अजेय योद्धा बाजीप्रभु

अजेय योद्धा बाजीप्रभु

त्रपति शिवाजी महाराज को हिंदवी स्वराज्य संस्थापक के रूप में जाना-पहचाना जाता है। शिवाजी महाराज की महानता केवल इसी बात में नहीं है, बल्कि उनकी महानता इस बात में है कि उन्होंने स्वराज्य निर्माण के कार्य के प्रति समर्पित ऐसी नरशार्दूलों की मालिका अपने साथ खड़ी की थी। छत्रपति शिवाजी महाराज को जीवन के हर मोड़ पर बड़ी-बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इन चुनौतियों से निपटने के लिए इन नरवीरों ने ही महाराज को पूरा साथ दिया था और अपनी जान भी हँसते-हँसते न्योछावर कर दी थी। यह पावन गाथा ऐसे एक महापराक्रमी नरवीर की है, जिसने अनुपम शौर्य दिखाकर इतिहास में अपना नाम अजरामर कर दिया। इस वीर ने अपने खून से सींचकर केवल घोडखिंड स्थान ही नहीं बल्कि इस देश की मिट्टी भपावन कर दी थी, शायद इसीलिए अब घोडखिंड ‘पावनखिड’ नाम से पहचानी जाती है।

जाने-माने लेखक। ‘मराठी भाषेतूनच इंग्रजी बोलायला शिका’, ‘वंदे मातरम्ची आत्मकथा’, ‘गुरुजी गोळवलकर जीवनचरित्र’, ‘छत्रपती शिवाजी आणि सुराज्य’, ‘ऑपरेशन ब्लैक टौरनैडो’, ‘अपूर्ण परिक्रमा कैलास मानसरोवर की’, ‘अपनाओ हिप्नॉटिज्म का सामर्थ्य’ (हिंदी) विविध सामाजिक व साहित्यिक विषयों की २५ पुस्तकें एवं पुस्तिकाओं का अनुवाद प्रकाशित।

महाराज ने अपने साथ जो नरवीरों की मालिका खड़ी की थी उन में से हर रत्न का मोल स्वयं महाराज जानते थे, इसीलिए ऐसे वीरों को खोने के लिए वे तैयार नहीं थे। मगर बाजी ने उन्हें ऐसा कहकर मना लिया कि ‘महाराज, लाखों लोग मर जाते हैं तो कोई गम नहीं, मगर जो लाखों लोगों का पालनहार और तारणहार है, उसे हर हाल में जिंदा रहना चाहिए। आप अगर सुरक्षित रूप से विशालगढ़ पहुँच जाते हैं तो इस कार्य हेतु मेरा बलिदान भी हो जाए तो मैं अपने आप को धन्य मान लूँगा।’’

यह इसी महान् योद्धा की पावन गाथा है। यह पावनखिड की लड़ाई मराठा इतिहास की एक बड़ी ही महत्त्वपूर्ण लड़ाई मानी जाती है। इस लड़ाई का कारण था शिवाजी महाराज का पन्हालगढ़ किले से निकलकर विशालगढ़ के किले तक सुरक्षित रूप से गमन। ऐसा क्या हो गया था महाराज को, अपने ही एक किले को छोड़कर दूसरे किले में आश्रय लेने हेतु जाना पड़ा। शिवाजी महाराज ने आदिलशाह की नाक में दम कर दिया था और बड़े-बड़े सेनानियों को धूल चटाई थी। अफजल खान जैसे बड़े सेनानी का वध किया था। इस बात से आदिलशाह क्रोधित हो गया।

उस ने सिद्दी जौहर को मराठा साम्राज्य पर हमला करने के लिए भेज दिया। उसी समय मुगलों से हाथ मिलाकर उनको भी मराठा साम्राज्य पर हमला करने के लिए उकसाया। उस समय महाराज पन्हालगढ़ पर डेरा डाले हुए थे। सिद्दी जौहर ने बड़ी चतुराई से पन्हालगढ़ किले की घेराबंदी कर डाली। इतनी बड़ी फौज का मुकाबला करना आसान नहीं था। यह घेराबंदी तोड़ना भी आसान नहीं था। महाराज के सामने यक्षप्रश्न खड़ा हो गया था।

सिद्दी जौहर, फाजल खान और उसकी पैंतीस हजार की सेना अपनी आँखें पन्हालगढ़ पर टिकाए बैठी थी। यह गढ़ कब हमारे कब्जे में आएगा, इसी बात का सपना उनकी आँखों में था। अंदर महाराज भी छटपटा रहे थे कि इस घेराबंदी से कैसे बाहर निकला जाए। ऐसे में विशालगढ़ उनको बुला रहा था। यह पन्हालगढ़ की वायव्य दिशा में लगभग बीस कोस की दूरी पर स्थित है। पन्हालगढ़ की घेराबंदी से किसी चींटी को भी बाहर निकलना मुश्किल था। ऐसे में आषाढ मास आ गया। मूसलधार वर्षा में भी सिद्दी वहीं पर अड़ा था। पन्हालगढ़ पर छह हजार मराठा सैनिक थे। उनमें कई महापराक्रमी वीर थे और एक असली मोती था बाजीप्रभु देशपांडे। इस कठिन घड़ी में बाजीप्रभु महाराज के साथ थे। बाजीप्रभु का जन्म चांद्रसेनीय कायस्थ प्रभु वंश के एक परिवार में वर्तमान पुणे क्षेत्र के भोर तालुका के मावल प्रांत में हुआ था। बाजीप्रभु का वर्णन किया जाए तो महारुद्र बजरंगबली का ही स्मरण हो सकता है—भीमरूप अतुलित बलधामा। ऐसा शायद उनके लिए ही कहा गया हो। वे इतने ताकतवर थे कि बीस-बाईस घंटे अनथक परिश्रम कर सकते थे। उनकी आयु शायद पचास के आसपास होगी। लेकिन जिस तरह हनुमानजी ने भगवान् रामचंद्र का साथ दिया था, उसी तरह भक्तिभाव से बाजी शिवाजी महाराज के चरणों में लीन हो गए थे। महाराज के आदेश पर कुछ भी कर गुजरने का साहस उनमें था।

आधा आषाढ बीत गया था। अब तो इस घेराबंदी में घुटन होने लगी थी। यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं था। यहाँ से निकलने का महाराज ने मन बना लिया, मगर यह भी खतरे से खाली न था। निकले तो कैसे निकले? फिर भी महाराज ने एक साहसी योजना बना ली। यह योजना उन्होंने अपने भरोसेमंद सहकारियों को बताई। सभी लोगों ने उस योजना पर काम करने का मन बना लिया। महाराज के गुप्तचरों ने बाहर निकलने के लिए एक छोटी दरार खोजने की ठान ली। सिद्दी जौहर की घेराबंदी से बाहर निकलने का मार्ग खोजना बिल्कुल खतरनाक था। जौहर की फौज गढ़ पर अपनी आँखें गढ़ाए खड़ी थी और कहीं से भी जानलेवा गोली आकर लगने की पूरी आशंका थी। ऐसे हालात में यह खोज करने का असंभव कार्य जान हथेली पर लेकर चलनेवाले साहसी गुप्तचरों के बलबूते पर ही संभव हो पाया।

गुप्तचरों ने एक नाजुक दरार ढूँढ़ निकाली थी। वहाँ न तो जौहर के सैनिक थे और न तो कोई पहरा। लेकिन वह मार्ग ही इतना सँकरा और फिसलन भरा था कि वहाँ से किसी का आना-जाना भी असंभव लगता था। शायद इसीलिए जौहर के हाशम भी वहाँ आने से कतराते थे। उन्होंने सोचा होगा कि यह जगह प्राकृतिक रूप से ही आनेजाने के लायक नहीं है तो वहाँ से कौन गुजरेगा।

अब मार्ग तो बन गया था, मगर इस मार्ग से गुजरने में भी खतरा ही था। हाँ, अगर जौहर की फौज में थोड़ा सा बेफिक्री का वातावरण बन जाता है तो उनकी नजरें बचाकर यहाँ से बाहर निकलना संभव लगता था। इसलिए महाराज ने आगे का दाँवपेंच चलाया।

आषाढ पूर्णिमा के दिन महाराज के महल से गंगाधरपत जौहर के लिए एक महत्त्वपूर्ण संदेसा लेकर बाहर निकले। यह संदेसा महाराज की शरणागति का संदेसा था, जिसके लिए जौहर बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहा था। केवल खत ही नहीं, जौहर का दिल रखने के लिए बेहतरीन नजराने भी साथ भेजे गए थे।

शिवाजी महाराज के गढ़ से उनका संदेसा लेकर कोई वकील आया है, इस खबर से जौहर की सारी फौज में खुशी की लहर दौड़ गई। इसी अंजाम को ध्यान में लेकर ऐसी बरसात में भी पुख्ता इंतजाम करके सभी लोग तैनात थे। अब इस सब्र का मीठा फल मिलते हुए नजर आ रहा था। सब लोग निहायत खुश हो गए थे।

जौहर की खुशी का तो कोई ठिकाना नहीं था। महाराज के वकील के साथ क्या और कैसी बातें करनी चाहिए, इसी विचार में जौहर मशगूल था और तब ही गंगाधरपत ने आकर उसको कुर्निसात करते हुए महाराज का संदेसा नजर कर दिया।

महाराज ने लिखा था, ‘‘...अगर आप की अनुमति हमें मिलती है तो रात को कुछ चुनिंदा लोगों को साथ लेकर मैं आपकी सेवा में हाजिर हो जाऊँगा।...मेरे बड़े-बड़े गुनाह आप बड़ा दिल दिखाकर माफ कर दीजिएगा। आनेवाले खतरे से बड़े-बुजुर्ग बनकर आप ही मेरी रक्षा कर सकते हैं। मैं खुद आपको मिलने आ रहा हूँ और मेरी सारी दामदौलत हजरत बादशाह के वास्ते आपको सौंपने के लिए मैं राजी हूँ।’’

संदेसा बहुत ही स्पष्ट था। महाराज ने शरणागति की दरख्वास्त की थी और खुद होकर सबकुछ बादशाह को सौंपने की बात भी कही थी। अब तो इस से बढ़कर जौहर की भी कोई माँग नहीं थी। सबकुछ बिन माँगे ही मिल रहा था। जौहर सोच में तो अवश्य पड़ गया, मगर महाराज का विनम्र अनुरोध मान लेने से कतरने का कोई सवाल ही नहीं था। इसे मंजूरी देना आवश्यक ही था।

सिद्दी ने इस पहाड़ के चूहे का निकलने को कोई अवसर बाकी नहीं रखा था। केवल यही एक रास्ता शिवाजी महाराज के लिए बाकी बचा था—सम्मानजनक शरणागति और महाराज ने वही चुन लिया था। सिद्दी ने सोच-विचार करते हुए बड़ी प्रसन्नता से इस अनुरोध को मंजूरी दे दी।

सारी फौज में यह खबर फैल गई। महाराज की शरणागति का संदेसा लेकर वकील आया था और सिद्दी जौहर ने उसे मंजूरी दे दी है। ऐसी खबर अपना असर तो अवश्य करती है। फौज को लगा कि यह तो बहुत अच्छा हो गया है। बिना जंग लड़े ही सफलता हाथ लग गई है। सफलता का नशा बहुत खराब होती है। रात-रात जागनेवाले को आँखें मूँदकर सोने के लिए सफलता मजबूर कर देती है। यह सफलता की खबर नहीं बल्कि अफीम की गोली थी। जिसे खाकर जौहर की फौज ने आनंद की डकार ली थी और वह गाफिल बन गया था।

शत्रु को गफलत में रखकर महाराज ने १२ जुलाई की रात गढ़ से निकलने की योजना को अंजाम देना तय किया था। उन्होंने केवल छह सौ हथियारबंद लोग ही अपने साथ लिये थे। इन लोगों में बाजीप्रभू और हिरडस मावल के शूर जवानों का समावेश था। अब आगे का इतिहास किसी कलम से नहीं बल्कि खून से ही लिखा जानेवाला था। पूर्णिमा की रात थी, मगर आकाश में काले बादल चाँद को छुपाने की होड़ में लगे थे और बीच-बीच में कड़कने वाली बिजली ही पूर्णिमा का संकेत दे रही थी। यहाँ बाजीप्रभु के साथ और एक महावीर का उल्लेख करना आवश्यक है। यह वीर कोई सैनिक नहीं था बल्कि पेशे से नाई था और योगायोग ऐसा था कि वह हूबहू महाराज की कदकाठी का था और दिखता भी उनके जैसा ही था। जौहर के साथ बातचीत करने के लिए उसी की योजना हुई थी और उस समय सैनिक से बढ़कर भी धैर्यशीलता इस शिवा काशीद नामक नाई ने दिखाई थी। इस शिवा नाई की पालकी जौहर के शामियाने की ओर निकल पड़ी और उसी आनन-फानन में महाराज अपने साथियों को लेकर उस सँकरी दरार से पन्हालगढ़ छोड़ने में कामयाब हो गए।

अपने साथ धोखा हुआ है, यह सिद्दी जौहर को पता चला और वह गुस्से से पागल हो गया। असली शिवाजी महाराज विशालगढ़ की ओर रवाना हो गए हैं, इस बात की उसे भनक लग गई। महाराज का पीछा करने के लिए उसने अपने विश्वासपात्र सिद्दी मसूद को रवाना किया।

महाराज और उनके साथी अब घोडखिंड तक ही पहुँच पाए थे, उनको यह अँदेशा हुआ कि अब सिद्दी मसूद और उसकी फौज करीब पहुँचनेवाली है। अगर मसूद से सामना होता है तो हम कभी विशालगढ़ तक नहीं पहुँच पाएँगे और यह योजना नाकामयाब सिद्ध हो जाएगी। यह बात उस रात में भी स्पष्ट दिख रही थी। घोडखिंड तो केवल नाम के लिए रास्ता था, वहाँ से एक समय पर एक-दो लोग ही बड़ी मुश्किल से गुजर सकते थे। तब बाजीप्रभु के दिमाग में बिजली कौंध गई कि अगर मसूद और उसकी फौज को बीच रास्ते में ही रोक लिया जाए तो महाराज सुरक्षित रूप से विशालगढ़ तक पहुँच सकते हैं। अब महाराज और मसूद के बीच में मुझे दीवार बनकर खड़ा होना है, यह बात बाजीप्रभु ने ठान ली और वैसा महाराज से अनुरोध किया।

महाराज ने कहा, ‘‘बाजी आपकी बात में दम अवश्य है, मगर यह बात मानने लायक नहीं है। मैं केवल अपनी जान बचाने के लिए आप जैसे मोती को कुर्बान नहीं कर सकता हूँ। मैं भी आपके साथ इसी मोर्चे पर अडिग रहूँगा। हम दोनों मिलकर मसूद को धूल चटाएँगे और फिर विशालगढ़ की ओर रवाना हो जाएँगे।’’

बाजी ने यह बात पहचान ली थी कि ये सारी बातें महाराज की नहीं, उनका अपने साथियों के प्रति जो प्रेम और सद्भाव है, उसी के मुँह से निकल रही हैं। क्योंकि मसूद को रोक पाना अथवा उसको पराजित कर विशालगढ़ पहुँचना यह असंभव था। आगे का रास्ता भी खतरनाक ही था। अगर तुरंत समय न गँवाते हुए विशालगढ़ की ओर प्रस्थान किया जाता है और उस बीच मसूद को घोडखिंड में ही रोका जाता है तो ही यह योजना सफल हो सकती थी। क्योंकि विशालगढ़ में भी महाराज का प्रवेश लड़कर ही संभव था। वहाँ बीजापूर के दो सरदार सूर्यराव सुर्वे और जसवंतराव पालवनीकर घेराबंदी लगाकर बैठे हुए थे। उस घेराबंदी में सेंध लगाकर विशालगढ़ में प्रवेश संभव था। बाजीप्रभु यह बात भलीभाँति जानते थे। इसलिए उन्होंने महाराज की एक न सुनी और उन्हें विशालगढ़ की ओर प्रस्थान करने को कहा। भारी अंतकरण से आधी सेना अर्थात् केवल ३०० सैनिक बाजीप्रभु के हवाले करते हुए महाराज आगे बढ़ने लगे। बाजीप्रभु के साथ दो ३०० सैनिक बचे थे उनको भी इस बात की पूरी कल्पना थी कि इस घोडखिंड में हमें शबू की मारकाट करते हुए स्वयं भी वीरगति को प्राप्त होना है। मगर किसी का कदम पीछे नहीं हटा। घोडखिंड से महाराज के साथ जो सैनिक आगे बढे़ थे, उनको भी पता था कि विशालगढ़ को घेराबंदी लगाकर वहाँ भी शबू उनका इंतजार कर रहा है और उससे जूझने का अवसर उन्हें अवश्य मिलनेवाला है। इसी उत्साह के साथ महाराज की सेना विशालगढ़ की ओर बढ़ने लगी थी।

इस घोडखिंड में मराठा शूरवीरों ने जो कहर बरपाया, उसका तो केवल इतिहास ही साक्षी है। आनेवाले मुगल सैनिकों पर ‘हर हर महादेव’ की हुंकार के साथ मराठा सेना टूट पड़ी थी। वैसे यह बड़ा ही असमान युद्ध था। बाजीप्रभु के पास केवल तीन सौ सैनिक थे और मुगलों की तुलना में यह तो उनका केवल सौवाँ हिस्सा थी। मगर भीमकाय बाजीप्रभु ने तो नरसिंहावतार धारण कर लिया था। भूखे शेर की तरह दहाड़ते हुए बाजीप्रभु अपने दोनों हाथों में समशीर लेकर मुगल सेना पर टूट पडे़ थे। महाराज ने कहा था, ‘‘जब हम विशालगढ़ सुरक्षित रूप से पहुँच जाएँगे, तब आपको संकेत देने के लिए तीन तोपों की सलामी होगी। उनकी आवाज सुनकर आप समझ लेना कि हम वहाँ पहुँच गए हैं और फिर आपको भी विशालगढ़ की ओर रवाना होना है।’’

तब बाजीप्रभु ने इतना ही कहा था, ‘‘महाराज, तोपों की सलामी सुने बिना बाजी की आत्मा इस देह को छोड़कर नहीं जा सकती है, यह मेरा वचन है।’’

इसलिए तोपों की सलामी तक दुश्मन को खिंड में ही उलझाए रखना बाजी का प्रमुख कार्य बन गया था। समरांगण में लड़ते हुए बाजीप्रभु की देह पर इतने घाव बन गए थे और इतनी चोटें आ गई थीं, ऐसी हालत में उनका खड़ा होना भी मुश्किल था। मगर अचरज की बात यह थी कि बाजी समरांगण में खड़े ही नहीं थे बल्कि दुश्मनों को ही मौत के घाट उतार रहे थे। मानो महाकाल ने अपना मुख खुला किया हो और आनेवाला हर कोई उस कालमुख में समाता जा रहा हो। उनका पूरा शरीर खून से लथपथ हो गया था। उनका सीना तलवार और भालों के घावों से छलनी हो गया था। मगर बाजी अपने मोर्चे पर अडिगता से डटे हुए थे।

उधर शिवाजी महाराज को विशालगढ़ के सामने पहले से मौजूद दुश्मनों का सामना करना पड़ा और उनसे जूझते हुए लगभग सुबह ही हो चली थी। मगर सूरज की रोशनी धरती पर पहुँचने तक महाराज ने गढ के भीतर प्रवेश प्राप्त कर लिया और बाजी प्रभु को इशारा देने हेतु तीन तोपों की सलामी दी। इन तोपों की गड़गड़ाहट सुनने के लिए बाजीप्रभु आतुर थे। वे लगभग मरणासन्न हो गए थे, मगर तोपों की सलामी सुनने के लिए साँसें रोक रखी थीं। तोपों की ध्वनि सुनते ही बाजीप्रभु के साथी सैनिकों ने भी ‘हर हर महादेव’ का जयकारा लगाया और बाजीप्रभु को लेकर वे दर्रे से बाहर निकल गए। अब बाजी के प्राणपखेरू भी उस नश्वर काया को त्यागने के लिए आतुर हो गए थे। बाजी ने चैन की साँस ली और उनका सर एक ओर लुढ़क गया। मगर उनके चेहरे पर असीम आनंद की मुसकान थी। यह आनंद कर्तव्यपूर्ति का आनंद था। अपने जान से भी प्यारे महाराज की जान बचाकर सुरक्षित मुकाम पर पहुँचाने का आनंद मुखमंडल पर शोभायमान रखते हुए ही महावीर बाजीप्रभु वीरगति को प्राप्त हो गए थे। उनकी असीम स्वामिनिष्ठा के कारण यह घोडखिंड उनके पावन लहू से पावन हो गई थी। वह दिन था १३ जुलाई, १९६०।

बाजीप्रभु की वीरगति का समाचार सुनकर महाराज का हृदय भर आया। उन्होंने बाजीप्रभु को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए घोडखिंड का ‘पावनखिंड’ नामकरण कर दिया और आज भी इस दर्रे को इसी नाम से जाना-पहचाना जाता है। भारतीय इतिहास के पत्रों से बाजी का नाम कभी नहीं मिट पाएगा। उनका यह स्वर्णिम बलिदान ही स्वराज्य स्थापना के लिए नींव का पत्थर बन गया।

—दीपक हनुमंतराव जेवणे

सी बिल्डिंग, ९०३, नौवीं मंजिल,

आनंदताराज हरितारा, भीमनगर,

एन.डी.ए. रोड, कोंढवे धावडे, पुणे-४११०२३

दूरभाष : ९५९४९६१८६४

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