स्वामी सत्यमित्रानंद : समन्वय-साधना के शिखर पुरुष

ज्योतिष्पीठ बद्रिकाश्रम से संबद्ध आचार्यपीठ भानुपुरा के निवृत जगद्गुरु शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, विश्व-विश्रुत समन्वय-साधक स्वामी सत्यमित्रानंद गिरिजी महाराज वर्तमान काल में समन्वय के पर्याय रहे, तो ‘समन्वयात्’ ब्रह्मसूत्र समस्त श्रुति वाक्यों में दार्शनिक समन्वय का आधार है तो दूसरी ओर लोक-जीवन का महत्त्व बताते हुए कहा गया कि समन्वय परमार्थ का सोपान है, व्यवहार पक्ष की भिति पर ही है। पूज्य श्री स्वामीजी ने जीवन भर अपने पूर्वाचार्यों के सिद्धांतों का अनुवर्तन तो किया ही, साथ ही समन्वय की दृष्टि को समाज के सम्मुख रखते हुए यही आग्रह किया कि खंडन की अपेक्षा स्वीकरण, सहिष्णुता अधिक श्रेयस्कर है, अतः पूज्यश्री व्यक्तित्व में कहीं भी कठोरता की अपेक्षा उदारता, कोमलता और समन्वयी दृष्टि की अभिव्यक्ति पग-पग पर दृष्टिगोचर होती है।

१९ सितंबर, १९३२ में भरतभूमि में आविर्भूत श्री अंबिका प्रसाद पांडेय (श्री स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि महाराज) बाल्यावस्था से ही अध्ययनशील, चिंतक और निस्पृही व्यक्तित्व के धनी थे। उनके पूज्य पिता, राष्ट्रपति सम्मानित शिक्षक श्री शिव शंकर पांडेयजी ने उन्हें सदैव अपने लक्ष्य के प्रति सजग और सक्रिय बने रहने की प्रेरणा दी। उनको यह अपेक्षा अवश्य थी कि जो भी वे करें, उसका जीवन भर प्रामाणिकता के साथ निर्वाह करें। यही कारण है कि अभावग्रस्त प्रारंभिक जीवन में भी उन्हें त्याग और वैराग्य की परम संपत्ति सुलभ हो गई। क्रमशः विद्या और ब्रह्मचारी जीवन के गुरु ऋषिकेश स्थित पूज्य महामंडलेश्वर स्वामी श्री वेदव्यासानंदजी महाराज से सत्यमित्र ब्रह्मचारी नाम भी मिला और साधना के विविध सोपान भी उनके प्राप्त हुए। ‘गीता-संदेश’ जैसी महत्त्वपूर्ण पत्रिका के प्रकाशन जैसा गुरुतर दायित्व इसी अवस्था में उन्होंने वहन किया। सत्यमित्र का बह्मचारी जीवन भावी युग के लिए उपयुक्त जीवन निर्माण की कार्यशाला सिद्ध हुई। इस समय गंगा तट पर उन्हें अनेक महापुरुषों का आशीर्वाद मिला, जिनमें शक्तिपात के परमाचार्य श्री स्वामी विष्णुतीर्थ का विराट् महापुरुष बनने का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। यहीं सभी प्रेषणाओं से पूर्ण विरक्त होकर संन्यासी जीवन जीने का उनका संकल्प दृढ़ हुआ।

इसी क्रम में एक अद्भुत अवसर के रूप में उन्हें एक आमंत्रण मिला और २९ अप्रैल, १९६०, अक्षय तृतीय के दिन श्री स्वामीजी महाराज ज्योर्तिमठ भानुपुरापीठ पर जगद्गुरु शंकराचार्य के पद पर प्रतिष्ठित हुए। उसके बाद से ही उन्होंने देश के विभिन्न अरण्यों, प्रांतों, क्षेत्र, नगरों ग्रामों में परिव्रजन किया। इस अवधि में उन्होंने वन्यग्राम, पर्वतीय क्षेत्रों, सुदूर ग्रामों का सर्वाधिक भ्रमण किया। जगद्गुरु शंकराचार्य के रूप में पद की पारंपरिक बाध्यताओं का निर्वहन करते हुए भी ग्रामीण जनों, पिछड़ी बस्तियों, उपेक्षित क्षेत्रों का प्रवचन, सत्संग, सेवा, सहायता जैसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक कार्य करते हुए अपने गहन गंभीर आध्यात्मिक चिंतन के आधारभूत सूत्रों पर सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय एकात्मता, देश की सार्वभौमिक अखंडता जैसे महिमामय पक्षों के व्यावहारिक धरातल की सुदृढ़ नींव रखने का प्रयत्न किया। इस तरह स्वतंत्र भारत में समय की आवश्यकता के अनुरूप रचनात्मक दिशा-बोध जनसामान्य को कराते रहे।

श्री स्वामीजी महाराज सन् १९६२ में जगद्गुरु शंकराचार्य के रूप में ही समुद्री मार्ग से भारतीयों के मध्य अफ्रीका यात्रा पर गए। भारत की भू-सीमा के बाहर प्रवासी भारतीय सनातन धर्मावलंबियों ने पहली बार अपने जगद्गुरु शंकराचार्य की विदेश की भूमि पर दर्शन किया। अफ्रीका में नेरोबी, कीनिया, युगांडा तथा कंपाला आदि स्थानों पर वे गए। इंग्लैंड, अमेरिका, जापान, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया, हांगकांग, कराची, कनाडा, जर्मनी, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, डेनमार्क, इटली, पुर्तगाल, सूरीनाम, मलगासी, मेडागास्कर, हवाई द्वीप, मॉरीशस, दक्षिण-पूर्वी अफ्रीकी देश, स्वीडन, आस्ट्रिया, न्यूजीलैंड, फ्रांस आदि देशों में प्रवास कर स्वामीजी ने भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया। सर्वाधिक प्रवास स्वामीजी ने इंग्लैंड का किया था। पूज्य स्वामीजी महाराज की विदेश यात्रा सन् १९६२ से प्रारंभ हुई और उनके जीवन के अंत तक चलती रही। तब से आज तक अनेक बार उनका इंग्लैंड जाना हुआ।

सन् १९६९ में उन्होंने शंकराचार्य पद से स्वयं मुक्त कर दंड का गंगा में विसर्जन कर दिया और केवल परिव्राजक संन्यासी के रूप में देश और विदेश का भ्रमण कर भारतीय संस्कृति, अध्यात्म के प्रचार-प्रसार में संलग्न हो गए, यह क्रम अद्यावधि सतत चल रहा था।

स्थायी रचनात्मक कार्यों में भारत माता मंदिर की कल्पना और निर्माण उनकी असाधारण संकल्प शक्ति, राष्ट्रीय चिंतन के प्रति सर्वात्मना समर्पण और भावी पीढ़ी के लिए अक्षय प्रेरणा तथा ऊर्जा के स्रोत के रूप में भावी युग को संदेश देता रहेगा। श्री स्वामीजी महाराज द्वारा राष्ट्र की एकात्मता, विश्व भर में राष्ट्रीय आस्था और भारत माँ के अक्षुण्ण गौरव की स्थापना के विविध प्रयास प्रारंभ से लेकर अब तक किए गए हैं और उनका यह क्रम निरंतर चलता रहा।

समन्वय सेवा ट्रस्ट, भारत माता जनहित ट्रस्ट, सत्यमित्रानंद फाउंडेशन, देश-विदेश में स्थित असंख्य समन्वय परिवारों द्वारा जहाँ एक ओर पीडि़त मानवता के अनेक महत्त्वाकांक्षी प्रकल्प चल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय चेतना एवं मानव निर्माण से परिपूर्ण आध्यात्मिक जागरण का अखंड अभियान विश्व-स्तर पर उनके द्वारा चलाया गया।

पूज्य श्री स्वामीजी महाराज ने देश की महान् विभूतियों का सम्मान करने की दृष्टि से समन्वय अलंकरण पुरस्कार प्रारंभ किया, जिसमें देश के शीर्षस्थ महापुरुषों का उनके असाधारण योगदान के कारण इस अलंकरण से सम्मानित किया गया है। श्री स्वामीजी द्वारा स्थापित समन्वय सेवा ट्रस्ट के द्वारा इस अलंकरण के अतिरिक्त, फिजियोथेरैपी सेंटर, अन्नक्षेत्र, ग्रंथालय आदि प्रकल्प चलाए गए।

श्री स्वामीजी की उदारता विश्व-विश्रुत है। विश्व तथा भारत के असंख्य आयोजनों में उन्होंने स्थान-स्थान पर इतना आर्थिक और नैतिक सहयोग दिया है कि उसका आकलन कर पाना भी संभव नहीं है। उनके प्रेरणा, मार्गदर्शन एवं उदार-सहायता के कारण ही देश-विदेश के समन्वय परिवार अनेक आयोजन कर सके और बड़े-बड़े सेवा कार्य अपने हाथ में लेकर पूरे कर सके।

आध्यात्मिक ऊर्जा को व्यावहारिक धरातल पर लाकर अत्यंत लोकोपयोगी उपदेशों के माध्यम से उन्होंने लाखों लोगों में गहरा परिवर्तन ला दिया। वे इस युग के मानव शिल्पी थे और थे भविष्य के युग- दृष्टा महापुरुष।

१९४७ में अवध के राजपरिवार में जन्म होने के बावजूद बुद्ध व महावीर से प्रेरित होकर सामान्य जीवन जीने के लिए तत्पर हुए। दर्शन, योग और हिंदू धर्मग्रंथों में विशेष रुचि। अटलजी नीत राजग सरकार में गृह राज्यमंत्री रहे। दो मासिक पत्रिकाओं ‘परमार्थ’ व ‘विवेक रश्मि’ के संपादक। अनेक पुस्तकों के लेखक।

उनके व्यक्तित्व के तीन मुख्य स्वर हैं—पहला, भारतमाता और गंगामाता के प्रति असाधारण भक्ति, जिसके फलस्वरूप राष्ट्रीय गौरव के प्रत्येक प्रतीक के प्रति उनमें प्रगाढ़ अनुराग है। वे उनकी रक्षा के लिए अपने आपको भी न्योछावर कर सकते थे। इसी के कारण उनका राष्ट्रीय चेतना का स्वर बहुत गहरा था तथा निरंतर जाग्रत् रहता था। दूसरा, पीडि़त मानवता, यहाँ तक कि प्राणिमात्र के कष्ट निवारण की तीव्र उत्कंठा। यही कारण है कि प्रत्येक समन्वय परिवार की गतिशीलता या सफलता के वे मुख्य आधार सेवा कार्य को ही मानते थे। तीसरा स्वर है, प्राचीन भारत के वाङ्मय तथा आध्यात्मिक चिंतन का नए भारत की चेतना के अनुरूप लोकहितकारी बनाना। उनका प्रवचन सहज, सरल, ओजस्वी और प्रेरणादायी होता था।

इस सबके परे और इनमें अनुस्यूत उनकी मानवीय संवेदना भरी विशालता उन्हें सबसे उदात्त और अलग बना देती है, परिणामतः वे आज विश्व-वंद्य संत हैं।

भारत माता मंदिर की स्थापना करके उन्होंने सनातन जगत् में एक नए अध्याय की शुरुआत की, इससे पहले भारतभूमि के प्रति लोगों का अनुराग और आस्था तो सनातन है, लेकिन उसके मूर्तिमन स्वरूप की प्रतिष्ठा पहली बार एक मंदिर के रूप में हुई। उस मंदिर के गर्भगृह में स्वामीजी ने उन सबको समाहित करने की चेष्टा की, जो भारतीय संस्कृति स्वाभिमान आस्था और अध्यात्म के प्रतीक रहे। उनकी इस चेष्टा ने देश को चिंतन की एक अलग दृष्टि दी, विभिन्न मत-संप्रदायों और जातियों में बँटे हुए समाज को आस्था के एक सूत्र में पिरोने का यह उनका अद्भुत प्रयास था। उनके लिए धर्म से राष्ट्र कहीं अलग नहीं था। राष्ट्रवाद के चिंतकों को उन्होंने चिंतन का एक अभिनव आधार दिया। सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता के मूल मंत्र को न केवल अपनी अभिव्यक्ति में, बल्कि समय-समय पर अपने कार्यक्रमों और अनुष्ठानों के माध्यम से जीवंत करने का प्रयास करते रहे। कला, साहित्य, संस्कृति और आध्यात्मिकता से जुड़े लोगों का सम्मान भी करते रहे। विचारधारा में विशुद्ध राष्ट्रवादी होते हुए भी विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं और नेताओं से उनके निकट संबंध रहे।

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उन सभी राष्ट्रवादी आंदोलनों को उन्होंने अपना खुला समर्थन ही नहीं, बल्कि आर्थिक सहयोग भी दिया। गौ, गंगा और गीता के प्रति उनका लगाव सर्वविदित है। वह शून्य से शुरू होकर शिखर तक पहुँचनेवाले अद्भुत प्रतिभा के धनी थे। उनकी इसी बहुमुखी प्रतिभा और प्रयास का सम्मान करते हुए समय-समय पर विभिन्न संगठनों ने उनको अनेक अलंकरणों से सम्मानित भी किया, लेकिन वे किसी सम्मान की परिधि में स्वयं को सीमित न कर आगे बढ़ते रहे। उनकी इस प्रवृत्ति का सम्मान करते हुए भारत सरकार ने भी उनको पद्मविभूषण अलंकरण से विभूषित किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वह एक ऐसे स्वयंसेवक थे, जो गणवेश भले न धारण किया हो, किसी शाखा में भले ही न गया हो, लेकिन संघ के विचार, संस्कार और उसके कार्यक्रमों के प्रति वह हमेशा समर्पित रहे। कई बार विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से उन्हें सक्रिय राजनीति में आने का आग्रह भी किया गया, लेकिन स्पष्ट शब्दों में उन्होंने अपने संन्यासी को निर्विवाद बनाए रखा और कभी किसी दल के सदस्य नहीं बने। वैभव और भौतिक संपन्नता उनके पैरों के नीचे थी, लेकिन उसके प्रति उनके मन में किंचित् मात्र भी लगाव नहीं था। उन्होंने केवल शंकराचार्य का पद ही नहीं, महामंडलेश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर और भारत साधु समाज के अध्यक्ष जैसे पदों को ढोना कभी स्वीकार नहीं किया। अपने जीवन काल में ही अपने द्वारा स्थापित सभी संस्थाओं, न्यासों और समितियों का दायित्व अपने योग्य शिष्यों को सौंप दिया। शंकराचार्य का पद उन्होंने भले छोड़ दिया हो, लेकिन वे स्वाभाविक रूप से एक जगद्गुरु थे। उन्होंने संन्यास की दीक्षा किससे ली, यह चर्चा का विषय कभी नहीं बना, लेकिन जिन लोगों ने उनसे दीक्षा ली, वह उनकी तरह भी विश्व-विश्रुत हो गए। आज उनके गुरुत्व का सहज दर्शन उनके प्रिय शिष्यों स्वामी अवधेशानंद गिरी, स्वामी गोविंददेव गिरी और स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरी जैसे संतों में होता है। राष्ट्रधर्म की जिस ध्वजा को लेकर वे चले थे, अपने जीते जी ही उसको विश्वगगन में फहराने का दायित्व अपने शिष्यों को सौंप दिया।

इधर कुछ वर्षों से उनका शारीरिक स्वास्थ्य शिथिल रहने लगा, लेकिन यह शिथिलता उनके दैनिक जीवन में बड़ी देर से आई। सामान्य से संत के आह्वान और आग्रह पर भी उसकी कुटिया में उनको जाने में कभी संकोच नहीं था। जब वे हरिद्वार पहली बार आए थे तो परमार्थ आश्रम में पूज्य श्री स्वामी धर्मानंद सरस्वतीजी के साथ ठहरे थे। उनसे उनका मैत्री संबंध इतना प्रगाढ़ था कि एक सगे गुरुभाई में भी वह निकटता देखने को नहीं मिलती। हरिद्वार के उनके मित्रों में जयराम आश्रम के संस्थापक पूज्य देवेंद्र स्वरूप ब्रह्मचारीजी और पावन धाम के संस्थापक स्वामी वेदांता नंद भी थे। ये वे लोग थे, जिन्हें पूरा हरिद्वार की धर्म नगरी उनके जीवन के अंत तक श्रद्धा और सम्मान समर्पित करती रही।

पिछले कुछ दिनों से उनका शरीर लगातार अस्वस्थ रहने लगा और भक्तों ने उनकी अच्छी-से-अच्छी चिकित्सा के लिए देश-विदेश के सभी नामी-ग्रामी चिकित्सकों और चिकित्सा संस्थानों में दिखाया, लेकिन लगता था कि उन्होंने अपनी जीवनयात्रा के अंतिम पड़ाव को दूर से देख लिया था, इसीलिए प्रायः हर मिलनेवाले से बातचीत में उनका यह विश्वास झलकता था। १३ जून से ही वे देहरादून के मैक्स अस्पताल में वेंटीलेटर पर थे और जीवनयात्रा के उस अंतिम चरण में शारीरिक कष्ट होते हुए भी शिव साधना में समर्पित उनका मन उदास नहीं दिखा। मुखमंडल तेजस्विता और जीवन के सभी लक्षण स्पष्ट दिखते थे। इसलिए सबको अनुमान था कि वे शीघ्र ही स्वस्थ होकर जन साधारण को आशीर्वाद के लिए उपलब्ध होंगे, लेकिन २५ जून की सुबह ४ बजे जब सूर्य उत्तरायण की अंतिम घड़ी में था, वे अपना भौतिक कलेवर छोड़कर आध्यात्मिक साम्राज्य परिव्राजक बन गए। जब भी धार्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में सामाजिक समन्वय और राष्ट्रवाद की चर्चा होगी तो भारत माता मंदिर के संस्थापक और समन्वय सिद्धांत के प्रवर्तक स्वामीजी जरूर याद किए जाएँगे।

—स्वामी चिन्मयानंद

परमार्थ आश्रम, भूपतवाला

निकट भारत माता मंदिर, हरिद्वार

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