अतीत की खुशबू

मन के सूने वन में

अंतर्मन में बारिश की बूँदें

एक मधुर पीड़ा धीरे से बहती,

अँधेरों से चली आती रौशनी

अचानक चमकती।

सोते हुए खुली हैं आँखें

करती यथार्थ का पीछा स्वप्न देखते,

जो न जिया उसका बतातीं दर्शन

यथार्थ की सीमाओं का पलायन करते।

जवाब खोजना सूने वन में

धुंध में उम्मीद ढूँढ़ना,

खोजना सौंदर्य आलस्य का

कम-से-कम मुझे यह नहीं करना।

अनंत काल

जीवन प्रकट होता है

अकसर एक अस्पष्ट भ्रम की तरह

एक अंतहीन समुद्र की तरह

विशाल और अनंत,

वास्तविकता अकसर होती है भयानक

इसीलिए तो भागते हम

काल्पनिक जीवन के

चमेली और ट्यूलिप के उद्यानों की ओर

हम करते पलायन।

जीवन हमें अकसर डराता

अपनी अंतहीन गहराइयों से

शाश्वत क्षण ठहर जाते सदा

रहते अनुप्राणित नित्य जीवन में,

लाल गुलाबों से महकते

देते अकेलेपन का आनंद

बिना ऊब के।

भटकाव

अतीत की खुशबू

करती मेरे अचेतन को गहरे विचलित

कि यह पुख्ता करती मेरी स्मृति को

मिटाते हुए

वर्तमान और भविष्य को पूरी तरह।

पर जब मैं व्यर्थ भटकता

समस्त असामान्यताओं की खोज में

तब रहता अभाव उस खुशबू का

जो गुजरी हजारों बार

मेरी आँखों के सामने।

मैं चाहूँगा...

मैं चाहूँगा नृत्य करना

अफ्रीकी पार्टी में

नकाब पहने, अर्ध-नग्न

लय और ताल के साथ

अपने हृदय में गर्मजोशी लिये।

फिर मैं चाहूँगा उड़ना

अनंत एशियाई आकाश में

इंडोनेशियाई राइस वाइन पिए

मुक्त करते अपनी

आत्मा, मन और मस्तिष्क।

फिर मैं श्वेत उत्तरध्रुवीय हिमप्रदेश में

रहूँगा एकांतवास में

स्वयं को देते हुए उलाहना

एक अलग रूप में

कदाचित् कुछ ज्यादा ही

दार्शनिक अंदाज में

लौटते हुए मैं जाऊँगा कैरेबियन

जीवन के लिए करते प्रार्थना

समुद्र का आलिंगन करते, सूर्य को चूमते

और करते गान, मानवता के लिए गान

दूर, सुदूर अनंत में।

नकाब पहने चेहरे

चुभते ताने

चीखते कटाक्ष

चले आते हैं

रक्त-रंजित लकड़बग्घों

क्लांत पिशाचों

लार टपकाते मुँहों से।

निरुत्साहित नकाब पहने चेहरों से

स्वयं नफरत की कला सीखना

है यह जानी-मानी शेक्सपिरियन दुविधा

जो आती,

फिर से पुरातन को सामने लाती।

मदिराओं के बीच उन्माद में घुटते

पाखंड के बिस्तर में लोटते,

है यह उत्तर-आधुनिक पराक्रम

बस यही मानवता का जीवन।

—ईलीर कालेमाज

११, सूर्या अपार्टमेंट,

रिंग रोड, राणाप्रताप नगर,

नागपुर-४४००२२ (महाराष्ट्र)

दूरभाष : ९४२२८११६७१

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