर शास्त्री ने एक गैर-सरकारी प्रस्ताव सदन में प्रस्तुत किया। इस प्रस्ताव को एक प्रकार से सर्वदलीय समर्थन प्राप्त था। जिन १२ सदस्यों ने इसका समर्थन किया, उनमें के. हनुमंथैया समेत कांग्रेस के सात सदस्य थे। इसके अतिरिक्त समर्थन में जम्मू-कश्मीर के प्रतिनिधि शाम लाल सराफ, एच.वी. कामत (सोशलिस्ट), भगवत झा आजाद (पूर्व मुख्यमंत्री बिहार) थे। डॉ. राम मनोहर लोहिया ने ३७० को निरस्त करने के पक्ष में बड़ा जोरदार भाषण दिया। इसके विरोध के कारण डॉ. श्यामा प्रसाद मुकर्जी का आत्मोत्सर्ग श्रीनगर में शेख अब्दुल्ला की जेल में हुआ। किन परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हुई, इसकी किसी प्रकार की जाँच कराने से शेख अब्दुल्ला साफ मुकर गए। प्रधानमंत्री नेहरू ने भी अपना पल्ला झाड़ लिया कि यह विषय राज्य सरकार से संबंधित है। जनसंघ और भाजपा की तो यह माँग निरंतर रही है। २०१९ के चुनावी घोषणा-पत्र में भी यह वादा था और उसको नरेंद्र मोदी सरकार ने अब पूरा किया। संपूर्ण देश में इसका हर्षोल्लास से स्वागत हुआ, क्योंकि इसके साथ भारत के एकीकरण की प्रक्रिया, जिसकी शुरुआत सरदार पटेल ने की थी, वह पूर्ण हुई। इतनी रियासतों में केवल जम्मू-कश्मीर के पूर्ण विलय का मामला अधर में लटक गया, क्योंकि प्रधानमंत्री नेहरू ने जम्मू-कश्मीर के मामले को अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया था, नहीं तो यह मामला उसी समय सुलझ गया था। यदि पं. नेहरू इसको सरदार पटेल की स्टेटस मिनिस्ट्री से अलग न करते तो कोई समस्या न होती।

कांग्रेस की तिलमिलाहट इस कारण है कि जो काम अपने लंबे शासनकाल में कांग्रेस की सरकारें नहीं कर सकीं, वह प्रधानमंत्री मोदी ने अपने दूसरे सत्ताकाल के शुरू में ही कर दिखाया। दूसरा कारण यह है कि कांग्रेस की अपने भविष्य के प्रति अनिश्चितता और धुँधलापन। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद, जो उन्होंने कांग्रेस की २०१९ के चुनावों की असफलता के कारण दिया, कांग्रेस अपने अगले अध्यक्ष के बारे में कोई फैसला नहीं कर सकी। राहुल गांधी के बार-बार कहने के बाद कि उनका निर्णय अंतिम है और उसमें किसी परिवर्तन का सवाल ही नहीं है, फिर भी कांग्रेस उनकी चिरौरी करती रही। यह सब बड़ा दयनीय दीख पड़ता था। राहुल गांधी का कहना था कि अगला अध्यक्ष ऐसा हो, जिसका नेहरू-गांधी परिवार से संबंध न हो। फिर भी परिवार पर निर्भरता अथवा चाटुकारिता के कारण बहुत लोगों ने प्रियंका गांधी वाड्रा के नाम को अध्यक्ष पद के लिए उछालने की कोशिश की। उनमें वे इंदिरा गांधी की छवि देख सकते हैं, पर वह अनुभव कहाँ है। आश्चर्य था कि बहुत से समझदार कांग्रेस के नेताओं ने उसका अनुमोदन किया, पर सब व्यर्थ रहा। इस बीच अनेक तथाकथित युवा नेताओं के नाम भी आए, पर सब अनिर्णीत रहा। कांग्रेस में नेतृत्व विहीनता के दिनों में हर प्रदेश में जो कांगे्रस में दरारें हैं, वे सब सामने आईं। बहुत से नेता और कार्यकर्ताओं ने भाजपा में शरण ली। खबरें आने लगीं कि हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री अपने एक अलग दल की शुरुआत करनेवाले हैं। भूपेंद्र हुड्डा ने अपनी रोहतक की रैली में कहा कि उनकी पार्टी (कांग्रेस) रास्ते से भटक गई है। उन्होंने ३७० को निष्प्रभावी बनाने के मोदी सरकार के निर्णय को उचित बताया और समर्थन किया। आपसी फूट और एक परिवार आश्रित रहने के कारण कांग्रेस में हर स्तर पर शिथिलता दिखाई देने लगी। पुरानी और नई पीढ़ी की प्रतिद्वंद्विता के समाचार भी आने लगे। दिशाहीन और समस्याओं से ग्रसित कांग्रेस ने सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष चुना। इतने नाटक के बाद फिर गांधी परिवार का ही सहारा लिया। अंतरिम अध्यक्ष ही सही, पर यह तो साफ हो गया कि नेहरू-गांधी परिवार के बाहर जाने में कांग्रेस को कितनी कठिनाई है। नौ दिन चले अढ़ाई कोस। सोनिया गांधी ने पुत्र राहुल को अध्यक्षता सौंपी थी, पर दो वर्षों से कम समय ही उन्हें स्वयं पुनः अध्यक्षता गृहण करनी पड़ी। ६ महीने के बाद जब कांग्रेस के आंतरिक चुनाव पूरे हो जाएँ तो फिर कौन अध्यक्ष बनेगा, यह यक्ष प्रश्न कांग्रेस के सामने है ही। यह बात तो साफ है ही कि परिवार के इतर चाहे कोई अध्यक्ष चुना जाए, पर नकेल सोनिया गांधी या प्रियंका के हाथ रहेगी। उसी प्रकार, जैसे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह नियुक्त हो गए, किंतु सब सरकारी महत्त्वपूर्ण निर्णय सोनिया के स्वीकार करने के बाद ही कारगर होते थे। सोनिया गांधी की परामर्शदात्री परिषद् कैबिनेट के ऊपर थी। एक प्रकार से वह कैबिनेट के प्रस्तावों पर विचार-विमर्श करती थी और उसके बाद ही उनका अनुपालन संभव था।

इस माहौल में कांग्रेस ३७० के निरस्त करने के विषय में क्या ऑफिशियल प्रतिक्रिया अपनाती है, देश यह जानना चाहता था। पर जब चुनाव के बारे में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक हो रही थी, तब जम्मू-कश्मीर की स्थिति के बारे में भ्रम फैलाने की कोशिश की गई। राहुल गांधी बाहर आए और कहा कि उन्हें जानकारी मिल रही है कि वहाँ बड़ी अशांति है, गोली चली है और लोग मारे गए हैं, आदि-आदि। जम्मू-कश्मीर के अधिकारियों और सैनिक अधिकारियों ने इस बयान को नकार दिया। अब कांग्रेस ने पैंतरा बदला कि उनको एतराज इस बात से है कि ३७० को निरस्त करने की प्रक्रिया उचित नहीं है। देश के जनमानस को देखते हुए यह कहने का साहस तो हुआ नहीं कि ३७० को निरस्त नहीं करना चाहिए। प्रियंका गांधी रट लगाए हैं कि जो कार्रवाई की गई, वह असंवैधानिक है, अलोकतांत्रिक है। शिकायत यह कि सब दलों से बातचीत नहीं की, जल्दबाजी की, जम्मू-कश्मीर की जनता को विश्वास में नहीं लिया, वहाँ के मुख्य दलों के नेताओं को हिरासत में लेकर रातोरात फैसला कर लिया। यह प्रक्रिया असंवैधानिक है, क्योंकि वहाँ की विधानसभा की राय नहीं ली गई। अमरनाथ यात्रा बीच में रद्द कर दी गई और वहाँ अर्ध सेना भेजी गई तथा बहुत बड़ी संख्या में सैनिकों को ताबड़तोड़ पूरे प्रदेश में नियुक्त कर दिया। पूरी कार्रवाई अलोकतांत्रिक है, संविधान की अवहेलना है।

यह पहली बार नहीं हुआ। आतंकवाद की आशंका से पहले भी ऐसा हो चुका है। सरकार ने बार-बार कहा है कि जो प्रभावित लोग हैं, दल हैं, उनसे संविधान के दायरे में बात हो सकती है। यह भारत का आंतरिक मामला है और उस बातचीत में पाकिस्तान को शामिल नहीं किया जा सकता है। कांग्रेस ने भी तीन वार्त्ताकारों को बात करने के लिए नियुक्त किया था, बातचीत हुई और नतीजा आखिर में कुछ नहीं निकला। घाटी के नेता पाकिस्तान हाई कमीशन के सदैव संपर्क में रहते हैं। वहाँ के कई दलों और व्यक्तियों को पाकिस्तान से पैसा मिलता है। ऐसे लोग समय-समय पर पाकिस्तान के इशारे पर वारदातें करते हैं, साधारण जनता को भड़काते हैं। शांति, कानून-व्यवस्था को भंग करने की कोशिश करते हैं। शिक्षालयों को जलाते हैं, बच्चों को पुलिस और सेना पर पथराव करने के लिए उत्तेजित करते हैं। आतंकवादियों को पनाह देते हैं। खबरें आतंकवादियों के घुसपैठ की आ रही थीं। सरकार को खुफिया जानकारी थी। सीमावर्ती प्रांत होने के कारण वहाँ तरह-तरह की संवेदनशील समस्याएँ थीं। अतएव सरकार को यकायक और शीघ्रता से सख्त कदम उठाने पड़े। इसलामिक स्टेट इराक और सीरिया में समाप्त हो गया है, पर भारत में उसके सुषुप्त गुर्गे हैं, जो इशारा पाते ही सक्रिय होंगे। इस्लाम स्टेट ने ऐलान किया है कि वह अपनी गतिविधियाँ भारत में बढ़ाते जा रहे हैं। तालिबान के भी संपर्क हैं। पाकिस्तानी फौज की खुफिया एजेंसी इन सबकी मदद करेगी। हर तरह से जम्मू-कश्मीर में तोड़-फोड़ को बढ़ावा देंगे और लोगों को भड़काने की कोशिश करेंगे। इमरान और पाकिस्तान के विदेश मंत्री तथा राजनेता तरह-तरह के गलत और उत्तेजित करनेवाले बयानों से चूक नहीं रहे हैं। वह देश के अन्य भागों में सांप्रदायिक दंगे कराने की कोशिश करेंगे। ऐसे अवसरों पर समय से कदम उठाना दूरदर्शिता का सूचक है। गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री ने कहा भी, जैसे-जैसे स्थिति सामान्य होगी, जो बंधन लगाए गए हैं, उनको कम किया जा सकेगा। आवश्यक है कि सब दल सरकार का सहयोग करें, ताकि जम्मू-कश्मीर की स्थिति सामान्य हो सके। सब्जबाग दिखानेवाले उन नेताओं से जनता निजात पा सके, जो अपने-अपने पापड़ बेलते रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर के विभाजन और उनके यूनियन टेरिटरी में परिवर्तित करने के कई कारण हैं। लद्दाख को एक यूनियन टेरिटरी बनाने की पुरानी माँग थी, क्योंकि उनको विकास से वंचित रखा गया। शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएँ न के बराबर हैं। यूनियन टेरिटरी बनने के बाद इस पिछड़े क्षेत्र का विकास संभव होगा। देश की सुरक्षा की दृष्टि से केंद्र आवश्यकतानुसार आदेश दे सकेगा। वहाँ विधानसभा की आवश्यकता नहीं है। शायद उपराज्यपाल एक परामर्शदाता समिति बना सकते हैं। जम्मू-कश्मीर नक्शे से हट गया है, यह कहना गलत है। जब यह डोगरा राज्य था तो भी वहाँ के कुछ नेता शिकायत किया करते थे कि ७५ लाख में अंग्रेजों ने उसे गुलाब सिंह के हाथों बेच दिया। जम्मू-कश्मीर का वजूद कायम है। उसकी अपनी पहचान है। शासन व्यवस्था में कुछ परिवर्तन किए गए हैं, पर वहाँ विधानसभा होगी और मंत्रिमंडल भी होगा, किंतु कुछ सीमित अधिकार होंगे, यह सब वहाँ की संवेदनशीलता को देखते हुए किया गया है। सही बात तो यह है कि जम्मू-कश्मीर की जनता की तरक्की, भलाई के लिए केंद्र ने और अधिक जिम्मेदारियाँ अपने ऊपर ली हैं और वह संसद् के प्रति उत्तरदायी होगी। इसके बाद भी प्रधानमंत्री ने ‘नए कश्मीर’ की तसवीर उकेरते हुए यह भी आश्वासन दिया कि संपूर्ण परिस्थितियों में सुधार होने पर जम्मू-कश्मीर को पुनः राज्य का दर्जा मिल सकेगा, यूनियन टेरिटरी का फैसला कोई अंतिम निर्णय नहीं है। वह आज की आवश्यकता ही नहीं, अनिवार्यता है।

जम्मू-कश्मीर के विषय में जम्हूरियत, इनसानियत और काश्मीरियत की बात को उठाया गया है। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि इस मानसिकता से जम्मू-कश्मीर की समस्या को सुलझाना चाहते हैं, ताकि कोई भ्रांति न रहे। वैसे स्थानीय बाध्यताओं को ध्यान में रखते हुए राजधर्म का तकाजा है कि मानवीय एवं लोकतांत्रिक व्यवहार शासन के हर क्षेत्र के नागरिकों के प्रति अपेक्षित है। प्रारंभ से ही दिल्ली सरकारों का यही प्रयास रहा है। किंतु ३७० एक अवरोधक रहा, क्योंकि वह अलगाववाद को सुदृढ़ करता है, भाईचारे को नहीं। जरूरत है कि काश्मीरियत के जो सकारात्मक तत्त्व हैं, उनको बल मिले। जब कश्मीरी पंडितों को घाटी से बलपूर्वक खदेड़ दिया गया और मंदिर तोड़े गए तो क्या यह इनसानियत, जम्हूरियत और काश्मीरियत से प्रेरित था? इस देश की तथाकथित लिबरल बिग्रेड उस समय क्यों मौन बनी रही? अब जो जे.एन.यू. के कुछ प्रोफेसर तथा एक्टिविस्ट और कुछ वामपंथी दलों के लोग, जो आज ज्वॉइंट एक्शन प्लान बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वे उस समय क्यों हाथ पर हाथ रखे निष्क्रिय रहे? किस काश्मीरियत की आज दुहाई दी जा रही है? जो अराजकता और आतंकवाद को संरक्षण देती है, बढ़ावा देती है। इस अभियान में कुछ सेवानिवृत्त विभिन्न सेवाओं के अधिकारी भी शामिल हो जाते हैं, ताकि वे भी सुर्खियों में रहें। तीसमार खाँ बनने का यह सबसे आसान तरीका है। ३७० अनुच्छेद को तो बहुतों ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी ही है। अतएव उनका भी कर्तव्य बनता है कि सामान्य स्थिति बनाने में सहयोग करें और शीर्ष न्यायालय के फैसले की प्रतीक्षा करें। उन्हें एहसास होना चाहिए कि यह समय चिनगारी में फूँक देने का नहीं है। चाहे नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के प्रति उनकी कितनी भी नाराजगी हो। सबसे खेदजनक और निंदनीय बात यह है कि कांग्रेस के एक कड़े नेता और पूर्व मंत्री ने ३७० को निरस्त करने के फैसले का सांप्रदायिकीकरण करने की कोशिश की। उन्होंने यहाँ तक कहा कि जम्मू-कश्मीर को दो भागों में विभाजित किया गया, क्योंकि वह मुसलिम बहुसंख्यक राज्य है। इस तरह के भाषण केवल भड़काने का ही काम कर सकते हैं। कथनी और करनी में साम्य होना चाहिए।

इसके पीछे एक अंतरराष्ट्रीय पहलू है, शायद उसने भी केंद्र सरकार को शीघ्र निर्णय लेने को विवश किया। अमेरिकन राष्ट्रपति ने पहले कहा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे कश्मीर की समस्या को सुलझाने में मदद माँगी। भारत ने इसका तुरंत खंडन किया। भारत का सदैव से यह मानना रहा है कि यह मामला दो पड़ोसी देशों का है और इसमें किसी तीसरे के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। हमारे विदेश मंत्री श्रीनिवासन ने संसद् में और बाहर भी इस बात को जोर-शोर से कहा। अमेरिकी राजनयिकों और चीनी राजनयिकों से भी यह कहा। हाल ही में अमेरिका के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट से भी उन्होंने साफ कहा कि यह द्विपक्षीय विषय है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने शब्दों में बदलाव कर कहा कि यदि दोनों देश चाहें तो वे प्रयास करेंगे। भारत ने फिर दोहराया कि किसी तीसरे देश की मध्यस्थता मंजूर नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति कह चुके हैं कि वे अमेरिकी सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस बुलाने को कटिबद्ध हैं। अफगानिस्तान के तालिबान को पाकिस्तान का समर्थन और संरक्षण प्राप्त है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान जब वॉशिंगटन में ट्रंप से मिले तो अपना रोना रोया। अमेरिका ने तालिबान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच एक समझौते की प्रक्रिया शुरू की। भारत के अफगानिस्तान से सदियों पुराने संबंध हैं। अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए भारत ने करोड़ों रुपयों की सहायता की। उनकी एसेंबली की नई इमारत भारत की देन है। पाकिस्तान अमेरिका पर कश्मीर के मामले में हस्तक्षेप करने के लिए दबाव डाल रहा है। अमेरिका का स्वार्थ है कि किसी प्रकार पाकिस्तान तालिबान से समझौता करा दे, ताकि अमेरिका अपने सैनिकों को वापस बुलाना शुरू कर दे, अमेरिका के राष्ट्रपति के अगले चुनाव से पहले।

अफगानिस्तान की सरकार तालिबान और पाकिस्तान की नीयत से आश्वस्त नहीं है। तालिबान आतंकवाद की जड़ है। भारत सतर्क है, क्योंकि उसमें अपनी सुरक्षा का भी प्रश्न जुड़ा है। भारत किसी दबाव में नहीं आएगा। चीन तो पाकिस्तान का हर हालात का दोस्त है। पाकिस्तान ३७० के विषय को लेकर पूरी कोशिश कर रहा है कि यह मामला किसी तरह इंटरनेशलाइज हो, यानी राष्ट्र मंडल हस्तक्षेप करें। चीन का अपना स्वार्थ भी है, क्योंकि पाकिस्तान द्वारा कब्जा किए गए हिस्से को वापस करने की हम माँग करते हैं। चीन की वेल्ट रोड इनाशियव वाली योजना इस हिस्से से गुजरती है। पाकिस्तान के कहने पर चीन ने कश्मीर के विषय को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में उठाया। बंद कमरे में सुरक्षा परिषद् ने कोई बयान जारी नहीं किया। आंतरिक विचार-विमर्श हुआ। स्पष्ट है कि पाकिस्तान की अपनी मनोच्छा पूरी नहीं हो सकी। बाद को एक प्रेसवार्त्ता में पाकिस्तान और चीन के राजदूत ने मानवाधिकार का प्रश्न उठाया। यू.एन. (राष्ट्रमंडल) में भारत के राजदूत अकबरुद्दीन ने मुँहतोड़ उत्तर दिए, जो विश्व भर के लोगों ने टी.वी. पर देखे और सुने। पिछले दिनों हाँगकाँग में जो हो रहा है और चीन के अपने सिकियांग प्रदेश में लाखों मुसलमानों का उत्पीड़न हो रहा है, उनको जेल में बंद कर दिया गया है, उनके धार्मिक रीति-रिवाजों पर प्रतिबंध है, वह चीन मानव अधिकारों की बात करे, यह अजूबा ही है। भारत के राजदूत ने न केवल भारत का दृष्टिकोण स्पष्टता से प्रस्तुत किया, वरन् उठाए गए सवालों के ऐसे उत्तर दिए कि प्रश्नकर्ताओं की बोलती बंद हो गई। पाकिस्तान को अधिकतर देशों ने यही परामर्श दिया है कि इस विषय पर भारत से बातचीत करे। भारत का कथन है कि आतंकवाद को बंद करने के बाद ही बातचीत हो सकती है। हमारे राजदूत ने प्रेस में स्पष्ट कर दिया कि चीन की अपनी राय का वैश्विक मत नहीं है। पिछले दिनों समाचार आ रहे हैं कि जम्मू-कश्मीर में बहुत से प्रतिबंध हटाए गए हैं, टेलीफोन इत्यादि सामान्यतः कार्य करने लगे हैं। फिर भी पिछले सात दशकों में जो हालात बने हैं, वे धीरे-धीरे ही सामान्य होंगे। भारत सावधानी बरत रहा है। इमरान और पाकिस्तान की आई.एस.आई. (सैन्य खुफिया एजेंसी) तथा वहाँ के अन्य सैनिक अधिकारियों की बंदर घुड़कियों को देखते हुए चौकस है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यह भी खुले तौर पर कह दिया है कि भारत अपने आणविक सिद्धांत से सदैव बँधा नहीं रह सकता कि हम पहले आक्रमण नहीं करेंगे। राजनाथ सिंह ने यह भी कहा है कि पाकिस्तान से केवल एक मुद्दे पर ही बात होनी बाकी है और वह है पी.ओ.के., यानी जम्मू-कश्मीर का जो हिस्सा कबीलों और पाकिस्तानी सेना ने अपने कब्जे में कर रखा है। किंतु कोई भी बातचीत तब होगी, जब पाकिस्तान आतंकवादी गतिविधियों को समाप्त करे। परिस्थितियाँ संवेदनशील हैं और देश को इस समय एकता से उनका सामना करना है। राजनीतिक दलों को याद रखना होगा कि देश पहले है, राजनीतिक दल बाद में।

लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का उद्बोधन

लालकिले से १५ अगस्त को स्वतंत्रता दिवस की प्रातः देशवासियों को प्रधानमंत्री के उद्बोधन की प्रतीक्षा रहती है। स्वतंत्रता संग्राम में आहुति देने वाले शहीदों, सैनिक और असैनिक दल, जो देश की सीमाओं की रक्षा में तैनात हैं, उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के उपरांत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सामने जो समस्याएँ हैं, उनपर अपने विचार प्रस्तुत किए। केरल, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, बिहार तथा देश के अन्य इलाके जो अति वर्षा और बाढ़ से पीड़ित हैं, उनके प्रति सहानुभूति और संवेदना प्रकट करने के साथ-साथ केंद्र द्वारा हर प्रकार की सहायता का आश्वासन दिया। प्रधानमंत्री ने अनेक महत्त्वपूर्ण मुद्दों की ओर देश का ध्यान खींचा। वे आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक हैं। सब मुद्दों का विवेचन स्थानाभाव के कारण संभव नहीं है। बजट ने एक आर्थिक तसवीर देश के सामने रखी थी और उससे संबंधी समस्याओं और शंकाओं के बारे में समय-समय पर विचार-विमर्श करने की बात कही। इस समय प्रधानमंत्री ने अपने उद्बोधन में जो अत्यंत महत्त्वपूर्ण सवाल उठाए और जिनका दीर्घगामी प्रभाव होगा, उनकी संक्षेप में चर्चा करना चाहेंगे। उनमें से एक है पानी का संकट और दूसरा है प्लास्टिक के इस्तेमाल, विशेषतया जो एक बार ही प्रयोग में आता है, उसको बंद करने का आह्वान। जलशक्ति मंत्रालय के दायित्वों और उद्देश्यों के विषय में ध्यान दिलाया। जलशक्ति मंत्रालय से बहुत आशाएँ हैं। उनके द्वारा पानी से संबंधित अनेक एजेंसियों में सामंजस्य स्थापित हो सकेगा। प्लास्टिक कितना हानिकारक है, इस विषय में तो देश बहुत समय से चिंतित है। अब इस विषय में कार्रवाई होगी और कार्यक्रम बनेंगे। प्रधानमंत्री ने आह्वान किया कि गांधी जयंती से ‘प्लास्टिक हटाओ’ अभियान प्रारंभ होना चाहिए। एक और मुद्दा जनसंख्या नियंत्रण का है। दुनिया की एक छठी आबादी भारत में है। जो भी विकास होता है, वह बढ़ती जनसंख्या खा जाती है। २०२४ तक यह चीन की जनसंख्या से अधिक हो सकती है। ऐसा एक यू.एन. की रिपोर्ट में कहा गया है। छोटे परिवार का सम्मान होना चाहिए। जनता और राज्य सरकारों से सहयोग की अपील की गई है। पहली बार आपातकाल के बाद इस गंभीर किंतु संवेदनशील समस्या के बारे में किसी प्रधानमंत्री ने बात की है। ओवैसी इसको भी मुसलिम विरोधी करार देते हैं। जनसंख्या विस्फोट को सही दृष्टि से देखने की जरूरत है। उसका संप्रदायीकरण बिल्कुल अनुचित है। यह राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। प्रधानमंत्री ने २०१९ के बाद के समय को जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने का कालखंड कहा है। अपनी सरकार की उपलब्धियों और योजनाओं पर भी उन्होंने प्रकाश डाला।

अनुच्छेद ३७० और जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को निरस्त करने के विषय में उन्होंने कहा कि यह ‘एक राष्ट्र और एक संविधान’ की ओर कदम है। उन्होंने पुनः कहा कि अनुच्छेद ३७० परिवारवाद, आतंकवाद, भ्रष्टाचार और अलगाववाद का जनक रहा है। अब जनता अपने सच्चे नेतृत्व का चुनाव कर सकती है। जनता पार्टी के समय हुए चुनाव के अलावा सब चुनाव ‘रिक्ड’ रहे हैं, उनसे खिलवाड़ हुआ है। इसी कारण जम्मू-कश्मीर में जनता और प्रशासन के बीच अविश्वास की एक गहरी खाई पैदा हो गई। अपनी सरकार की कार्यप्रणाली का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी सरकार समस्याओं को न आगे के लिए छोड़ती है और न उनको बढ़ने देती है। तुरंत निर्णय लेना उनकी सरकार का स्वभाव है। जो सत्तर साल में न हो सका, उनकी सरकार ने ७० दिन में करके दिखा दिया। उन्होंने जनता से अपील की, जो धनोपार्जन के साधन पैदा करते हैं, उन्हें संदेह की दृष्टि से नहीं, आदर की दृष्टि से देखना चाहिए।

एक बहुत ही खास निर्णय की उन्होंने घोषणा की, जो बहुत समय से विलंबित था और उसकी चर्चा होती रही है। कारगिल के युद्ध के उपरांत जो सुब्रमण्यम कमेटी बैठी थी, उसने सिफारिश की थी कि सुरक्षा प्रणाली में आवश्यक समन्वय-सामंजस्य और सहयोग लाने के लिए तीनों सैन्य बलों के प्रमुखों के अतिरिक्त एक चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सी.डी.एफ.) की नियुक्ति होनी चाहिए। आडवानीजी की अध्यक्षता वाली मंत्रियों की कमेटी ने भी इसकी सिफारिस की, समर्थन किया, पर निर्णय न हो सका। सैन्य बलों में भी सी.डी.एस. के विषय में अलग-अलग राय रही, रक्षा मंत्रालय में भी मतभेद रहा। प्रधानमंत्री ने निर्णय कर लिया कि अब सी.डी.एस. के पद का सृजन होगा। यह ओहदा सैन्य दलों के प्रमुखों के ऊपर होगा। प्रधानमंत्री के आदेश से रक्षा मंत्रालय में एक कमेटी भी बना दी गई है, जो नवंबर तक अपनी रिपोर्ट दे देगी कि इस नई व्यवस्था का रंग-रूप किस प्रकार का होगा। देश की सुरक्षा की दृष्टि से यह एक महत्त्वपूर्ण निर्णय है, जो बहुत समय से अपेक्षित था और बीस साल के बाद अब संभव होगा।

‘इंडिया टुडे’ मैगजीन ने २६ अगस्त के अपने अंक का शीर्षक ‘मोदिस्तान’ दिया है और अपने एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण, नेशनल पोल के आधार पर कहा है कि राष्ट्र मोदी से मोहित है, उनकी पकड़ में है। भारतीयों का विश्वास है कि इस समय मोदी के पास हर समस्या का उत्तर है, समाधान है। सर्वेक्षण विचारणीय है। देश अनेक समस्याओं से घिरा हुआ है, मंदी का जोर है, पर जनता का मोदी की सोच और कार्यप्रणाली में अगाध विश्वास है। जनता का मूड ऐसा है कि ‘मोदी है तो मुमकिन है।’ ७३वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जनता को आशा और भरोसा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश बहुआयामी प्रगति के पथ पर अग्रसर है।

श्रीमती सुषमा स्वराज को श्रद्धासुमन

श्रीमती सुषमा स्वराज के अल्पायु में अचानक निधन के समाचार से देश को एक बड़ा धक्का लगा। देश के हर भाग से और प्रत्येक वर्ग से संवेदना और शोक के समाचार प्राप्त हुए। ये उनकी लोकप्रियता के ही परिचायक हैं। उनमें कोई औपचारिकता नहीं थी। वे हृदय के उद्गार थे। सुषमा स्वराज ने २०१९ के चुनाव में भाग लेने के लिए अपनी पार्टी से असमर्थता प्रकट की थी, क्योंकि कुछ समय पहले उनका गुरदे का ट्रासप्लांटेशन हो चुका था। पर आशा थी कि उनकी सेवाएँ अन्य महत्त्वपूर्ण पदों पर उपलब्ध होंगी। उनके असामयिक निधन ने उन आशाएँ पर पानी फेर दिया। जनता पार्टी के दिनों में हरियाणा में देवीलाल के विरोध के बावजूद वे २५ वर्ष की उम्र में मंत्री बनाई गई थीं। हम उनको तभी से जानते थे, चूँकि उनका सरकारी बँगला चीफ कमिश्नर के निवास के सामने ही था। चंडीगढ़ में उनकी ख्याति एक अत्यंत योग्य और ईमानदार मंत्री की थी, जो जनता के अभियोग और अभाव को बहुत सहानुभूति से सुनतीं। उनके दरवाजे बिना भेदभाव के सबके लिए खुले थे। उनकी शिक्षा-दीक्षा पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में हुई थी। उन्होंने कानून की डिग्री हासिल की थी। आपातकाल में उन्होंने जार्ज फर्नांडीस के मुकदमे में पैरवी की और चुनाव के समय जब वे जेल में बंद थे, प्रचार किया। जनता पार्टी के विघटन के बाद वे भाजपा में आ गईं। वे प्रखर वक्ता थीं, किंतु उनके शब्द चुने हुए और संतुलित होते थे। वे दल और संसद् दोनों में अत्यंत सक्रिय रहीं। सुषमाजी ने आडवाणीजी की रथयात्रा में सविनय भाग लिया। उत्तरपारा में जहाँ श्रीअरविंद ने जेल से छूटने पर अपना महत्त्वपूर्ण भाषण दिया था, आडवाणीजी को पहुँचने में बहुत रात हो गई थी। जनता प्रतीक्षा कर रही थी। हम भी कोलकाता से वहाँ पहुँच गए थे, सुषमाजी आडवाणीजी की देखभाल कर रही थीं। इस लंबी यात्रा में भी उनके चेहरे पर थकान नहीं, मुसकान थी। आधी रात हो गई थी, हमें देखकर उन्होंने कहा, अरे आप भी यहाँ आए हुए हैं और आधी रात तक रुके हुए हैं, बड़ी दिक्कत रही होगी। ऐसी थी उनको दूसरों की चिंता, अपने कष्ट के प्रति अनदेखी। संवेदनशीलता इसको कहते हैं। राज्यसभा के सदस्य होने के समय हमने देखा कि वे जब प्रतिपक्ष में थीं तो बड़े ढंग से प्रश्न करतीं, पूरक प्रश्न पूछतीं और संबंधित मंत्री के लिए उत्तर देना आसान नहीं होता था।

मंत्री के नाते उनकी भूमिका उतनी ही प्रभावी रही। वे कई मंत्रालयों की मंत्री रहीं। उन्हें साहित्य से बहुत प्रेम था। वे शे’रो-शायरी की भी शौकीन थीं। उनकी स्मरणशक्ति विलक्षण थी। शे’र और कविताओं का समीचीन उपयोग वे संसद् में करने में सक्षम थीं। वे मानवीय भावनाओं से ओत-प्रोत थीं। उनमें सचमुच माँ का हृदय था। कोई भी अपनी कठिनाई लेकर जाए, यथाशक्ति वे उसकी सहायता की चेष्टा करती थीं। विदेश मंत्री की हैसियत से उन्होंने भारत के पक्ष को, चाहे कोई सा फोरम रहा हो, सब जगह सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया। जो भारतीय नागरिक विदेशों में संकट में फँसे थे, उनको सुरक्षित भारत वापस लाने वाले उनके अनेक प्रयास स्तुत्य हैं। सुषमाजी के उन प्रयत्नों ने देश की सामान्य जनता का दिल जीत लिया। किंतु विनम्रता से सुषमाजी ने उसे अपने कर्तव्यपालन और दायित्व निर्वहन का ही भाग कहा। किसी प्रकार के श्रेय से अपने को महिमामंडित करने से सदैव दूर रहीं। उनका एक गुण था कि जब भी उनको हमने फोन किया और वे नहीं मिलीं, तो आने पर वे अवश्य संपर्क करतीं। जब वे सूचना मंत्री थीं, प्रशासन में मितव्यता के संदर्भ में प्रकाशन विभाग को समाप्त करने का सुझाव आया, वहाँ के कुछ कर्मचारी हमारे पास आए और अपना पक्ष रखा। हमने यह मामला पार्टी और राज्यसभा दोनों में उठाया। प्रधानमंत्री वाजपेयीजी से भी इस विषय में बातचीत की। एक पत्र लिखकर हमने उन्हें प्रकाशन विभाग के असली मंतव्य की ओर ध्यान दिलाया कि इस कारण से उसका साहित्य अकादमी या नेशनल बुक ट्रस्ट में विलय नहीं किया जा सकता है। पूरी तरह विचार कर सुषमाजी ने प्रकाशन विभाग को बंद करने के सुझाव को नकार दिया। वे एक अत्यंत कल्पनाशील, विचारशील, संवेदनशील मंत्री थीं, जो हर निर्णय समझ-बूझ से करती थीं। भारतीय संस्कृति की वे प्रेमी थीं, पर परंपरा के आधुनीकरण की कहाँ आवश्यकता है, उसे समय रहते वे भाँप लेती थीं। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व अत्यंत शालीन और गरिमामयी था। उनकी अनन्य सेवाओं को देश कभी भूल नहीं सकता। श्रीमती सुषमा स्वराज की स्मृति को आदरपूर्वक नमन!

(त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी)

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