लोकसाहित्य में शौर्य

लोकसाहित्य में शौर्य

भासुपरिचित लेखिका। कहानी, उपन्यास लोक-साहित्य, नाटक, निबंध, बाल-साहित्य आदि विषयों पर शताधिक कृतियाँ तथा अनेक संपादित कृतियाँ प्रकाशित। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के विभिन्न केंद्रों से निरंतर प्रसारण। अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मान एवं पुरस्कार।

रतीय नवजागरण की प्रेरणा का मूल स्रोत भारतीय साहित्य और संस्कृति रही हैं, ‘कस्मै देवाय हविषः विधेम’? किस देवता की हम हवि द्वारा उपासना करें, यह प्रश्न शास्त्रों में उठता रहा है। इसमें व्यक्ति और समाज दोनों की अस्मिता का प्रश्न जुड़ा रहा है। इस अस्मिता को बचाए रखने के लिए राष्ट्र के प्रति गौरवबोध आवश्यक है। जब राष्ट्र के प्रति गौरवबोध और प्रेम होता है, तभी उसकी रक्षा के लिए मन में संकल्प जगता है और इस संकल्प को पूरा करने के लिए शौर्य की आवश्यकता होती है। इसीलिए यह शौर्य व्यक्ति और समाज दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण है। इसके महत्त्व को लिखित और वाचिक साहित्य दोनों में उजागर किया गया है।

साहित्य में शौर्य का निरूपण चेतना के स्तर पर जीवन से जोड़कर किया जाता रहा है। चेतना का यह स्तर व्यक्ति समाज या देश की सीमाओं को पार करता हुआ पूरे विश्व की चिंता करता है; उसकी रक्षा और मंगल के लिए सन्नद्ध होता है। उसमें सीमित दायरे से, संकीर्णताओं से ऊपर उठकर सर्वमंगल का भाव होता है। भारतीय संस्कृति की यह उदार दृष्टि ऐसी है, जिसे एक श्लोक के द्वारा समझा जा सकता है—

माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः।

बान्धवाः शिवभक्तश्च स्वदेशो भुवनत्रयम॥

अर्थात् पर्वत को धारण करनेवाली पृथ्वी मेरी माँ है, पिता परमात्मा है, शिवभक्त परिजन हैं और तीनों लोक मेरा अपना देश है।

देश की दासता की बेडि़यों को काटने के लिए हमारे वीर बलिदानियों ने जिस अभूतपूर्व शक्ति, आत्मबल और स्वाभिमान का प्रमाण दिया, वह इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है। स्वार्थवश लिखे गए छद्म इतिहास में भले ही उनके त्याग और वीरता को छोटा करके दिखाने की कुचेष्टा की गई, लेकिन साहित्य ने उनके प्रति श्रद्धा को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया। यही कारण है कि आज भी लोककंठों में उन वीर बाँकुरों की गाथाएँ बसी हुई हैं।

इसीलिए शौर्य को सौंदर्य का प्रतिमान मानकर भारतीय ललनाएँ ऐसे वर की कामना करती हैं, जो वीर और शौर्यवान हो। गीतों में सुंदरी नायिका अपने को चंपा की कली कहती है और प्रिय को गुलाब का फूल। स्वयं को चंचल हिरणी तथा तालाब की मछली और प्रिय को धनुर्धारी क्षत्रिय तथा जाल में फँसाने वाला मछुवारा कहकर उसके साथ एकाकार होना चाहती है।

मैं जंगल की हिरनी रे,

तुम पिया क्षत्री के पूत, उठाय बान मरत्या केस नाहीं रे।

इसमें विंध्य और बेधक का भाव है, यह गीत उन्मुक्तता का प्रतीक है। एक गीत में कन्या अपने पिता से कहती है कि मेरे लिए ऐसा वर ढूँढना, जो अपने आसपास के परिवेश को और स्वयं को स्वच्छ रखता हो, जो विद्वान हो, जो वीर हो तथा सौदर्य, शृंगार प्रेमी भी हो—

धोतिया कचारैं बाबा पोथिया बिचारैं, हाथे गुलेल मुख पान।

उन्हीं क तिलक चढ़ाया मोरे बाबा! मिलि जइहैं दुलरू दमाद।

जो अपने वस्त्र स्वयं स्वच्छ करता हो, जो पोथी विचारता हो, जिसके हाथ में गुलेल (अस्त्र-शस्त्र से तात्पर्य है) हो और मुख में पान हो, अर्थात् जो रसिक प्रवृत्ति का भी हो, ऐसे वर का तिलक करना तो दुलारा दामाद मिल जाएगा।

गीतों में विजयी होकर लौटे प्रिय वीर की प्रशंसा है—

अच्छी रैनि (रण) जीति आया सँवरिया,

धन्नि बाप, मइया धन्नि रे बहिनिया

धन्नि उहै कोखि जहाँ जनम्या सँवरिया।

धन्य है वह रण, जहाँ से जीतकर वीर साँवरिया आए। धन्य हैं, वे माता-पिता, बहन और धन्य है वह कोख, जहाँ वीर ने जन्म लिया। धन्य है वह सेज, शयन कक्ष और वह नारी जहाँ वीर ने विश्राम किया। धन्य है वह राह, राह में मिले पथिक और वह देश जहाँ वीर ने जन्म लिया।

गोस्वामी तुलसीदास ने शौर्य के सौंदर्य को बडे़ सौष्ठव के साथ प्रस्तुत किया है—

उदित उदय गिरि मंच पर, रघुवर बाल पतंग।

विकसे संत सरोज सब, हरषे लोचन भृंग॥

श्रीराम बालरवि को सभी नर-नारी मुग्ध भाव से देखते हैं और देवता पुष्प बरसाते हैं। राजा को ऐसा ही होना चाहिए। तभी वह जननायक बन सकता है और रामराज्य की कल्पना को साकार कर सकता है।

भारत की आजादी के बाद जो स्वप्न भंग हुआ, उसमें राजनीति और धर्म दोनों में ही मूल्यों के क्षरण का अनुभव हुआ। कुछ मूल्य विकसित हुए, जो आयातित थे। अपने इतिहास के प्रति गौरव-बोध की जो चिनगारी पराधीनता के दर्द में प्रस्फुटित हुई थी, वह ठंडी पड़ने लगी। तब तुलसी का रामराज्य फिर से लाने का सपना सबके मन में जगने लगा, क्योंकि उसके बिना कहीं भी आश्रय नहीं दिखता। तुलसी ने दैन्य भाव की पराकष्ठा को महत्त्व दिया। वह दैन्य पलायन के लिए नहीं था बल्कि विनम्रता के लिए था। आज हर क्षेत्र में विनम्रता का स्थान अहंकार लेता जा रहा है, इसलिए भी तमाम विसंगतियाँ पैदा हो रही हैं।

विवाह गीतों में द्वार पूजन के समय कन्या के भाई को पुकारा जाता है कि बहन की रक्षा के लिए धनुष उठा लो, बाँहों में बल भरो, नहीं तो वर दल-बल के साथ आकर बहन को उठा ले जाएँगे। यह गीत संभवतः कन्या अपहरण के भय से आक्रांत लोकमन ने रचा या कन्या के प्रति ममता के आवेग में विछोह की कल्पना के दर्द से रचा गया हो, पर इसे सुनकर रोमांच होता है। भाई उत्तर देता है—अरी बहन! मैंने धनुष उठाया, बाँहों में बल भरा, पर बहनोई से हार गया और बहन परायी हो गई—

अरे-अरे भइया अमुक राम धनुही उठावौ

बहियाँ में बल भरौ

आवत है तोरा बहनोइया बहिनी परायी होइहैं।

अरे अरे बहिनी अमुक देई धनुही उठायों,

बहियाँ म बल भर्यों जीति गए मोरा बहनोइया

हार्यों बहिनि आपनि।

इस गीत में इतिहास का वह दर्द भी छिपा है जहाँ शासक अपहरणकर्ताओं से रक्षा के लिए भाई के शौर्य का आह्वान किया जाता था और असहाय भाई शौर्यवान होते हुए भी अकेले लड़ने के कारण हार जाता था। यह तो हुई शौर्य और सौंदर्य की कामना की बात। इसका प्रमाण है कि वीर बाँकुरों के चित्र को अपने वस्त्र पर छपवाने की कामना नारियाँ करती हैं।

लोकगीतों में कुलवधुएँ देशभक्त वीरों से इतनी प्रभावित हुईं कि नेताजी, आजाद हिंद फौज तथा तिरंगा झंडा, वीर भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की छवि अपनी चुनरी पर छापने के लिए रँगरेज से अनुरोध करती हैं—

रँगरेजवा छापि दे हमरी चुनरिया।

नक्सा हिंद अजाद फौजिया

एक ओर छापा नेता सुभास चंद

एक ओर झंडा तिरंगा।

एक ओर छापा वीर भगतसिंह, चंदसेखर आजाद।

नेताजी ने ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ नाम से नए दल का गठन किया गया। लेकिन संगठन उल्लेखनीय कार्य न कर सका। परंतु नेताजी अपनी सक्रियता के कारण अंग्रेजों की आँख की किरकिरी बने रहे। उन्होंने २० वर्ष विदेश में काटे। बर्लिन में ब्रिटिशों के विरुद्ध रेडियो के माध्यम से अभियान शुरू किया। जहाँ पहला ‘शेर’ पढ़ा जाता था—

तेजो खंजर से जानें लड़ा देंगे हम,

बिगड़ी को तेरी बना देंगे हम ।

हम फिरते हैं सिर पर बाँधे कफन, ऐ वतन! ऐ वतन!

राजनैतिक उथल-पुथल परिवर्तन एवं महत्त्वपूर्ण घटनाओं का प्रभाव लोकजीवन पर पड़ता है। अतः लोकगीतों में भी नेताजी के देशप्रेम के जज्बे को स्वर दिया गया है—

हमरे देसवा क धरतिया रतनवा क खान।

यहि रे धरतिया पर जनमे सुभास चंद्र

जे देस क खातिर घूमे दुनिया जहान।

देसवा के कारन नेता जी खुनवा बहाए

गये जेहलिया, देसवा प रहा वन्है बहुत गुमान।

देसवा क खातिर मरि मिटि गए जे

नेता होइ गए हो देवता अइसन महान।

ब्रिटिश शासन के प्रति नेताजी का आक्रोेश लोक का आक्रोश बन गया। लोक ने उनके स्वर में स्वर मिलाकर अपने क्रोध को व्यक्त किया। नेताजी को अपने देश की प्रतिष्ठा की चिंता थी। उनकी इस चिंता को लोकगीतों ने अभिव्यक्ति दी। लोक को नेताजी पर भरोसा और विश्वास था।

लोकमन नेताजी सुभाष चंद्र बोस और भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद को और महात्मा गांधी को देश का कर्णधार मानता रहा।

ब्रिटिश साम्राज्य के विरोध में लोक का आक्रोश ही अभिव्यक्त हुआ है—

फिरंगियन के लइ जायँ हइया मइया, काली मइया,

उनसे भारत देसवा बचाया भगवान,

हमरे सुभास बाबू नइया क खेवइया

उनकर टेकिया बचाया भगवान।

(इसी प्रकार भगतसिंह, आजाद, महात्मा गांधी आदि के बारे में अगली पंक्तियों में)

फिरंगियों से देश को बचाना भगवान! हमारे सुभाष बाबू, भगतसिंह, आजादजी नाव के खेवनहार हैं, उनकी टेक बचाना भगवान। माता-बहनों की प्रतिष्ठा, उनकी लाज खतरे में है।

भारतीय नारियाँ अपने पति से नेताजी का साथ देने का आग्रह करती हैं—

सैंया सीखि ल्या बोलै अँगरेजी,

होइजा नेता जी की फौज म भरती

चला जा देसवा रंगून।

पानी की जहजिया से पहिले तू चला जा

जाइके हमहूँ का लिहा बोलाय

हमहूँ होबै फौज मा भरती।

आगे-आगे तू चल्या लइके तिरंगा

पाछे हम चली जयहिंद कहती

देश के वीरों का प्रभाव युवकों पर सर्वाधिक पड़ा। ‘दूल्हा’ भी तिरंगा हाथ में लिये जयहिंद कहता हुआ चल रहा है—

बन्ना हमारो नेता औ गान्ही के बस मा, तिरंगा झंडा उठाय रहा।

सब केहू गावै और गवनई बन्ना जयहिंद क रटन लगाय रहा।

सब केहू बजावै ढोलक मंजीरा बन्ना रनभेरी बजाय रहा।

जोड़ा औ जामा उनके मन ही न भावै,

वीर बाना औ खद्दर क रटनि लगाय रहा।

फूलन क मउरा उनके मन ही न भावै,

केसरिया पगिया क रटनि लगाय रहा।

बाबा मँगाये सजा मियाना,

ऊ तौ पैदल कै रटनि लगाय रहा।

वर नेताजी और गांधीजी के वश में है। वह तिरंगा झंडा उठाकर चल रहा है। सभी तरह-तरह के गाने गा रहे हैं, पर वर जयहिंद की रट लगाए हैं। सभी ढोलक-मंजीरा बजा रहे हैं, वर रणभेरी बजा रहा है। दूल्हे की पोशाक (जोड़ा-जामा) उसे नहीं पसंद, वह वीरों का वेश धारण करने की रट लगा रहा। फूलों का मौर मुकुट उसे नहीं भा रहा, वह केसरिया पगड़ी की रट लगा रहा है।

कुलवधुओं का स्वप्न है कि मेरा प्रिय स्वराज्य-स्वप्न को पूरा करेगा। वह नेताजी को आश्वासन देती है—

सुभास बाबू तोहार अजादी सपनवाँ हरि मोर पूरा करिहैं ना।

तोहरे कहे बंदूक उठइहैं, तोपिया धमाका करिहैं ना।

तोहरे साथे खुनवा बहइहैं, अँगरेजवन क मारि भगइहैं ना।

तोहरे पछवां-पछवां चलिहैं, देसवा आजाद करइहैं ना।

नेता सुभाष बाबूजी! आपका आजादी का सपना मेरे पति पूरा करेंगे। वह बंदूक उठाएँगे, तोप से धमाका करेंगे, आपके साथ खून बहाएँगे, अंग्रेजों को मार भगाएँगे, आपके पीछे-पीछे चलेंगे और देश आजाद कराएँगे।

गारी गीतों में भी स्वराज्य की कामना की गई है—

हम भारतवासी, हम भारतवासी, पाएँ सुराज सही रे सही,

नेता सुभास बाबू, एक पन ठाने देसवा गुलाम रही न रही।

सब खून द्या हमैं, हम देबैं अजादी एकहि बात कही रे कही।

प्यारा भारत देसवा, गुलामी म तड़पै सभी रे सभी।

गुलामी दूर होइ जाई मिली अजादी, सुख कर मूल यही रे यही,

देस क अजादी सब कर धरम होय, सुनौ नर नारी सभी रे सभी।        

हम भारतवासी हैं, हमें सच्चा स्वराज्य मिले। नेता सुभाष बाबू ने एक ही प्रण ठाना है कि अब देश गुलाम नहीं रहेगा। सभी लोग, मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूँगा। प्यारा भारत देश गुलामी से तड़प रहा है। गुलामी दूर हो और आजादी मिले सुख का यही मूल मंत्र है। देश की आजादी सभी भारतीयों का धर्म है, सभी नर-नारी सुनो।

मातृभूमि के बलिदानी सपूतों के प्रति लोक सदा कृतज्ञ रहा है। गुलामी सहन करने वाले कायरों की भर्त्सना हुई है—

जौने भारत म जनमे वीर बाँकुरे

देस रहा धरम इमान रे बटोहिया,

भगत सिंह, आजाद, सुभास चंद

देसवा की खातिर दिहे प्रान रे बटोहिया

बहुत विपति सहे गए जेहलखनवाँ

तबहूँ न मथवा झुकाये रे बटोहिया।

देसवा अजाद कइकै, सरग सिधारे

बड़ा-बड़ा रहा अरमान रे बटोहिया।

वही देसवा म आज ऐसन अधम भए,

देसवा से करै लागे घात रे बटोहिया।

जिस भारत में ऐसे वीर बाँकुरों ने जन्म लिया, जिनका धर्म और ईमान सबकुछ अपना देश था। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस जैसे सपूतों ने देश के लिए प्राण न्योछावर किए। बहुत विपत्ति सही, जेल गए, पर सिर नहीं झुकाया। जिस देश को आजाद करके स्वर्ग गए, जिसकी आजादी के बड़े-बड़़े अरमान थे, उसी देश में ऐसे अधम हो गए हैं, जो देश के साथ धोखा कर रहे हैं।

नेताजी का पूरा जीवन संघर्ष और शक्ति परीक्षण करते हुए कष्टमय गुजरा। पर वे अपने लक्ष्य से विचलित नहीं हुए। उनके आचरण का आदर्श और संदेश युग-युग तक अमर रहेगा और लिखित तथा वाचिक साहित्य उनकी कीर्ति गाथा सुनाते रहेंगे।

इसी प्रकार ‘गांधी की बानी दुनिया में पसरी’ अवधी लोकगीतों ने इस बात का गा-गाकर प्रसार किया। लोकगीतों में ईश्वर साधारण व्यक्ति बनकर प्रस्तुत होते रहे हैं। किंतु लोकगीतों में महात्मा गांधी को भगवान् का अवतार मानकर उनकी तुलना राम और कृष्ण से की गई है—

अवतार महात्मा गांधी कै, भारत कै भार उतारै काँ,

सिरी राम के हाथे म धनुहा बान, श्रीकृष्ण के हाथे मुरली,

गान्हीं के हाथे म चरखा बा, भारत कै भार उतारै काँ।

सिरी राम के साथे बानर सेना, और लखन यस भइया,

सिरी कृस्न के साथे ग्वाल बाल अउर बलदाऊ भइया,

गान्ही के साथे जनता बा और जवाहर लाल, पटेल

सिरी राम मारे रावण काँ सिरी किसन मारे कंसा काँ,

गांधीजी जग माँ परगट भए, अन्यायी राज हटावै काँ

महात्मा गांधी का अवतार भारत का भार उतारने के लिए हुआ। श्रीराम के हाथ में धनुष-बाण और श्रीकृष्ण के हाथ में वंशी थी। गांधी के हाथ में चरखा है। श्रीराम के साथ वानर सेना और लक्ष्मण थे। श्रीकृष्ण के साथ ग्वाल-बाल तथा बलराम थे। गांधी के साथ जनता है और जवाहर, पटेल हैं। श्रीराम और श्रीकृष्ण ने रावण और कंस रूपी अन्यायी राजा को मारा, गांधीजी संसार में प्रकट हुए हैं अन्यायी अंग्रेजी राज हटाने के लिए।

सामाजिक जीवन पर राजनैतिक उथल-पुथल परिवर्तन एवं महत्त्वपूर्ण घटनाओं का प्रभाव पड़ता है। अतः लोकगीत भी इस प्रभाव से अछूते नहीं रह सकते।

मध्यकालीन राजनैतिक जीवन से संबद्ध कुछ गीत अभी भी गाए जाते हैं। मुगल शासकों के अत्याचार, उनकी विषय-लोलुप प्रवृत्ति, हिंदुओं की विवशता, मुगलों से सतीत्व रक्षा हेतु भारतीय नारियों का आत्म-बलिदान आदि इन गीतों में मार्मिक रूप से व्यक्त हुआ है। (कुसुमा) से संबंधित गीत, बैरगिया नाला जुलुम जोर का गीत आदि इसी श्रेणी में आते हैं।

कुसुमा की करुण गाथा प्रसिद्ध है—

बाबा के सगरवाँ चलीं करैं असननवा,

रोइ-रोइ मिरजा हो जलवा बहावैं,

बाझि आवैं घोंघवा सेंवरवा हो राम।

हँसि-हँसि बीरन भइया जलवा बहावैं,

बाझि आवैं नाके कै नथुनियाँ हो राम।

‘कुसुमा राजपूत बाला को मुगल अपहृत करके ले जाता है, उसके पिता, भाई को बंदी बना लेता है, तब वह वीरांगना अत्यंत चतुराई से पिता और भाई को स्वाधीन कराकर स्वयं भी सदा-सदा के लिए मुक्त हो जाती है। वह पालकी ढोनेवाले कहारों से कहती है कि भाई, अंतिम बार बाबा के सागर से पानी पी लेने दो। मिर्जा कहता है—इस पोखर का जल गंदा है, मेरे सागर का जल पीना। कुसुमा कहती है—तुम्हारे सागर का जल तो अब नित्य पीना है, बाबा की पोखर अब दुर्लभ हो जाएगा। सागर में वह जल-समाधि ले लेती है। मुगल जब जाल डलवाता है तो घोंघे सेंवार फँस आते हैं। पर भाई जाल डालता है तो नाक की नथ फँस जाती है। नाक की नथ प्रतिष्ठा की प्रतीक है। मुगल रोता है और उसका भाई हँसता है कि बहन ने उसकी पगड़ी की लाज रख ली।

अंग्रेजों और मुगलों से डरकर भारतीय नारी अपने वर से और भाई से कहती है कि सिर पर पाग बाँध लो और हाथ में ढाल तलवार ले लो। अंग्रेजो से और मुगलों से डरकर हम जंगल-जंगल छिपती फिर रही है—

घोड़ चढु दुलहा तुँ घोड़े चढु यहि रह बन में

दुल्हा बाँधि लेहू ढाल तरुवारि त यहि रन बन में।

पहिरौ न पियरी पितंबर यहि रन बन में।

दुलहा बाँधि लेहु लटपट पाग त यहि रन बन में।

कैसे के बाँधी पाग त यहि रन बन में।

दुलहिन मरम न जान्यों तोहार त यहि रन बन में।

जतिया तो हमरी पंडित कै यहि रन बन में।

दुलहा मुगल के डरिया लुकानि त यहि रन बन में।

यतनी बचनिया क सुनतइ यहि रन बन में।

दुलहा घोड़े पीठि लिहेनि बैठाय त यहि रन बन में।

यक बन गए दूसर बन यहि रन बन में।

दुलहा तिसरे में लागी पियास त यहि रन बन में।

अरे अरे जनम संघाती त यहि रन बन में।

दुलहा बूँद यक पनिया पियाउ त यहि रन बन में।

ताल औ कुइँआ सुखानी त यहि रन बन में।

पनिया रकत के भाव बिकाय त यहि रन बन में।

उँचवै चढि़ के निहारेन त यहि रन बन में।

दुलहिनि झरना बहै जुड़ पानि त यहि रन बन में।

दुलहिनि ठाढ़े मुगुल पचास त यहि रन बन में।

अरे अरे जनम सँघाती त यहि रन बन में।

दुलहा बून एक पनिया पियाउ त यहि रन बन में।

दुलहा मोरी तोरी छूटै सनेहिया त यहि रन बन में।

यतना बचन सुनि पायेन त यहि रन बन में।

दुलहा खींचि लीहिनि तलवारि त यहि रन बन में।

ठाढे़ एक ओर मुगुल पचास त यहि रन बन में।

दुलहा एक ओर ठाढ़े अकेल त यहि रन बन में।

रामा जूझे हैं मुगुल पचास त यहि रन बन में।

राजा जीति के ठाढ़ अकेल त यहि रन बन में।

पतवा के दोनवा लगायनि त यहि रन बन में।

दुलहिनि पनिया पियहु डभकोरि त यहि रन बन में।

दुलहा धरम लिहेउ मोर राखि त यहि रन बन में।

दुलहा हम तोहरे हाथ बिकानि त यहि रन बन में।

यतनी बचनिया के साथ त यहि रन बन में।

दुलहिन मलवा दिहिन गरे डारि त यहि रन बन में।

हे दुलहा! घोड़े पर चढ़ लो, निर्जन और भयानक वन में ढाल-तलवार बाँध लो। पीतांबर पहन लो, पगड़ी बाँध लो। दुलहन! पगड़ी कैसे बाँधू? मैं तुम्हें जानता नहीं। दुलहा! मैं ब्राह्मण कन्या हूँ । मुगलों के डर से जंगल में छिपी हूँ। मुगलों ने मेरे भाई और पिता को मार डाला है। इतना सुनते ही उसने उसे घोड़े पर बैठा लिया। एक वन, दूसरा वन पार किया, तीसरे में प्यास लगी। हे जीवनसंगी! एक घूँट पानी पिलाओ। इस वन के सभी ताल और कुएँ सूख गए हैं। पानी तो रक्त के भाव हो गया है। ऊँचे चढ़कर देखा, पानी का झरना तो है, पर वहाँ पचास मुगल खड़े हैं। हे दुलहे! पानी पिलाओ, नहीं तो अब प्रीति छूट रही है। एक ओर पचास मुगल एक ओर अकेला दुलहा। युद्ध जीतकर दुलहन को पानी पिला दिया, दुपट्टे के छोर से हवा की। दुलहन ने, ‘तुमने मेरा धर्म बचा लिया’, कहकर उसके गले में वरमाला डाल दी।

गीतों में युद्ध के लिए तैयार भाई को बहन प्रेरणा देती है।

बिरना! झीनी झीनी पतिया अमिलि कइ,...

बिरना! हाली-हाली जेंवउ बिरन मोरा,

बिरना! मुगल लड़इया क ठाढ़...।

बिरना! मुगल की ओरियाँ सौ साठि जने,

मोरा भइया अकेलवइ ठाढ़।

बिरना! मुगल जुझैं सौ साठि जने,

मोरा भइया समर जीति ठाढ़।...

इमली की नन्हीं-नन्हीं पत्तियों को कीलकर बरई का पुत्र पत्तल बना रहा है। भाई! जल्दी करो, पत्तल बनाओ। भाई! जल्दी भोजन करो। तुर्क युद्ध के लिए खड़ा है। उसकी ओर सौ साठ सिपाही हैं, मेरा भाई अकेला खड़ा है, उसके सभी आदमी मारे गए। मेरा भाई युद्ध जीतकर खड़ा है। ऐसी माँ की कोख को सराहती हूँ, जिसका पुत्र जीतकर खड़ा है। ऐसी बहन के भाग्य को सराहती हूँ, जिसका भाई जीतकर खड़ा है। ऐसी भाभी की माँग को सराहती हूँ, जिसका स्वामी युद्ध जीतकर खड़ा है।

आधुनिक युग में राजनैतिक चेतना का सूत्रपात गांधीजी के स्वतंत्रता आंदोलन से होता है। लोक-मानस में गांधीजी का अत्यधिक प्रभाव तत्कालीन लोकगीतों में दिखाई पड़ता है। लोकगायकों ने अपनी जोशीली वाणी में क्रांतिकारियों का संदेश घर-घर पहुँचाया। स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित कुछ उदाहरण हैं—

कुलवधुओं का स्वप्न है कि मेरा प्रिय गांधी के स्वराज्य-स्वप्न को पूरा करेगा। वह बापू को आश्वासन देती है कि मेरा प्रिय भोजन, वस्त्र का उपभोग मिल-बाँटकर करेगा, चरखा कातकर, वस्त्र बनाकर, सबको पहनाकर तब स्वयं पहनेगा—

गांधी तेरो सुराज सपनवाँ हरि मोर पूरा करिहै ना।

गांधी की जय-जयकार लोकगीतों में भी गूँज उठी थी—

एक छोटी चवन्नी चाँदी की, जय बोलो महात्मा गांधी की।

जैसे चवन्नी देखने में छोटी लगती है, वैसे ही बापू भी देखने में बहुत साधारण लगते हैं। वे महानता का मुखौटा नहीं लगाते, लेकिन सारा लोक उनकी जय-जयकार करता है।

स्वराज्य और चरखा आंदोलन का गहरा प्रभाव भी लोकगीतों पर पड़ा। स्त्रियों में भी बल और शौर्य का अनुभव तथा स्वाभिमान जगा—

अपने हाथे चरखा चलउबै, हमार कोउ का करिहै,

गांधी बाबा से लगन लगउबै, हमार कोउ का करिहै।

अपने हाथ से चरखा चलाऊँगी मेरा कोई क्या कर लेगा। गांधी बाबा से लगन लगाऊँगी, मेरा कोई क्या कर लेगा।

चरखे का तार न टूटने पाए, वह लोक की आन बन गया—

मोरे चरखे क टूटै न तार, चरखवा चालू रहे।

असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर स्वराज्य की कामना की गई है। सारे भौतिक सुखों की चाह आजादी की चाह में खो गई। लोकगीतों में फिरंगियों की अवमानना भारतीय नारियों ने भी की—

अपने पिया कै पनही ढोवइबैं, फिरंगिया भागा जाय,

अपने ससुर की पनही से पिटउबै, फिरंगिया भागा जाय।

अपने पिया का जूता फिरंगी से ढोवाऊँगी, ससुर के जूते से उसकी पिटाई कराऊँगी, वह भाग जाएगा।

मातृभूमि पर प्राण न्योछावर करनेवाले सपूतों को लोक कभी भी भूल नहीं सकता। भारतभूमि वीर प्रसूता है। अतः परतंत्र भारत के कायरों को धिक्कारता हुआ लोककवि कहता है—

जहवाँ रहिन जनमा वीर परताप सिंह, औरौ चौहान से सपूत रे फिरंगिया।

देसवा की खातिर जे मरि मिटि गए, तबहूँ न मथवा झुकाये रे फिरंगिया।

गांधी, भगत, आजाद, सुभास सपूत, कइ दिहे जान कुर्बान रे फिरंगिया।

वही देसवा म आज ऐसन अधम भए, चाटथे बिदेसियन कै लात रे फिरंगिया।

जिस देश में वीर राणा प्रताप ने जन्म लिया, पृथ्वीराज चौहान जैसे सपूत हुए, जो देश के लिए मर मिट गए। हे फिरंगी! उन्होंने अपना सिर नहीं झुकाया। जिस देश के लिए महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सुभाषचंद्र बोस जैसे सपूतों ने अपने प्राणों का बलिदान कर दिया, उसी देश में आज ऐसे अधम हो गए हैं, जो विदेशियों के पावों के तलवे चाट रहे हैं।

‘स्वतंत्रता संग्राम’ में शहीद वीरों की गाथा भी लोकगीतों में अमर है—

देसवा के करनवा केतने गए जेहलखनवाँ, केतने बीर फाँसी चढि़गै ना।

कइके तन-मन-धन अरपनवा, केतने दुनिया छोडि़गै ना।

पहिले चढि़न भगतसिंह सरदार, हँसि कै फंदा मा सिर डारि,

कितने घरवा भये बिन ललनवा ना।

जलियाँवाले बाग माँ गोली खाइके केतने मरिगे

भारत माँ के वीर जवनवाँ।

देश के कारण कितने वीर जेल गए, फाँसी चढ़ गए, अपना तन-मन-धन सब अर्पण कर दुनिया छोड़ गए। पहले चढ़े सरदार भगत सिंह हँसकर फाँसी के फंदे में सिर डाल दिया। कितने घर बिना बेटों के हो गए। जलियाँवाले बाग में कितने गोली खाकर मर गए, भारत माँ के जाने कितने वीर जवान मर गए।

‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का आह्वान लोकगीतकारों ने भी किया है—

भारत छोड़ो हे अँगरेजो, चली जोर से आँधी,

लंदन भागे, जीति गए गांधी, नजरिया हमरी भारत पै रही।

हे अंग्रेजो! भारत छोड़ो, स्वराज्य आंदोलन की आँधी जोर से चल पड़ी है। अंग्रेज लंदन भाग गए, गांधी की विजय हुई, सब की दृष्टि भारत पर थी।

भारत माता की दुःखी अवस्था का मार्मिक वर्णन है—

गंगा रे जमुनवाँ कै धारि, नयनवाँ से नीर बहै,

फूटिगै भारतियन कै भागि, भारत माता रोय रहीं।

गंगा-जमुना की धारा नयनों से नीर बनकर बह रही है। भारतीयों का भाग्य फूट गया, देश परतंत्र हो गया, भारतमाता रो रही है।

शौर्य और वीरभाव को जगानेवाले जन-जागरण के गीत ‘सुराजी’ गारी गीत बनकर गूँज उठे—

भारतवासी सोवत बाट्या, उठि परा होइगै सबेरा कि वाह वाह।

सोवत देखि के भारतवासिन, आय रहिन देसवा म गोरा कि वाह वाह।

हे भारतवासी! सो रहे हो, उठो सबेरा हो गया। भारतवासियों को सोता देखकर देश में गोरे अंग्रेज आ गए। हीरा, मोती, सोना, जवाहरात लूटकर बोरों में भर-भरकर उठा ले गए। देश का सब धन लूटकर बिलायत ले गए, बात करने पर मारने को दौड़ते हैं, बहुत बरजोरी करके सताते हैं। देश की ऐसी दशा देखकर महात्मा गांधी ने शोर मचा दिया है, सबको जगा रहे हैं।

भारत पर हुए आक्रमण के समय के भी कुछ गीत हैं—

जागा बीर भारती देसवा के रतनवा, मैदनवा बाटै दुसमन से रचा।

माँ अपने पुत्र से देश की रक्षा का वचन लेकर अपने दूध का ऋण माँग रही है—

रन माँ होई दुसमन से समनवाँ, गुमनवाँ उनकै तोर्या ललना।

नवें मास तक कोख में राखा, कस्ट सह्यों मैं भारी

दूध पियाइ पियाइके लालन, देहिया कस्यों तोहारी,

आज दुधवा से कै द्या उरिनवाँ, गुमनवा वनकै तोर्या ललना।

हे पुत्र! रण में दुश्मन से सामना होगा, उनका गर्व चूर-चूर कर देना। नौ महीने तक तुम्हें कोख में रखा, मैंने भारी कष्ट सहा, दूध पिला-पिलाकर तुम्हारा शरीर पुष्ट किया, आज उस दूध के ऋण से उऋण कर दो, दुश्मन का अहंकार तोड़ दो।

युद्ध के समय भी लोककवि ने अपने उद्गार प्रकट किए हैं—

देसवा आपन हम बचइबे, सब जतनियाँ करि कै ना,

गौरव देसवा के बढ़इबे, सब जतनियाँ करि कै ना,

गोद के देबे सलोना लाल, सोना चाँदी देब निसारि,

भारत माँ का हम बचइबे, केसरिया बनिके ना।

अपने देश को हम सब यत्न करके बचाएँगे, देश का गौरव बढ़ाएँगे। अपनी गोद के सलोने लाल देश को दे देंगे, सोना चाँदी सब निकालकर दे देंगे। भारत माँ को हम केसरी (सिंह) बनकर बचाएँगे।

अंग्रेजों के दमनकारी अत्याचारों से जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी—

फूँकि दिहिस छनिया औ छप्पर, रछसवा फिरंगी आइकै।

फूँकि दिहिस महल अटरिया, ना देखै बूढ़ा, ना देखै बच्चा

पाटि दिहिस फँसिया से पेड़वा, रछसवा फिरंगी आइकै।

एक ओर खाईं, एक ओर कुआँ, सिपाही चले सिर कफन बन्हाइ के।

सीना तानि चले राजपूतै, बहू-बिटियन कै इज्जतिया बचाय के।

राक्षस फिरंगियों ने फूस के छप्पर फूँक दिए, महल-अटारी फूँक दीं। वे आततायी आतंक पैदा करने के लिए न बूढ़ा देखते थे, न बच्चा। वे सबको फाँसी लगाकर पेड़ पर टाँग देते थे। इस तरह से फाँसी के फंदों पर लटकते लोगों से पेड़ पट गए थे। एक ओर खाई थी एक ओर कुआँ, वीर सिपाही सिर पर कफन बाँधकर चल पड़े। देश की बहन-बेटियों की प्रतिष्ठा बचाने के लिए राजपूत सीना तानकर चल पड़े।

स्वराज्य का आना बहुत बड़े सपने का पूरा होना है। इसीलिए स्वराज्य के जन्म पर सोहर गाया गया है—

जनमा सुराज सपूत त आज सुभ घरिया माँ।

सखिया! जगर मगर भै बिहान, त दुनिया अनंद भै।

आजु सुफल भई कोखिया, त भारतमाता मगन भई,

घर-घर बाजी बधइया उठन लागे सोहर।

लहर लहर लहराइ, त फहरै तिरंगवा...।

स्वराज्य सपूत का जन्म हो गया आज शुभ घड़ी में। सखियाँ जगमग करता सूर्योदय हो गया है, दुनिया में आनंद छा गया है। आज माता की कोख धन्य और सफल हुई है, भारतमाता आनंदमग्न हो गई हैं। घर-घर बधाई बज रही है, सोहर गाए जा रहे हैं। तिरंगा लहर-लहर लहरा रहा है।

स्वराज्य आंदोलन के बाद लोकगीतों में भी नई लहर आई। इनमें देशप्रेम और राष्ट्रीय चेतना के भाव अभिव्यक्त होने लगे। गीतों की लय, धुन वही थी, भाव बदल गए। गारी गीतों में विदेशी वस्त्र न छोड़ने पर व्यंग्य है—

आए सुराजी जमाना रे झमकोइया मोरे लाल,

भारत से भागि गए मेम कै भतार।

भारत माँ आइगै आपन राज, झमकोइया मोरे लाल।

स्वराज्य का जमाना आ गया। विदेशी बाजार सभी छोड़ दो ऐसा गांधीजी का कहना है। खद्दर की साड़ी सबके मन को भाने लगी है, विदेशी वेश-भूषा छोड़ दो। भारत से मेम के पति (अंग्रेज) भाग गए। भारत में अपना राज्य आ गया।

स्वतंत्रता के बाद स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस आदि नए उत्सव देश में मनाए जाने लगे। भारतमाता को देवी के रूप में पूजा जाने लगा—

भारत मंदिरवा माँ अरती उतारौ, भारत माता काँ सीस नवावौं।

गा उठा—

लहर-लहर लहराए रे, मोरा झंडा तिरंगा।

लोकसाहित्य ने जब-जब देश के लोग बेखबर हुए या भ्रमित हुए, तब-तब उन्हें जगाने का कार्य किया है। महाभारत का श्लोक ‘न दैन्यं न पलायनम्’ ऐसा सूत्र है, जो निरंतर संकल्प जगाने के लिए साहित्य के विविध रूपों में अभिव्यक्त होता रहा है। इसीलिए हर युग में साहित्य ने अपने युग की समस्या को उकेरकर उसका समाधान प्रस्तुत किया है। इस दिशा में लोकसाहित्य की भी महती भूमिका रही है।

श्रीवत्स, ४५ गोखले बिहार मार्ग, लखनऊ

दूरभाष : ९३३५९०४९२९

हमारे संकलन