व्हाट्सएप के बुद्धिजीवी

व्हाट्सएप के बुद्धिजीवी

बुद्धिजीयियों को जानते हैं आप? सामान्य तौर पर बुद्धिजीवी उसे कहते हैं, जो स्वाभिमान की बड़ी-बड़ी बातें करता है। लेकिन इस लालच में संपादकों की अनवरत चरणवंदना करता है कि उसकी रचना को प्रकाशन मिल जाएगा। सामान्य बुद्धिजीवियों की एक बड़ी पहचान यह भी है कि उन्हें पुरस्कारों से चिढ़ होती है, फिर भी राज्यस्तर पर पुरस्कृत होने के लिए वे अधिकारियों, विधायकों और अकादमी अध्यक्षों से अपने नाम की सिफारिशें करवाते हैं। बुद्धिजीवी किस्म के लोग अपने बयानों में सामाजिक सद्भाव की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और फिर अपने ड्राइंगरूम में बैठकर कुछ लोगों के साथ इस बात पर गुप्त चर्चा करते हैं कि कैसे किसी संस्था पर से उस आदमी का कब्जा हटाया जाए, जिस आदमी ने साहित्य की दुनिया में आगे बढ़ने में उनकी बहुत मदद की थी।

बुद्धिजीवी जो होते हैं, वे नहीं चाहते और जो दिखना चाहते हैं, वैसा होना नहीं चाहते। मसलन, बुद्धिजीवी चाहते हैं कि दुनिया में भाईचारा बढ़े, लेकिन अपनी पहचान के पुलिस अधिकारी के सहयोग से वे अपने सगे भाई की संपत्ति को हथिया लेते हैं। वे पत्नी को पीटने और प्रेम की कविता लिखने जैसे दो विपरीतधर्मी कार्य एक साथ कुशलता से साध लेते हैं। वे जरूरत पड़ने पर अपनी पी-एच.डी. की डिग्री का रोब उसी मित्र को दिखाने में नहीं चूकते, जिस मित्र की लिखी हुई सिनोप्सिस पर उन्हें पी-एच.डी. का रजिस्ट्रेशन मिला था। वे गालियाँ देते हुए भी मुसकरा लेते हैं और किसी पुरस्कार की खबर मिलने पर ईर्ष्या की आग में जलते-भुनते हुए भी ‘मजा आ गया’ कहकर खीसें निपोर लेते हैं। उन्हें तकनीक जीवन में हस्तक्षेप करती हुई सी लगती है, लेकिन यह बताना सैंसर बोर्ड की मर्यादाओं का उल्लंघन होगा कि वे स्मार्टफोन हाथ में आने के बाद क्या-क्या कर गुजरते हैं।

तो पिछले दिनों बुद्धिजीवियों ने एक व्हाट्सएप गु्रप बनाया। व्हाट्सएप समूह में देशभर के सदस्य जोड़े गए। लेकिन सामान्य किस्म के सदस्यों से बुद्धिजीवियों को मजा नहीं आ रहा था। इसलिए माँग उठी कि कुछ बड़े बुद्धिजीवियों को भी समूह से जोड़ा जाए। जी हाँ, बुद्धिजीवियों की भी दो प्रजातियाँ होती हैं। कुछ बुद्धिजीवी सामान्य या छोटे बुद्धिजीवी होते हैं। लेकिन जो बुद्धिजीवी संपादक हो जाते हैं, प्रशासनिक अधिकारी होते हैं, अकादमियों के सदस्य हो जाते हैं, बड़े आयोजक होते हैं, नामी प्रकाशकों के सलाहकार होते हैं या जिन्हें बड़े पुरस्कार मिल जाते हैं—वे सामान्य बुद्धिजीवी नहीं रहते। बड़े बुद्धिजीवी तो जाते हैं। बड़े बुद्धिजीवी सामान्य बुद्धिजीवियों के बीच अकसर अध्यक्षता करने, मुख्य अतिथि रोने या फिर विशिष्ट बयान देने ही जाते हैं। ऐसे बुद्धिजीवियों की उपस्थिति मात्र कुछ सामान्य बुद्धिजीवियों के लिए प्रेरणा का काम करती है और कई सामान्य बुद्धिजीवी तो इसे अपने बयानों में भी मान लते हैं।

बुद्धिजीवियों के व्हाट्सएप समूह में भी यही हुआ। जैसे ही कुछ बड़े बुद्धिजीवी जुड़े, समूह में प्रेरित हो रहे लोगों की टिप्पणियों की बाढ़ आ गई। एक उत्साही ने एक संपादक की वंदना में यहाँ तक टिप्पणी कर कि दस साल पहले आप मेरे कार्यक्रम में जब मेरे शहर में आए थे तो शहर बहुत प्रेरित हुआ था। मैंने ध्यान दिया कि पिछले दस सालों में उस शहर की सड़कों पर गड्ढों के कारण होनेवाले हादसों में बहुत इजाफा हुआ है। मैं समझ नहीं सका कि इसमें बढ़े बुद्धिजीवी की क्या प्रेरणा हो सकती है। लेकिन जब एक बुद्धिजीवी कह रहा था और दूसरा बुद्धिजीवी मुसकरा रहा था तो सहमत होना मेरी विवशता थी। तभी एक महिला बुद्धिजीवी ने एक घिसापिटा चुटकुला पोस्ट कर दिया। इसे पढ़कर मुझे रोना आया, लेकिन एक बुद्धिजीवी ने लिखा कि उनके तो हँसते-हँसते पेट में दर्द हो गया। मेरे लिए यह नया अनुभव था। अभी तक इनके पेट में दर्द तभी होता था, जब किसी दूसरे बुद्धिजीवी को पुरस्कार मिल जाता था। किसी चुटकुले के कारण पेट में दर्द की प्रवृत्ति उनके व्यक्तित्व में विकास का प्रमाण थी। यह इस बात का भी प्रमाण थी कि बड़े बुद्धिजीवियों और महिलाओं की समूह में उपस्थिति सामान्य बुद्धिजीवियों को लगातार अभिप्रेरित कर रही थी।

बुद्धिजीवी दूसरे समूह से चुराए गए चुटकुलों को इस समूह में पोस्ट कर रहे थे। चुटकुलों का द्विअर्थी आध्यात्मिक विश्लेषण बता रहा था कि समूह के सदस्य कितने पहुँचे हुए लोग हैं। कुछ बुद्धिजीवी अपने बुद्धिजीवी होने के प्रमाण में यह बता रहे थे कि वे उसी गली में रहते हैं, जिस गली में स्वर्गीय हो चुके एक महान् बुद्धिजीवी के घर दूध देने जानेवाला रहा करता था। कुछ लोग अपनी प्रकाशित रचनाओं के लिंक भेज रहे थे। इसमें रचना को दूसरों के साथ साझा करने की भावना कम और दूसरे लोगों को चिढ़ाने की भावना अधिक थी। बड़े बुद्धिजीवी छोटे बुद्धिजीवियों की गतिविधियों को देख-देखकर मुसकरा रहे थे। वे टिप्पणी नहीं कर रहे थे। वे जानते थे कि वे बड़े बुद्धिजीवी हैं। बड़े बुद्धिजीवी आमतौर पर तभी बोलते हैं, जब छोटे बुद्धिजीवी बोल चुके होते हैं और अभी छोटे बुद्धिजीवियों को बोलने का जोश कम नहीं हुआ था। सही बात तो यह भी है कि बड़े बुद्धिजीवी आमतौर पर कार्यक्रम के अंत में ही बोलते हैं और फिलहाल बुद्धिजीवियों के व्हाट्सएप समूह का अंत भी निकट नहीं था। आखिर जहाँ सभी बुद्धिजीवियों को एक साथ बोलने का मौका मिल जाए, उस मंच का अंत कौन करना चाहेगा!

—अतुल कनक

३ ए ३०, महावीर नगर विस्तार

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