शौर्य के आयाम

शौर्य के आयाम

भारत का अहिंसक स्वतंत्रता संग्राम देश के सबसे बड़े शौर्य पुरुष के संघर्ष का ज्वलंत उदाहरण है। धोती-लँगोटी-धारी कृशकाय गांधी ने सिद्ध कर दिया कि तोप-बंदूक के मुकाबले सत्याग्रह कहीं अधिक प्रभावी है। बिना सूट-टाई भी अंग्रेजी शासकों से संवाद संभव है। गांधी का दर्शन आज भी उपयोगी है, पर राजनेता उन्हें केवल जुबानी जमा खर्च का सम्मान देते हैं, उनके विचारों पर अमल करने का नहीं। वैचारिक स्तर पर बुद्ध, महावीर और गांधी दुनिया के शांतिदूत हैं, पर उनकी सीख पर ध्यान कौन दे? तभी दुनिया के हर देश का रक्षा बजट दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है, सीमाओं की सुरक्षा के नाम पर। यही धन हर देश की गरीबी मिटाने को पर्याप्त है। यदि ऐसा हो तो संसार विकास का स्वर्ग बन सकता है। पर किसे फुरसत है, इस दिशा में सोचने की भी? हमारे पड़ोसी देश को चिंता है कि कैसे वह पास के मुल्कों में आतंक को आयात करे? भले इसकी सजा के बतौर उसके नागरिक दाने-दाने को तरसें! आर्थिक प्रगति और विकास उससे मुँह मोड़ें।

इसी तरह अपनी जीवन-शैली की प्रशंसा से गांधी ने छुआछूत का विरोध ही नहीं किया, हिंदू समाज को जातियों में विभाजन करने का भी। पर हमारे सियासत-दाँ अपनी-अपनी जाति को आरक्षण दिलवाने में जुटे हैं। सबका लक्ष्य अपना वोट बैंक बनाना है। भले ही इससे जातिगत वैमनस्य और पनपे। गांधी के दर्शन और चिंतन का इससे बड़ा मखौल क्या होगा? उस पर तुर्रा यह कि ऐसे स्वयं को गांधी के अनुयायी होने का दम भरते हैं। कई नेता गांधी-आश्रम जाकर चरखा कातते हुए फोटू खिंचवाते हैं। उनका खयाल है कि इस नाटक से जनता उन्हें भी गांधी का चेला मान लेगी। हमें यकीन है कि वह भी जानते हैं कि गांधी मद्य-निषेध के पक्षधर थे। पर वह बात भले ही नशाबंदी की कर लें, व्यवहार में महँगी विदेशी शराबों का सेवन उनका शौक है। दिन ढलने के बाद नियम से वह दारू से ऐसे टुन्न होते हैं कि किसी को दर्शन देने के योग्य नहीं रहते। उनकी उन्नावस्था के किस्से सियासी गलियारों में ही नहीं, जनता के बीच भी आम हैं। उन्हें मुगालता है कि चरखा कातने के एक फोटू से वह गांधी-भक्त सिद्ध होंगे और उनके दूसरे पाप धुल जाएँगे। बिहार के अलावा किसी भी अन्य राज्य ने मद्य-निषेध का प्रयत्न भले ही किया हो, उसे अपनाया नहीं है।

आज भी गरीब के घर में कोहराम मचता है, जब पुरुष अपनी सारी कमाई ‘पौवों’ की भेंट चढ़ा बैठता है। घर में भूख है, अभाव है, पर उसके पेट में तो दारू है, उसे क्या फिक्र है? वह गटर में गिरे या घर की गली में। उलटे जब पैसे नहीं होते तो वह कुछ भी बेचने को प्रस्तुत है। चाहे इसमें पत्नी के मायके से लाए गहने-जेवर हों। ‘पौवा-वीर’ पीने को ही अपना शौर्य मानते हैं। घरेलू हिंसा का सबसे प्रमुख कारण यही दारू की लत है। पर बिहार के अलावा एक भी राज्य शराबबंदी की नीति की दुहाई भले दे, उसे लागू नहीं करता है। सबका इकलौता तर्क है कि उनके राजस्व का क्या होगा? कैसे चलेगा राज्य का खर्चा? वह यह नहीं सोचते हैं कि बिहार ने ऐसा सफलता से कैसे कर दिखाया? हमें कभी-कभी लगता है कि हम गांधी का बाह्य अनुकरण करते हैं, जैसे खादी पहन ली, उनकी समाधि पर फूल चढ़ा दिए, वगैरह-वगैरह। पर अंदर से हम आश्वस्त हैं कि प्रगति का गांधी-मॉडल अब समीचीन नहीं है। ऐसों के लिए सादा जीवन संभव नहीं है। उनका विचार है कि उसके बिना भी जन-कल्याण के उच्च विचार रखे जा सकते हैं। इतनी जुगाड़ और भागदौड़ के बाद मंत्री बने हैं तो फिर क्यों भला झोंपड़ी में रहें? ऐसे शहर में झुग्गी-झोंपड़ी हैं ही कहाँ? सरकारी आँकड़ों के अनुसार सबको उचित आवास मुहैया करवा दिए गए हैं। बची-खुची का उन्मूलन किया जा रहा है। अब तो शहर को ‘स्मार्ट’ बनाना है, भले ही स्वच्छ हो न हो।

दूसरा शौर्य का पर्याय हमारी सीमा पर नियुक्त सिपाही हैं। वह शरीर और मन की शक्ति का प्रतीक है। इतने बम-गोलों की घातक बौछार के बीच टिके रहना कोई आसान बात है क्या? हमारे मोहल्ले के पलटू दफ्तर की यूनियन के नेता हैं। उनके कंठ में ध्वनि विस्तारक यंत्र फिट है। जब वह गला फाड़कर नारे लगाते हैं तो बिल्डिंग की खिड़की के काँच कँपकँपा उठते हैं। इमारत में बैठे अफसरों को डर लगता है कि कहीं उसकी बुनियाद ही भरभराकर गिर न पड़े? किंतु सब इस तथ्य से आश्वस्त हैं कि बिल्डिंग अंग्रेजों के वक्त की बनी है और आसानी से टपकनेवाली नहीं है। लोग कभी-कभी ताज्जुब भी करते हैं कि आजादी के बाद के निर्माण में ऐसी क्या गिरावट आ गई है? ठेकेदार तब भी भारतीय थे, आज के समान। फिर ऐसा क्या अंतर हो गया? कौन उन्हें बताए कि इमारत के निर्माण में तब भ्रष्टाचार की सीमेंट नहीं लगती थी। बस कार्य की एक समय सीमा थी, जिसके अंदर वह पूरा होना होता था। ठेकेदार उसी का पालन करते। उन्हें इधर-उधर कमीशन की दर के लिए दौड़-भाग नहीं करनी पड़ती। न सीमेंट में उचित मिलावट का प्रबंध।

फौज का सिपाही सीमा की सुरक्षा पर अपनी जान से खेलता है, साहब अपने शौर्य-प्रदर्शन को बाजार से। उनको वहाँ पहला पटरी दुकानदार नजर आता है। जीप उसके पास जाकर रुकती है। साहब मौन रहकर उतरते हैं और बैटन दुकानदार की पीठ पर बरसकर उसके ठोस होने का अनुमान लगाते हैं। पीठ कितनी ठोस है? इस पर कोई वार होता है तो चोट कितनी लगती है? एक बार बैटन खाकर पीठ हाथ को जेब में जाने की प्रेरणा देगी कि नहीं? सिपाही का तो यह रोज का करतब है। उसकी वसूली की राशि भी तय है।

ऐसे पलटू की खासियत है। सामान्य बातचीत के दौरान यदि कहीं मोटर साइकिल का ‘मिस-फायर’ भी होता है तो वह तत्काल तड़ी होते हैं। कभी-कभी तो प्रत्यक्षदर्शियों ने उन्हें वहाँ से सौ मीटर की गति से दौड़ लगाते भी देखा है। क्या पता, कहाँ से बम चलनेवाला हो? खैरियत इसी में है कि जल्दी-से-जल्दी यहाँ से खिसक लो। नारों तक तो ठीक है लाठी या डंडे और इस प्रकार की आवाज को वह अपनी सेहत के लिए शुभ नहीं मानते हैं। इसीलिए आज तक उन्होंने पुलिस के लाठी-डंडों से परहेज किया है। यदि कभी लाठी चार्ज होता भी है तो लोग खोजते रहते हैं कि पलटू कहाँ गुम हो गए? उनकी स्वीकारोक्ति भी है कि यदि शारीरिक खतरे ही झेलने होते तो दफ्तर की बाबूगीरी क्यों करते, फौज में भरती हो जाते। कोई कुछ भी कहे, हमें तो ‘वन पीस’ रहना है।

उन्हें अपने प्राण प्यारे हैं। ऐसे भले कोई उन्हें कायर समझे, पर वह कंठ-शौर्य के धनी हैं। उनके ऐसे नारा-बहादुर मिलना कठिन है। फौज के सिपाही से सिर्फ पलटू ही प्रेरित नहीं हैं, पुलिस के एस.एच.ओ. साहब भी अपने शौर्य प्रदर्शन में अग्रणी हैं। जब वह वर्दी पहनकर अपनी मूँछें सहलाते हैं तो उनमें गजब की आंतरिक शक्ति का संचार होता है। उन्हें लगता है कि पाँव जमीन से कुछ ऊपर उठे हैं। उनकी बाँहों का रक्त संचार कुछ बढ़ गया है। हाथ का ‘बैटन’ किसी पर बरसने को तैयार है। इतना ही नहीं, वह कहीं-न-कहीं विवश हो उठे हैं, इस पवित्र कर्म के लिए शिकार खोजने को। सरकार का दृढ़ निश्चय कानून व्यवस्था का सुधार है। इसके लिए, प्रथम कदम के रूप में, हर बड़े थाने में वाहन की सुविधा मुहैया करवाई गई है। सिपाही रात को पैदल पेट्रोलिंग करेंगे और ‘साहब’ वाहन से जाँच करेंगे कि उनके आदेश का पालन हो रहा है कि नहीं? वह एक बार फिर अपनी मूँछों का निरीक्षण करते हैं और जीप पर बैठकर ‘बैटन’ की प्यास बुझाने को निकल पड़ते हैं। ड्राइवर को साहब का रुटीन पता है। फौज का सिपाही सीमा की सुरक्षा पर अपनी जान से खेलता है, साहब अपने शौर्य-प्रदर्शन को बाजार से। उनको वहाँ पहला पटरी दुकानदार नजर आता है। जीप उसके पास जाकर रुकती है। साहब मौन रहकर उतरते हैं और बैटन दुकानदार की पीठ पर बरसकर उसके ठोस होने का अनुमान लगाते हैं। पीठ कितनी ठोस है? इस पर कोई वार होता है तो चोट कितनी लगती है? एक बार बैटन खाकर पीठ हाथ को जेब में जाने की प्रेरणा देगी कि नहीं? सिपाही का तो यह रोज का करतब है। उसकी वसूली की राशि भी तय है। पर आज तो साहब पधारे हैं। उन्हें क्या दिया जाए? पहला बैटन पड़ने से ‘पेन’ तो है, पर दिमाग सक्रिय है, राशि निर्धारित करने में कि दूसरा बैटन पड़ता है। वह दोनों हाथ जेब में डालकर निकालता है और एक हजार के लगभग की राशि शौर्य के इस पर्याय को भेंट चढ़ाता है। उल्लेखनीय है कि यहाँ मुँह से एक शब्द भी नहीं निकला है। संवाद का सूत्रधार साहब का ‘बैटन’ है। बाजार भर में उस दिन मौन ‘बैटन-संवाद’ चलता है, जैसे बॉर्डर के इस पार से लेकर उस पार तक बम-गोलों की गरज। बॉर्डर पर कइयों के प्राणों पर बन आई है, यहाँ बाजार में साहब की सिर्फ कमाई ही कमाई है। सिपाही का शौर्य साहस, प्रशिक्षण और देशप्रेम का है, साहब का शौर्य भ्रष्ट आचरण का।

साहब अपने करप्शन को मन-ही-मन न्यायोचित भी ठहराते हैं। उन्होंने भरती से लेकर हर पदोन्नति पैसे देकर पाई है। उन दिनों कोई और कर ही क्या सकता था? भरती की रीति ही यही थी। हर स्थान पर घूस का बोलबाला था। नौकरी चाहे शिक्षक की हो या चपरासी की अथवा पुलिस के सिपाही की, सब जगह पैसा चलता था। कोई मुख्यमंत्री की जात का हो तब भी एक दो प्रतिशत की रियायत ही थी, पर नौकरी की खरीद में कीमत पूरी माफ कहीं नहीं थी। जमीन गिरवी रख या उधार लेकर खरीदनेवाले भी क्या करें? उनकी भी विवशता है। कर्ज ली रकम ब्याज सहित वसूलनी है, वरना नौकरी का लाभ ही क्या है?

चपरासी पढ़ा-लिखा है। वह फाइल की गुप्त सूचनाएँ बेचता है, शिक्षक बच्चों का भविष्य और वर्दीधारी ईमान। जिसने इस लेनदेन के क्रम को भंग किया है, शासकीय व्यवस्था में वह ऐसे सबके लिए, दंडनीय अपराध का खलनायक है। उसे न कुरसी पर रहने का अधिकार है, न सत्ता में आने का। वह तो दुर्घटना एक बार हो गई। भ्रष्टों को आशा थी कि दुबारा नहीं होगी। किंतु वह तो दुबारा से हो जाती है, कहते हैं कि एक ही स्थान पर बिजली दुबारा नहीं गिरती है। पर यहाँ तो प्रकृति के नियम तक को सिंगट्टा दिखा दिया है, करप्शन के विरुद्ध युद्धरत इस नायक ने। अब भ्रष्ट शौर्य-वीर चिंतित हैं। कहीं वह पकड़े गए तो उनकी आगे की आमदनी का क्या होगा?

बैटन पीठ या पार्श्व भाग को ‘हैलो’ कहकर कैसे कमाई करेगा? यही दुर्दशा सरकारी दफ्तरों और शिक्षा-संस्थाओं की है। सब शंकित हैं। बड़े अधिकारियों की तरह, यह भी शासकीय प्रावधान की लात से कार्यक्षेत्र से बाहर न फेंक दिए जाएँ? फिर बस तीन महीने के वेतन से ही संतोष करना पड़ेगा। सारी भविष्य की उम्मीदें धरी रह जाएँगी। यों भी आयु के साथ साँस की डूबती नाव का क्या भरोसा है? तब डूबी कि अब? फिर भी भ्रष्ट अपने दुष्कर्मों से बाज नहीं आते हैं। कौन कहे वह इस कलंकित पैसे का क्या करेंगे? मृत्यु के बाद की नियति किसे पता है? क्या परलोक में सिर्फ सतत सन्नाटा है या फिर कोई गतिविधि भी है? क्या भ्रष्ट-श्रेष्ठों का वहाँ पर कोई बैंक खोलने का इरादा है? अभी तक एक-दो पीढ़ी का प्रबंध वह कर चुके हैं, इस अनपेक्षित सरकारी खलल के वाबजूद। अब परलोक के प्रबंध का सोच रहे हैं।

वही सिपाही सीमा पर बिना किसी लोभ-प्रलोभन के तैनात है। उसे सिर्फ अपने कर्तव्य से वास्ता है। कहीं इस गोलाबारी की आड़ में कोई दहशतगर्द उस पार से भारतीय सीमा में प्रवेश न कर लें? घुसपैठिए किसी भी सेंध में छिपकली से घुसपैठ की कला में पारंगत हैं। वह इसके विशेषज्ञ हैं। निर्दोषों की जान लेने के लिए ही वह हर खतरा झेलने को प्रस्तुत हैं। उन अनपढ़ों को प्राण से हाथ धोने के बाद हूरों के आकर्षण का कपोल-कल्पित लालच दिया जाता है। धर्म का अतिरेक आदमी को अंधा बनाने में समर्थ है। यदि यह बात किसी तथ्य से सिद्ध होती है तो उसके आदर्श उदाहरण के लिए कहीं दूर नहीं जाना पड़ेगा। किसी घुसपैठिए का जीवन-वृत्त ही इसके लिए पर्याप्त है।

जैसे लक्ष्मण का ‘कॉमन मैन’ आम आदमी का प्रतिनिधित्व करता था, वैसे ही सीमा पर तैनात सामान्य भारतीय सिपाही शौर्य का। वह साहस का प्रतीक है, जैसे अहिंसा के गांधीजी। इस कर्तव्य से प्रेरित भारतीय सिपाही की प्रशंसा में कुछ भी कहा जाए, वह कम है। इस देश में शौर्य के कई विकृत चेहरे भी हैं। कुछ भ्रष्टाचार में डूबे हैं, कुछ उसके माध्यम से धन के संचय में। यदि कोई इन्हें रेखांकित करे तो एक समान तथ्य सबमें उभरकर आएगा। सबकी नाक समान रूप से गायब मिलेगी और पेट किसी मटके सा फूला हुआ। यह अपमान, प्रतारणा, हर स्थिति में आत्मा का हनन आदि सब उदरस्थ करने में माहिर हैं। शौर्यवान सिपाही की एक अन्य विशेषता है। अपने कर्तव्य को निभाने के लिए न वह भूख से हतोत्साहित होता है, न ठंड से निराश। वह अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए डटा रहता है, भूख, प्यास, विपरीत मौसम के बावजूद। निर्धन हो या धनवान, हर भारतीय उसके नमन को स्वेच्छा से नत है। शब्द असमर्थ हैं उसकी महानता के वर्णन को, उसी प्रकार जैसे कोई तपते हुए सूरज को कंदील दिखाए, दोनों की रोशनी को समान बताए?

—गोपाल चतुर्वेदी

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