प्रभाकर माचवे : एक अप्रतिम हिंदीतर हिंदी लेखक

प्रभाकर माचवे : एक अप्रतिम हिंदीतर हिंदी लेखक

प्रयात रचनाकार प्रभाकर माचवे का जन्मशताब्दी वर्ष बीत चुका है। उनका जन्म २६ दिसंबर, १९१७ को एक मराठी परिवार में ग्वालियर में हुआ। वे महाराष्ट्र में कभी नहीं रहे। तीन पीढ़ी पहले इनके पूर्वज महाराष्ट्र से आकर मध्य प्रदेश में बस गए थे। माचवेजी के पितामह किसी मुसलमान जमींदार के यहाँ मुलाजिम थे। पिता बलवंत विट्ठल माचवे रेलवे में काम करते थे। वहाँ से सेवानिवृत्त होने के बाद वे ग्वालियर रियासत में पोस्ट मास्टर बन गए।

प्रभाकर माचवे अपने माता-पिता की चौदहवीं और आखिरी संतान थे। इनकी माँ जबलपुर से थीं। वे पढ़ी-लिखी न थीं, लेकिन धार्मिक स्वभाव की थीं। पिता क्रोधी स्वभाव के थे, मारते-पीटते भी थे। वे बच्चों को सवेरे उठाकर व्यायाम करवाते और संस्कृत पढ़ाते थे। पिता के कड़े स्वभाव के चलते प्रभाकर अपनी माँ के अधिक निकट थे। वे उन्हें धार्मिक ग्रंथ पढ़कर सुनाते थे, जिनमें तुकाराम, ज्ञानेश्वर, रामदास आदि की रचनाएँ शामिल थीं।

माचवेजी की आरंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। उन्होंने रतलाम के दरबार हाई स्कूल में पाँचवीं कक्षा में दाखिला लिया, जहाँ बड़े भाई काशीनाथजी गणित के अध्यापक थे। पिता की मृत्यु जब वे आठ वर्ष के थे, तभी हो गई थी। १९३० में माचवेजी ने मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। चित्रकला में उनकी बचपन से ही रुचि थी। रतलाम में रहते हुए उन्होंने कई भाषाएँ भी सीखीं।

उन्होंने क्रिश्चियन कॉलेज, इंदौर से स्नातक किया। वहाँ इंदौर प्रार्थना समाज में कई धर्मों का अध्ययन किया। १९३६ में उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा, आगरा से ‘साहित्य रत्न’ की उपाधि प्राप्त की। आगरा कॉलेज से उन्होंने दर्शनशास्त्र में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् १९५८ में उन्होंने ‘हिंदी-मराठी निर्गुण संत काव्य’ विषय पर आगरा विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. किया।

इंदौर में रहते हुए सन् १९३७ में राष्ट्रीय मजदूर संघ इंदौर के मंत्री पद पर उनकी नियुक्ति हुई। वहाँ उन्हें चालीस रुपए प्रतिमाह वेतन के रूप में मिलते थे। यहाँ उन्हें मजदूरों के मध्य काम करने का अवसर मिला। सन् १९३९ में वे माधव कॉलेज में अंग्रेजी और दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में १४०/- प्रतिमाह के वेतन पर नियुक्त हुए। सन् १९४८ में उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और आकाशवाणी नागपुर में काम करना शुरू किया। आकाशवाणी नागपुर, इलाहाबाद, विदेश प्रसार सेवा में छह वर्ष तक काम करने के बाद त्याग-पत्र दे दिया। १९५४ में साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली में सहायक सचिव के पद पर नियुक्ति हुई। १९५९-६१ तक अमेरिका के दो विश्वविद्यालयों—विसकांसिन तथा कैलिफोर्निया में अतिथि प्राध्यापक के रूप में हिंदी, भारतीय साहित्य और गांधी दर्शन का अध्यापन किया। १९६४-६६ तक संघ लोक सेवा आयोग में विशेष भाषाधिकारी के रूप में कार्य किया। १९७१-७५ तक साहित्य अकादेमी के सचिव रहे। १९७६-७७ में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला में मानद फेलो रहे। इस बीच कई विश्वविद्यालयों और संस्थानों में अतिथि प्राध्यापक रहे। १९७९-८५ तक भारतीय भाषा परिषद्, कलकत्ता में निदेशक रहे। १९८८ में ‘चौथा संसार’ (इंदौर) के संस्थापक संपादक बने। १७ जून, १९९१ को इंदौर में हृदयाघात से देहावसान हो गया।

माचवेजी में बचपन से ही साहित्य-संस्कार का बीज पड़ गया था। माँ बचपन से ही उनसे धार्मिक ग्रंथ, तुकाराम, ज्ञानेश्वर, रामदास, श्रीधर आदि की रचनाएँ सुना करती थीं। बचपन में ही वे तुकबंदियाँ करने लगे थे। यह संस्कार क्रमशः विकसित होता गया। मात्र सत्रह वर्ष की वय में उनकी पहली कविता १९३४ में माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा संपादित ‘कर्मवीर’ में छपी। तब वे बी.ए. के छात्र थे। सन् १९३५ में प्रेमचंद ने ‘हंस’ में उनकी पहली कहानी प्रकाशित की। इसी तरह निराला द्वारा १९३६ में ‘सुधा’ में उनका पहला लेख छापा। १९३८ में अज्ञेय ने ‘विशाल भारत’ में उनकी दो इंप्रेशनिस्ट कविताएँ छापीं। १९३७ में उन्होंने जैनेंद्र के दार्शनिक विचारोंवाले निबंधों का संपादन किया, जो ‘जैनेंद्र के विचार’ नाम से प्रकाशित हुआ और यह उनकी हिंदी की प्रथम प्रकाशित पुस्तक है।

प्रभाकर माचवे द्वारा लिखित, अनूदित, संपादित पुस्तकों की संख्या सवा सौ से अधिक है। माचवेजी ने हिंदी, मराठी और अंग्रेजी में समान अधिकार से लिखा है। वे बहुभाषाविद् थे। भारत की बहुत सी भाषाएँ वे समझ और बोल लेते थे। अपने इस भाषाज्ञान का उपयोग उन्होंने हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए किया। दक्षिण भारत में हिंदी को आगे बढ़ाने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। उनकी प्रेरणा से बहुत से हिंदीतरभाषियों ने हिंदी में लेखन शुरू किया। भारतीय भाषाओं के लगभग सभी बड़े लेखकों से उनका व्यक्तिगत परिचय था। अपनी विदेश यात्राओं के क्रम में उन्होंने वहाँ भी अनेक लेखकों को अपना मित्र और सुहृद बनाया।

माचवेजी ने हिंदी साहित्य की लगभग हर विधा में लिखा है—कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, व्यंग्य, आलोचना, रेखाचित्र, यात्रा-वृत्तांत, संस्मरण, रिपोर्ताज, सभी में अपनी एक छाप छोड़ी है। उन्होंने शब्दकोश निर्माण का भी कार्य किया। राहुल सांकृत्यायन द्वारा संपादित ‘शासनकोश’ में प्रभाकर माचवे और विद्यानिवास मिश्र उनके सहयोगी रहे। हिंदी में उनके सोलह उपन्यास, सात कविता-संग्रह, इक्कीस समालोचनात्मक कृतियाँ, पाँच व्यंग्य संग्रह, दो यात्रा-वृत्तांत एक-एक कहानी-संग्रह, एकांकी-संग्रह और जीवनी तथा छह बाल कृतियाँ प्रकाशित हैं। अनूदित कृतियों की संख्या उन्नीस और संपादित कृतियाँ सोलह हैं।

मराठी में प्रकाशित कृतियों की संख्या तेरह और अंग्रेजी में प्रकाशित कृतियों की संख्या उन्नीस है। इसके अतिरिक्त पत्र-पत्रिकाओं में बिखरी रचनाओं की संख्या सैकड़ों में होगी, जिसे संकलित-संपादित कर प्रकाशित करने की आवश्यकता है। माचवेजी की प्रकाशित बहुत सी कृतियाँ अब अनुपलब्ध हैं। आवश्यकता है कि कोई प्रकाशन संस्थान आगे आए और उनकी रचनावली के प्रकाशन की योजना बनाए। निश्चय ही यह श्रमसाध्य कार्य है, लेकिन इसके प्रकाशन से एक महत्त्वपूर्ण कार्य संपादित होगा और साहित्य का एक पूरा दौर हमारे सामने होगा।

अज्ञेय ने अपने महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक कविता-संकलन ‘तारसप्तक’ में एक कवि के रूप में प्रभाकर माचवे को शामिल किया। इसमें शामिल अन्य कवि थे—मुक्तिबोध, नेमिचंद्र जैन, भारत भूषण अग्रवाल, गिरिजा कुमार माथुर, रामविलास शर्मा और अज्ञेय। ‘तारसप्तक’ १९४३ में कलकत्ता से छपा।

‘तारसप्तक’ के बाद १९५४ में ‘स्वप्नभंग’ संग्रह आया, जिसमें सौ सॉनेट संकलित थे। हिंदी में सॉनेट लिखनेवालों के वे पुरोधा थे। हिंदी में सॉनेट लिखने के लिए चर्चित त्रिलोचन शास्त्री ने तब लिखा था—‘मैंने इस रचना से सॉनेट शैली के बारे में बहुत कुछ जाना है। १९५९ में ‘अनुक्षण’ नामक संग्रह प्रकाशित हुआ, जिसमें पैंसठ कविताएँ संकलित थीं। इसमें कई तरह की कविताएँ हैं—गीत छोटी कविताएँ, लंबी कविताएँ, सॉनेट, षटपदी और दो गीति रूपक। इन कविताओं का गुण है—समाज से इनकी निकटता और इनकी सहज संप्रेषणीयता। इस संग्रह में माचवेजी की कविता के कई रंग उभरकर सामने आए हैं।’

प्रायः विदेश में लिखी गई कविताओं का संकलन है ‘मेपल’, जो १९६३ में प्रकाशित हुआ। इसमें १९५९ से १९६१ के बीच लिखी गई कविताएँ शामिल हैं। इसमें उनकी प्रयोगधर्मी कविताएँ हैं, जो विदेश में अलग-अलग जगहों पर लिखी गईं। ‘मेपल’ के प्रकाशन के एक लंबे अंतराल के बाद १९८८ में उनका खंडकाव्य ‘विश्वकर्मा’ प्रकाशित हुआ। इसकी समीक्षा करते हुए विष्णु प्रभाकर ने लिखा, ‘‘अपने खंडकाव्य ‘विश्वकर्मा’ में उन्होंने सूर्य के जिस सौम्य रूप को देखा है, वह आज के यंत्र युग से त्रस्त मनुष्य के लिए संजीवनी के समान है।...’’

माचवेजी ने अपने उपन्यासों में अभिनव प्रयोग किए। उन्होंने मनोविश्लेषणवादी लघु उपन्यास लिखे और अंतःप्रज्ञा प्रकृति और शैली का प्रयोग किया। १९५१ में उनका ‘परंतु’ उपन्यास आया, फिर ‘साँचा’ और ‘द्वाभा’। इनमें बराबर सामाजिक समस्याओं का चित्रण हुआ है। ‘तीस-चालीस-पचास’ पीढ़ियों के संघर्ष पर केंद्रित है। ‘जो’ उपन्यास में अमेरिका में नीग्रो सत्याग्रहियों के आंदोलन का जीवंत वर्णन है और हमारे देश की जातिवादी सोच पर प्रहार है। ‘दशभुजा’ में हम नारी विमर्श के एक रूप को देख सकते हैं। ‘लापता’, ‘कहाँ-से-कहाँ’, ‘किसलिए’ जैसे उपन्यासों में वे कुछ दार्शनिक सवालों से मुठभेड़ करते हैं। माचवेजी शुरू से प्रयोगधर्मी रहे और आलोचकों की चिंता किए बगैर विचारोत्तेजक लेखन करते रहे।

डॉ. कमल किशोर गोयनका ने माचवेजी की प्रतिनिधि रचनाओं का एक संचयन ‘प्रभाकर माचवे : प्रतिनिधि रचनाएँ’ संपादित किया था जो १९८४ में प्रकाशित हुआ। उसकी भूमिका में उन्होंने लिखा है कि ‘डॉ. प्रभाकर माचवे देश के ऐसे लेखकों में से हैं, जो हिंदी, मराठी तथा अंग्रेजी जैसी तीन श्रेष्ठ भाषाओं में पिछले पचास वर्षों से रचना करते आ रहे हैं, किंतु हिंदी तथा मराठी में एक ऐसा वर्ग है, जो उन्हें संदेह की दृष्टि से दे॒खता है और उन्हें साहित्यकार ही मानने को तैयार नहीं हैं। गोयनका का कहना है कि वे नवीनता प्रेमी हैं। शायद इसी कारण उन्होंने कविता, उपन्यास, व्यंग्य सभी में नए-नए प्रयोग किए हैं, चाहे वे सफल हुए हों या असफल। असफल होने के भय से नया प्रयोग करना ही नहीं चाहिए, ऐसी उनकी मान्यता नहीं है। वे नए नए प्रयोग करते हैं, इस आशा के साथ कि आनेवाला युग उनकी नई संवेदना एवं नए शिल्प को सही संदर्भों में रखकर समझ सकेगा। डॉ. गोयनका के शब्दों में, ‘‘हिंदी साहित्य को समृद्ध करनेवाले ऐसे साहित्यकार के प्रति यदि हम उपेक्षा भाव रखेंगे और उनका तर्कहीन मूल्यांकन करेंगे तो क्या हम कृतघ्न न कहलाएँगे? सीमाएँ सबकी होती हैं, माचवेजी की भी हैं, किंतु उपन्यास, कविता, व्यंग्य तथा आलोचना में उनके योगदान को रेखांकित न करना सरासर बेइनसाफी है।’’

मैं उस समय भारती भंडार, इलाहाबाद में साहित्यिक सलाहकार के रूप में कार्यरत था, जहाँ से माचवेजी की दो पुस्तकें प्रकाशनाधीन थीं। एक तो व्यंग्य-संग्रह ‘विसंगति’ और दूसरा लेखों का संग्रह ‘संगति’। विसंगति के हर लेख के साथ छोटे-छोटे रेखाचित्र हैं, जो माचवेजी के बनाए हुए हैं। मुझे याद है कि वे रेखाचित्र कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों पर बनाकर उन्होंने भेजे थे। कई तो पोस्टकार्ड पर भी। ‘विसंगति’ की भूमिका में माचवेजी का यह दुःख झलकता है कि पाठकों ने उनकी रचनाओं को गंभीरता से नहीं लिया, ‘‘(पर) मेरी शिकायत यही है कि अभी तक मेरी रचनाओं को गंभीरता से पढ़नेवाला ‘पाठक’ ही नहीं मिला।’’ फिर अपने चिरपरिचित चुहल और व्यंग्य भरे अंदाज में, ‘‘पाठक नाम के एक हमारे सहपाठी थे, सो तो कभी के रिटायर होकर स्वर्ग भी पहुँच चुके। अब जो बचे हैं, वे (उठा) पाठक ही अधिक हैं या ‘कीलोत्पाटी’ वानर की जात के पाठक। सुधी पाठक जानते होंगे कि हिंदी शब्द ‘ठग’ संस्कृत ‘ठक’ से बना है।’’

व्यंग्य के उनके अन्य संग्रह हैं, ‘खरगोश के सींग’, ‘बैरंग’, ‘तेल की पकोड़ियाँ’ और ‘खबरनामा’। व्यंग्य जीवन की विसंगतियों से उपजता है। माचवेजी ने इस संदर्भ में बड़ी गंभीर बात कही है—‘‘हमारे जीवन में बड़ी विसंगतियाँ रही हैं। शायद हर एक लेखक के जीवन में होती होगी। कई उन्हें चुपचाप पी जाते हैं। कुछ ‘साहित्यिक सन्निपात’ में उन्हें परिणत कर लेते हैं। जब मैं हिंदी साहित्य सम्मेलन के साथ १९४८ में राहुलजी के साथ ‘शासन’ शब्दकोश बना रहा था, तब शब्दों और अर्थों के साथ जूझते-जूझते ये विसंगतियाँ मन को और मथने लगीं। हम कहते क्या हैं, करते क्या हैं, शायद इसीलिए कहते हैं कि कर कुछ नहीं पाते या इसलिए कर बैठते हैं, चूँकि कह नहीं पाते।’’

व्यंग्य के उनके अन्य संग्रह हैं, ‘खरगोश के सींग’, ‘बैरंग’, ‘तेल की पकोड़ियाँ’ और ‘खबरनामा’। व्यंग्य जीवन की विसंगतियों से उपजता है। माचवेजी ने इस संदर्भ में बड़ी गंभीर बात कही है—‘‘हमारे जीवन में बड़ी विसंगतियाँ रही हैं। शायद हर एक लेखक के जीवन में होती होंगी। कई उन्हें चुपचाप पी जाते हैं। कुछ ‘साहित्यिक सन्निपात’ में उन्हें परिणत कर लेते हैं। जब मैं हिंदी साहित्य सम्मेलन के साथ १९४८ में राहुलजी के साथ ‘शासन’ शब्दकोश बना रहा था, तब शब्दों और अर्थों के साथ जूझते-जूझते ये विसंगतियाँ मन को और मथने लगीं। हम कहते क्या हैं, करते क्या हैं, शायद इसीलिए कहते हैं कि कर कुछ नहीं पाते या इसलिए कर बैठते हैं, चूँकि कह नहीं पाते।’’

 

माचवेजी का कार्यक्षेत्र इतना विविध है कि आश्चर्य होता है कि कोई व्यक्ति एक साथ इतने क्षेत्रों में कैसे सक्रिय रह सकता है। उनका एक रूप चित्रकार का भी है। बचपन से ही चित्र बनाने में उनकी रुचि रही है। जब वे क्रिश्चियन कॉलेज, इंदौर में पढ़ते थे, उस समय ‘आर्ट स्कूल’ के छात्र भी रहे, जहाँ उनके साथ बेंद्रे, एम.एफ. हुसैन और एम.एस. जोशी भी थे। आजीवन उनके हाथों में कलम और कूची रही। बचपन से ही वह पोर्टेट और स्केच रेखाओं, जल और तैल रंगों में बनाते रहे। उन्होंने हजारों रेखाचित्र बनाए होंगे। चित्रकला का प्रशिक्षण उन्होंने इंदौर स्कूल ऑफ आर्ट में देवलालीकरजी से लिया था। शब्दरेखा की भूमिका में उन्होंने लिखा है, ‘‘सन् उन्नीस सौ तीस और चालीस के बीच मैंने एक मालवी किसान (लाल पगड़ी और हरे बैक ग्राउंड वाले) पोर्टेट तैल रंगों में बनाया था। कैनेडियन मिशनरी प्रोफेसर ने उसे खरीदा। वह क्रिश्चियन कॉलेज, इंदौर के स्टाफरूम की दीवार पर वर्षों तक टँगा हुआ था। बाद में वह किसी कबाड़खाने में चला गया।’’

इसी प्रकार एक बूढ़े राजपूत का पोर्टेट उन्होंने बनाया था, जिसे उन्होंने यशपाल को भेंट किया था। ‘शब्दरेखा’ में कुछ बड़े आदमियों, लेखकों, कवियों, कलाकारों, समीक्षकों आदि के हस्ताक्षर सहित चित्र हैं, वह उनके विशाल संग्रह का एक छोटा-सा अंश है। इन रेखाचित्रों के साथ माचवेजी से कुछ इबारत भी लिखी है, इसीलिए वे इन्हें शब्दचित्र कहते हैं। माचवेजी के लेखन के विविध रूपों पर अलग-अलग शोध कार्य की जरूरत है। वे एकांकीकार हैं, यात्रा-वृत्तांत लेखक हैं, संस्मरण और जीवनी-लेखक हैं। आलोचक, निबंधकार और अनुवादक के रूप में हिंदी साहित्य को उनका महत्त्वपूर्ण अवदान है। बच्चों के लिए भी उन्होंने पर्याप्त लेखन किया है। एक बहुभाषाविद् के रूप में हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के मध्य वे एक दृढ़ सेतु हैं। हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के मध्य आदान-प्रदान को सुकर बनाने में भी उनकी अहम भूमिका रही।

माचवेजी राहुलजी की तरह बौद्ध दर्शन से प्रभावित रहे। अपने जीवन में वे निस्संग बने रहे। अपनी खिल्ली स्वयं उड़ाई और अपने लेखन को बहुत महत्त्व नहीं दिया। खुद ही उसे थोथा और अर्थहीन कहते रहे। सत्तर वर्ष के होने पर उन्होंने एक कविता लिखी ‘अपने मन से’, जो इस प्रकार है—

हुए प्रभाकर अब तुम सत्तर

मियाँ दुकान उठा लो अपनी

और समेटो कागज पत्तर।

बहुत अकेले लड़े पुकारा

अँधियारे को भी ललकारा

बहुत अँधेरा सिया सँभाला

तार-तार अब अस्तर।

जंगल में गाते-चिल्लाते

टूटे बहुत बने जो नाते

बहुत बहे ऊबड़-खाबड़ में

पत्थर रहते पत्थर।

नहीं जुटाए चेला-चाँटी

जो कि चलाते गुरु-परिपाटी

दो डग पीछे नीचे होते

एक कदम अग्रिम व वृहत्तर।

माचवेजी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।

—ब्रजेंद्र त्रिपाठी

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