दूसरा आदमी

संजीत को उठने में आज फिर से देर हो गई। वह जल्दी-जल्दी नहा लिया, चाय गैस पर रख दी, बिछौना ठीक किया और दीवार घड़ी को देखा। उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि घड़ी की सूइयाँ भाग रही हैं। उसने पलंग के नीचे रखे पानी के प्याले की ओर देखा।

देर हो रही थी, इसलिए तुरंत चाय पी, तैयार हुआ, लिफ्ट आने पर सोसाइटी के सेक्रेटरी से मिले बिना गेट के बाहर निकला। वॉचमैन के सलाम की उपेक्षा करते हुए वह रिक्शे में बैठ तो गया, परंतु वह प्याला उसके दिमाग से नहीं हट रहा था।

संजीत को अच्छी तरह याद है कि पानी का वह प्याला उसने रात को सोने से पूर्व किचन के सिंक के पास रखा था, पर वह पलंग के नीचे आया कैसे?

जैसे कि किसी ने पानी पीकर प्याला पलंग के नीचे रखकर उस पलंग पर रात बिताई हो! संजीत ने रूमाल से पसीना पोंछते हुए महसूस किया कि उसके कपाल पर पसीना नहीं, बल्कि पसीना तो विचारों का आ रहा है!

संजीत अकेला रहता था। अकेला आदमी रह सके उतना व्यवस्थित या अव्यवस्थित। वैसे तो सबकुछ ठीक चल रहा था, परंतु कुछ दिनों से संजीत को ऐसा लग रहा था कि उसके घर में कोई और भी रहता है।

वैसे तो बात इतनी अविश्वसनीय एवं विचित्र थी कि ऐसी कल्पना भी हास्यास्पद लग सकती है। घर में कोई रहता हो और पता भी न चले, ऐसा हो सकता है? मगर आहिस्ता-आहिस्ता संजीत का संदेह बढ़ रहा था कि ऐसी सफाई के साथ घर में कोई रहता है कि पकड़ा ही नहीं जाता!

जैसे कि कल रात ही वह काम पर से आया, तो हाथ-पैर धोए कपड़े बदलकर वह अखबार ढूँढ़ रहा था, तभी उसकी नजर पलंग पर बिछी चादर की झुर्रियों पर पड़ी। जैसे कोई बैठकर खड़ा हो गया हो, ऐसी झुर्रियाँ। मगर कौन बैठा था और कब? वह स्वयं तो रोज के क्रम के अनुसार बिछौना व्यवस्थित करके ही काम पर जाता है। संजीत उदास हो गया। वैसे भी जीवन में समस्याएँ कम न थीं। दफ्तर में सीनियर शुक्ला तो उसका खून पीने का प्रण लेकर बैठा था। दस मिनट भी देर होने पर तीर छोड़ता—‘साहब, देर से ही सही, आने की कृपा तो करते हो!’ अथवा ‘आइए, आइए, आप लेट नहीं हैं, सारे विश्व की घड़ियाँ ही तेजी से चल रही हैं! आपका क्या दोष?’ संजीत कोई उत्तर न दे पाता और उसका काम करने का मूड ही गायब हो जाता। दफ्तर की कैंटीन का चायवाला उसे क्यों ठंडी चाय ही देता और शिकायत करने पर हँस पड़ता। संजीत को समझ में नहीं आता था कि शुक्ला तो सीनियर होने के नाते रुआब दिखाता है, मगर यह चायवाला क्यों उसको तुच्छ समझता है? संजीत के जीवन में ऐसी अनेक परेशानियाँ थीं, जो उसे कुकुरमाछी की तरह पीड़ा दे रही थीं। बस में ज्यादातर ऐसे सहयात्री मिलते, जो मोबाइल पर ऊँची आवाज में बातें करते और उसके दिमाग को गरम कर देते। ‘हमारे देश के लोगों में सिविल सेंस कब आएगा?’ ऐसा सोचते-सोचते वह थक जाता था। कंपनी हर मास तनख्वाह का चैक लेट ही देती और सोसाइटी का सेक्रेटरी मेंटिनेंस समय पर न चुकाने के बदले में ताना मारा करता था।

जीवन में एक गर्लफ्रेंड है। वह भी सुकून देने की बजाय सुर बदलकर ब्लड प्रेशर बढ़ाने का प्रयास कर रही है। एक दिन भी यदि संजीत फोन करना या कॉल बैक करना भूल गया तो नमिता इतना गुस्सा करती, जैसे संजीत ने उस पर अपार जुल्म किए हों। एक दिन मॉल में डेढ़ घंटे के बाद भी जब नमिता डे्रस पसंद न कर पाई, तब खड़े-खड़े थके हुए संजीत ने केवल इतना ही कहा, ‘‘यार, अब मैं बोर हो गया हूँ।’’ तब जवाब में नमिता ने वहाँ तमाशा खड़ा कर दिया, ‘‘मेरे लिए दस मिनट भी नहीं होते तुम्हारे पास? मेरी हर बात तुम्हें बोर करती है?’’ आदि-आदि। उस वक्त वहाँ हाजिर लोग आश्चर्य से हम दोनों को देखने लगे। संजीत अचंभे में पड़ गया।

घर में थोड़ी शांति मिलती थी, मगर गत छह महीनों से वहाँ भी समस्या खड़ी हो गई है। टॉयलेट की छत से पानी टपक रहा है। चार बार उसने सोसाइटी में शिकायत की, मगर कोई कार्रवाई नहीं की गई। संजीत को लगता है कि उसके चारों ओर समस्याएँ-ही-समस्याएँ हैं। सारा जहान उसके विरुद्ध हो गया है। सोसाइटी के सेक्रेटरी से लेकर हमेशा मिलनेवाले, रिक्शावाले, बस के यात्री अथवा कंडक्टर, नमिता, शुक्ला, सारे परिचित-अपरिचित, जो संपर्क में आते थे, समझो कि वे लोग ड्यूटी पर थे कि संजीत को किस प्रकार तकलीफ दी जा सके! ऐसे विचार से खिन्न होकर संजीत में कोई नई समस्या का सामना करने की क्षमता नहीं बची थी। पहेली भी कैसी कि क्या घर में कोई छिपकर रहता है?

मगर कौन रहेगा ऐसे छिपकर और किसलिए?

ऐसे प्रश्नों के उत्तर संजीत के पास न थे। किंतु ऐसे प्रश्न खड़े हों, उसके लिए वैसे प्रमाण मिलते रहते थे। कभी संजीत रात का बचा हुआ खाना सुबह के नाश्ते में खाने के लिए सोचता, मगर वह गायब हो जाता था। इस्तरी करके कपाट में रखे उसके कपड़े उसे वॉशिंग मशीन में उपयोग किए हुए मालूम पड़ते। कभी-कभी तो घर में पहनने की स्लीपर उसे बाथरूम में पानी में भीगी हुई मिलती। सिंक में बिना धोए चाय के कप-सॉसर मिलते। उसके लड्डू डिब्बे में कम हो गए हैं, ऐसा दिखता। कभी फ्रिज में आइस-ट्रे खाली पाई जाती थी। शाम को घर का द्वार खोलने पर फर्नीचर का स्थान बदला हुआ पाया जाता था।

संजीत को लगा कि वह पागल हो जाएगा। क्या सच में घर में कोई है या यह उसका संदेह मात्र है? शायद वहम समझकर संजीत उसकी उपेक्षा करता, पर बाद में उसे साक्षी मिलने लगे, तो वह गंभीर हो गया। पड़ोसन ने एक बार शिकायत की कि ‘कल रात बारह बजे आप तेज आवाज में रेडियो सुन रहे थे। प्लीज, आवाज थोड़ा कम कीजिए!’ संजीत को याद था कि वह उस रात ग्यारह बजे ही सो गया था। इसके अलावा रेडियो में बैटरी न होने के कारण वह बज ही नहीं सकता! दिल की धड़कन थामकर उसने रेडियो चेक किया तो उसमें नई बैटरी लगी पाई गई। यह किसने लगाई? और रात बारह बजे पड़ोसी रेडियो सुनकर डिस्टर्ब हुए तो मुझे क्यों रेडियो सुनाई नहीं दिया? ऐसा सोचकर वह उलझन में पड़ गया।

एक रविवार की दोपहर को वह बीयर पीकर गहरी नींद लेने की तैयारी कर रहा था, तब ऊपर रहनेवाले रमेश भाई का फोन आया। वे अपना फ्लैट बेचना चाहते थे। दलाल किसी को घर दिखाने आनेवाला था। परंतु रमेश भाई स्वयं घर में न थे। वे संजीत को कह रहे थे कि दस मिनट में दलाल आएगा, कृपया उसे आप अपना घर देखने देना, क्योंकि सारे फ्लैट एक समान हैं। संजीत उनको कहना चाहता था कि वह व्यस्त है और दलाल को अन्य किसी का घर दिखलाने को कहो। मेरे लिए आसान न था, किंतु मोबाइल नेटवर्क ठीक न होने के कारण वह रमेश भाई को मना न कर सका। फिर फोन कट गया। केवल दस मिनट संजीत ने राह देखी, मगर बाद में उसको नींद आ गई। करीब तीन घंटे के बाद वह जागा। वह चाय बना रहा था, तब फोन की घंटी बजी। वह कुछ बोले, उसके पूर्व ही दूसरी तरफ से रमेश भाई ने बोलना शुरू किया। उन्होंने कहा, ‘थैंक्स, आपने दलाल तथा उस फ्लैट लेनेवाले भाई को इतना कोऑपरेट किया। अरे, आपने दोनों को चाय भी पिलाई। बहुत-बहुत आभार, संजीत भाई! ओके-ओके’ कहकर संजीत से फोन काटा और सिंक में देखा तो चाय के तीन कप और बिना साफ की हुई पतीली वहाँ पड़ी थी। संजीत को आश्चर्य हुआ और वह सोच में पड़ गया, ‘मैं गहरी नींद में सो रहा था, तब घर में दो व्यक्ति आ जाए और घर में जो कोई छिपकर रहता है, उसने आनेवाले दो व्यक्तियों को चाय बनाकर पिलाई!’ रमेश भाई को भी अचंभा हुआ। उसने आज रमेश भाई को भी चाय नहीं पिलाई थी। संजीत पड़ोसियों के साथ विशेष संबंध नहीं रखता था।

यह बात रहस्यमय बनती जा रही थी। संजीत को यह समझ में आने लगा कि जो कोई छिपकर रहता है, उसकी अब हिम्मत बढ़ती जा रही है और वह अपने अस्तित्व के प्रमाण लापरवाही या मनःपूर्वक छोड़ रहा है, ताकि संजीत को पता लग जाए कि वह इस घर में रहता है; मगर उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता!

‘क्या वह सचमुच में कुछ नहीं कर सकता?’

‘क्यों नहीं कर सकता? सोसाइटी में शिकायत कर सकता है, पुलिस की मदद ले सकता है, पड़ोसियों का साथ ले सकता है।’ संजीत ने सोचा कि मैं क्या मूर्ख या कायर हूँ कि मेरे घर में कोई चुपचाप घुसकर रहने लगे! एक सुबह संजीत बालकनी में दाढ़ी बना रहा था। उस वक्त उसे लगा कि बाथरूम में कोई है। पहले तो वह डर गया। बाद में उसने सोचा कि चलो बाथरूम की कुंडी बाहर से बंद करके, पड़ोसी तथा वॉचमैन को बुलाकर लाऊँ, उस बदमाश को आज पकड़ ही लूँगा! संजीत के कदम आहिस्ता-आहिस्ता बाथरूम की ओर बढ़ रहे थे, तभी सीनियर शुक्ला का फोन आ गया। संजीत को फोन लेना पड़ा। शुक्ला ने किसी मामूली मुद्दे पर उसे झाड़ दिया। संजीत का मूड खराब हो गया। वह फिर से दाढ़ी बनाने लगा और अचानक उसे याद आया कि बाथरूम में कोई था। उसने डरते-डरते जाँच की तो अब वहाँ कोई नहीं था। संजीत को लगा, जैसे कि उसके कान के पास से कोई गोली गुजर गई हो। परंतु इस घटना के तीन दिन बाद, जो कि रविवार था, उस दिन एक बड़ी घटना घटी।

हुआ ऐसा कि संजीत बाथरूम में था और उसे घर की डोर-बेल बजती सुनाई दी। वह जोर से बोला कि वह नहा रहा है, बाद में आओ! उसके पहले किसी ने घर का द्वार खोल दिया हो, ऐसा लगा। संजीत चौंक गया! घर में जो कोई रहता है, वह इतनी सहजता से दरवाजा भी खोल सकता है! जैसे कि उसके बाप का घर हो? संजीत इतना डर गया कि बाथरूम से बाहर निकलकर उस द्वार खोलनेवाले का सामना कर सके, उसमें उतनी भी हिम्मत न थी। इसके विपरीत जैसे कि वह अन्य किसी के घर में हो, वैसे छिपकर बाहर क्या बात हो रही है, सुनने लगा। आवाज सुनकर समझ में आया कि सोसाइटी का सेक्रेटरी मेंटिनेंस चैक माँगने आया था। संजीत ने चैक तैयार रखा था, मगर वह तो यहाँ छिपकर खड़ा था! द्वार खोलनेवाला व्यक्ति क्या ड्रावर खोलकर उसे चैक देगा? यदि सेक्रेटरी उससे पूछेगा कि आप कौन हैं, और संजीत भाई कहाँ हैं? क्या बात होगी, वह संजीत देखना चाहता था, मगर उसे बड़ा धक्का लगा, जब उसने सुना कि द्वार खोलनेवाला व्यक्ति सेक्रेटरी को ऊँची आवाज में कह रहा था कि छह महीनों से टॉयलेट की छत लीक हो रही है, उस शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं होती और हर बार मेंटिनेंस के लिए पैसे माँगने को हाजिर! एक पैसा नहीं मिलेगा। भागो यहाँ से। पानी लीक हो रहा है, पहले उसे रिपेयर कराओ, बाद में मेंटिनेंस का पैसा मिलेगा! और धड़ाम से दरवाजा बंद करने की आवाज आई। संजीत डरकर बेहोश हो गया। होश में आने पर फिर से उसका शरीर काँप उठा। उसे यह समझ में नहीं आया कि सेक्रेटरी ने उस व्यक्ति से ऐसा क्यों नहीं पूछा कि आप कौन हैं इस तरह बहस करनेवाले? संजीत भाई को बुलाइए! क्या वह व्यक्ति मेरे जैसा ही दिखता होगा? ऐसा सोचकर वह और ज्यादा डरने लगा। उसे लगा कि शायद उस व्यक्ति की आवाज भी मेरे जैसी थी। संजीत को लगा कि यदि वह व्यक्ति मुझसे संपूर्णतया मिलता-जुलता होगा, तब मैं कुछ करूँ, उसके पूर्व ही वह मुझे घूसखोर समझकर घर से बाहर निकाल दे तो? मैं कैसे साबित करूँगा कि मैं नहीं, वह घूसखोर है! डर के मारे संजीत बहुत देर तक बाथरूम में छिपा रहा। बाद में कोई हलचल न होने पर उसने आहिस्ता से कदम बाहर निकाले। सारे घर में घूमकर उसने देखा, मगर उसने किसी को वहाँ पाया नहीं।

अजीब मनःस्थिति में उसने बाकी का समय बिताए। रात के समय वह पूरी घटना के विषय में सोचने लगा। आहिस्ता-आहिस्ता उसे लगा कि केवल यह घर नहीं, बल्कि उस व्यक्ति को मेरा जीवन भी जीना आना चाहिए। हर जगह वह डरकर जी रहा है। ऐसे जीवन का क्या अर्थ है? उसी आदमी को जीने का हक है, जो यदि अनुचित हुआ तो उसके खिलाफ लड़े, जैसे आज सेक्रेटरी से वह दूसरा आदमी लड़ गया था। मैं नहीं, वह दूसरा आदमी ही सही है! ऐसे विचार के साथ संजीत सो गया।

दूसरे दिन बिछौने से संजीत नहीं, दूसरा आदमी उठा। तैयार होकर घर से बाहर जाते समय सोसाइटी का सेक्रेटरी मिल गया, तब उसने खुनस के साथ देखा। सेक्रेटरी ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘एक सप्ताह में आपका काम करवा देता हूँ। बस, एक ही सप्ताह...!’’ और संजीत के नाते वह कुछ भी बोले बिना आगे चला गया। दफ्तर में आधा घंटा लेट गया और सीनियर शुक्ला ने घड़ी की ओर तब इशारा करके देखा! उसने चिढ़कर कहा, ‘‘घड़ी की ओर मत देखो!’’ शुक्ला ऐसे विचित्र सवाल के लिए तैयार न था। वह बोला, ‘‘मेरा पेंडिंग काम कितना है, यह बताओ।’’ शुक्ला बोला, ‘‘पेंडिंग कुछ नहीं है तो यहाँ ठीक ग्यारह बजे हाजिर होकर भजन गाना है? यहाँ सब काम करने ही आते हैं, रजिस्टर में दस्तखत करने नहीं!’’ शुक्ला की बोलती बंद हो गई। इतने में चायवाला आया, तब संजीत बनकर दूसरे आदमी ने चाय का कप उसके सिर पर डाल दिया और कहा, ‘‘बस...?’’ वह लड़का भाग खड़ा हुआ और फटाक् से दूसरी गरम चाय ले आया।

इतने में नमिता का फोन आया। उस दूसरे व्यक्ति ने उसे कड़ी आवाज में कहा, ‘‘खबरदार, आज के बाद कभी ऑफिस आवर्स में फोन किया तो! लाइफ में कभी भी फोन नहीं करोगी तो चलेगा! पर काम के समय फोन नहीं करना!’’ उसने फोन काट दिया। ऑफिस के सहकर्मी उसकी ओर देख रहे थे। जब उसने उनकी ओर देखा तो वे सभी शर्मिंदा हो गए। वे सब अपना काम करने लगे।

अब संजीत के स्थान पर वह दूसरा व्यक्ति सेट हो गया है। अब बस में मोबाइल पर जोर से बोलनेवालों में उनका मोबाइल बाहर फेंके जाने का डर सता रहा है। रिक्शेवाले को भी वह नहीं छोड़ता। अब वह पड़ोसियों के साथ भी फें्रडली है।

शुक्ला हो या नमिता, सभी अपनी मर्यादा में रहकर उससे बरताव करते हैं। सेक्रेटरी ने एक सप्ताह में काम करवा दिया है।

अब वह दूसरा आदमी संजीत बन गया है।

—राजेश पटेल

७, प्राची, ९० फुटा रोड,

घाटकोपर (ईस्ट), मुंबई-४०००७७

दूरभाष : ९८२११२२३६१

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