एकाग्रता

दरअसल वर्षों से घर में लकड़ी-चूल्हे पर रोटियाँ पकती-सिंकती रही हैं। इसीलिए बाबूजी कई दिनों से अपनी धुन में कहीं खोए-खोए से रहते थे। और फिर एक दिन बुदबुदाए, ‘जब एक तारीख के लिए सबकुछ क्लियर-साफ हो चुका है तो उनको अब बेफिकर ही रहना चाहिए!’

...आज वह घड़ी भी आ चुकी थी, जिसका सभी को इंतजार था। लेकिन आज एक तारीख की वजह से चहुँओर मुर्दनी सी छाई रही।

‘‘हाँ-हाँ..., बाबूजी! अगले महीने देखेंगे। आप एक महीने की और प्रतीक्षा करें!’’ तुरंत अपने हाथों से खरीदी वस्तु को दिखलाते हुए वह मुख्तसर में प्रकट हुआ।

‘‘नहीं, बेटा! तुमने यह गलत किया है।’’ बाबूजी के स्वर में रोष था।

‘‘कतई गलत नहीं है, बाबूजी! यह हमारे वास्ते हद-बेहद जरूरी थी, सो...’’ लापरवाही में उसने उगला।

...बहरहाल, बाबूजी एक अंतर्द्वंद्व की पीड़ा से सहम से उठे। और फौरन पत्नी के समीप थोड़ा रुककर वे गेट के बाहर हो लिये। रफ्ता-रफ्ता चलते बाबूजी ने सोचा, ‘गैस-चूल्हा आज ही खरीदना है; किसी और दिन नहीं!’

सच में शाम तक घर में गैस-चूल्हा आ गया था और पुत्र के सिवाय घर भर में खुशियों से हर किसी की पलकें भीग आईं।

मगर एकाएक बाबूजी के डबडबाते नेत्र पत्नी के गले को बगैर मंगलसूत्र के निहारकर एक पल में बह गए, फिर भी बाबूजी शांत-शांत रहे।

आवासीय बँगला

सबकुछ ठीक सा चल रहा था। लेकिन एक रोज जाने क्यों उनके चेहरे की हवाइयाँ उड़ी-उड़ी सी दिखने लगी थीं। वस्तुतः कोर्ट के एक फरमान से उनकी चेतना हिल उठी; और कोर्ट के अनुसार जिन-जिन पूर्व मुख्यमंत्रियों ने अभी तक सरकारी बँगले खाली नहीं किए हैं, उनको राज्य सरकार यथाशीघ्र खाली करवाए!

सहसा उस राज्य के एक पूर्व मुख्यमंत्री क्षणमात्र उदासी से भीग उठे थे, और उन्होंने महसूसा, ‘पब्लिक में उनकी इमेज सदा की तरह आज भी बरकरार रहे, अतः उनके नाम एलॉट बँगले को वे खाली कर देंगे।’ मन-ही-मन एक दृढ़ निश्चय उनके भीतर उपजा, ‘जित्ता आर्थिक लाभ सरकारी बँगले से उनको मिलना था, उससे वे काफी खुश हैं!’

मगर थोड़ी देर में वे तसल्ली से बुदबुदाए, ‘उनके सरकारी बँगले में एक परिवार अरसे से एक किराएदार के रूप में मौजूद था, जिसे अब जल्द ही खाली करवाना होगा!’

—सत्य शुचि

साकेत नगर

ब्यावर-३०५९०१ (राजस्थान)

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