लोकगीत की कोख से उपजा 'चटनी संगीत'

लोकगीत की कोख से उपजा 'चटनी संगीत'

इस लोकगीत के बोल उत्तर प्रदेश, बिहार की याद दिलाते हैं, परंतु यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि यही नहीं, इन प्रांतों में प्रचलित बिरहा, कजरी, चैती, झूला, बारहमासा, सोहर, विवाह गीत भारत से बाहर डायस्पोरा देशों में अब नए अवतार ‘चटनी संगीत’ के रूप में लोकप्रिय है। सूरीनाम, ट्रिनिडाड, मॉरीशस जमेका, गुयाना और फीजी में भोजपुरी और क्रियोल के मिश्रण से जनमे चटनी संगीत की लोकप्रियता का आलम यह है कि वहाँ कोई भी उत्सव, विवाह, मेला या डांसफ्लोर इसके बिना अधूरा रहता है।

लगभग डेढ़ सौ बरस पहले अंग्रेज शासकों द्वारा गन्ने और कॉफी की खेती की देखभाल करने के लिए सात समंदर पार लाए गए गिरमिटिया श्रमिकों का जीवन कठिनाइयों का पर्याय था। लंबी कठिन यात्रा, रोगों के प्रकोप और दिनभर खेतों में हाड़तोड़ मेहनत से थके-हारे ‘जहाजी भाइयों’ के मनोबल को बनाए रखने में उनकी अपनी मिट्टी से जनमे रोपाई, बुवाई, जन्म, विवाह, वियोग के गीतों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई। लोकगीतों की मधुरता में अपनी संस्कृति से बँधे हुए वे गुलामी और आर्थिक संघर्ष से परास्त नहीं हुए।

अनुबंध (अग्रीमेंट) समाप्त होने के पश्चात् जो गिरमिटिया श्रमिक अपने देश नहीं लौटे और यहीं बस गए, वे धीरे-धीरे यहाँ की भाषा ‘क्रियोल’ सीखने लगे। उनकी आनेवाली पीढ़ियाँ शिक्षित होने लगीं, लेकिन उनके घर-परिवार में भोजपुरी शब्दों का प्रयोग होता रहा। क्रियोल में भोजपुरी के शब्दों और मुहावरों के छौंक तथा लय-ताल के लिए परंपरागत हारमोनियम, ढोलक, धनताल, तासा के साथ इलेक्ट्रिक गिटार, सिंथेसाइजर और स्टील के ड्रमों के प्रयोग से चटपटे ‘चटनी संगीत’ का जन्म हुआ।

सन् १९४० के आसपास गन्ने के खेतों, मंदिरों, विवाह-शादियों में ‘चटनी संगीत’ के बोल सुनाई देते थे, उनका कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। १९६८ में साउथ अमेरिका के एक छोटे से देश सूरिनाम के ‘रामदेव चैतो’ का पहला गीत रिकॉर्ड हुआ। मूलतः धार्मिक होते हुए भी लय-ताल में बँधे रामदेव चैतो के गीत  नृत्योपयोगी थे, जैसे—

भूलऽ बिसर मत जाना

अजी, भूल बिसर मत जाना

कन्हैया मोरी गलियों में आना

जब तुम मेरा नाम न जाऽना

मेरा नाम दीवाना

कन्हैया मोरी गलियों...

आरंभिक चटनी गीतों की प्रकृति धार्मिक होने का कारण यह था कि ज्यादातर चटनी गायक अपनी गायकी का आरंभ मंदिरों से करते थे जहाँ भजन-कीर्तन भोजपुरी में होता था।

भारतीय कैरेबियाई संस्कृतियों के मिश्रण से उद्भूत इस अनूठे संगीत में लगभग एक दशक के बाद महिला गायिका द्रौपती के आने से एक नया मोड़ आया। परंपरागत विवाह-गीतों पर आधारित उनके एलबम ‘लैट अस सिंग एंड डांस’ में गायन के साथ नृत्य की जुगलबंदी से लोकप्रियता का नया कीर्तिमान स्थापित हुआ, इसके नृत्योपयोगी गीतों की बानगी इस प्रकार है—

मोरी गारी सुनो महाराज

दुलहे राम ललाऽऽऽ

दुलहे के बप्पा देखो अजवा सजे हैं

अलाऽऽ जइसे राजा महाराऽऽज

दुलहे राम ललाऽऽऽ

ट्रिनिडाड और टौबेगो में चटनी संगीत को जन-जन तक पहुँचाने का श्रेय सातवें दशक के संस्कृतिप्रेमी मोइन मुहम्मद और उनके भाई को है, इन्होंने रामदेव चैतो और द्रौपती जैसे चटनी के महारथियों के ‘शो’ आयोजित किए। इनके भाई कमालुद्दीन, जो स्वयं रेडियो कलाकार थे, ने भारतीयों के लिए प्रसारित होनेवाले कार्यक्रम में चटनी संगीत को शामिल करवाया।

ट्रिनिडाड के बारकपुर से आए ‘सुंदर पोपो’ के आने से चटनी में एक निर्णायक मोड़ आया। अपने चर्चित गीत ‘नाना और नानी’ में सुंदर पोपो ने दूर गाँव में बसे वृद्ध दंपती की दिनचर्या को हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित भाषा में मजाकिया लहजे में प्रस्तुत किया—

नाना नानी घर से निकले धीरे-धीरे चलते गए,

मदरा के दुकान में दूनो जाके बैठ गए।

आगे-आगे नाना चले,

नानी गोइंग बिहाइंड,

नाना ड्रिंकिंग व्हाइट वाइन

नानी ड्रिकिंग वाइन।

उनके ‘हम न जइबे’, ‘सुराजी’, ‘मदर्स लव’ और ‘फिल्लौरी बिना चटनी’ आदि गीतों ने उन्हें प्रतिष्ठित सिंगर बना दिया। इस समय के कुछ अन्य चटनी कलाकारों लिलीजॉन, सैम बूदराम, ‘लाखन करिया’, ‘आनंद यानकरण’, ‘सोनी मान’ के गीतों को रिकॉर्ड कर उन्हें पूरी दुनिया में पहुँचाने का श्रेय रोहित जगेसर को है, व्यवहार और व्यापार कुशल रोहित जगेसर ने १९८० के दशक में दुनिया भर के बड़े-बड़े स्टेडियम और क्रिकेट क्षेत्रों में चटनी संगीत के ‘लाइव कान्सर्ट’ आयोजित किए।

चटनी की लोकप्रियता का बहुत बड़ा कारण गिटार, ऑर्केस्ट्रा आदि पश्चिमी वाद्यों का प्रयोग था। कंचन बाबला के ‘कुछ गड़बड़ है’ की सफलता देखकर अन्य चटनी कलाकारों ने भी केलिप्सो और अमेरिकन लय-ताल का मिश्रण करके अपनी संगीत-शैली को चटपटा बनाया और उसे नाम दिया ‘इंडियन सोका’। कार्निवाल सेंशन में ट्रिनिडाड और टोबेगो में ‘चटनी सोका’ प्रतियोगिताएँ होने लगीं। ट्रिनिडाड को ‘द्रौपती रामगोनाई’ को ‘चटनी क्वीन’ की उपाधि से नवाजा गया, यद्यपि उनकी उत्तेजक और कामुक नृत्य मुद्राओं से युक्त शैली की आलोचना हुई।

पिछले कुछ वर्षों में विशेष रूप से त्रिनिडाड में संगीत के माध्यम से साईंबाबा की स्तुति करनेवाले आयोजनों ने चटनी संगीत को बढ़ावा दिया है। भारतीय रागों पर आधारित, ऊँची पिच पर गाए जानेवाले इन भक्ति गीतों में तेज गति से कुछ पंक्तियों की बार-बार आवृत्ति इस कीर्तन को चटनी के समकक्ष खड़ा कर देती है।

मॉरीशस में चटनी संगीत का क्रमिक विकास ‘सेगा भोजपुरी’ से ‘सेगा चटनी और फिर ‘सेगा बॉलीवुड’ के रूप में हुआ है। सत्रहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी में अफ्रीकी देशों से आए गुलाम श्रमिकों ने यूरोपीय प्रभाव को आत्मसात् कर जिस गायन और नृत्यशैली को जन्म दिया, वह ‘सेगा’ कहलाया। सेगा भोजपुरी में रावान्ने मारवान्ने और ट्राइएंगल आदि वाद्यों के साथ-साथ भारतीय संगीत वाद्य ढोलक, तबला, हारमोनियम भी शामिल हो गए। १९५० तक औपनिवेशिक सत्ता और कैथोलिक चर्च ने इस संगीत-शैली का तिरस्कार किया, लेकिन धीरे-धीरे पार्टियों में इसने अपनी जगह बना ली।

भोजपुरी को सेगा के रंग में रँगने की अनिवार्यता की चर्चा करते हुए मॉरीशस की महिला गायिका विस्वानी दीपोय का कहना है कि ‘हम अपने गीतों की रचना सेगा की लय पर नहीं करेंगे तो कोई भी इन्हें नहीं सुनेगा।’

सेगा चटनी में ऑर्केस्ट्रा के साथ चूले (सीटी) का प्रयोग दर्शकों को झूमने के लिए विवश कर देता है, ‘मॉरीशियन चटनी’ एलबम का एक गीत है—

डिस्को में

गामात में

पिकनिक में, पार्टी में, हम नाचिला

ला टैंट में, हम नाचिला।

विवाहोत्सव आदि में किए जानेवाले मनोरंजनात्मक नृत्य गमात को आधुनिक रंगत देकर चटपटा बनाने की प्रक्रिया में नब्बे के दशक में ‘भोजपुरी बॉयज’, ‘भोजपुरी लवर्स’, ‘भोजपुरी बाजा बाजे ब्वॉयज’ ‘मसाला चटनी’, ‘मिक्स चटनी’ आदि संगीत समूहों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई। इन दलों में शामिल नृत्यांगनाओं और फ्यूजन संगीत ने जनता को मोह लिया। ‘भोजपुरी बॉयज’ एलबम की एक मोहक रचना है—

ऐ लांगडू, ऽऽ ऐ लांगडू, ऽऽऽऽ

जिया जरेलात, बोलियन

ऐ लांगडू

ओकरा सजा के सिनेमा ले जाले,

हमारा दिखा के पिकनिक ले जाले

हाय करेजा फाटेला

ऐ लांगडू ऽऽ

ऐ लांगडू ऽऽऽऽ

लोकसंगीत के क्रियोलाइजन में संगीत के प्रबंधकों की महती भूमिका है।  हैनरिऑट फिगारो जोज मैथ्यु अथवा क्लौरो बिगन्याक्स और भारतीय मॉरीशियन लोगों में रवीन सोवंबर और नंद रामदीन के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

प्रवासी संसार में संस्कृति के उत्थान के लिए प्रयासशील मॉरीशस की जानी-मानी हस्तियाँ सुश्री सरिता बूधू और सुश्री सुचिता रामदीन ने इस नृत्यशैली के पुनरुद्धार के लिए अथक प्रयास किए हैं। महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट और मॉरीशस भोजपुरी इंसटीट्यूट में इस संबंध में औपचारिक और अनौपचारिक कार्यक्रमों का आयोजन करके वेषभूषा और नृत्य-शैली के स्तर पर इन्होंने चटनी संगीत को भव्य बनाने का प्रयास किया है।

भारतीय समाज में विभिन्न संस्कारों, प्रथाओं, ऋतुओं से संबंधित गीत गाने का कार्य स्त्रियाँ ही करती रही हैं। केवल महिलाओं के बीच गाए जानेवाले गीतों में पंजाब में विवाह से एक दिन पहले ‘लेडीज संगीत’ का आयोजन किया जाता रहा है। इसी तर्ज पर त्रिनिडाड में ‘माटीकोरा नाइट’ प्रचलन में आया, जिसमें बाहर से मिट्टी खोदकर लाने, उसे पूजास्थल पर रखने के साथ-साथ नीचे झुके-झुके नृत्य किया जाता है। पुरुषों की नजरों से दूर विवाहित महिलाओं द्वारा गाए जानेवाले इन गीतों में होनेवाली दुलहन को द्विअर्थी शब्दों में विवाहोपरांत दिनचर्या की जानकारी दी जाती है। माटीकूर गीत का एक उदाहरण प्रस्तुत है—

पंखा डोलाय दियो ना

सजन जी पंखा डोलाय दियो ना।

हो हमका, हो हमका, हो हमका

गरमी बहुत है लागि।

बलम जी, पंखा डोलाय दियो ना।

मॉरीशस में दुलहन के साथ दूल्हे के घर पर ‘गीत गावनी’ के रूप में गीत और नृत्य का आयोजन होता है। जिसमें स्त्री-पुरुष सब गाते और नाचते हैं। कभी-कभी पुरुष स्त्रियों का वेश धारण करके नृत्य करते हैं, जो संभवतः बिहार में होनेवाले ‘लौंडा नाच’ का प्रभाव है।

‘कुली वुमन’ की प्रतिष्ठित लेखिका गायत्रा बहादुर ने अपनी दादी की भारत से गुयाना की यात्रा का वर्णन करते हुए चटनी संगीत के प्रति अपने लगाव का उल्लेख करते हुए कहा है कि ‘वे एक संभ्रांत परिवार से हैं और चटनी संगीत के प्रति उनके झुकाव को उनकी माँ टेढ़ी निगाहों से देखती थीं, लेकिन न्यूयॉर्क, फलोरिडा, टोरंटो, लंदन में होनेवाले विवाह-शादियों में सभी अंकल-आंटियों को चटनी संगीत पर एक साथ थिरकते हुए देखकर उन्हें लगता था कि यह संगीत उनकी जड़ों से जुड़ा है।’

चटनी संगीत की विकास-यात्रा से गुजरते हुए यह साफ हो जाता है कि आरंभ में पीड़ित कुली की व्यथा, गोरे लोगों के प्रति घृणा, विरहिणी के दुःख, दांपत्य जीवन के रोजमर्रा अनुभव चटनी संगीत के विषय हुआ करते थे; जैसे—

गड़बड़ भई आजि घर में

हाथ उठि गएल हमार

घर में औरति बात न माने

रोज खोजत है झगड़ा,

हाथ उठि गए हमार।

लेकिन अब घरेलू हिंसा, पति की नशे की लत से त्रस्त पत्नी अपनी स्थिति के विषय में सवाल करती हुई दिखाई देती है, जो महिला सशक्तीकरण की आधुनिक विचारधारा का स्पष्ट प्रभाव है। अनिल सिंह रामेसुर का ‘धाल पकायेली’ और बिस्वानी दीपोय का ‘शादी करके’ जैसी रचनाएँ इसकी गवाही देती हैं।

लोकसंस्कृति के ताने-बाने से शुरुआत करनेवाला चटनी संगीत अब वैश्वीकरण और सूचना विस्फोट से अछूता नहीं। नई पीढ़ी अफ्रीकी, पश्चिमी, यूरपीय या मिडिल ईस्ट की सीमाओं में बँधना नहीं चाहती। ढोलक, हारमोनियम, तासा की सुगम लय में ढले गीतों से आगे इलेक्ट्रिक गिटार, ड्रम, की बोर्ड की धुनों पर बड़े-बड़े मंचों पर थिरकना चाहती है, फलतः चटनी के नए-नए रूप सामने आ रहे हैं। जैसे ‘रेगा चटनी’, ‘चटनी भाँगड़ा’, ‘चटनी सोका’, ‘सेगा चटनी’, ‘बॉलीवुड चटनी’। मिट्टी से उपजा संगीत अब हाइब्रिड हो गया है।

—चंद्रकांता किनरा

सी-२९, सी.सी. कॉलोनी

दिल्ली-११०००७

दूरभाष : ९८१०१७६४००

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