सिख गुरुओं की शौर्य-परंपरा

सिख गुरुओं की शौर्य-परंपरा

भारत के इतिहास की तरफ हम जब भी निगाह उठाकर देखते हैं तो यह समझ आता है कि अगर सिख कौम न होती तो आज भारत का स्वरूप कुछ और ही होता। देश शायद इसलाम बहुल होता और हिंदुओं की स्थिति भी शायद कुछ अलग होती। जनसंख्या की दृष्टि से सिख कुल आबादी का मात्र २ प्रतिशत ही हैं, पर इनकी अलग ही पहचान है, जो इन्होंने अपने गौरवशाली दस गुरुओं द्वारा प्रदत्त शिक्षाओं के आधार पर प्राप्त की है। सिख पंथ की स्थापना का श्रेय गुरु नानक देवजी को जाता है। १४६९ ई. में पंजाब में जनमे गुरु नानक देवजी ने गुरुमत को खोजा और गुरुमत की शिक्षाओं का देश-देशांतर में स्वयं जाकर प्रचार-प्रसार किया। इनकी ओजस्वी वाणी से समस्त मानव-जाति प्रभावित थी। न केवल सिख, अपितु हिंदू व मुसलमान भी इनको गुरु मानते हैं। आज के युग में एक साथ पंगत में बैठकर जात-पाँत को भुलाकर लंगर ग्रहण करने की पावन रीत को भी गुरु नानक देवजी ने ही शुरू किया था, जो आज तक अविरल रूप से संपूर्ण विश्व में जारी है।

इसी मार्ग का अनुसरण करते हुए सिखों के दसवें गुरु श्रीगुरु गोबिंद सिंहजी ने १६९९ में वैशाखी के दिन पंजाब के श्रीआनंदपुर साहिब में ‘खालसा पंथ’ की स्थापना की, जो सिख इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण दिन माना जाता है। गुरुजी ने अपने धर्म और देश की रक्षा के लिए अपना पूरा परिवार बलिदान कर दिया। गुरु गोबिंद सिंहजी के पिता श्रीगुरु तेग बहादुरजी सिखों के नौवें गुरु हैं, जिन्हें ‘हिंद की चादर’ का दर्जा प्राप्त है। कश्मीरी पंडितों को औरंगजेब द्वारा धर्म-परिवर्तन से बचाने के लिए गुरु तेग बहादुरजी ने अपने शीश का बलिदान कर दिया, यह बलिदान स्थल दिल्ली के चाँदनी चौक में आज गुरुद्वारा शीश गंज साहिब के नाम से स्थापित है। धर्म की रक्षा हेतु अपने पिता की परिपाटी को आगे बढ़ाते हुए गुरु गोबिंद सिंहजी अपने चारों पुत्रों—साहिबजादा अजित सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह व फतेह सिंह का भी बलिदान दे दिया। भारत के इतिहास में इससे बड़ी कुर्बानी की मिसाल देखने को नहीं मिलती है। इसलिए गुरु गोबिंद सिंह, जिन्हें ‘सरबंसदानी’ भी कहा जाता है। इतिहास साक्षी है, देश-धर्म की रक्षा के लिए सिख समुदाय सदैव ही अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देता आया है।

गुरु गोबिंद सिंहजी से प्रेरणा पाकर ही माधो दास बंदा सिंह बहादुर बने और कौम की रक्षा हेतु नए आयाम स्थापित किए। उनकी वीरता के किस्से आज भी घर-घर में सुनाए जाते हैं। सिखों के गौरवशाली इतिहास में कई प्रतापी राजा और योद्धा हुए हैं। इन्हीं में से एक थे महाराजा रणजीत सिंह। इन्हें ‘शेर-ए-पंजाब’ भी कहा जाता था। इनके कुशल नेतृत्व मे सिखों ने अफगानों के विरुद्ध कई युद्ध किए और अपना साम्राज्य विस्तार किया। इस काल में हरी सिंह नलवा के नाम का भी उल्लेख करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इनका नाम लिये बिना सिख इतिहास की बात अधूरी रह जाएगी। हरी सिंह नलवा के बेखौफ रवैए व वीरता के किस्से बहुत प्रसिद्ध हैं। एक बार एक शेर को उन्होंने बिना किसी हथियार के केवल अपने हाथों से ही मार डाला था। सिख साम्राज्य में जम्मू के राजा गुलाब सिंह के सेनापति जोरावर सिंह ने संपूर्ण लद्दाख और तिब्बत तक अपना परचम लहरा दिया था। १८७१ में आजादी की लड़ाई में पंजाब क्षेत्र में गुरु राम सिंहजी के नेतृत्व में ‘कूका आंदोलन’ ने अंग्रेजों की जड़ें हिला दी थीं। अफगानी कबीलों के विरुद्ध सितंबर १८९७ को हवलदार ईशर सिंह के नेतृत्व में ३६वीं सिख रेजीमेंट के २१ जवानों ने १० हजार अफगानों को पराजित किया था। ईशर सिंह की वीरता व नेतृत्व कुशलता से फौजी अफसर अत्यंत प्रभावित हुए। इस युद्ध में शामिल सभी २१ सिख शूरवीरों को अंग्रेजी हुकूमत ने वीरता के सर्वोच्च पुरस्कार ‘इंडियन ऑर्डर ऑफ मेरिट’ से सम्मानित किया था।

 

सिख संप्रदाय के प्रवर्तक : गुरु नानक देवजी

भारतीय मध्यकाल में जनमे गुरु नानक देवजी का अन्यतम स्थान है। इनका जन्म वर्तमान पाकिस्तान के लाहौर जिला में रावी नदी के किनारे तलवंडी नामक ग्राम में कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को १५२६ विक्रमी में हुआ था। किंतु कतिपय ग्रंथों के द्वारा इनका जन्म वैशाखी भी माना जाता है, अर्थात् इनका जन्म १५ अप्रैल, १४६९ ई. को हुआ था। भारतीय संत समाज में गुरु नानक देवजी को त्रेतायुगीन राजा जनक का अवतार माना जाता है। इनका जन्म हिंदू-धर्म के खत्री समाज में हुआ था। इनकी माता तृप्ता देवी थीं और पिता कल्याणचंद, जिन्हें मेहता कालू भी कहते हैं। इनकी एक बहन भी थीं। इनका नाम नानक रखा गया था और बहन का नाम नानकी।

सिख संप्रदाय में गुरु परंपरा का विकास हुआ, जो क्रमशः इस प्रकार है—गुरु नानक देव, गुरु अंगद देव, गुरु अमरदास, गुरु रामदास, गुरु अर्जुन देव, गुरु हरराय, गुरु हरकिशन, गुरु तेग बहादुर, गुरु गोविंद सिंह। अंतिम गुरु प्रतीक के रूप में गुरु की वाणी का संकलन रूप ‘श्रीगुरु ग्रंथसाहिब’ कहलाया। आगे के कुछ गुरुओं ने अपने पुत्रों को भी सिख संप्रदाय का उत्तराधिकारी घोषित किया, किंतु गुरु नानक देवजी ने अपने पुत्र श्रीचंदजी या लखमीदास को अपनी शिष्य-परंपरा का उत्तराधिकारी न घोषित करके भारतीय संस्कृति के मूल आदर्श का भी संदेश दिया। नानक देव का देहावसान करतारपुर में १५३९ ई. को हुआ था। आज यहाँ इनका समाधि-स्थली यानी गुरुद्वारा है।

सिख गुरु परंपरा

‘सिख या सिक्ख’ शब्द संस्कृत के ‘शिष्य’ शब्द से बना है। कुछ लोग इसे ‘शिक्ष्’ धातु से भी उत्पन्न मानते हैं। गुरु नानक देवजी ने जिस ‘शिष्य-परंपरा’ का प्रवर्तन किया, उसे ‘सिक्ख संप्रदाय’ कहा जाता है। भारत में अनादि काल से गुरु-शिष्य संप्रदाय और परंपरा विकसित-पल्लवित होती रही है। उसी प्रकार नानक देवजी द्वारा उनके जीवनकाल में सिक्ख परंपरा का विकास हुआ, जिसकी निश्चित तिथि नहीं मिलती है। इसलिए सिख संप्रदाय का इतहास प्रथम सिख गुरु, गुरु नानक के द्वारा पंद्रहवीं सदी में प्रारंभ होकर अंतिम गुरु दशमेश-गुरु गोविंद सिंह तक चलता है। दशम गुरु गोविंद सिंह ने गुरु तेग बहादुर सिंह से दीक्षा पाकर अपने समाज की विभिन्न जातियों को दीक्षित करके एक ‘खासला-पंथ’ खड़ा किया। इसमें ‘पंच-प्यारे’ का अन्यतम स्थान है।

जिस सिख संप्रदाय का प्रवर्तन गुरु नानक देव ने किया था, उसका उत्तराधिकार अपने पुत्रों को न सौंपकर अपने शिष्य भाई लहनाजी को सिक्ख परंपरा का दूसरा गुरु बनाते हुए नानकजी ने कहा था कि ‘मेरे शरीर से उत्पन्न हुआ तू अंगद है।’ उन्होंने गुरु अंगदजी को दूसरा गुरु बनाते समय अपने हाथ से गुरु की गद्दी पर बैठाया था और उनके चरणों में पाँच पैसे रखकर, नारियल चढ़ाकर उनकी परिक्रमा की। उन्होंने पुनः साष्टांग प्रणाम करके अपने गले की माला गुरु अंगद देवजी के गले में धारण करा दी। यहीं से सिख संप्रदाय की गुरु-परंपरा शुरू हो गई। नानकजी के विचारों को अंगद देवजी ने आगे बढ़ाया। उन्होंने भी सामाजिक-विषमता और कुरीतियों को मिटाने का बहुत प्रयास किया।

सिख संप्रदाय के तीसरे गुरु अमरदासजी का जन्म अमृतसर के वसर्के गिला में ५ मई, १४७९ को हुआ था। इनके पिता तेजभान भल्ला एवं माता बख्त कौर थीं। इनका विवाह बाल्यावस्था में मंसादेवी से हुआ था, जिनकी दो पुत्रियाँ—बीबी दानी एवं बीबी भानी और पुत्र—मोहन एवं मोहरी थे। अपनी दूसरी बेटी भानी का विवाह अपने शिष्य—चौथे गुरु रामदास से किया था। गुरु अमरदासजी अंगद साहिब की पुत्री बीबी अमरो जी के साथ गुरु वाणी सुनने गए, जहाँ गुरु अंगद देवजी से प्रभावित होकर शिष्य बन गए। गुरु अमरदासजी अंगदजी के आश्रम में सेवा करके खडूर साहिब में व्यास नदी से जल लाकर अंगदजी को स्नान कराते थे। प्रतिदिन जंगल से लकडि़याँ काटते थे। इससे प्रभावित होकर तृतीय नानक अर्थात् गुरु के रूप में ७३ वर्ष की आयु में मार्च, १५५२ को गद्दी सौंप दी। कालांतर में गुरु अमरदास ने अपना केंद्र गोइंदवाल को बनाया, जो बहुत पवित्र और प्रसिद्ध उदासी (तीर्थ स्थल) बन गया। उन्होंने यहाँ एक बावली का निर्माण कराया, जिसमें ८४ सीढि़याँ थीं।

सिख-गुरुओं की परंपरा में चौथे गुरु रामदास हुए थे, जिनका जन्म लाहौर में १५३४ को हुआ था और मृत्यु १५८१ में गोइंदवाल में हुई थी। ये गुरु की गद्दी पर ३० अगस्त, १५७४ को आसीन हुए थे। सभी गुरुओं में इनका मात्र छह वर्ष गुरु पद प्रदान किया था। आदि ग्रंथ के चौथे महला में इनकी ९०७ वाणियाँ हैं। इन वाणियों के अलावा गुरु रामदास का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य था कि इन्होंने रामदासपुर नामक गाँव बसाया, जहाँ रामसर की बाड़ी बनवाई थी। वही सरोवर आज ‘अमृतसर’ के नाम से जाना जाता है। इन्होंने एक नई परंपरा को जन्म दिया कि केवल शिष्य को ही गुरु पद नहीं दिया जा सकता, बल्कि गुरु-पुत्र को भी गुरु की गद्दी पर बैठाया जा सकता है। इसीलिए इन्होंने अपने पुत्र अर्जनदेवजी को पाँचवें गुरु के पद का उत्तराधिकारी बनाया।

गुरु अर्जुनदेव सिख गुरुओं की परंपरा में अन्यतम स्थान रखते हैं। चौथे गुरु रामदास इनके पिता और माता बीबी भानी थी। इनका जन्म १५ अप्रैल, १५६३ को गोइंदवाल साहिब में हुआ था और इनका विवाह १५७९ में १६ वर्ष की अवस्था में ही हो गया था। गुरु नानक की भाँति गुरु अर्जुनदेव को भी सिद्ध महापुरुष एवं ब्रह्मज्ञानी माता जाता है। सिक्ख संप्रदाय की परंपरा एवं संस्कृति को भारतीय समाज में घर-घर भेजने का श्रेय अर्जुनदेव को ही जाता है। इन्होंने गुरु-दरबार या ‘गुरुद्वारा’ के निर्माण की व्यवस्था और १५९० ई. में तरनतारन के सरोवर में हरमिंदर साहिब का निर्माण करवाया था। इन्होंने सरोवर के शिलान्यास के लिए चारों कोने तथा मध्य में सूफी संत साईं मियाँ मीर के द्वारा ईंट रखवाई और हिंदू-मुसलिम एकता और समरसता का संदेश दिया था। महाराजा रणजीत सिंह द्वारा इस मंदिर को स्वर्णमंडित करवाए जाने के बाद यह ‘स्वर्ण मंदिर’ के नाम से विख्यात हुआ। इसमें स्थापित चार दवाजे हिंदू धर्म के चारों वर्णों के लिए खुले माने जाते हैं।

पूर्व गुरुओं एवं अर्जुनदेव के कारण पंजाब क्षेत्रों में मुसलिमों को प्रभाव समाप्त होने लगा था। सूफियों के द्वारा धर्मांतरण कार्य स्थिर हो गया था। इसलिए सिख संप्रदाय पर मुसलिम शासकों को कोपभाजन बढ़ता गया। कट्टरपंथियों की शिकायत के कारण गुरु अर्जुनदेव पर अकबर बहुत नाराज हुआ था। उसे बताया गया कि श्री गुरुग्रंथ साहिब में मुसलमानों की निंदा की गई है, किंतु उसने जब स्वयं देखा तो ५१ मोहरों के साथ क्षमा-याचना की थी। १६०५ में अकबर का बेटा जहाँगीर बादशाह की गद्दी पर बैठा और वह अपने विद्रोही बेटे खुसरू का पीछा करते हुए सरहिंद आया था। यहाँ शेख ने गुरु अर्जनदेवजी के खिलाफ जहाँगीर को भड़काया, जिससे जहाँगीर अर्जुनदेव को मारने का षड्यंत्र रचने लगा। इसी बीच उसका बेटा खुसरू अर्जदनदेव से मिला, इन्होंने खुसरू को चंदन-तिलक किया। इस घटना से क्रोधित होकर जहाँगीर ने अर्जुनदेव के घर एवं संतानों को मुर्तजा खाँ को सौंप दिया। आदिग्रंथ पर दो लाख रुपया जुर्माना लगाया, किंतु उसके आदेश को अर्जुनदेव ने मना कर दिया। तब उसने गुरु अर्जुनदेव को कठोर यातना देते हुए इसलाम अपनाने के लिए कहा। किंतु उन्होंने अपने निज-जाति-धर्म पर बलिदान होने में गौरव का अनुभव किया। गुरु अर्जुनदेव को सश्रम कारावास देते हुए उन पर अनेक प्रकार का अत्याचार किया गया। गुरु अर्जुनदेव पर तपता रेत डाला गया था, किंतु उनके लिए यह शीतल बन गया था। कालांतर में आग के ऊपर लोहे का तवा रखकर उनको बैठाया गया। पुनः उनको खौलते हुए तेल में बैठाया गया, जिससे उनके शरीर में छाले-छाले निकल गए, किंतु उनके मुख से यही निकला—तेरा किया भाणा मिठा लागे। हरि नामु पदारथ नानक माँगे॥

गुरु अर्जुनदेव ने श्रीगुरुग्रंथ साहिब में ननक, अंगद, अमर, रामदास के साथ अपनी वाणियों को प्रमुखता से रखा है। इसके साथ इसमें जयदेव, नामदेव, त्रिलोचन, परमानंद, सधना, बेनी रामानंद, धन्ना, पीपा, सेन, कबीर, मरदाना, रबदास (रैदास), शेख फरीद, भीखन, सूरदास (मदनमोहन) के साथ लगभग १५ अन्य भट्ट-कवियों की भी वाणियों का संकलन प्राप्त होता है।

गुरु हरगोविंद छठवें गुरुपद पर आसीन होने वाले अर्जुनदेवजी के एकमात्र पुत्र थे। गुरु हरगोविंद सिंह का जन्म १९ जून, १५९५ को अमृतसर के गुरु की ‘वडाली’ में हुआ था। पिता की मृत्यु के बाद गुरु परंपरा एवं परिवार की सारी जिम्मेदारी इनके ऊपर आ गई। ये मात्र ग्यारह वर्ष के थे, तभी भाई गुरुदास एवं बाबा बुड्ढाजी ने गुरुपंथ की शिक्षा-दीक्षा में प्रवीण बनाया और टीका लगाकर गद्दी पर बैठाया। जिस तरह से अमीर खुसरो और अब्दुर्रहीम खानखाना ने अनेक शासकों की सेवा की थी, उसी प्रकार वृद्ध संत भाई बुड्ढाजी ने दूसरे गुरु से लेकर छठवें गुरु हरगोविंद सिंह तक पाँच गुरुओं को टोका लगाकर गद्दी पर बैठाने का सौभाग्य प्राप्त किया था। धार्मिक दृष्टि से बाबा बुड्ढाजी ने जाट जाति में जन्म लिया था, जबकि सभी गुरुओं का जन्म खत्री जाति में हुआ था। सिक्ख संप्रदाय में यह बहुत भारी सामाजिक समरसता का उल्लेख प्राप्त होता है।

गुरु हरगोविंद सिंह ऐसे सिक्ख-गुरु हैं, जिन्होंने सिक्ख-आंदोलन का सैनिकीकरण किया और अपने भक्तों एवं अनुयायियों को शस्त्र-अश्व रखने का आदेश दिया। स्वयं गुरुजी ने दो तलवारों को रखकर ‘मीरी और पीरी’ का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि सत्ता, शक्ति और भौतिक उन्नति के लिए एक कृपाल मीरी है और आध्यात्मिक उन्नति के लिए दूसरा कृपाण पीरी है।

गुरु हरगोविंद सिंह घुड़सवारी और आखेट में अत्यंत सिद्धहस्त एवं तलवार-युद्ध में प्रवीण थे। इन्होंने १६०८ ई. में हरिमंदिर के सामने विशाल राजसिंहासन बनवाया, जिसे ‘अकाल तख्त’ नमा दिया। ‘अकाल तख्त’ का अर्थ है कि जिसके ऊपर समय का कोई प्रभाव न पड़े। अमृतसर की सुरक्षा के लिए इन्होंने एक किला भी बनवाया, जिसे ‘लोहागढ़’ के नाम से जाना जाता है। इन्होंने सिक्ख-सैन्य की तैयारी के लिए अकाल तख्त के सामने सिक्ख-युवकों को मल्लयुद्ध एवं कुश्ती की प्रतियोगिताएँ प्रारंभ कीं।

‘छठे बादशाह’ गुरु हरगोविंद सिंह अपनी सैन्य-शक्ति के कारण युद्ध में सम्मिलित होने वाले पहले गुरु कहलाए, जिन्होंने अपने जीवन को सिक्खों को युद्ध-कलाएँ सिखाने और सैन्य-परीक्षणों के लिए समर्पित कर दिया। इन्होंने अपने कुशल सैन्य-शक्ति के द्वारा अनेक लड़ाइयाँ लड़ीं, जिनमें रोहला की लड़ाई, करतारपुर की लड़ाई, अमृतसर की लड़ाई, हरगोविंदपुर की लड़ाई, गुरुसर की लड़ाई, कीरतपुर की लड़ाई विशेष उल्लेखनीय एवं ऐतिहासिक हैं। इन्होंने अपने सिक्ख संगतों में गुरुद्वारों को भेंट में घोड़े, शस्त्र और अन्य युद्ध-सामग्री को दान करने के लिए प्रेरित किया। इन्होंने गुरु की गद्दी के उत्तराधिकारी के रूप में अपने पोते हररायजी को ‘सातवाँ गुरु’ घोषित किया था, जिन्हें १४ वर्ष की आयु में ३ मार्च, १६४४ ई. को ‘सप्तम नानक’ की उपाधि से विभूषित किया गया था।

सातवें गुरु श्री हररायजी का जन्म १६ जनवरी, १६३० को पंजाब प्रांत के रूपनगर, कीरतपुर साहिब में हुआ था। इनके पिता गुरदिताजी गुरु हरगोविंद सिंह के बेटे थे और माता निहाल कौर जी थी। गुरु हरराय का विवाह १६४० ई. में बुलंदशहर के दयारामजी की पुत्री रामराय, हरिकिशन हुए थे। गुरु हरराय सिक्ख संप्रदाय के सातवें गुरु के रूप में महान् आध्यात्मिक, राष्ट्रवादी, उन्नायक एवं कुशल योद्धा भी थे। ‘सप्तम नानक’ गुरु हरराय को उनके बाबा हरगोविंद साहब ने अपने जीवनकाल में ही ३ मार्च, १६४४ ई. को ‘गुरुपद’ पर बैठा दिया था। बाबा हरगोविंद के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए गुरु हरराय ने भी राजनीतिक सूझ-बूझ के साथ ही कार्य किया और सिक्ख-योद्धाओं को संगठित-सुसज्जित किया।

अपने बाबा की भाँति इन्होंने भी अनेक लड़ाइयाँ लड़ी थीं। मालवा एवं दोआबा से लौटते समय मुहम्मद यारबेग खान ने गुरु हररायजी पर एक लाख सैनिकों के साथ आक्रमण कर दिया। किंतु इन्होंने यारबेग को परास्त कर दिया था। दारा शिकोह भारतीयतावादी था। इनके पुत्र को गुरु हररायजी द्वारा सहयोग एवं संरक्षण देने के कारण इनसे औरंगजेब बहुत शत्रुता करता था। उन्हें औरंगजेब शत्रुतापूर्वक मारना चाहता था। इसलिए हररायजी को दिल्ली दरबार में बुलाया गया। इनके बड़े पुत्र दिल्ली दरबार जाने के लिए तैयार हो गए। सिक्ख धर्म एवं गुरुवाणी के प्रति भ्रष्ट-मसंद, धीरमल एवं मिनहास व्यक्तियों ने भ्रांतियाँ फैलाई थीं। उसके विषय में रामरायजी द्वारा मुगल दरबार में गलत व्याख्या कर दी गई, जिनसे दुःखी होकर गुरु हररायजी ने राष्ट्रीय स्वाभिमान एवं सिक्ख धर्म की अनुशासन-मर्यादा के कारण रामरायजी को सिक्ख संप्रदाय से हटा दिया। उसी समय गुरु-परंपरा एवं श्रीगुरुग्रंथ साहिब की गलत व्याख्या एवं परिवर्तन को रोकने के लिए सिक्ख संप्रदाय ने कठोर नियम तैयार किए। कालांतर में अपने जीवन के अंतिम समय में गुरु हररायजी ने अपने दूसरे छोटे पुत्र हरकिशन को आठवें गुरुपद पर आसीन किया। इन्होंने कीरतपुर में ही ६ अक्तूबर, १६६१ ई. को अपनी अंतिम साँस ली।

सिक्ख संप्रदाय के आठवें गुरु हरकिशनजी को गुरु हरिकृष्ण भी कहा जाता है। इनका जन्म ७ जुलाई, १६५६ ई. को कीरतपुर में हुआ था। इनके पिता का नाम गुरु हरराय और माता का नाम किशन कौर था। हरकिशनजी दो भाई थे। बड़े भाई रामरायजी पिता के गुरु हरराय ने इन्हें सिक्ख संप्रदाय से निकाल दिया था। यही कारण है कि गुरु हरराय ने अपने छोटे पुत्र को गुरुपद का उत्तराधिकार मात्र ८ वर्ष की अवस्था में अपने प्रयाण से पूर्व सौंप दिया था। रामरायजी ने औरंगजेब से अपने अधिकार न मिलने की शिकायत की थी। अतएव उसने गुरु हरकिशनजी को दिल्ली दरबार बुलाने के लिए राजा जयसिंह को दायित्व दिया। गुरु हरकिशनजी दिल्ली गए। यहाँ जनता के द्वारा इनका भव्य स्वागत हुआ।

३० मार्च, १६६४ को गुरु हरकिशनजी का प्रयाण हुआ और गुरु तेगबहादुर को गुरुपद प्राप्त हुआ। इनकी श्रद्धांजलि में दशम गुरु गोविंद सिंह की उक्ति सत्य चरितार्थ होती है—श्री हरकिशन धियाइए। जिस दिट्ठे सब दुख जाए॥ इन्होंने आनंदपुर साहिब की स्थापना की थी, जो आज सिक्ख समुदाय का बहुत पवित्र तीर्थ माना जाता है।

नवम सिक्ख गुरु के रूप में गुरु तेग बहादुर सिंह का नाम विख्यात है, जिनके शौर्य एवं बलिदान से सनातन धर्म की रक्षा हुई है। इनका जन्म १ अप्रैल, १६२१ ई. को अमृतसर में हुआ था। इनके पिता हरगोविंदजी छठवें सिक्ख गुरु थे, जिन्होंने सर्वप्रथम सिक्ख-सैन्य को तैयार करके हिंदू-धर्म की रक्षा के लिए मुगलों से अनेकानेक युद्ध किए। गुरु तेग बहादुरजी ने अपने पिता एवं सिक्ख धर्म का अनुसरण किया। ये भक्त, कवि और योद्धा भी थे। ३३ वर्ष की अवस्था में इन्हें हरकिशनजी ने गुरुपद प्रदान किया था। भारतीय जनता में देशभक्ति का उन्मेख करने के लिए इन्होंने देश के विचित्र कोनों में भ्रमण किया। इन्होंने गुरु नानकजी की भक्ति-भावना को भारतीय जनता में जमाया और धर्मांतरण एवं मुसलिम अत्याचार का विरोध किया। १६६६ ई. में प्रयाग और काशी की धर्मयात्रा करते हुए गुरु तेग बहादुर सिंहजी पटना आ गए। अपनी धर्मपत्नी माता गूजरी को पटना (पटना साहिब) में ठहराकर और छोड़कर स्वयं असम और बंगाल की दिशा में चले गए। मध्यकालीन भक्ति की धारा को सिक्ख समाज और भारतीयों में जीवंत करते हुए गुरु तेग बहादुर सिंह ने कहा था—

गुन गोविंद गाइयो नहीं, जनमु अकारथ कीनु।

कछु नानक हरि भजु मना, जिहि विधि जल कउ मीनु॥

भारतीय संस्कृति, धर्म की रक्षा के लिए गुरु तेग बहादुर सिंह एवं उनके तीन शिष्यों—भाई दयाराम, भाई मतीदास, भाई सतीदास को बहुत यातनाएँ दीं गईं। परंतु उन्होंने ‘जिस देश-जाति पर जन्म लिया, बलिदान उसी पर हो जाए’ को चरितार्थ किया। ‘सिक्ख इतिहास में श्रीरामजन्मभूमि’ ग्रंथ में श्री राजेंद्र सिंह ने लिखा है कि यातना के पाँचवें दिन गुरु तेगबाहदुर के सम्मुख भाई दयाराम को उबलते पानी के हंडा में बंद करके, भाई मतीदास को आरे से चीरकर, भाई सतीदास को रुई में लपेटकर जला दिया गया। फिर भी गुरु तेगबहादुरजी ने अपने धर्म की रक्षा के लिए इसलाम को नहीं कबूला। तीनों शिष्यों का धर्म हेतु बलिबेदी पर चढ़ जाने के उपरांत २४ नवंबर, १६५७ ई. को दिल्ली के चाँदनी चौक में गुरुजी का सिर काटकर हत्या कर दी गई।

गुरुजी के शीश की सफाई करनेवाला ‘जैता रंगरेटा’ गुरुजी का शिष्य था। उसने चतुराई के साथ गुरुजी के शीश को गुप्त रूप में दिल्ली से आनंदपुर लाया। तब माता गूजरी और उनके बेटे गोविंद सिंह ने अंतिम संस्कार किया। गुरुजी के धड़ अर्थात् शीश का अन्य भाग रात्रि में लक्खीशाह बनसारा ने अपने आठ पुत्रों के साथ रायसीना ग्राम में लाया और विधिवत् दाह-संस्कार किया। आँधी के चलने से पूरे गाँव में आग लग गई, जिनसे पूरा गाँव जलकर राख हो गया। कालांतर में गुरु तेग बहादुर के बलिदान की स्मृति में चाँदनी चौक पर शीशगंज-गुरुद्वारा और रायसीना ग्राम के स्थान पर रकाबगंज गुरुद्वारा का निर्माण हुआ। आज संपूर्ण देश में इनके बलिदान को ‘हिंद की चादर’ के नाम से जाना जाता है।

दसवें गुरु गोविंद सिंहजी का जन्म वर्तमान पटना (बिहार) में २२ दिसंबर, १६६६ ई. को हुआ था। उनके पिता गुरु तेग बहादुर और माता गूजरी थी। गुरु तेग बहादुरजी काश्मीरी ब्राह्मणों की रक्षा एवं वार्त्ता के लिए औरंगजेब के पास जाने से पूर्व ११ नवंबर, १६७५ को अपने पुत्र गोविंद सिंह को गुरु पद पर बैठा दिया था। इसलिए इन्हें दशमेश और दशम गुरु भी कहते हैं। इन्हें स्वामी विवेकानंदजी ने आदर्श हिंदू की संज्ञा दी थी। गुरु गोविंद सिंहजी के बाद सिक्ख संप्रदाय की गुरु पद की परंपरा समाप्त हो गई। इनके बचपन का नाम गोविंद राय था। इनका जन्म पटना में हुआ था और यहाँ अपने जीवन के मात्र चार वर्ष ही रह पाए थे। पटना के इस स्थान को अब तख्त श्री पटनासाहिब के नाम से जाना जाता है। अन्य सिक्ख गुरुओं की भाँति गुरु गोविंद राय साहब का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण एवं कष्टमय था। इनके जन्म के समय पिता पूर्वी भारत के प्रांतों—असम, बंगाल में धर्मोपदेश एवं भक्ति-शक्ति के नवजागरण पर गए हुए थे। यहाँ से वापस आकर गुरु तेग बहादुरजी अपने परिवार को १६७० ई. में पंजाब ले गए। पुनः हिंदू-धर्म एवं परिजनों की रक्षा के लिए हिमालय की शिवालिक पहाडि़यों के बीच ‘चक्की नानकी’ स्थान पर रहने लगे। कालांतर में जिस स्थान को आनंदपुर साहिब के नाम से जाना जाता है।

दशम गुरु गोविंद सिंह के चार पुत्रों के बलिदान को राष्ट्रभक्त नहीं भूल पाएँगे। इन्हें चार साहिबजादों के रूप में भी जाना जाता है। १८ वर्षीय बाबा अजित सिंह गुरु गोविंद सिंहजी के साथ चले गए और सरसा नदी के किनारे माता गूजरीजी के साथ छोटे साहिबजादे जोरावर सिंह (९ वर्ष) और फतेह सिंह (७ वर्ष) रह गए। इनके यहाँ पूर्व में नौकर रहा गंगू नामक व्यक्ति के घर माता गूजरी पोते साथ चली गईं। प्रलोभन पाकर गंगू ने नजीर खाँ से माता गूजरी एवं दोनों बालकों की सूचना दे दी, जिसके कारण उसे बहुत पुरस्कार मिला। दोनों साहिबजादों को रातभर ठंडे बुर्ज में रखा गया और दूसरे दिन इसलाम न स्वीकारने के कारण ९ वर्षीय जोरावर सिंह ओर ७ वर्षीय फतेह सिंह को जिंदा दीवार में चिनवा दिया गया। जोरावर सिंह की आँखों में आँसू देखकर फतेह सिंह ने कहा, ‘‘हम लोग अपने पूर्वजों की कुर्बानी को व्यर्थ नहीं जाने देंगे और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए हँसते-हँसते बलिदान होंगे।’’ फतेह सिंह ने बड़ी मार्मिक बात कही थी—‘‘मुझे बलिदान होने का दुःख नहीं है। दुःखी इसलिए हुआ कि इस संसार में मैं सबसे पहले आया। मुझे पहले अपने देश, धर्म एवं माटी के लिए बलिदान होना चाहिए था, परंतु मेरे सामने मेरा छोटा भाई बलिदान हुआ, तू बहुत भाग्यवान है।’’

सिक्खों ऐसा गौरवशाली इतिहास भारत की धरती में प्रेरणा एवं पाथेय बन गया। सिक्ख गुरुओं का शौर्य-पराक्रम अद्वितीय है। इसी बलिदान पर गुरु गोविंद सिंह ने कहा था—

सवा लाख से एक लड़ाऊँ।

चिडि़यन ते मैं बाज तुड़ाऊँ॥

—ऋषि राज

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