प्रकृति स्वयं एक काव्य है

र्वप्रथम मैं जानना चाहूँगी कि लेखन के क्षेत्र में आने की प्रेरणा आपको कब और कहाँ से मिली?

मैं बचपन में जिस परिवार व परिवेश में पला-बढ़ा, वहाँ पढ़ने का ही वातावरण था। उससे पढ़ने की तरफ रुचि जागी, फिर स्कूल में मेरा लिखा निबंध हर बार कक्षा में पढ़कर सुनाया जाता था तो इससे लिखने के प्रति रुचि जागी। युवावस्था में गंभीर विषयों पर भी सोचना शुरू किया। कई बातें, जो अनुचित लगती थीं, उनके प्रति मन में उपजे विद्रोह को मैंने अपने लेखन द्वारा व्यक्त करना शुरू किया।

एक बार ‘नया जीवन’ के संपादक कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर, जो कि स्वयं लेखनी के धनी थे, एक गोष्ठी में आए, वहाँ मैंने एक निबंध पढ़ा, उन्होंने प्रभावित होकर उस निबंध को अपनी पत्रिका में प्रकाशित किया, इससे मुझे प्रोत्साहन मिला।

विनोबाजी की भूदान-यात्रा चल रही थी। समर्पित स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी श्रीरामजी यादव हमारे पारिवारिक सदस्य थे। उन्होंने मुझे विनोबाजी के साथ भूदान यात्रा में साँवेर से महू तक पदयात्रा में शामिल होने को कहा। मैंने विनोबाजी के साथ तीन-चार दिन गुजारे तथा उसकी रिपोर्ट लाकर दी। तब लिखने के लिए यह पर्याप्त प्रेरणा थी।

आपका पहला चर्चित लेख कौन सा था?

प्रत्येक कॉलेज की मैगजीन में साहित्य पर केंद्रित मेरा आलेख छपता ही था। एम.ए. में मैंने पहली बार भारत की विदेश नीति पर लिखा, उसमें मैंने नेहरूजी की आलोचना की। क्रिश्चियन कॉलेज होने की वजह से परामर्शदाता प्रोफेसर ने उसे न छापने का निर्णय लिया। संपादक मेरा मित्र था, उसने कहा, ‘पंत, उसमें कुछ पंक्तियाँ बदल दो।’ मेरे इनकार करने पर उसने कहा, ‘मैं संपादक पद भले ही छोड़ दूँ, पर तुम्हारा यह लेख जरूर जाएगा।’ इस लेख का महत्त्व तब समझा गया, जब १९६२ वाली घटना घटी। नहीं तो यह माना जाता कि मैं नेहरू विरोधी हूँ, जबकि ऐसा नहीं है। केवल कुछ नीतियों पर मेरा उनसे मतभेद था।

जब क्रिश्चियन कॉलेज सौ वर्ष पूर्ण करने पर शताब्दी वर्ष मना रहा था, तब कॉलेज मैगजीन में सौ साल में छपे महत्त्वपूर्ण लेखों को एक स्मारिका में प्रकाशित किया गया। उसमें मेरा भी लेख छपा था, मुझे इसकी जानकारी नहीं थी, जबकि उस कार्यक्रम में मुझे आमंत्रित कर सम्मानित किया गया था। एक दिन अचानक क्रिश्चियन कॉलेज के एक प्रोफेसर मिलने आए, उनके साथ एक अन्य प्रोफेसर थे, जो मुझसे अपरिचित थे। बातचीत में जब उन्हें मेरा नाम ज्ञात हुआ, तब उन्होंने मुझे बताया कि आपका एक आलेख शताब्दी वर्ष की स्मारिका में छपा है। मैंने अचरज से उनसे कहा कि स्मारिका तो मुझे मिली नहीं। फिर मेरे अनुरोध पर उन्होंने स्मारिका भिजवाई। उस स्मारिका में वही लेख था, जिसको छापने में इतनी कशमकश हुई थी।

वर्तमान लेखन से आप संतुष्ट हैं? उसकी दशा और दिशा पर आपके क्या विचार हैं?

देखिए, संतुष्टि इसमें होनी चाहिए कि लिखा तो जा रहा है। हालाँकि आज का लेखन कमजोर कहा जाता है, किंतु अपने समय में निराला, पंत, महादेवी वर्मा, बच्चन, जैसे दिग्गज रचनाकारों की आलोचना कम नहीं होती थी। इनको कमतर आँकने की कोशिश की गई थी। लेकिन आज जब हम उनको आँकते हैं, अपनी कसौटी पर कसते हैं तो ज्ञात होता है कि वे कितने बड़े रचनाकार थे। इनके गद्य व पद्य में गहराई के साथ एक निश्चित विचार रहता था। सबसे बड़ा गुण उनमें ग्रहणशीलता थी। दूसरी भाषाओं में लिखे साहित्य से भी ग्रहण करने की क्षमता थी। जब आज के लेखन से इसकी तुलना करते हैं तो निराश होना स्वाभाविक है।

आज हम किसी को कह सकते हैं कि वह निरालाजी या जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ के स्तर का लिख रहा है? मैथिलीशरण गुप्तजी व माखनलाल चतुर्वेदीजी ने जिस तरह राष्ट्रीय भावनाएँ जाग्रत् कर लोगों के मन में क्रांति की आग पैदा की, आज के लेखन में वह बात नहीं है। आज का लेखन वैचारिक दृष्टि से कमजोर है। उसमें शिल्पगत नवीनता तो है लेकिन गहराई नहीं है। लेखक आत्मश्लाघा से युक्त व आत्ममुग्ध हैं। आज के लेखक अपने पूर्वज व समकालीन लेखकों को पढ़ना ही नहीं चाहते हैं। पहले जिस तरह गोष्ठियाँ होती थीं, उसमें खुलकर आलोचना भी होती थी और आलोचना करने व सहने का नैतिक बल भी होता था। शब्दों को लेकर ‘सरस्वती’ के संपादक महावीरप्रसाद द्विवेदी और अंबिकादत्त वाजपेयी के बीच काफी लंबा ‘शब्द-युद्ध’ चला था, पर आपस में कोई मनोमालिन्य नहीं था। इससे मालूम पड़ता है कि वे कितने विशाल हृदय थे। आजकल के लेखकों में वैसा बड़प्पन नहीं है और आलोचक में भी वस्तुनिष्ठता का अभाव है। विषय को देखकर, समझकर कवि की भावना के अंतरंग में डुबकी कैसे लगाई जाए कि जान पाएँ कि वह किस उद्देश्य से लिख रहा है, यह धैर्य ही नहीं है।

हिंदी के प्रचार के लिए आप सतत क्रियाशील हैं, इस राह में सबसे ज्यादा कठिनाइयाँ क्या हैं?

समाज की मानसिकता। जब हम अंग्रेजों से मुक्त हुए तब हमारे उत्साहित मन में यह भाव था कि अंग्रेजों के जाने के बाद अब अंग्रेजियत भी जाएगी। गांधीजी ने भी ‘हिंद स्वराज’ में कहा था कि अंग्रेज रह जाएँ, मुझे इसकी चिंता नहीं है, पर इस देश से अंग्रेजियत को जाना चाहिए। दुर्भाग्य यह है कि अंग्रेज चले गए, अंग्रेजियत छोड़ गए। उस अंग्रेजियत को हमने अंग्रेजी के माध्यम से जिंदा भी रखा और लोगों की मानसिकता में पराधीनता के कीटाणु को कायम रहने दिया। उन कीटाणुओं का इलाज तब होता जब इस देश के लोग अपनी भाषा के प्रति, अपनी संस्कृति के प्रति अपने मन में गौरव का भाव जगाते। अब यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी मिलने के इतने वर्षों के बाद भी बच्चों को इतिहास में वह पढ़ाया जा रहा है, जो हमारे अतीत को धूमिल करता है, कलंकित करता है, जबकि हमारा अतीत गौरवशाली था। हम राजनैतिक दृष्टि से कुछ अंशों में पराजित हुए थे, पूरी तरह से कभी नहीं और सांस्कृतिक रूप से तो हमने पराजय स्वीकारी ही नहीं थी।

यह भी गलत प्रचारित है कि देश पूर्ण रूप से गुलाम था। जब अंग्रेज भारत से गए तो जो रियासतें बचीं, उनमें ज्यादातर हिंदू रियासतें थीं। नवाबी शासन बहुत थोड़ी रियासतों में था। इसका अर्थ यही हुआ कि मुगलों व अंग्रेजों के आने के बाद भी हिंदुओं का अधिकार बना रहा, इस बात को हम भुला देते हैं। सावरकरजी ने सिद्ध कर दिया था कि १९५७ की क्रांति ही पहला स्वतंत्रता-संग्राम था, पर उसको ‘गदर’ कहने की प्रवृत्ति आज भी बनी हुई है। ये बातें मानसिक जड़ता को बढ़ाती हैं। हम स्वतंत्र हुए, लेकिन स्वतंत्र रूप से सोचने की न हममें क्षमता है और न हम उस योग्य हो पाए। आज एक बड़ा वर्ग मानता है कि हिंदी में बात करना पिछड़ेपन की निशानी है तो हिंदुस्तान की संस्कृति की बात करना भी पिछड़ेपन की निशानी कहलाएगी। इसलिए जब तक हमारे मन में अपनी भाषा के प्रति गौरव का भाव नहीं आएगा, तब तक समाज नहीं बदलेगा। हम सरकार को क्यों दोष दें! अंग्रेजी पढ़े बिना भविष्य नहीं है, इस बात को अगर समाज खारिज कर दे तो सबकुछ बदल जाएगा। नौकरी में अंग्रेजी की जरूरत है किंतु कितने प्रतिशत लोगों को नौकरियाँ मिल रही हैं? अधिकांश लोग अपना कारोबार, खेती या कारीगरी कर रहे हैं। उन लोगों पर अंग्रेजी का बोझ डालकर हम उन्हें ज्ञान के अन्य क्षेत्रों से वंचित कर रहे हैं तो देश कैसे विकसित होगा? सबसे बड़ी कठिनाई समाज की मानसिकता की है। इस मानसिकता को जब तक नहीं बदलेंगे, तब तक हिंदी का रास्ता आसान नहीं होगा।

ज्वलंत समस्याओं पर लिखे हुए आपके लेख काफी चर्चित हुए हैं। अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में बताइए।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात कि लिखते समय आपको किसी भी प्रकार की प्रतिबद्धता से मुक्त होना होता है। जो है, केवल वही नहीं देखना है बल्कि यह क्यों है, इस यथार्थ को जानना है? यथार्थ का चित्रण तो किया जा सकता है लेकिन यथार्थ क्यों है? समाज में व्याप्त बुराइयों की जड़ कहाँ है? उसकी ओर भी ध्यान देना चाहिए। जैसे संयुक्त परिवार का चलन अब समाप्ति के कगार पर है, जबकि सच यह है कि किसी भी सदस्य के दुःख-सुख में संयुक्त परिवार सामूहिक रूप से जवाबदारी उठाता था। इससे सुरक्षा का भाव हमेशा बना रहता था किंतु उस परिवार को तोड़कर एकल परिवार की बात की गई, यानी परिवार की परिभाषा हमारे यहाँ जो व्यापक थी, उसमें धीरे-धीरे ऐसा जहर बोया गया कि लोगों के मन में आपसी भेदभाव पैदा हो गया। लेकिन संयुक्त रूप से न रहते हुए भी संयुक्त भावना को तो बनाए रखा जा सकता है। इसके लिए जरूरी था कि हम अपने संस्कारों को अपने पारिवारिक संस्कारों से जोड़कर रखते। आज के बच्चों को यह पता नहीं कि उनके पूर्वज कौन थे, कहाँ रहते थे, कहाँ से आए, जबकि हमारे यहाँ कोई अनुष्ठान होता है तो पूरे सात पूर्वजों के नाम लेकर पहले उन्हें श्रद्धार्पूवक याद किया जाता है। यही तरीका है अपने पूर्वजों के साथ तथा अपनी जमीन से जुड़े रहने का।

हमारे यहाँ के ऋषियों ने चार धाम की यात्रा निकाली। धार्मिक भाव के साथ-साथ हम अपने देश व समाज को भी समझ लेते हैं और यह अनुभव होता है कि मैं कितने बड़े परिवार का हूँ। इस भावना ने राष्ट्र की भावना को जन्म दिया अर्थात् राष्ट्र के पीछे एक सांस्कृतिक भाव काम करता है। इस सांस्कृतिक भाव को जगाए रखना बहुत जरूरी है। इसको दृष्टिगत रखते हुए जब लिखा जाता है तो परिवार, समाज, देश और विश्व के यथार्थ का सही विश्लेषण करने की क्षमता आती है और हम वस्तुनिष्ठ विश्लेषण कर पाते हैं।

मनुष्य की बुद्धि तो काम करती है लेकिन मनुष्य के भीतर एक विवेक होता है, जो कि अनुभूतिजन्य ज्ञान है, जिसे हम ‘छठी इंद्रिय’ कहते हैं, यह आपको बता देती है कि क्या सच है, क्या झूठ है। इसके लिए एकाग्रता चाहिए। आप गौर से किसी बात पर ध्यानपूर्वक सोचेंगे तो उसी निष्कर्ष पर पहुँचेंगे, जिस निष्कर्ष पर कोई बड़े-से-बड़ा विद्वान्, कोई विशेषज्ञ पहुँचेगा। बशर्ते आप उस पर पूरा ध्यान केंद्रित हो, एकाग्रता हो। मैं अपने लेखन में यह कोशिश करता हूँ कि जब मैं लिख रहा हूँ तो मैं नहीं होता। मैं यह मानकर चलता हूँ, कोई अन्य मुझसे लिखवा रहा है और मैं लिख रहा हूँ।

वर्तमान में राष्ट्र के समक्ष खड़ी समस्याओं का आकलन आप एक पत्रकार होने के नाते किस तरह करते हैं?

समाज की कमजोरियाँ ही राष्ट्र की कमजोरी बन जाती है। अगर हम परिवार को सुदृढ़ करेंगे तो समाज सुदृढ़ होगा, जब समाज को सुदृढ़ करेंगे तो राष्ट्र सुदृढ़ होगा। हम अपने सांस्कृतिक भाव में उतरते हैं, जब कहा जाता है कि आप अपने पूर्वजों की याद करो तो श्रीराम की याद आती है, श्रीकृष्ण की याद आती है। राम के बचपन का खेलकूद, कौशल्या माँ के सामने उनका नटखटपन, उनका वन-पथ-गमन और श्रीकृष्ण की लीलाएँ सब कल्पना रूप से आपके सामने आ जाती हैं। यह है अपने आपको इतिहास से जोड़ना। इसी तरह जब आप वर्षों बाद अचानक अपने गाँव लौटते हैं तो क्या विचार आता है कि मैं किस खानदान का हूँ? मेरे पूर्वज कौन थे? वे किन परिस्थितियों में जीते थे यानी एक बहुत विराट् धरातल पर आप उतर जाते हैं। यह रागात्मकता ही राष्ट्र के मनोभाव को जाग्रत् करती है।

अगर पूरे राष्ट्र के सांस्कृतिक परिदृश्य के साथ हम अपने को जोड़ते हैं तो राष्ट्र के प्रति हमारी आस्था ज्यादा सुदृढ़ होती है। सांस्कृतिक मूल्यों पर खड़े इस राष्ट्र पर हजारों आक्रमण हुए, इसे क्षत-विक्षत करने की कोशिशें हुईं, साजिशें रची गईं, फिर भी हम अपनी जगह खड़े हैं। इतने साल का इस्लामी शासन, ढाई सौ वर्षों का ब्रिटिश शासन, जिसमें केवल राजनैतिक दबाव ही नहीं था, उनके द्वारा संरक्षित मजहबों का, उनके द्वारा संरक्षित रिलीजनों का दबाव हम पर जारी था, लेकिन सांस्कृतिक रूप से हम पराजित नहीं हुए, केवल राजनैतिक रूप से हारे थे।

हमारे संविधान निर्माताओं ने भी कुछ गलती की। संविधान बनाते हुए राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान की बात की, लेकिन राष्ट्र की ही बात नहीं की। संविधान के अनुसार तो भारत संघात्मक राज्य है, जिसे विभिन्न राज्यों का समूह या संगठन कहते हैं। अब राष्ट्र होना और विभिन्न राज्यों का एक संघ होना, इसमें बड़ा फर्क है। अगर हम सांस्कृतिक राष्ट्र की गणना करते हैं तो पड़ोसी को भी हम अपने परिवार का अंश समझते हैं। अगर एक उद्योग बंगाल में तथा दूसरा तमिलनाडु में खुल रहा है तो उसमें मेरे भारत की ही आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो रही है किंतु दुर्भाग्यवश लोगों की ऐसी मानसिकता नहीं है। भाषा के आधार पर विरोध है। राज्यों में परस्पर पानी व बिजली के बँटवारे को लेकर व उद्योग खोलने को लेकर झगड़ा है, जबकि सांस्कृतिक धरातल पर हम एक हैं। राष्ट्र तो तभी टिका रहेगा, जब हम सांस्कृतिक आधार पर जीएँ। महर्षि अरविंद ने कहा था, राष्ट्र कोई सामान्य भूखंड नहीं होता। उन्होंने उसको ‘भवानी’ की उपमा दी थी, ‘ये तो चतुर्भुजा भवानी है।’ महर्षि अरविंद का यह कथन बहुत महत्त्वपूर्ण है।

इसी संदर्भ में मैं यह भी बता दूँ कि कुछ धारणाएँ गलत भी हैं। जैसे हिंदू संप्रदाय; सुप्रीम कार्ट ने भी अपने निर्णय में हिंदू को कोई मजहब, कोई धर्म नहीं माना, एक जीवन-शैली माना है। १९१४ के आस-पास भारत आए एक अंग्रेज सैनिक अधिकारी ने पूरे देश का भ्रमण किया। वह सुनकर आया था कि हिंदू, हिंसक व कू्रर होते हैं, लेकिन उसे हिंदू ऐसे नहीं लगे। इसकी खोज में वह नेपाल, तिब्बत, कोरिया, बर्मा, लंका, बनारस, सब दूर गया और अंततः उसने हिंदुओं को परिभाषित किया, ‘‘इफ आय टॉक आई विल डिफाइन हिंदुज्म, इट इज नेशनल एक्सप्रेशंस ऑफ एथिक्स।’’ यह नैतिकता की राष्ट्रीय अभिव्यक्ति है। नैतिकता वही है, जो हमारे ऋषियों ने सिखाई। सच बोलो, तप करो, अन्याय मत करो, सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना से रहो। ये सारी बातें हमारे संस्कारों में डालने की कोशिश की जाती रही है। पूरे देश की जनसंख्या को एक साथ संस्कारित करने की प्रक्रिया चल रही थी, तभी विदेशी आक्रमण हो गए। यह अवरोध हुआ तो निश्चित है कि समाज में विकृति आएगी। कुछ दूसरों के प्रभाव, कुछ अपनी आत्मरक्षा की भावना से आईं। उन विकृतियों के कारण जो सामाजिक विकृतियाँ व बुराइयाँ हैं, वे हमारी संस्कृति, दर्शन या चिंतन की देन नहीं हैं। वे राजनैतिक दबाव और परिस्थितिवश हैं। इसीलिए मैं कहता हूँ कि यथार्थ का चित्रण करते हुए कारणों का विश्लेषण करना जरूरी है। तल की गहराई के लिए डुबकी लगानी पड़ती है।

व्यक्ति और समाज के बीच संबंधों का अभाव है, इसमें साहित्य क्या भूमिका निभा सकता है?

साहित्य का मतलब क्या है—समग्रता से हित की साधना करना। समग्रता में पूरी मानवता व पूरी सृष्टि आती है। इसीलिए वेदों को वैदिक साहित्य कहते हैं। साहित्य शब्द नया है, हमारे यहाँ तो काव्य कहा गया है। प्रकृति स्वयं एक काव्य है। जब आप कोयल की कूक सुनते हैं, झरने व प्रपात की झर-झर ध्वनि सुनते हैं, बहती हुई नदी का कल-कल नाद सुनते हैं, तब उसमें वही रस आता है, जो किसी संगीत को सुनने में आता है। इसलिए प्रकृति के साथ सामंजस्य रखते हुए जीवन को आनंदमय बनाना चाहिए। यही आर्य सभ्यता है और वैदिक ऋषि का संदेश भी है। जीवन में आनंद अनुभूतियों से आता है, अंदर से आता है। बाहरी चीजों से अगर आनंद आता तो सबसे ज्यादा आनंदित लोग तो अमेरिका में होने चाहिए, जबकि सबसे ज्यादा दुःखी वहाँ का समाज है। वहाँ बच्चे स्कूलों में गोली चला देते हैं, अपने साथियों की हत्या कर देते हैं। यह पाशविकता आ रही है। यही फर्क है। भौतिकता आपको पाशविकता की ओर ले जाती है और आध्यात्मिकता आपको मनुष्यत्व से देवत्व की ओर ले जाती है। अच्छा साहित्य हमें नैतिक मूल्यों व परस्पर सहयोग की भावना पर टिके रहने का संदेश देता है।

नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए साहित्यिक और सांस्कृतिक विमर्श की निरंतरता कितनी उपयोगी हो सकती है?

यह बहुत उपयोगी है। प्रत्येक समाज में अगर कुछ व्यक्ति पतित, अत्याचारी हैं तो वहाँ कुछ विवेकशील लोग भी होते हैं और उनका यह कर्तव्य है कि पथभ्रष्ट होते समाज को सही दिशा प्रदान करें। इससे समाज कभी-न-कभी तो सुधरेगा। हमारे यहाँ बच्चों को बचपन से वाल्मीकि कथा सुना दी जाती थी कि वे डाकू थे। भले ही न रहे हों, क्यों सुनाई गई? डाकू भी सुधरकर एक महाकवि हो सकता है; आदिकवि की उपाधि प्राप्त कर सकता है। रामायण जैसा गं्रथ आज तक नहीं लिखा गया। कितना विराट् चरित्र हमारे सामने है, जो हमारा आदर्श बन गया। परमश्री, परमशक्ति, परम सौंदर्य से युक्त शीलसमन्वित पुरुषोत्तम श्रीराम हमारे सामने आ गए। उस महाकवि ने कितना बड़ा आदर्श हमारे सामने खड़ा कर दिया। इसीलिए इस तरह के विमर्श अगर जारी रहेंगे तो कहीं-न-कहीं तो बदलाव आएँगे।

ऐसा माना जा रहा है कि साहित्य से लोक-संस्कृति विलुप्त होती जा रही है। उसको बचाने के लिए क्या प्रयास किए जाने चाहिए?

मैं तो इससे पूरी तरह सहमत नहीं हूँ, क्योंकि लोक-साहित्य और साहित्य में कोई भेद नहीं है। आज साहित्य में लोक-साहित्य की बड़ी चर्चा है। हमने इसमें भेद किया है जैसे—नारी लेखन, दलित लेखन और अन्य लेखन। लेखन तो सब एक ही है, साहित्य के अंतर्गत है। यह दृष्टिकोण है—दलित दृष्टिकोण, नारी दृष्टिकोण, पुरुष दृष्टिकोण से किया गया लेखन। इसलिए हम टकरा रहे हैं। जो संघर्ष है, वह हमारी नासमझी के कारण है। स्वयं को खाँचों में बाँधकर हम लोक-साहित्य को अलग देखने लगे। किसी लेखक की कृति को भी हम किसी खाँचे में बाँधकर देखते हैं। जो लिखा जा रहा है, उसका तत्त्व विवेचन करें तब तो बात है। इसीलिए खाँचों में बँधे लेखक हाशिए पर चले गए हैं और जो अपने सांस्कृतिक मूल्यों पर, जीवन के सनातन मूल्यों को लेकर लिखते रहे, वो आज पुनः जीवित हो रहे हैं। उनका हम शताब्दी वर्ष मनाते हैं, उनको याद करते हैं, उनके साहित्य को पढ़ते हैं, उद्धृत करते हैं। यह फर्क है। जो खाँचों को तोड़ते हैं, वे कालजयी होते हैं। जो खाँचों में बँधकर चलते हैं, वे समयबद्ध हैं, कुछ दूर तक प्रवाह होता है फिर सूख जाते हैं या सड़ जाते हैं।

‘दादा आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा, प्रणाम!’

‘मुझे भी, खुश रहो!’

—शीला मिश्रा

बँगला नं. ४, सेक्टर-२

रॉयल रेजीडेंसी, बावड़िया कला,

थाना शाहपुर के पास

भोपाल-४६२०३९ (म.प्र.)

दूरभाष : ०९९७७६५५५६५

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