हाजी पीर की लड़ाई

हाजी पीर दर्रा (८,६५२ फीट) उड़ी के दक्षिण में तथा युद्ध-विराम रेखा से ८ किलोमीटर दूर है। सन् १९४९ में हुए कराची समझौते में उड़ी-पुंछ मार्ग पाकिस्तान को दिए जाने से भारत इसका उपयोग नहीं कर सकता था। दोनों पक्षों में से किसी को भी इससे ५०० मीटर के निकट जाने की इजाजत नहीं थी। वर्ष १९६५ की शुरुआत में युद्ध-विराम रेखा पर तैनात पाकिस्तानी सैन्य टुकडि़यों ने भारत के रसद आपूर्ति दल पर गोलीबारी शुरू कर दी। पाकिस्तान की तीन चौकियों ने कारगिल क्षेत्र में श्रीनगर-लेह राजमार्ग को काट दिया। मई की शुरुआत में इन चौकियों पर तैनात टुकडि़यों ने राजमार्ग पर गोलीबारी करते हुए आवागमन को अवरुद्ध कर दिया। इससे नाराज होकर भारत ने पाकिस्तानियों को उनकी चौकियों से खदेड़ दिया, लेकिन इसके फौरन बाद कच्छ के रण पर हुए समझौते के तहत जीते गए क्षेत्र को पुनः पाकिस्तान को सौंप दिया गया।

ब दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच मित्रवत् कूटनीतिक परिहास जारी था, उसी दौरान पाकिस्तान कश्मीर को हड़पने की धूर्ततापूर्ण योजना पर काम कर रहा था। योजना यह थी कि पाकिस्तान में प्रशिक्षित एक बड़े गुरिल्ला सैन्य दल को छोटे दलों में विभाजित कर युद्ध-विराम रेखा पार करवा दी जाए। उसका लक्ष्य श्रीनगर में अराजकता फैलाकर प्रशासन को उखाड़ फेंकना और वहाँ एक कठपुतली सरकार का गठन करना था। जब भारतीय सेना इस पर कोई काररवाई करेगी तो वह कठपुतली सरकार पाकिस्तान से मदद की गुहार लगाएगी और उनकी सेना जवाबी हमला कर देगी।

उस गुरिल्ला सैन्य दल को ‘जिब्राल्टर फोर्सेज’ नाम दिया गया तथा उसकी कमांड पाकिस्तानी सेना के डिवीजनल कमांडर मेजर जनरल अख्तर हुसैन मलिक को सौंपी गई। वर्ष १९६५ में अगस्त के पहले सप्ताह में युद्ध-विराम रेखा से ७५६ किलोमीटर में फैले विभिन्न स्थानों से जिब्राल्टर फोर्स भारतीय कश्मीर में प्रवेश कर गई। वे मुख्यतः रात में यात्रा करते। उन्होंने कई जंगल पार किए तथा पहाड़ चढ़े। उस क्षेत्र में काफी अंदर आने के बाद वे छोटे दलों में बँट गए। उन्होंने अपनी बंदूकें छिपाने में मदद देनेवाली स्थानीय लोगों जैसी ढीली-ढाली पोशाक फिरन पहन रखी थी, जिससे वे आसानी से स्थानीय लोगों में मिल गए और इसी तरह श्रीनगर तक पहुँच गए। तत्पश्चात् उन्होंने आगजनी, लूटपाट व हत्याओं द्वारा घाटी में अशांति फैलाना आरंभ कर दिया। रेडियो स्टेशन पर कब्जा करना, पुल जलाना तथा मार्गों को बाधित करना उनकी योजना का ही हिस्सा था, जिससे वह इलाका शेष भारत से कट जाए। जब राज्य की पुलिस के स्थान पर कमान भारतीय सेना के हाथ में आई तो वे फौरन समझ गए कि इसका एकमात्र हल घुसपैठियों के प्रवेश स्थल को अवरुद्ध करना है। भारतीय सेना ने मई में जिन पाकिस्तानी चौकियों पर कब्जा किया था, अब १५ अगस्त को वे एक बार फिर उन पर काबिज हो गईं। कुछ दिन बाद पाकिस्तानी तोपों ने सीमा के निकट आकर टिथवाल, उड़ी व पुंछ के नजदीक स्थित भारतीय ठिकानों पर भारी गोलीबारी आरंभ कर दी। इसके बाद ही हाजी पीर दर्रे पर कब्जा करने का निर्णय लिया गया, क्योंकि घुसपैठिए इसी रास्ते का इस्तेमाल करते थे।

हाजी पीर की कहानी

सन् १९६५ का युद्ध हुए लगभग पंद्रह वर्ष बीत चुके थे। युद्ध-विराम रेखा पर भारतीय तरफ के उड़ी सेक्टर में रुस्तम पोस्ट पर वह शरद् ऋतु का सुहावना दिन था। लगभग पचास वर्ष का खूबसूरत व लंबा सिख अफसर हाजी पीर के उभार पर पूरी भव्यता से फैले हाजी पीर दर्रे की निगरानी कर रहा था। उसकी स्मृति में अँधेरी व बारिश की बूँदों से आच्छादित अगस्त की वह रात घूम रही थी, जब उसने पहाड़ की चोटी को घेरे बादलों के बीच से १ पैरा के पैराट्रूपर्स को घुटनों व हाथों के बल फिसलनवाली ढलान पर चढ़ते देखा था। उस समय वह चुप रहा, लेकिन बाद में ‘पैराट्रूपर’ पत्रिका में अपनी पुरानी यादों में उस समय के अपने एहसास को व्यक्त करते हुए लिखा—

‘‘वे भी क्या दिन थे, जब लगभग पंद्रह वर्ष पहले २८ अगस्त, १९६५ को मैंने पैंतीस वर्ष की उम्र में दो इन्फैंट्री कंपनी के कमांडिंग मेजर के रूप में हाजी पीर दर्रे पर कदम रखा था। वहाँ लौकिक रूप से अपने पाँव जमाने के लिए मुझे भारतीय सेना की सबसे पुरानी बटालियन १ पैरा के अपने बहादुर जवानों के साथ पाकिस्तानियों को इंच-दर-इंच खदेड़ने के लिए खूनी जंग लड़नी थी। हम तभी संतुष्ट हुए, जब हमने दर्रे पर अपने सफलतापूर्वक कब्जे के कोड वर्ड ‘चमक तारा’ को सभी उच्चतर हेडक्वार्टर्स तक पहुँचा दिया। वह एक सपने के सच होने जैसा था।’’

हाजी पीर पर हमला करने तथा उसे जीतने के इस अभियान को ६८ इन्फैंट्री के ब्रिगेड कमांडर ब्रिगेडियर जोरावर चंद बक्शी (‘जोरू बक्शी’ के नाम से विख्यात) के नाम पर ‘ऑपरेशन बक्शी’ नाम दिया गया। यह इस बात का सूचक है कि उच्चाधिकारियों को उन पर कितना अधिक भरोसा था। जोरू बक्शी ने एक साहसिक योजना बनाई। भारतीय सेना हाजी पीर के दोनों ओर से चोटी पर पहुँचकर शत्रुओं को वहीं मसल देगी। हमला दोनों ओर से किया जाएगा।

उस साहसिक अभियान के लिए ‘महावीर चक्र’ पानेवाले लेफ्टिनेंट जनरल रंजीत सिंह दयाल का तो कुछ वर्ष पूर्व कैंसर से निधन हो गया, लेकिन १९६५ में उनके उस समय सहयोगी रहे युवा कंपनी कमांडर ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह (रिटा.) और तब के बटालियन एडजुटेंट कर्नल जे.एस. बिंद्रा ने हाजी पीर की लड़ाई को याद करते हुए मेरे समक्ष उसका इतना घटनावार वर्णन किया, जैसे वह कल ही की बात हो। बेदोरी की लड़ाई में १९ पंजाब द्वारा दिखाए गए साहस का वर्णन मेजर जनरल जे.आर. भट्टी (रिटा.) ने किया है, जो सन् १९६५ में बटालियन का हिस्सा थे।

युद्ध की योजना

कश्मीर में विद्रोह भड़काने के लिए घुसपैठ के मार्ग को अवरुद्ध करने हेतु हाजी पीर दर्रे को पाकिस्तान से छीनने का निर्णय होने के बाद पश्चिमी कमांड के सैन्य कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हरबक्श सिंह ने हाजी पीर उभार से पाकिस्तानियों को खदेड़ने की जिम्मेदारी ६८ इन्फैंट्री ब्रिगेड को सौंपी। हाजी पीर पर हमला करने तथा उसे जीतने के इस अभियान को ६८ इन्फैंट्री के ब्रिगेड कमांडर ब्रिगेडियर जोरावर चंद बक्शी (‘जोरू बक्शी’ के नाम से विख्यात) के नाम पर ‘ऑपरेशन बक्शी’ नाम दिया गया। यह इस बात का सूचक है कि उच्चाधिकारियों को उन पर कितना अधिक भरोसा था। जोरू बक्शी ने एक साहसिक योजना बनाई। भारतीय सेना हाजी पीर के दोनों ओर से चोटी पर पहुँचकर शत्रुओं को वहीं मसल देगी। हमला दोनों ओर से किया जाएगा।

हमला करने के लिए चयनित दोनों यूनिट पहले ही उस क्षेत्र में पहुँचकर जगह का मुआयना कर चुकी थीं। उस नाले के एक ओर सेब, संतरे, खिलादरे, धना, चौकस, चबक व कमान टीले पर स्थित चौकियों पर भारतीय सेना की सबसे पुरानी यूनिट १ पैरा मौजूद होगी। वहीं दूसरी ओर से नई उभरती हुई एक वर्ष से भी कम आयुवाली १९ पंजाब जाएगी। निर्णय लिया गया कि दर्रे की पश्चिमी चोटी पर १ पैरा कब्जा करेगी, जिसमें सैंक शिखर (पॉइंट ९५९१), सर व लेडवाली गली शामिल थे। जबकि १९ पंजाब पूर्वी चोटी पर कब्जा करेगी, जिसका सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा बेदोरी (१२,३३० फीट) था। दर्रे के दोनों किनारों पर कब्जा हो जाने के बाद कारगिल में सफल प्रदर्शन कर चुकी एक अन्य बटालियन ४ राजपूत आगे बढ़कर हाजी पीर को अपने कब्जे में ले लेगी।

योजना बहुत अच्छी थी। लेकिन कई बार सबसे अच्छी योजना भी प्रतिकूल साबित होती है। वहीं कई बार केवल इच्छा-शक्ति व अपरिष्कृत साहस के बल पर असंभव विजय भी प्राप्त की गई है। हाजी पीर पर ये दोनों ही बातें घटित हुईं। उस अँधेरी, बादल-युक्त व वर्षा की संभावना वाली २४-२५ अगस्त की रात को मेजर रंजीत सिंह दयाल और १ पैरा के पैराट्रूपर्स ने जब भरपेट भोजन किया, अपने बैगपैक में सूखे राशन के रूप में शकरपारे व बिस्कुट रखे, अपने जूतों के फीते बाँधे, अपने हेलमेट पहने तथा सैंक पर अपने पहले हमले के लिए चढ़ाई आरंभ की, तब वे बिल्कुल नहीं जानते थे कि भविष्य के गर्भ में उनके लिए क्या छिपा है।

पिछले दो दिनों से लगातार बारिश हो रही थी, जिससे नाला उफान पर था और मिट्टी भी गीली हो गई थी। इस कारण २४ अगस्त को किए जानेवाले हमले को चौबीस घंटों के लिए आगे बढ़ाया गया। लेकिन जब २५ अगस्त को भी मौसम खुलने के कोई आसार नहीं दिखाई दिए तो अंततः हमला करने का आदेश दे दिया गया। चूँकि शत्रु द्वारा काबिज सैंक व सेब, जहाँ १ पैरा मौजूद थी, एक ही ऊँचाई पर थे, इसलिए हमले की ये तैयारियाँ पाकिस्तानी सैनिकों से छिपी न रह सकीं। दोनों पक्ष जानते थे कि जल्दी ही एक बेहद खूनी लड़ाई छिड़ने वाली है।

२५-२६ अगस्त की रात

जब अल्फा व चार्ली कंपनियों के जवानों तथा १ पैरा ने अपने बैगपैक के पट्टे बाँधे, अपने .३०३ बोर की बोल्ट-एक्शन पैरा राइफलों को उसके पीछे खोंसा और झाड़-झंखाड़ों के पीछे धीमी गति से आगे बढ़ना शुरू किया, उस समय रात के १० बज रहे थे तथा भूरे रंग के पहाड़ अनिष्ट सूचक काले बादलों से पूरी तरह ढके हुए थे। उन्होंने तेजी से ऊपर चढ़कर नाला पार किया। उनके मिट्टी भरे जूते पानी में छप-छप कर रहे थे। उन्होंने चढ़ना आरंभ किया और सैंक की ओर बढ़ने लगे। योजना यह थी कि वे रात के अँधेरे में छिपकर धीरे से आगे बढ़ेंगे और सुबह की पहली किरण उगने के पूर्व ही दुश्मन पर धावा बोल देंगे, जिससे वह भौचक्का रह जाएगा।

जब जवान चढ़ाई कर रहे थे, उसी समय बादल फट पड़े और उनके ऊपर तेज बारिश गिरने लगी। जल्द ही वे सब पूरी तरह से भीग गए; लेकिन उन्होंने मौसम की परवाह न करते हुए किटकिटाते दाँतों और सिर झुकाकर चलना जारी रखा। उनके नीचे की जमीन फिसलन भरी हो गई थी। वे बार-बार फिसलते, लेकिन फिर से उठकर चढ़ना आरंभ कर देते। दुश्मन तक पहुँचने का कोई सीधा रास्ता न होने के कारण वे सामने की खड़ी चढ़ाई पर आगे बढ़ रहे थे, जो जितनी कठिन थी, उतनी ही खतरनाक भी थी। उनके हाथ जो कुछ भी आता, वे उसी के सहारे अपने को आगे खींचते रहे और फिसलनी मिट्टी में अपने जूते धँसाने का प्रयास करते। उस समय बटालियन का हिस्सा रहे कर्नल जे.एस. बिंद्रा (रिटा.) याद करते हैं कि दुर्भाग्यवश, वे अँधेरे व बारिश से उत्पन्न हुए भ्रम के कारण रास्ता भटक गए। जिस चौकी को वे अपने ठीक सामने तथा आसानी से पहुँचने लायक मान रहे थे, अचानक वहाँ तक पहुँचना असंभव जान पड़ने लगा। वे जवान छह घंटे से भी अधिक पैदल चल चुके थे और इस बात पर चकित थे कि वे अभी तक सैंक क्यों नहीं पहुँचे।

लेकिन तभी सुबह के शुरुआती घंटों में मशीनगन की चमक दिखने के साथ ही उनपर फायरिंग होने लगी। जब दुश्मन ने फायरिंग शुरू की तो सबसे आगे जा रहे अल्फा कंपनी के जवान अभी फिसलन भरी मिट्टी में अपने पाँव जमाने में व्यस्त थे। उन्होंने पकड़ बनाने के लिए जवाबी फायरिंग का प्रयास किया, लेकिन यह उनके लिए नुकसानदेह साबित हुआ। जवान गोलियों का शिकार होकर गिरने लगे और सारा वातावरण उनकी चीख-पुकार से भर गया। सैंक में दुश्मन की एक से अधिक कंपनियाँ मौजूद थीं, जिनके पास मध्यम मशीन गन और ३ इंच व ४.२ इंच के मोर्टार भी थे। चालाक दुश्मन उन्हें ऊपर चढ़ते हुए देख रहा था और वे जैसे ही गोलियों की जद में आए, उनपर गोलीबारी शुरू कर दी गई। केवल एक ही बहादुर जवान चोटी तक पहुँच सका। वह थे बटालियन के सर्वश्रेष्ठ धावक पैराट्रूपर लाल सिंह। दुश्मनों ने उन्हें पकड़ लिया। उनकी निर्दयतापूर्वक हत्या करके उनके क्षत-विक्षत शरीर को नीचे फेंक दिया, जो १ पैरा को बहुत बाद में मिला।

कई वर्षों बाद इस लड़ाई पर चर्चा करते हुए मेजर दयाल ने एक पत्रिका को बताया, ‘‘उन्होंने (दुश्मनों ने) हमें ऊपर चढ़ते देख लिया था। लेकिन उन्होंने तब तक गोली नहीं चलाईं, जब तक उनके निकट व खुले में नहीं आ गए। यह भ्रमपूर्ण युद्ध सुबह ९.३० बजे तक जारी रहा, जिसमें पलटन को बुरी तरह हानि पहुँची और २८ जवान इसका शिकार बने। हमारा हमला बुरी तरह नाकामयाब रहा और हमें पीछे लौटने का संदेश देने के बाद हमसे संपर्क तोड़ लिया गया।’’

दोनों हमलावर कंपनियाँ वापस लौट आईं। उनकी बटालियन ने कवर फायर देकर घायलों को वहाँ से निकाला। लाल सिंह को नहीं खोजा जा सका, जिन्हें लापता की श्रेणी में रखा गया। सन् १९६५ में डेल्टा कंपनी के कंपनी कमांडर रहे ब्रिगेडियर अरविंदर सिंह याद करते हैं कि जब २६ अगस्त की सुबह सैनिक घायलों को वहाँ से निकाल रहे थे तो पूरा दिन सैंक पर तोपों से गोलाबारी जारी रखी गई, जिससे शत्रु अपना सिर न उठा सके। वे कहते हैं, ‘‘मैंने देखा कि मेजर रंजीत सिंह दयाल उस सीधी ढलान पर घायल सैनिकों को अपनी पीठ पर लादकर वापस ला रहे थे।’’

सैंक पर दूसरा हमला

२६-२७ अगस्त की रात बटालियन ने एक बार फिर हमला किया। इस बार के हमलावरों में मेजर एच.ए. पाटिल के नेतृत्व में ब्रेवो (डोगरा) तथा मेजर अरविंदर सिंह के नेतृत्व में डेल्टा (अहिर) कंपनियाँ शामिल थीं। इस बार फिर हमले की बागडोर मेजर दयाल के हाथ थी। प्रत्येक व्यक्ति के दिमाग में केवल एक ही बात थी—पिछली रात की हार का बदला लेना है। ब्रिगेडियर सिंह मुसकराते हुए याद करते हैं, ‘‘हम जाने के लिए तत्पर थे; सभी जवान जोश से भरे हुए थे। मेजर दयाल ने स्वतः ही हमारे साथ आने की इच्छा जताई। वे उस समय पैंतीस वर्ष के थे। वही ऐसे परिपक्व व वरिष्ठ मेजर थे, जिनके पास चौदह वर्षों का अनुभव था। मैं उस समय चौबीस वर्ष का था। पाटिल मुझसे कुछ बड़े थे। हम वे साहसी चूजे थे, जिनके कंधों पर ‘मेजर’ का तमगा लगा हुआ था।’’ इस बार सैनिकों ने छोटे दलों में चढ़ना आरंभ किया। दुश्मनों को पस्त करने के लिए तोपें लगातार चोटी पर गोले बरसा रही थीं। ‘‘बारिश नहीं हो रही थी, लेकिन जमीन अभी भी फिसलन भरी थी। हमने चढ़ाई का अधिकांश हिस्सा घुटनों व हाथों पर तय किया। हम बार-बार फिसलते व पीछे पहुँच जाते। हम फिर कुछ पकड़ते और अपने आपको ऊपर खींच लेते। हमारे चेहरे व हाथ मिट्टी में सन गए थे। हमारी वरदियाँ फट गई थीं, लेकिन हमारा जोश अभी भी बरकरार था और हम लगातार ऊपर चढ़ते रहे।’’

हमलावर कंपनियाँ जैसे ही नियत स्थान के नीचे पहुँचीं, दुश्मन की टुकड़ी अपनी खंदकों से बाहर निकली और उन पर अपने स्वचालित हथियारों से गोलियाँ बरसाने लगी। उनके साथ चल रहे फॉरवर्ड ऑब्जर्वेशन ऑफिसर कैप्टन नायडू ने आर्टिलरी फायर के निर्देश दिए। उन्होंने गोलीबारी को दुश्मन के इस औचक कदम से निपटने के लिए तैयार किया। इससे दुश्मन को बहुत नुकसान पहुँचा, लेकिन आर्टिलरी फायर के निकट होने के कारण इसका चिंताजनक प्रभाव १ पैरा की टुकड़ी पर भी पड़ा।

दोनों कंपनियाँ धीरे-धीरे ऊपर चढ़ती रहीं और अंततः सुबह की पहली किरण के साथ ही उन्होंने धावा बोल दिया। आर्टिलरी फायर ने दुश्मन की मध्यम व हल्की मशीनगन को खामोश कर दिया था और जल्द ही दुश्मन अपने पंद्रह मृत साथियों को पीछे छोड़ते हुए वहाँ से भाग निकले। ब्रिगेडियर सिंह बताते हैं, ‘‘हमें वहाँ दुश्मनों के शवों के अतिरिक्त बड़ी मात्रा में हथियार मिले। स्पष्ट था कि आर्टिलरी फायर ठीक निशाने पर लगा, जिससे उन्हें भारी नुकसान पहुँचा। सुबह ७.३० बजे तक हमने सैंक पर कब्जा करके सफलता का संकेत दे दिया था।’

२७-२८ अगस्त की रात को जवानों ने १०,००० फीट की ऊँचाई पर स्थित पथरा से ४,००० फीट पर स्थित उड़ी की ओर चलना शुरू कर दिया। अपने कार्य के प्रति दृढता और अपनी शक्ति की आखिरी बूँद का भी उपयोग करते हुए वे उड़ी में चट्टानों से फटी अपनी वरदी पहने पंक्तिबद्ध हो गए। उनके घाव-युक्त चेहरे सख्त व हमले को तैयार थे।

इसके बाद जवानों ने आगे बढ़ते हुए चोटी पर स्थित दो अन्य चौकियों पर भी हमला करने का फैसला किया। ये थीं सर व लेडवाली गली। वे बताते हैं, ‘‘सुबह ८ बजे हमें अगली चौकी पर हमला करने के आदेश मिल गए। जब हम चोटी के सँकरे व पथरीले मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे, उसी समय दुश्मनों ने हमें आते देख लिया और उन्होंने हम पर गोलीबारी शुरू कर दी। हम जवाबी फायर करते हुए लगातार आगे बढ़ते रहे। हमें वहाँ दुश्मन के बारह सैनिक दिखाई दिए, जिन्होंने एक ढलवाँ चट्टान के नीचे बंकर बना रखे थे। हम जिस मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे, वह केवल कुछ गज ही चौड़ा था, जहाँ वे हमें बहुत निकट से गोली मार सकते थे; लेकिन सौभाग्यवश ऐसा नहीं हुआ। वे अंतिम क्षण तक गोलीबारी करते रहे और फिर वहाँ से भाग निकले। हमने बिना किसी नुकसान के सर पर कब्जा कर लिया। जब हम लेडवाली गली की ओर बढ़े तो वहाँ भी यही हुआ। दुश्मन पीछे हटते हुए भी हम पर गोलियाँ बरसा रहा था। पाकिस्तानियों का दिमाग कुछ ऐसा है कि जब तक वे जीत रहे होते हैं, तब तक बेहतरीन लड़ाके होते हैं, लेकिन जैसे ही वे हारने लगते हैं, फौरन भाग निकलते हैं। इस तेज व साहसपूर्ण आक्रमण का यह नतीजा रहा कि तीन घंटों के भीतर १ पैरा ने सैंक, सार व लेडवाली गली पर कब्जा कर लिया था। बटालियन को सौंपी गई जिम्मेदारी सफलतापूर्वक पूरी कर दी गई थी।

पूर्वी चोटी पर

उड़ी-पुंछ पहाड़ी ४,००० फीट से १२,००० फीट की असमान ऊँचाइयोंवाला बीहड़ पर्वतीय इलाका है। इसके शिखर से ८,००० फीट तक का हिस्सा वर्ष के अधिकांश समय बर्फ से ढका रहता है। १२,३३० फीट पर स्थित बेदोरी इस पहाड़ी की सबसे ऊँची चोटी है। पहाड़ी का सबसे ऊँचा हिस्सा होने के अलावा यहाँ से उड़ी सेक्टर पर भी नजर रखी जा सकती है।

जोरू बक्शी की योजना के मुताबिक, जब १ पैरा सैंक, सार व लेडवाली गली की ओर बढ़ रही होगी तो उसी बीच ४ राजपूत व १९ पंजाब के जवानों का एक सैन्य दल पॉइंट १०,०४८- पॉइंट ११,०९४-बेदोरी-कुथनार दी गली व हाजी पीर दर्रे की ओर बढ़ेगा। दोनों ओर से बढ़ रहे जवान हाजी पीर पर एकत्र हो जाएँगे।

१९ पंजाब की टुकड़ी को बेस सुरक्षित करने के अलावा २५ अगस्त के अभियान में दुश्मन पर सहसा आक्रमण की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी। जब २६ अगस्त की देर रात १.३० बजे जहाँ १ पैरा द्वारा सैंक पर कब्जे के लिए किया गया हमला नाकाम रहा, वहीं १९ पंजाब ने पथरा पर कब्जा कर लिया था। यद्यपि ४ राजपूत भी बेदोरी पर कब्जा करने के अपने कार्य में नाकाम रही। बहादुर सिपाहियों ने जान हथेली पर रखकर जोरदार लड़ाई की; लेकिन वह चौकी बहुत दुर्गम, पथरीले व खड़े पहाड़ पर थी। उस पथरीले इलाके में खाई खोदना संभव न था, इसलिए पाकिस्तानी सिपाहियों ने पत्थरों की मदद से संगर नामक कच्चे दुर्ग बना लिये और उनके पीछे से फायरिंग करने लगे। कर्नल बिंद्रा कहते हैं, ‘‘वह इलाका बीहड़ व बहुत ढलवाँ था और पाकिस्तानियों ने अपनी सुरक्षा बहुत मजबूत कर रखी थी। बेदोरी पर कब्जा करना लगभग असंभव था।’’ इसके अलावा, हमला करने के लिए चुना गया रास्ता ऊँचा-नीचा तथा बाहर निकले पत्थरों के कारण अनुमान से अधिक कठिन निकला। ४ राजपूत को भारी हानि पहुँची और अंततः उन्हें वापस लौटना पड़ा। ब्रिगेडियर बक्शी ने २७ अगस्त को ७ बिहार सहित बेदोरी पर एक बार फिर आक्रमण करने का निर्णय लिया और १ पैरा से सैंक क्षेत्र छोड़कर वहाँ १९ पंजाब को तैनात होने का आदेश दिया। लेकिन १९ पंजाब के लेफ्टिनेंट कर्नल (बाद में ब्रिगेडियर) संपूरन सिंह, जो एक स्वाभिमानी सैनिक थे, उनको अपनी बटालियन के लिए ऐसी निष्क्रिय भूमिका पसंद नहीं आई। उन्होंने स्वयं यह प्रस्ताव रखा कि यदि उन्हें अपने अनुसार हमला करने की छूट दी जाए तो वे बेदोरी पर आक्रमण करना चाहेंगे। उन्हें इसकी आज्ञा मिल गई। हमले की एक नई योजना तैयार की गई। लेफ्टिनेंट कर्नल संपूरन सिंह व उनके सहयोगी लेफ्टिनेंट (बाद में मेजर जनरल) जे.आर. भट्टी ने पहले ही बेदोरी जाने का एक वैकल्पिक मार्ग तलाश लिया था, जो कोंराली व गगरहिल से होकर बेदोरी झरने तक पहुँचता था। उन्होंने फैसला किया कि १९ पंजाब इसी रास्ते पर आगे बढ़ेगी।

बेदोरी की जीत

तीन दिन बीत गए। १९ पंजाब के सैनिकों ने २५ अगस्त को चलना शुरू किया था। उनके पास हथियार व मोर्टार जैसा भारी सामान था। वे बारिश से सराबोर व ठंड में काँपते हुए चले जा रहे थे। आखिर वे भी मनुष्य ही थे। जल्दी ही थकान उनपर हावी होने लगी। जो राशन वे अपने साथ लाए थे, वह ७२ घंटों में समाप्त हो गया। इसके बाद वे पूरी तरह जमीनी आहार पर निर्भर थे। लेकिन उस ऊँचाई पर कुछ नहीं उगता था। इसलिए उन्हें ७,००० फीट नीचे खेतों से अनाज व मकई लाने के लिए टोलियाँ भेजनी पड़तीं। विमान द्वारा भेजी गई आहार की एक खेप दुश्मन के इलाके में नाले में जा गिरी और भूखे व मजबूर सैनिक उसे वहाँ पड़ा देखते रहे। वहाँ से उसे लाने का कोई तरीका न होने के कारण वे अपनी राह पर आगे बढ़ गए। इसका पूरा श्रेय उन्हें जाता है कि इन सबके बावजूद जब उन्हें बेदोरी पर एक और हमला करने का आदेश दिया गया तो उन्होंने जरा भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई।

२७-२८ अगस्त की रात को जवानों ने १०,००० फीट की ऊँचाई पर स्थित पथरा से ४,००० फीट पर स्थित उड़ी की ओर चलना शुरू कर दिया। अपने कार्य के प्रति दृढता और अपनी शक्ति की आखिरी बूँद का भी उपयोग करते हुए वे उड़ी में चट्टानों से फटी अपनी वरदी पहने पंक्तिबद्ध हो गए। उनके घाव-युक्त चेहरे सख्त व हमले को तैयार थे। वे धैर्यपूर्वक उन ट्रकों की प्रतीक्षा करने लगे, जो उन्हें ४,५०० फीट पर स्थित कौरली तक पहुँचाने वाले थे। २५ किलोमीटर की लंबी यात्रा के बाद आराम व शांति पाने के लिए उनमें से बहुत से जवानों ने अपनी आँखें बंद कर लीं। ट्रकों से उतरने के बाद वे एक बार फिर लंबी यात्रा पर निकल पड़े। उन्होंने पूरी दृढता सहित दिन भर चढ़ना जारी रखा। उनका लक्ष्य २५ अगस्त को सूर्य की अंतिम किरण के पूर्व ११,५०० फीट पर स्थित बेदोरी झरने तक पहुँचना था। अल्फा कंपनी ने पीछे रुककर सैंक से १ पैरा को रिलीव कर दिया। आधी रात तक डेल्टा कंपनी ने हमले को अंजाम देने के लिए सुरक्षित फॉर्मिंग अप प्लेस (एफ.यू.पी.) बना लिया था। बेदोरी झरने की ओर बढ़ते समय बटालियन को बीच में ७ बिहार मिली, जिसका बेदोरी पर किया गया हमला नाकाम हो चुका था और वे अपने घायलों सहित वापस लौट रहे थे। सैनिकों के लिए अपने मृत व घायल साथियों को ढलान पर ले जाया जाते देखना हतोत्साहित करनेवाला था, लेकिन फिर भी उन्होंने अपना काम पूरे साहस के साथ अंजाम दिया।

१९ पंजाब ने बेदोरी के लिए जो रास्ता लिया था, वह इतना सँकरा था कि वहाँ से एक बार में केवल एक कंपनी ही आक्रमण कर सकती थी। तब पूर्वी हिस्से की ओर से दोहरा हमला करना निश्चित हुआ। पहला हमला मेजर एस.बी. वर्मा के नेतृत्व में ब्रेवो कंपनी को करना था। खूनी संघर्ष के बाद उन्होंने अपने लक्ष्य का कुछ हिस्सा हासिल कर लिया। तत्पश्चात् मेजर परमिंदर सिंह के नेतृत्ववाली चार्ली कंपनी ने निर्दयतापूर्वक प्रवेश किया और हमले को सफल बना दिया। अंततः २९ अगस्त को सुबह ६ बजे बेदोरी पर कब्जा कर लिया गया। १९ पंजाब को बेदोरी पर कब्जे के तीन नाकाम प्रयासों के बाद सफलता मिली। इस जीत के पीछे विशुद्ध साहस तथा ‘करो या मरो’ की इच्छा ही थी। लेफ्टिनेंट कर्नल संपूरन सिंह ने अपना वादा पूरा किया। इस अभियान में कूच के दौरान १९ पंजाब के जवानों ने बिना विश्राम किए अपने बैगपैक (जिसमें रखे राशन, हथियार व गोला-बारूद उनके शरीर पर लदे थे) सहित १०,००० फीट से ४,००० फीट तक की उतराई तथा पुनः ११,००० फीट की चढ़ाई करके १२,३३० फीट पर स्थित बेदोरी पर कब्जा किया। इन चौबीस घंटों में उन्होंने ४० किलोमीटर की दूरी पैदल और २५ किलोमीटर का सफर वाहनों में तय किया था।

इस दौरान वे रसद लेने के लिए कहीं नहीं रुके, क्योंकि इस विजय में दुश्मन को चौंकाना महत्त्वपूर्ण कारक था। बटालियन का अगला लक्ष्य कुथनार दी गली थी। उन्होंने तैयारी करनी शुरू की। सैनिक न केवल थके हुए, बल्कि भूखे भी थे। बीते कई घंटों में उन्हें एक बार भी भरपेट भोजन नहीं मिला था।

यहाँ कहानी एक दिलचस्प मोड़ लेती है। रामपुर में तैनात १६१ इन्फैंट्री ब्रिगेड के ब्रिगेड मेजर, मेजर (बाद में लेफ्टिनेंट जनरल) एल.एस. रावत ने वायरलेस संदेश में १९ पंजाब के जवानों के भूखे होने की बात सुनी थी। उन्होंने फौरन उस मामले को अपने हाथ में लिया और स्थानीय लोगों की मदद से ७०० सैनिकों के लिए पूडि़याँ बेदोरी तक पहुँचा दीं। दुर्भाग्यवश, तब तक बटालियन पहले ही कुथनार दी गली के लिए कूच कर चुकी थी; लेकिन वहाँ मौजूद एक कंपनी तक यह अनपेक्षित भोजन अवश्य पहुँच गया। कुथनार दी गली और किरण पर कब्जा के बाद जब १ सितंबर को १९ पंजाब हाजी पीर दर्रे पर १ पैरा से मिली, उसके बाद ही युद्ध से थके हुए सैनिकों को खाने के लिए उचित भोजन मिल सका।

लेकिन काम अभी खत्म नहीं हुआ था। ९ सितंबर को उन्होंने दिन के उजाले में पूरे साहस के साथ जियारत चौकी पर हमला किया, तत्पश्चात् १९ पंजाब की डेल्टा कंपनी एवं ६ डोगरा की एक कंपनी ने मिलकर आमने-सामने की लड़ाई में कहूता हाइट्स पर स्थित एक मुश्किल चौकी गिटियन को सुरक्षित कर लिया। दोनों ही कंपनियों के कमांडर १९ पंजाब के मेजर रणबीर सिंह एवं ६ डोगरा के मेजर लल्ली इस भयंकर लड़ाई में खेत रहे। उन्हें मरणोपरांत ‘वीर चक्र’ से सम्मानित किया गया। इन अभियानों के दौरान यूनिट के विभिन्न श्रेणियों वाले २१ अन्य जवान भी शहीद हुए।

इसके बाद मेजर परमिंदर सिंह के नेतृत्व में चार्ली कंपनी पॉइंट ८,७७७ पर हमले को तैयार हो गई। कंपनी ने अपना आंशिक लक्ष्य ही हासिल किया था कि दुश्मन के जवाबी हमले में उनके पाँव उखड़ गए। जब १९ पंजाब पुनः एकत्र होकर पॉइंट ८,७७७ पर एक और हमला करने की तैयारी कर रही थी, उसी समय युद्ध-विराम की घोषणा हो गई। युद्ध तुरंत प्रभाव से समाप्त कर दिया गया। युद्ध-विराम के बाद जब शहीद सैनिकों के शवों का आदान-प्रदान हुआ तो पाकिस्तानी सेना के २० पंजाब के मेजर रिजवी ने लड़ाई में ‘सी’ कंपनी के लांस नायक लाखा सिंह की बहादुरी का विशेष रूप से उल्लेख किया। अपनी गोलियाँ चुक जाने के बाद लाखा सिंह ने अपनी संगीन से दुश्मनों को मारना जारी रखा। जब वह भी टूट गई तो उन्होंने अपना हेलमेट उतार लिया और उससे दुश्मनों को हताहत करते रहे। मेजर रिजवी ने यह बात १९ पंजाब के अफसरों को स्वयं बताई।

उस समय बटालियन एडजुटेंट मेजर जनरल जे.आर. भट्टी (रिटा.) को आज भी याद है कि लाखा सिंह की आँखें शेर जैसी चमकती थीं। अब मेरठ में रह रहे मेजर जनरल भट्टी याद करते हैं, ‘‘लाखा मेरी कंपनी व मेरी ही प्लाटून में थे। वह लंबे कद के बलवान, मजबूत, साहसी व निडर हिमाचली थे। मेजर रिजवी ने बताया कि उन्होंने लाखा की जान बचाने का हर संभव प्रयास किया। उन्होंने अपने जवानों को तेज आवाज में आदेश दिया कि अपने हेलमेट से इतनी बहादुरी से लड़ रहे निहत्थे सैनिक को नहीं मारना है। लेकिन युद्ध के कोलाहल में उनका आदेश अनसुना रह गया और लाखा सिंह को गोली मार दी गई।’’

लाखा सिंह की इस बहादुरी पर संज्ञान लेते हुए सरकार ने उन्हें मरणोपरांत ‘वीर चक्र’ से सम्मानित किया। उसी दौरान एक अन्य सिपाही देवराज को भी ‘वीर चक्र’ प्रदान किया गया। देवराज मीडियम मशीन गन के संचालक थे, जिन्होंने अपने दो साथियों के घायल होने के बावजूद निरंतर गोलियाँ चलाते हुए अपनी जान जोखिम में डाली। एक महीने बाद ही लेफ्टिनेंट कर्नल संपूरन सिंह को ‘महावीर चक्र’ तथा ‘वीर चक्र’ से अलंकृत किया गया। इस युवा यूनिट की उपलब्धियों का सम्मान करते हुए उन्हें बेदोरी की ‘बैटल उपाधि’ व हाजी पीर की ‘थियेटर उपाधि’ से सम्मानित किया गया।

हाजी पीर की लंबी चढ़ाई

१ पैरा ने २७ अगस्त को सुबह ११ बजे तक उसे सौंपे गए लक्ष्य को पूरा कर दिया। लेकिन पैराट्रूपर अभी भी कुछ और करने को मचल रहे थे। ब्रिगेडियर सिंह याद करते हैं, ‘‘हमने अपनी दूरबीन से हाजी पीर दर्रे को देखा तो वहाँ कोई हरकत नजर नहीं आई। हम १०,००० फीट की ऊँचाई पर थे। यदि हम नीचे जाकर हैदराबादी नाला पार कर ऊपर की ओर चढ़ते तो हम ८,६५२ फीट पर स्थित हाजी पीर तक पहुँच सकते थे। हम आत्मविश्वास से भरे और उस इलाके से भलीभाँति परिचित थे। मेजर दयाल ने इस बारे में मुझसे चर्चा की और हम दोनों इस बात पर सहमत थे कि हमें हाजी पीर पर हमला कर देना चाहिए।’’

सुबह वे दर्रे के पश्चिमी बाजू पर स्थित मीडियम मशीनगन की जद में आ गए। एक पलटन को उनसे निपटने के लिए छोड़कर मेजर दयाल बाकी सैनिकों को लेकर दर्रे के दाहिनी बाजू की ओर बढ़े और नीचे उतरकर हाजी पीर दर्रे पर पहुँच गए। इस साहसिक हमले से दुश्मनों में पूरी तरह घबराहट फैल गई और इसी भ्रम की अवस्था में वे वहाँ से भाग निकले। २८ अगस्त की सुबह १० बजे तक हाजी पीर दर्रे पर कब्जा कर लिया गया।

मेजर दयाल हमारे कमांडिंग अफसर लेफ्टिनेंट कर्नल प्रभजिंदर सिंह के पास गए और बोले, ‘‘सर, मैं व मेरे ट्रूपर्स भी पूरी तरह से तैयार हैं। यदि अनुमति दी जाए तो हम हाजी पीर तक पहुँच सकते हैं।’’ जब कर्नल प्रभजिंदर सिंह आश्वस्त हो गए तो उन्होंने स्वयं ब्रिगेड को बुलाया और १ पैरा द्वारा हाजी पीर पर हमला करने का प्रस्ताव रखा। लगभग दो घंटे विचार-विमर्श के बाद जनरल जोरू बक्शी ने काररवाई की अनुमति दे दी। २७ अगस्त को दोपहर २ बजे मेजर दयाल को हाजी पीर पर हमला करने का आदेश दे दिया गया। जो हमला पहले पूरी ब्रिगेड को करना था, अब वह कार्य केवल एक कंपनी के जिम्मे था।

चूँकि अल्फा कंपनी ने सैंक पर पहले हमले में अपने बहुत से जवान खो दिए थे, इसलिए मेजर दयाल अपने साथ डेल्टा कंपनी के एक दस्ते को ले गए। इन जवानों का नेतृत्व अपनी दृढता व साहस के लिए विख्यात कनिष्ठ कमीशंड अफसर सूबेदार अर्जन सिंह के हाथ था। आदेश मिलने के आधे घंटे के भीतर ही लगभग १०० जवान लेडवाली गली से नीचे उतरे और लगभग पाँच घंटे में पैदल जंगल पार कर देर शाम तक हैदराबादी नाले तक पहुँच गए। तत्पश्चात् वे उस बर्फ जैसे ठंडे पानी में उतरकर उसे पार करते हुए पानी से सराबोर पतलूनों, मोजों व जूतों सहित दूसरे किनारे पहुँच गए। ब्रिगेडियर सिंह ने बताया, ‘‘हम उस इलाके से अच्छी तरह परिचित थे। हम जानते थे कि पानी कितना ठंडा हो सकता है, इसलिए जवानों के लिए ऐसा करना कठिन नहीं था।’’ दूसरे किनारे पर पहुँचते ही जवानों ने बिना समय गँवाए हाजी पीर दर्रे की लंबी चढ़ाई चढ़नी शुरू कर दी।

हाजी पीर का धावा

जनरल दयाल ने ‘पैराट्रूपर’ पत्रिका को बताया था—

‘‘दर्रे पर कब्जा करने के लिए मुझे ऐसी मजबूत कंपनी को नेतृत्व सौंपा गया, जिसमें अल्फा व डेल्टा दोनों कंपनियों के जवान शामिल थे। २५ अगस्त को प्रशासनिक टोली में से कंपनी बनने से अब तक हम राशन के रूप में सीले हुए शकरपारे व बिस्कुट खा रहे थे, बावजूद इसके हम पर जो विश्वास जताया गया था, उससे हमारा मनोबल आकाश छू रहा था। हमने २७ अगस्त की दोपहर को अपना राशन समाप्त किया और हैदराबादी नाले के किनारे चलते रहे। दुश्मन हमें चौंकाने के लिए बेढब ढंग से गोलियाँ बरसा रहा था, जो स्पष्टतः निष्प्रभावी रहा। ईश्वर हम पर मेहरबान था। तभी अचानक बारिश शुरू हो गई, जिससे बादल बहुत नीचे आ गए और हमें छिपने का पर्याप्त साधन मिल गया। इसके बाद दुश्मन हमें नहीं खोज पाए।’’

रात को ठंड बहुत थी और सभी सैनिक बारिश व नाले से गुजरने के कारण पूरी तरह भीगे हुए थे। बावजूद इसके उनके जोश में कोई कमी नहीं आई। इससे पहली मिली सफलताओं ने उन्हें आत्मविश्वास से परिपूर्ण कर दिया था। इसलिए लगातार दूसरी रात बिना सोए काटते हुए भी उनमें लेशमात्र भी थकान नहीं थी। मेजर दयाल तीन रात से नहीं सोए थे, लेकिन उनका स्वास्थ्य तब भी उत्तम था। सैनिकों का उत्साह बढ़ाए रखने के लिए उनके नेतृत्व में होने का तथ्य अपने आप में काफी था।

दर्रे की ओर ऊपर चढ़ते हुए सैनिकों को एक बहक मिली। यह ऐसी झोंपड़ी होती है, जिसकी एक दीवार पहाड़ होता है। मेजर दयाल को उसमें कुछ हरकत दिखाई दी। उन्हें वह संदेहजनक लगा और उन्होंने जवानों से उसे घेर लेने को कहा। जब उन्होंने अंदर मौजूद लोगों को अपने हाथ ऊपर उठाकर बाहर आने को कहा तो पता चला कि वे पाकिस्तानी सेना का एक कप्तान तथा ग्यारह सैनिक हैं। पाकिस्तानी अफसर की जेब से पैराट्रूपरों ने एक नक्शा बरामद किया, जिसमें १ पैरा की स्थिति दरशाई गई थी। पूछताछ पर उस कप्तान ने स्वीकार किया कि उस छोटी सी टुकड़ी को १ पैरा को बेतरतीब करने के लिए आक्रमण करने का आदेश दिया गया था। उस कप्तान की जेब से एक खत भी मिला, जिसमें उसने पाकिस्तान के सेना प्रमुख से मृत्यु-शय्या पर पड़े अपने पिता को देखने जाने की अनुमति माँगी थी; लेकिन फिर भी उसे इस मिशन पर भेज दिया गया। वह बुरी तरह खिन्न व नाराज था और उसने सेना प्रमुख को लिखा था कि वो यह सब छोड़ देना चाहता है।

दुश्मन के सैनिकों से हथियार ले लिये गए और उन्हें भारवाहकों के रूप में साथ लेकर पैराट्रूपर्स ने हाजी पीर की ओर अपनी चढ़ाई जारी रखी। बारिश के कारण उनके पैरों के नीचे की जमीन फिसलन भरी हो गई थी, इसलिए उन्होंने अधिकांश रास्ता घुटनों व हाथों पर चलकर तय किया। सुबह लगभग ४.३० बजे वे उड़ी-पुंछ मार्ग पर पहुँच गए। दर्रा अभी भी १० किलोमीटर ऊपर था। मेजर दयाल ने अपने सैनिकों को आराम करने को कहा, जिससे वे आगामी लड़ाई के लिए ऊर्जा बचा सकें। वे सब अँधेरे में लगभग दो घंटे तक बैठे रहे। निरंतर गिरती बारिश उनके सिर से होती हुई पीठ तक पहुँच रही थी।

बटालियन की युद्ध-डायरी के अनुसार—

‘‘किसी के भी पास कंबल या गरम कपड़ा नहीं था। अधिकांश जवानों के पास केवल वाटरप्रूफ टोपियाँ थीं। विश्राम का आदेश मिलने पर वे सब आगे को उभरी चट्टानों या झुके हुए पेड़ों के नीचे और कुछ लोग खुले में ही बैठ गए। उन्होंने अपने सिर झुका लिये, जिससे बारिश उनकी पीठ पर गिरती रही।’’

सुबह वे दर्रे के पश्चिमी बाजू पर स्थित मीडियम मशीनगन की जद में आ गए। एक पलटन को उनसे निपटने के लिए छोड़कर मेजर दयाल बाकी सैनिकों को लेकर दर्रे के दाहिनी बाजू की ओर बढ़े और नीचे उतरकर हाजी पीर दर्रे पर पहुँच गए। इस साहसिक हमले से दुश्मनों में पूरी तरह घबराहट फैल गई और इसी भ्रम की अवस्था में वे वहाँ से भाग निकले। २८ अगस्त की सुबह १० बजे तक हाजी पीर दर्रे पर कब्जा कर लिया गया। वायरलेस पर जीत के संकेत ‘चमक तारा’ की गर्जना जोरू बक्शी ने प्रसन्नचित्त कानों तक पहुँची तो सब ओर हर्ष छा गया। आकाशवाणी द्वारा यह समाचार देश भर में पहुँच गया और एक घंटे के भीतर ही कोर कमांडर मेजर रंजीत सिंह दयाल को ‘महावीर चक्र’ दिए जाने का समाचार भी प्रसारित होने लगा। हाजी पीर पर तिरंगा फहरा रहा था; पाकिस्तान इस अपमान को झेल नहीं सका और जल्द ही पैराट्रूपर्स को अपनी जीत का उत्सव मनाने की जगह जवाबी आक्रमण का सामना करना पड़ा। मेजर दयाल ने तुरंत ही सहायक सेना भेजने को कह दिया।

रिंग कंटूर की लड़ाई

ब्रिगेडियर सिंह ने बताया, ‘‘२८ अगस्त को सुबह लगभग १० बजे हमें मेजर दयाल की कंपनी की सहायता हेतु कूच करने के आदेश मिले। वे ऊपर चढ़े और २९ अगस्त को सुबह लगभग ४ बजे हाजी पीर पहुँच गए। अभी पौ भी नहीं फटी थी। वह दिन शांतिपूर्वक गुजरा; लेकिन जब रात हुई तो सभी अफसर सावधान हो गए, क्योंकि दुश्मन जवाबी हमला करने के लिए कभी भी वापस आ सकता था। रिंग कंटूर क्षेत्र में भेजी गई २० जवानों की पलटन इस चौंकानेवाली खबर के साथ लौटी कि वहाँ भारी संख्या में दुश्मन एकत्र होते दिखाई दे रहे हैं। इस खबर को सुनिश्चित करने के लिए मेजर सिंह खुद दो पलटनों को लेकर ३० अगस्त को सुबह ४.३० पर रवाना हो गए। सुबह तड़के वहाँ पहुँचने पर उन्होंने देखा कि खबर सच्ची थी। हाजी पीर की हार के बाद पाकिस्तानियों ने दर्रे से १.४ किलोमीटर दूर दक्षिण-पश्चिम में स्थित रिंग कंटूर में अपनी टुकडि़यों को एकत्रित करना आरंभ कर दिया था।

उन्हें अगली चोटी पर खाकी वरदी पहने लगभग ३५ पाकिस्तानी सैनिक दिखाई दिए। ‘उनमें से कुछ ने हेलमेट पहन रखे थे, जबकि कुछ खंदकें खोद रहे थे। हम समझ गए कि यदि हमने फौरन कुछ नहीं किया तो वे हाजी पीर पर हमला करेंगे और चूँकि वे ऊँचाई पर हैं, अतः इसका लाभ उन्हें अवश्य मिलेगा।’ ब्रिगेडियर सिंह बताते हैं कि हमला करने या वहीं से वापस लौट जाने का फैसला करने के लिए उनके पास केवल कुछ क्षण ही थे। उन्होंने हमला करने का साहसिक निर्णय लिया। ‘हम पिछले पाँच दिनों से अभियानों में व्यस्त थे। रेडियो की बैट्री समाप्त हो गई थी और मेरे पास मेजर दयाल से बात करने का कोई तरीका नहीं था। जब मैं वहाँ से चला था तो हमने सहमति बनाई थी कि यदि मुझे मदद की जरूरत होगी तो वे वहाँ पहुँच जाएँगे। मैंने हमला करने का फैसला कर लिया।’

अहीर युद्धनाद ‘किशन महाराज की जय’ पुकारते हुए मेजर सिंह और उनके जवानों ने दुश्मन के सैनिकों पर धावा बोल दिया। पाकिस्तानी इस हमले के लिए तैयार नहीं थे, इसलिए वे स्तब्ध रह गए। इसके बाद जो खूनी संघर्ष हुआ, उसे ‘रिंग कंटूर की लड़ाई’ के नाम से जाना जाता है। दोनों ओर के सैनिक एक-दूसरे पर गोलियाँ बरसाने लगे। ग्रेनेड्स फेंके जा रहे थे। सारा वातावरण मरनेवालों व घायलों की चीख-पुकार से भर गया। आखिरकार आमने-सामने की लड़ाई शुरू हो गई, जिसमें सैनिक एक-दूसरे को संगीनों से भोंकने लगे, जिससे वहाँ की पथरीली भूमि रक्तरंजित हो गई। ब्रिगेडियर सिंह याद करते हैं कि युद्ध की उग्रता का कम-से-कम सैनिकों पर तो कोई असर नहीं होता। वे एक घटना बताते हैं, जब वे युवा कंपनी कमांडर होने के जोश में एक साहसी अहीर हवलदार उमराव सिंह के नेतृत्ववाले गश्ती दल में उनसे आगे निकल गए थे। ‘‘उन्होंने मुझपर बंदूक तान दी और बोले, ‘पीछे जाओ! तुम्हारी मुझसे आगे जाने की हिम्मत कैसे हुई!’ और मैंने अनिच्छापूर्वक उन्हें पहले जाने दिया। उसके बाद फौरन हवलदार उमराव सिंह और उनका साथी मशीनगन की गोलियों का निशाना बन गए।’’ रिंग कंटूर की लड़ाई में डेल्टा कंपनी के सात जवान शहीद हुए, जबकि घायलों की संख्या बाईस थी। मेजर सिंह के पीछे फटे एक मोर्टार का टुकड़ा उनकी पिंडली में घुस गया, जिससे वह लड़खड़ाकर जमीन पर गिर गए। चलने में असमर्थ होने के बावजूद उन्होंने अपने एक मृत साथी की लाइट मशीन गन उठाई और अपनी कंपनी के जीवित बचे २९ जवानों के साथ मिलकर दुश्मनों को वहाँ से खदेड़ दिया।

वे याद करते हैं कि कैसे पैराट्रूपर हीरा लाल धमाके में घायल होने के बाद भी अपनी ग्रेनेड गन चलाते रहे, जबकि पेट पर लगे गंभीर घाव के कारण उनकी अँतडि़याँ शरीर से बाहर लटक रही थीं। ‘‘उनका हाल जानने के लिए जब मैं उनके पास पहुँचा तो वो बोले, ‘साहब, मैंने मर जाना है। तू मेरी परवाह मत कर, आगे जा।’ मैं आगे बढ़ गया। इसके बाद उन्होंने शायद एक ग्रेनेड और दागा और फिर गिर पड़े तथा हमेशा के लिए अपनी आँखें मूँद लीं।’’

इसी बीच हाजी पीर पर जब मेजर दयाल ने गोलियों की आवाजों के साथ आसमान में गोलाबारी की चमक देखी तो वे समझ गए कि वहाँ जोरदार लड़ाई जारी है। उन्होंने अपने नेतृत्व में एक छोटे दस्ते के साथ वहाँ चढ़कर जाने का निर्णय लिया। वे डेढ़ घंटे के भीतर रिंग कंटूर पहुँच गए। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि मेजर सिंह का पैर लगभग फटा हुआ है। इसके बावजूद वे जमीन पर लेटे हुए पूरी बहादुरी के साथ लाइट मशीन गन चला रहे थे। मेजर दयाल ने उनके पास रुककर कुछ प्रेरणादायक वाक्य कहे। जब वे वहाँ बैठे थे, तभी किसी मशीनगन से निकली गोलियाँ उनकी स्टेनगन के आवरण पर टकराईं और वे गोलियाँ उनकी डेनिसन स्मॉक में प्रविष्ट हो गईं। वह चमत्कारी ढंग से बच गए। उनकी वह बंदूक तथा गोलियों से छलनी हुआ डेनिसन स्मॉक १ पैरा की नहान स्थित मेस में पुरस्कार के रूप में प्रदर्शित किया गया है।

सामना करना

ब्रिगेडियर सिंह याद करते हैं कि सन् १९७१ के युद्ध में उनकी डेल्टा कंपनी ने चौदह पाकिस्तानियों को पकड़ा। जब अगले दिन सुबह उन्हें पूछताछ के लिए उनके सामने पेश किया गया तो उनमें से एक ने ठेठ पंजाबी में उनसे पूछा, ‘साहबजी तू हाजी पीर पास ते सी?’ जब उन्होंने हामी भरी तो उस ढीठ पाकिस्तानी युद्ध-बंधक ने उल्लसित होते हुए बताया, ‘तुस्सी मेजर दे मेजर ही रह गए, मैं ते लांस नायक से हवलदार बन गया।’

तथापि यह भी माना जाता है कि भारत ने युद्ध के मैदान में जो कुछ भी जीता था, वह सब उसने ताशकंद में खो दिया। हाजी पीर पर्वत पर इतनी सारी बटालियनों ने अदम्य साहस सहित जो लड़ाई लड़ी, जिसमें उसके बहुत से वीर सैनिकों ने अपना जीवन कुरबान किया, सन् १९६६ में हुए ताशकंद घोषणा-पत्र में वह सब पाकिस्तान को वापस लौटा दिया गया। कर्नल बिंद्रा याद करते हैं कि जब सैनिक अंतिम रूप से हाजी पीर को खाली कर रहे थे तो उनकी आँखें युद्ध में मारे गए अपने साथियों की याद में नम थीं।

दिन भर में लड़ाई उत्तरोत्तर जोर पकड़ने लगी। दुश्मन रिंग कंटूर वापस लेने का बार-बार प्रयास करता, लेकिन डेल्टा कंपनी के साहसी सैनिक उसे हर बार मुँहतोड़ जवाब देते। बहुत से सैनिकों के खेत रहने के बावजूद वे मैदान में डटे रहे। शाम तक उनकी सहायतार्थ सेना आ पहुँची। अंततः उन्होंने उस चौकी पर कब्जा बनाए रखा।

घायल सिपाही आठ घंटे तक सहायता मिलने की प्रतीक्षा में वहीं पड़े रहे। आखिरकार ३० अगस्त की शाम को राहत वहाँ पहुँच सकी। अगले दिन सुबह दो डंडों के बीच चादर बाँधकर, कामचलाऊ स्ट्रेचर बनाकर घायलों को वहाँ से हटाया गया। उतनी ऊँचाई से घायलों को हटाना भी कोई सरल कार्य नहीं था। ब्रिगेडियर सिंह याद करते हैं कि कैसे बटालियन के सूबेदार मेजर ने स्ट्रेचर उठाने के लिए आसपास के घरों से स्थानीय लोगों को एकत्रित किया। एक स्ट्रेचर की जिम्मेदारी आठ लोगों को सौंपी गई। उनमें से चार स्ट्रेचर उठाते और अन्य चार उनके साथ चलते और जब पहले उठानेवाले थक जाते तो वे नए लोग उनकी जगह ले लेते। हमें नीचे उड़ी तक लाने में उन्हें पूरा एक दिन लग गया। मेजर सिंह के घावों की सफाई और उन पर पट्टी बाँधने का कार्य एक टेंट में निर्मित अस्थायी ड्रेसिंग स्टेशन में किया गया। उनका अत्यधिक दर्द मॉर्फिन का इंजेक्शन लेने के बाद ही कम हो सका। वहाँ से उन्हें श्रीनगर स्थित सेना के बेस अस्पताल भेज दिया गया। तत्पश्चात् उन्हें आगरा के मिलिट्री अस्पताल में भेजा गया। उन्हें पूरी तरह से ठीक होने में कई वर्ष लग गए; लेकिन उन्हें इसका कोई अफसोस नहीं। वे कहते हैं, ‘‘हमने जो कुछ भी किया, हमें उस पर गर्व है। हमें जनरल दयाल पर भी गर्व है। सामान्यतः यह माना जाता है कि बटालियन का सेकंड-इन-कमांड (२ढ्ढष्ट) पीछे रहेगा; लेकिन वह ऐसे एकमात्र सेकंड-इन-कमांड हैं, जो हर लड़ाई में सबसे आगे रहे।’’

हाजी पीर पर कब्जा करने में १ पैरा की बहादुरी को उचित सम्मान मिला। उन्हें हाजी पीर की ‘बैटल उपाधि’ से नवाजा गया। मेजर दयाल को ‘महावीर चक्र’, हवलदार उमराव सिंह को मरणोपरांत ‘वीर चक्र’, जबकि कैप्टन मदन मोहन पाल सिंह ढिल्लों व सूबेदार अर्जन सिंह को अभियानों में दिखाई गई विशिष्ट वीरता के लिए ‘सेना मेडल से सम्मानित किया गया।

‘महावीर चक्र’ से सम्मानित होनेवाले जनरल दयाल ने ‘पैराट्रूपर’ को घटनाक्रम बयान करते हुए कहा—

‘‘हमारी १ पैरा पलटन देश की आँख का तारा बन गई। प्रधानमंत्रीजी ने हमारी विशेष रूप से सराहना की। फिर चाहे वह शक्तिशाली दुश्मन से लड़ना हो या तीन दिनों की भूख को मिटाने के लिए पहाड़ी बकरियों को पकड़ना, कूक साहब की पलटन (गठन के समय १ पैरा को इसी नाम से जाना जाता था) ने दल-भावना का सर्वोत्तम उदाहरण पेश किया। जब हमारी वीरता के सम्मानार्थ भारत के राष्ट्रपति ने मेरे सीने पर ‘महावीर चक्र’ लगाया तो मेरे दिल में बरबस ही अपने उन कंधे-से-कंधा मिलानेवाले साथियों की स्मृतियाँ उमड़ आईं, जो हाजी पीर को सुरक्षित करने के लिए रिंग कंटूर में शहीद हो गए। हमारे कल के लिए उन्होंने अपना आज कुरबान कर दिया।’’

पाकिस्तान को झटका

हाजी पीर पर्वत पर कब्जा होने से जम्मू व कश्मीर में छापेमारी का एक महत्त्वपूर्ण मार्ग अवरुद्ध हो गया। इससे पाकिस्तान की घुसपैठ का मुख्य आधार निष्प्रभावी होने के अलावा पाकिस्तान का अपने घुसपैठ कर चुके गुरिल्लाओं के साथ सीधा संपर्क भी टूट गया। प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने ३ सितंबर को दिए एक साहसिक बयान में कहा, ‘‘अपनी आत्मरक्षा हेतु हम महत्त्वपूर्ण चौकियों पर कब्जा करने की काररवाई के अलावा घुसपैठियों को जड़ से उखाड़ने के लिए युद्ध-विराम रेखा भी पार कर सकते हैं।’’ पाकिस्तानियों के लिए यह बहुत बड़ा झटका था, क्योंकि वे मानते थे कि भारत किसी भी परिस्थिति में अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार नहीं करेगा। तथापि यह भी माना जाता है कि भारत ने युद्ध के मैदान में जो कुछ भी जीता था, वह सब उसने ताशकंद में खो दिया। हाजी पीर पर्वत पर इतनी सारी बटालियनों ने अदम्य साहस सहित जो लड़ाई लड़ी, जिसमें उसके बहुत से वीर सैनिकों ने अपना जीवन कुरबान किया, सन् १९६६ में हुए ताशकंद घोषणा-पत्र में वह सब पाकिस्तान को वापस लौटा दिया गया। कर्नल बिंद्रा याद करते हैं कि जब सैनिक अंतिम रूप से हाजी पीर को खाली कर रहे थे तो उनकी आँखें युद्ध में मारे गए अपने साथियों की याद में नम थीं।

(‘१९६५ भारत-पाक युद्ध की वीरगाथाएँ’ पुस्तक से साभार)

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