बिन पावर सब सून

बिन पावर सब सून

रईसों की बस्ती में सेठ करोड़ी का बँगला है। सामने मखमली दूब है, किनारे मौसमी फूल। करोड़ी डॉक्टर की सलाह पर यहीं सबेरे-सबेरे प्राणवायु का सेवन करते हैं। शहर में कई पार्क हैं। वे उनसे कतराते हैं। न जाने कौन प्रतियोगी उनकी जान से खेल जाए? ज्योतिष पर उनका गहरा विश्वास है। उन्हें ज्योतिषी ने चेताया है कि निजी सुरक्षा भरोसे योग्य नहीं है। ऐसे भी ग्रहों का गठजोड़ यही इंगित करता है कि उन्हें अस्त्र-शस्त्र से सावधान रहना है। गार्ड है तो गन भी होगी। कौन कहे कब उन्हीं पर चल जाए, लिहाजा ऊँची दीवारों से घिरा लॉन उनके लिए सुरक्षित है। वहीं गार्ड भी है, पर बाहर के खोखे में। करोड़ी की अनुमति से ही किसी का प्रवेश संभव है। इसके लिए खोखे से घर के दफ्तर में इंटरकॉम है। वहीं बैठा सचिव करोड़ी की अनुमति से ही इस वर्जित क्षेत्र में किसी को प्रवेश देता है।

करोड़ी के लिए श्रेष्ठता का मानक धन है। उनकी तुलना में कम दौलतमंद हेय हैं, बराबरी के प्रतिद्वंद्वी केवल धनी और अधिक दौलतमंद पूजनीय। अतिम श्रेणी में काम आनेवाले मंत्री अफसर, विधायक, सांसद आदि भी शामिल हैं। यह वे हस्तियाँ हैं, जो पद पर रहने तक उपयोगी हैं। चुनाव में पराजित जन-प्रतिनिधि अथवा सेवानिवृत्त अधिकारी तभी काम के हैं, जब सरकार या सियासी क्षेत्र में अपने संपर्कों से उनकी स्वार्थ सिद्धि करें। इनमें से कुछ उनके वेतनभोगी हैं और कुछ मौके-बेमौके कीमती भेंट-उपहार के हकदार। आज सुबह से करोड़ीजी का पारा सातवें आसमान पर है। दरअसल वातानुकूलन के अभाव में वे सो नहीं पाए हैं। यों पॉवर जाए तो शक्तिशाली जेनरेटर का प्रबंध है। उसके लिए अलग कर्मचारी भी नियुक्त है। कोई कारण नहीं है कि करोड़ी अपनी इच्छानुसार तय किए सुखद तापमान में न रहें? अथवा उनकी कमाऊ निर्णय लेने की क्षमता पर कोई विपरीत प्रभाव पड़े?

करोड़ी खरीदने-बेचने के विशेषज्ञ हैं। कर्मचारी ने स्वीकार किया है कि डीजल न रहने की वजह से जेनरेटर नहीं चल पाया। करोड़ी को संदेह है कि डीजल उसने बेच खाया होगा। वह उसकी नौकरी खाने पर उतारू हैं और वह उसे बचाने की प्रार्थना पर। उसने इस संदर्भ में बीबी-बच्चे की कसम भी खाई है। डीजल बेचने के गुनाह से उसका साफ इनकार है। उसके अनुसार समय पर डीजल आपूर्ति न कर पाना ही उसका इकलौता अपराध है। करोड़ी की सोच है कि क्या कोई हत्यारा हत्या का जुर्म कुबूल करता है या कोई डकैत डकैती का न जाने पुलिस इस स्वीकारोक्ति के लिए क्या-क्या यातनाओं की जुगत नहीं भिड़ाती है, फिर भी सफलता संदिग्ध है, करोड़ी ने सचिव को निर्देश दिया, ‘‘जाओ, थाने में इस ‘चोर’ के जुर्म की एफ.आई.आर. दर्ज करवाओ।’’ निजी सचिव उनके मुँह लगा है। उसने विरोध का दुस्साहस दिखाया, ‘‘फिर पुलिस के पास इतने गंभीर केस हैं कि कुछ समय बाद वह रिपोर्ट को दाखिल-दफ्तर कर देगी। मेरा सुझाव है कि इसको गंभीर चेतावनी देकर अथवा एक दिन का वेतन काटकर मामला रफा-दफा किया जाए, वरना आप अखबारों की प्रवृत्तियों से तो परिचित हैं ही। वह भूखे भेड़िए की तरह ऐसे किसी तथाकथित अन्याय की प्रतीक्षा करते हैं, आपकी छवि को धूमिल करने के लिए। कुछ तो ऐसे भी हैं, जो इस ‘मामले’ का उपयोग ‘ब्लैक मेलिंग’ के लिए करेंगे। कभी न छापने के प्रलोभन से, कभी छापने की धमकी से। उसके तर्कों ने करोड़ीक्रोध के ताप पर बर्फीले पानी का प्रभाव डाला। उनका गुस्सा कुछ ठंडा पड़ा। उन्होंने निजी सचिव से कुछ खीज के स्वर में ‘जैसा ठीक समझो वैसा करो’ कहकर अपना पल्ला झाड़ा।

हमारा अनुभव है कि बिजली के तारों के जाल को, शरीर से कभी यकायक प्राण की आत्मा का लुप्त होना बाहरी तापमान पर निर्भर है। चिल्ला जाड़ा पड़े या लू का आक्रोश, बिजली ऐसे मौकों पर अचानक, कौन कहे, कैसे सैर-सपाटे को सिधार जाती है! हमारे मोहल्ले में कुछ गुस्सैल स्वभाव के भी लोग बसते हैं। उनमें से कुछ फोन के माध्यम से अपने जी की भड़ास निकालते हैं तब तक, जब तक कि बिजली के दफ्तर का कर्मचारी फोन काटकर उनकी मौखिक आक्रामकता का अंत न कर दे। कुछ ऐसे हैं, जो इस प्रकार के नपुंसक आक्रोश से, सहमत नहीं हैं। वह बिजली बोर्ड की दिशा में, झुंड में जाकर, वहाँ की ‘कार्यकुशलता’ से कुछ बिजली कर्मचारियों से हाथापाई करते हैं। देखने में आया है कि ऐसे वहाँ पधारते जरूर हैं, पर अधिकारियों की मिन्नत-मनुहार से प्रभावित होकर, उनकी मरम्मत के इरादों को मुलवी कर खाली हाथ लौट भी आते हैं। इसे भारत की मूल अहिंसक भावना को विजय के रूप में भी आँका जा सकता है।

इसीलिए मोहल्ले के हर घर में हाथ का पंखा उपलब्ध रहना ही रहना है। ऐसा नहीं है कि हम सब देश के कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करने को कटिबद्ध हैं। पर क्या करें, हाथ का पंखा एक अनिवार्यता है। बिजलीवाले दो कमरों के निवास की कलादीर्घा में आवश्यक सजावट के बतौर बिजली का पंखा फिट है। किसी को पता नहीं है कि आवश्यकता के अवसर पर चले, न चले? दुर्दिन के समय अपने भी साथ छोड़ते हैं तो पॉवर भी अंतर्धान हो तो क्या आश्चर्य? कठिनाई है कि चंचला बिजली की चलाचली से पॉवर बोर्ड तक अनभिज्ञ है। बिजली जैसे बिना सूचना चली जाती है वैसे ही अचानक प्रगट भी होती है। बिजली बोर्ड से कोई दरयाफ्त करे तो यही उत्तर मिलता है, ‘‘असुविधा के लिए हमें खेद है, पर लाइन में ‘फील्ड’ है। उसे सुधारने युद्ध स्तर पर, काम हो रहा है। ‘कितना वक्त लगेगा’ बताने में हम असमर्थ हैं।’’ घर में आलम है कि ग्रह सज्जा की सामग्री यानी बिजली का पंखा, अपने असमर्थ आका को सिंगट्टा दिखाकर पूर्ण रफ्तार से चालू है।

जिन्होंने भोगा है, वे जानते हैं। हमारे ऐसे अधिकांश वातानुकूलन से उतने ही अनभिज्ञ हैं, जितने बाथ-टब से। बाल्टी-लोटे से नहाकर भी उतनी ही सुखमय सफाई होती है, जितनी पानी भरे टब में लेटकर। हमें तो लगता है कि ‘जकूजी’ और ‘शॉवर’, ‘टब’ आदि रईसों के चोंचले हैं। नव-धनाढ्य इनकी शान बखारते हैं। इनसे कोई पूछे कि यूरोप की इस आयातित अवधारणा में कितने लोग वहाँ रोज स्नान तक करते हैं? सुना है कि बहुत हुआ तो दाढ़ी बनाकर दिन के कार्यक्रम को तैयार हो जाते हैं यूरोपवासी। फर्क के लिए मौसम उत्तरदायी है। भारत में वर्षपर्यंत कुछ माह छोड़कर गरमी पड़ती है, वहाँ ठंड। यहाँ सूर्य सालभर भट्ठी में पड़ी नान सा तपाता है आदमी को। वहीं यूरोप में सूर्य नजर आए तो उत्सव का वातावरण होता है। बहुत दिनों बाद भुवन भास्कर ने दर्शन तो दिए। कोई पूछे कि बिजली का सजावटी पंखा हम क्यों रखते हैं तो हमारा उत्तर होगा कि दूसरों को प्रभावित करने के लिए। अपना काम तो हाथ के पंखे से भी चल जाता है। पसीना बहाने की कुछ वर्जिश करते हैं। सुबह हाँफते ज्यादा और चलते कम हैं। हमें तो घर के बाहर मेहनत से पसीना आता है, खुद ही सूखने के लिए। श्रम-परिश्रम से पसीना बहाने से हम, ठाले-बैठे के मोटापे और मधुमेह से भी दूर रहते हैं, जिससे आधुनिक पीढ़ी-की-पीढ़ी आक्रांत है।

नेताओं में भी खानदानी नेता हैं। इनकी पुश्त-दर-पुश्त इसी धंधे पर निर्भर है। इससे कल के फटेहाल वर्तमान के करोड़पति हैं। कभी यह धन-बल से चुनाव जीतते हैं, कभी बाहुबल से। न इनके उसूल हैं, न कोई सिद्धांत। सत्ता की जुगाड़ में यह वोटों के पुश्तैनी सौदागर हैं। झूठ इनके स्वभाव का अंग है और यह भविष्य के सपने ऐसे दिखाते हैं, जैसे ज्योतिषी किसी की कुंडली बाँचता है। सत्ता में इनकी खिलखिलाती तसवीरें हैं। संदेह होता है कि यह जनता की पीड़ा का मजाक तो नहीं उड़ा रहे हैं? यों इनसे प्रश्न करो तो यह स्वयं को देश के सुनहरे भविष्य का प्रतीक बताते हैं और कभी रामराज्य का संवाहक तो कभी सेक्युलर और उदार भारत का नुमाइंदा।

पॉवर के सैर-सपाटे से किसी को कष्ट है तो सेठ करोड़ी जैसे व्यक्तियों को है। उनका पूरा जीवन वातानुकूलन पर निर्भर है। उनको मजबूरन सूर्य का दर्शन करना पड़ता है, व्यायाम के बहाने से। वह भी इसलिए कि डॉक्टर की चेतावनी है, वरना जिंदगी को खतरा है। हमें तो दाल-रोटी नसीब है।

ऐसे बेचारे तो साँसें चलती रहें, इसके लिए रंग-बिरंगे दवा के कैपसूलों के सहारे हैं। जहाँ हर किस्म के पकवान उपलब्ध हैं, वहाँ गृहस्वामी को रूखा-सूखा खाना पड़े तो देखकर कभी हमदर्दी होती है, कभी तरस आता है।

ऐसों के जीवन का लक्ष्य विलगासिता का प्रदर्शन है। उनसे कइयों की रोजी-रोटी भी जुड़ी है। इवेंट मैनेजर इनकी फॉर्महाउस की पार्टी की सजावट और कार्य का प्रबंध करते हैं, खान-पान का कैटरर। दोनों चाहते हैं कि ऐसी पार्टी रोज करें। हमारे जैसों को भी सामान चढ़ाने-उतारने का रोजगार मिलता है, कभी-कभार नायाब विदेशी फल और खास खाद्य पदार्थों को चखने का भी। साथ ही हमें देश के समृद्ध अपवादों की जीवन-शैली के अध्ययन का अवसर भी प्राप्त होता है। यह राज भी खुलता है कि इतने आह्लादित चेहरे सिर्फ कवच हैं, आंतरिक पीड़ा और रोगों को छिपाने के। जीवन में सबके अपने-अपने दुःख और कष्ट हैं। कभी-कभी हम सोचते हैं कि जीवन में क्या कोई है, जो पूरी तरह सुखी हो? ऐसे अजूबे शायद किसी म्यूजियम में सजाने योग्य हैं। कम-से-कम मैडम टुसार की गैलरी में ऐसों की मोम की प्रतिमाएँ ही लगा दी जाएँ। इनसे अपने मन का यह भ्रम तो दूर होगा कि जिंदगी केवल पीड़ा का अनवरत सफर है, जिसमें सुख केवल अस्थाई सराय है। जैसे बच्चे चिड़ियाघर घूमने जाते हैं, हम भी सुखी इनसानों के अजायबघर में जाकर हँसने-मुसकराने की प्रेरणा प्राप्त करेंगे?

फिर हमें देश के नेताओं का ध्यान आता है। जिस धंधे में वे हैं, उसमें कभी जनसेवा की प्रमुखता थी। आजादी के बाद से इसे देश का ऐसा कमाऊ पेशा बना दिया गया है, जिसमें जनसेवक जनता के हित का कम और अपने स्वार्थ का अधिक सोचते हैं। आज यह देश का सबसे मुनाफे का पेशा है। कोई आश्चर्य का विषय नहीं है कि आज जनता इन्हें जन-भक्षक का दर्जा देती है।

नेताओं में भी खानदानी नेता हैं। इनकी पुश्त-दर-पुश्त इसी धंधे पर निर्भर है। इससे कल के फटेहाल वर्तमान के करोड़पति हैं। कभी यह धन-बल से चुनाव जीतते हैं, कभी बाहुबल से। न इनके उसूल हैं, न कोई सिद्धांत। सत्ता की जुगाड़ में यह वोटों के पुश्तैनी सौदागर हैं। झूठ इनके स्वभाव का अंग है और यह भविष्य के सपने ऐसे दिखाते हैं, जैसे ज्योतिषी किसी की कुंडली बाँचता है। सत्ता में इनकी खिलखिलाती तसवीरें हैं। संदेह होता है कि यह जनता की पीड़ा का मजाक तो नहीं उड़ा रहे हैं? यों इनसे प्रश्न करो तो यह स्वयं को देश के सुनहरे भविष्य का प्रतीक बताते हैं और कभी रामराज्य का संवाहक तो कभी सेक्युलर और उदार भारत का नुमाइंदा।

गिरगिट की तरह रंग बदलना इनकी फितरत है। जिस पार्टी में खाने की गुजांइश है, उसमें शरीक होना इनकी विवशता है। भारत के सब दल उसूलों के ड्राईक्लीनर हैं। कोई जैसे ही एक में शामिल होता है, उसके कल के सिद्धांत धुल जाते हैं। कभी-कभी किसी को भी शक हो कि यह इनसान है कि गिर-गिरटान? इनके व्यवहार और आचरण से तो यही प्रतीत होता है कि यह कहलाते भले ही मानव हों, पर गिरगिटी प्रवृत्ति के अधिक करीब हैं। इन्होंने आजतक जनता को खैरात उसी के पैसे से बाँटी है। खर्चा जहाज का हो या रेल का, इन्होंने हर तरकीब से जेब का धेला बचाया है। खुद महलों में रहकर यह गरीब, किसान, पिछड़ों और दलितों के हितचिंतक हैं। जुबानी जमा-खर्च में जाता ही क्या है? इन्हें एक से निकालकर दूसरी जेब में डालने की महारत हासिल है। जैसे कई विषय के अज्ञानी होकर भी उसके पी-एच.डी. हो जाते हैं, यह भी न गरीबी का ‘ग’ जानते हैं, न किसानी का ‘क’। फिर भी ये पीढ़ियों से गरीबी हटा रहे हैं। गरीबी ऐसा अंगद का पाँव है, जो इनके प्रयत्नों के बावजूद हटने को कतई प्रस्तुत नहीं है। पुरखों ने कभी देश-सेवा के लिए त्याग किया था, उसी का राग यह आज भी अलाप रहे हैं, वह भी बेसुरे अंदाज में।

खान-पान, महल, धन-दौलत, मनोरंजन, सैर-सपाटे आदि की इफरात है इनके जीवन में। फिर भी बिना पॉवर के इनकी गुजर नहीं है। जैसे मछली बिना पानी के तड़पती है, यह बिना सत्ता के। अंतर इतना है कि मछली में अंतर का दर्द छिपाने की चतुराई नहीं है, यह चालाक हैं। सत्ता गँवाने की पीड़ा यह विरोधियों के झूठे वादों को देते हैं। इनका सिर्फ एक मुद्दा, जो भी प्रधानमंत्री हो, उसे कोसना है। कहने को कुछ भी कहें, सत्ता गँवाने का उनका दर्द छिपाए नहीं छिपता है। उनको सुनकर कभी जनता को हँसी आती है, तो कभी रोना। जो खुद करप्शन की कालिख में सिर से पाँव तक डूबे हैं, उन्हें लगता है कि सरकार बिना भ्रष्टाचार के चलती तो दूर, रेंग भी नहीं पाती है। उन्हें आश्चर्य है कि कोई सरकार बिना भ्रष्टाचार के पाँच साल कैसे काट गई, वह भी बिना किसी आरोप-आलोचना के।

उनकी प्रमुख पीड़ा दूसरी है। प्रजातंत्र के प्रधान की कुरसी उनकी बपौती है। इस पुश्तैनी कुरसी पर कोई और कैसे काबिज हो गया? तीन-चार पीढ़ियों के उनके अधिकार से उन्हें एक सामान्य, गैर-खानदानी व्यक्ति ने कैसे बेदखल कर दिया? उनकी सोच सामंती है। राजा में योग्यता, अनुभव होना कोई जरूरी है क्या? दिमाग की दरकार क्या है? उसमें भूसा भी भरा हो तो चलेगा। यह कुरसी का करिश्मा है, जो उन्हें महान् बनाता है। इतने देशी-विदेशी सलाहकार हैं। उनका काम क्या ऊँचे वेतन पाकर सिर्फ घास छीलना है? वह योजना बनाएँगे। क्रियान्वयन पर नजर रखेंगे और खानदानी वारिस श्रेय लेगा, नाम कमाएगा। उसी पीढ़ी-दर-पीढ़ी का यही योगदान है तो उसका क्यों न हो? उन्होंने भी बिना आत्मसात् किए उसूलों की कै की है तो वह भी क्यों न करें? इधर उनके सलाहकार भूसे की उपयोगिता पर बयान दे रहे हैं। दूसरों के अंतर में घृणा है। इसके मन में केवल प्रेम है। यह फौज को निर्बल कर, केवल प्रेम से, आतंक से मुक्ति व राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने को तत्पर हैं। किसी ने लिखकर दे दिया। उन्होंने पढ़ दिया। तब से वह मंत्र के समान इसे ही दोहरा रहे हैं।

यों पॉवर का अभाव उन्हें अखरना स्वाभाविक है। कभी उनकी इच्छा सरकार के लिए आदेश था। वह जनता के सामने कैबिनेट को पारित प्रस्ताव की धज्जियाँ उड़ाने में समर्थ थे, वह भी अपनी ईमानदारी की छवि बनाने को। अब भी खानदान का महत्त्व है। पर वह धीरे-धीरे किसी नवाब के अतीत की यादगार चाँदी का पानदान बना जा रहा है। सब पानदान को सम्मान देने को प्रस्तुत हैं, पर इस ‘पैदाइशी’ प्रधानमंत्री को सत्ता देने को नहीं। न दरबारियों की भीड़ है, न जनता की, न स्वार्थ साधकों की, न विदेशी बिचौलियों की। विदेशी राजदूत उससे कतराते हैं, वरन् कभी-कभार वह जी बहलाने को अपने क्षेत्र का दौरा कर लेता है या मन बदलने और अपनी महत्ता के प्रदर्शन को पार्टी द्वारा शासित प्रदेशों का।

राजनीति में आयु को लेकर लचीलापन है। जब नेता का जन्म ही पैंतीस या चालीस वर्ष की उम्र में होता है तो उसका पचास-साठ की उस तक युवा हृदय सम्राट् बने रहना स्वाभाविक है। अधिकतर, क्षेत्रीय दलों में भी अब सियासी खानदानों का महत्त्व और महत्ता बढ़ती जा रही है। वह भी उनके अनुकरण में लगे हैं। जो किसी अन्य धंधे के अयोग्य होता है, वह राजनीति में प्रवेश करता है। बहुत कम ऐसे हैं कि किसी राजनीतिज्ञ का पुत्र या भतीजा-भानजा व्यापार करे या प्रतियोगिता परीक्षाओं में सफल होकर अफसरी।

यों खानदान का प्रजातंत्र की अवधारणा में एक विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण योगदान है। इन्होंने प्रजातंत्र को परिवार-केंद्रित बना दिया है। उसे देश को पारिवारिक प्रजातंत्र का नाम भी दिया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि विश्व में सियासी परिवारों का महत्त्व नहीं है, पर उनमें सीधे प्रजातंत्र के आका के अवतार कम ही पैदा होते हैं। अब यह प्रदूषण राज्यों तक फैल गया है। यदि कोई राज्य का मुख्यमंत्री रह चुका है तो उसका पुत्र ही पद का उचित और काबिल उत्तराधिकारी है। संसार में कहीं ऐसा नहीं है, पर खानदान का ऐसा संक्रामक प्रभाव है कि अब राज्यों में भी यह छूत की बीमारी फैल रही है। हमें विश्वास है कि इतिहास में खानदान के इस योगदान को स्वर्णाक्षरों में अंकित किया जाएगा और धीरे-धीरे पारिवारिक प्रजातंत्र शायद विश्व में भी प्रचलित हो!

वह और उनके सलाहकार आजकल गंभीर चिंतन में व्यस्त हैं। उनके पुरखों ने संविधान में कई उपयोगी संशोधन किए हैं। ऐसा संशोधन क्या उचित नहीं होगा कि प्रधानमंत्री एक ही परिवार से हो? कठिनाई यही है कि उसके लिए भी बहुमत अनिवार्य है!

—गोपाल चतुर्वेदी

९/५, राणा प्रताप मार्ग

लखनऊ-२२६००१

दूरभाष : ९४१५३४८४३८

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