'गुड मॉर्निंग' सूरज दादा

'गुड मॉर्निंग' सूरज दादा

चींटी रानी

चींटी रानी-चीटीं रानी

छोटी है पर बड़ी सयानी,

मिल-जुलकर सब काम है करती,

लाइन बनाकर हरदम चलती,

राह में दुःख-सुख कहती-सुनती,

नहीं कहीं है धक्का-मुक्की,

ना ही करती मारामारी,

चींटी रानी बड़ी सयानी।

कालू दबंग

कालू कौआ बड़ा दबंग,

करता सबकी नाक में दम।

छीना-झपटी उसके शौक,

पंछी खाते उससे खौफ।

देखकर कालू की शैतानी

बिल्ली मौसी को आया गुस्सा,

उछल उसे जा धर-दबोचा

कालू काँव-काँव चिल्लाया

अपना गैंग झट बुलवाया।

देखकर कालू की पलटन भारी

भागी डरकर बिल्ली बेचारी,

पर कुत्ते की भौं-भौं के आगे

दबंगों की टोली भागी।

सूरज दादा

सूरज दादा घर से निकले

‘लाल शर्ट’ में सज-धजकर,

‘गुड मॉर्निंग’ सूरज दादा

चिड़ियों ने गाया हिल-मिलकर

सूरज दादा इतराने लगे

चाल अपनी तेज दिखाने लगे,

हर ठाँव-छाँव की आस लिये

धूप से सब कतराने लगे।

सूरज दादा का पसीजा मन

समेटा अपना धूप बिछावन,

चल दिए वे अपने घर

हाथ हिला बाय-बाय कर।

रानी बिटिया आँखें खोलो

सुबह-सुबह है सूरज आया

लाल-सुनहरा सूरज आया,

धरती ने लेकर अँगड़ाई

अपनी नींद तुरंत भगाई।

मम्मी ने की रसोई में खटपट

पापा ऑफिस भागे सरपट,

रानी बिटिया आँखें खोलो

बैग सँभालो झटपट-झटपट।

तुमको भी तो स्कूल है जाना

पढ़ना-लिखना मेहनत करना,

जग में देश का नाम है करना,

रानी बिटिया आँखें खोलो

अपनी नींद तुरंत भगाओ।

शादी का लड्डू

बंदर आया-बंदर आया

ढोल बजाता बंदर आया

शादी कर बँदरिया लाया,

बँदरिया अब उसे नचाती

लिपस्टिक-पाउडर रोज मँगाती

बंदर जी-भरकर पछताया

शादी का लड्डू क्योंकर खाया?

सँवराए बादल

जल का भार सीने में दबाए

घनीभूत से, पीड़ा से

सँवराए बादल,

धरती पर पाँव टिकाए

मंथर गति से सरकते

गगन में छा गए हैं,

यह गम ही तो उन्हें उदार बनाता है

धारा की विदाई की पीर का

एहसास कराता है,

उसके घावों पर मरहम लगाने को

वे पिघलकर अश्रुओं की धार बन

छम-छम बरस जाते हैं

वे श्यामल बादल।

तपन सृजन की

तीखी चिलचिलाती धूप को

लू के पंखों पर विचरते देख

राह रोकी गुलमोहर के,

चटख लाल-पीले फूलों ने

जरा ठहरो, रुको

कुछ हँसो, गुनगुनाओ हमारे संग भी,

धूप तपते-तपते ही मुसकाई, बोली—

‘तुम्हें यह शोख रंग

मेरी तपन ने ही तो दिए हैं

राह न रोको मेरी’, वह बढ़ चली।

तभी लहराते-सरसराते नीम ने

गलबहियाँ डाल उसे थामना चाहा,

पर सुखद आलिंगन के इस मोहपाश से

स्वयं को मुक्त कर

वह बढ़ चली,

वह जानती थी

तपन ही उसकी शक्ति है सृजन की

वह बढ़ चली।

—माला श्रीवास्तव

डी-३६, सीनियर सिटीजन होम कॉम्प्लेक्स

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