आईना दिखलाऊँगा

: एक :

वो जो सबसे भिन्न है,

वो ही सबसे खिन्न है।

अंश है जो हर वही,

कैसे कह दूँ भिन्न है?

उनके हाथों जो बना,

उनके हाथों छिन्न है।

सच, सियासत आज की,

तक-धिना-धिन-धिन है।

कथ्य भी कुछ है उदास,

शिल्प भी कुछ खिन्न है।

: दो :

कब कहा आज-कल चाहिए,

जिसमें जी लूँ, वो पल चाहिए।

तुमने पौधा लगाया अभी,

और अभी तुमको फल चाहिए।

सड़ चुका है सरोवर का जल,

उनको खिलता कमल चाहिए।

पान अमृत का जब कर लिया,

कह रहा है गरल चाहिए।

दिल की मिट्टी करो खूब नम,

गर गजल की फसल चाहिए।

: तीन :

हमको जैसे गम मिले हैं,

दूसरों को कम मिले हैं।

तुम जिन्हें कहते हो सूरज,

चाँद से मद्धम मिले हैं।

किस भरम में जी रहे हो,

किसको दो आलम मिले हैं।

रंग और खुशबू से खाली,

हमको सब मौसम मिले हैं।

तुम नहीं तुम, हम नहीं हम,

इस तरह क्यों हम मिले हैं।

जिंदगी के इम्तिहाँ में,

हमको नंबर कम मिले हैं।

: चार :

किस-किसको समझाऊँगा,

मैं पागल हो जाऊँगा।

मैं न सफाई दूँगा कोई,

जहर भले पी जाऊँगा।

जितना मुझ में डूबोगे,

उतना मैं गहराऊँगा।

अंधों की बस्ती में किसे,

आईना दिखलाऊँगा।

ठीक रहेगा हाँ इतना,

इतना दुःख सह पाऊँगा।

कड़वा सच कहता हूँ मैं,

कैसे उनको भाऊँगा!

—धर्मेंद्र गुप्त ‘साहिल’

के-३/१० ए

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