संकट-मोचक तीन व्यक्ति

मेरे बचपन का शहर रामेश्वरम एक छोटा सा टापू था। इसकी उच्चतम चोटी ‘गंधमादन पर्वतम्’ थी। इस चोटी पर चढ़कर आप सारे रामेश्वरम को देख सकते हैं, नारियल के हरे पत्तों को हर तरफ देख सकते हैं। इसी तरह से फैले हुए समुद्र को दूर-दूर तक देखा जा सकता है। रामनाथ स्वामी मंदिर का गोपुरम् आकाश की ऊँचाइयों को छूता है। यहाँ रहनेवाले लोगों की कमाई का साधन नारियल की खेती, मछली व्यापार तथा पर्यटन है। यह स्थान इस पवित्र तीर्थ-स्थल के कारण प्रसिद्ध हुआ था। रामेश्वरम का पवित्र पर्यटन स्थल भारत का विख्यात धार्मिक पर्यटन स्थल है, जो हर समय दर्शनार्थियों से भरा रहता है।

इस छोटे से शहर में मुख्यतः हिंदुओं के घर थे। कहीं-कहीं हमारे जैसे मुसलिम परिवार भी थे। इसके साथ ही कुछ ईसाई परिवार भी रहते थे। हर समुदाय यहाँ शांतिमय वातावरण में रहता था। हम सब सौहार्दपूर्ण व शांतिपूर्ण माहौल में जीते थे तथा एक-दूसरे की सहायता के लिए हर समय तैयार रहते थे। भेदभाव व नफरत की आग दुनिया में फैली थी, लेकिन अभी यहाँ तक नहीं पहुँची थी। हर रोज अखबारों में जात-पाँत के झगड़ों की खबरें सुनने में आती थीं; परंतु यहाँ के लोग शांतिपूर्ण माहौल में आराम से जिंदगी गुजारते थे।

शांति का यह वातावरण इस शहर में कई वर्षों से इसी तरह से बना हुआ था। मेरे पिता प्यार से हमारे पूर्वजों—हमारे दादाजी के दादाजी की कहानी सुनाते थे, जिन्होंने एक बार रामनाथ स्वामी मंदिर की मुख्य मूर्ति बचाई थी। एक प्रमुख त्योहार में भगवान् की मूर्ति को गर्भगृह से एक जुलूस के साथ मंदिर के परिसर में ले जाया गया था। एक बार इस समारोह के दौरान लगातार घटित होनेवाली घटनाओं के चलते न जाने कब वह मूर्ति एक टैंक में गिर गई, जिसके बारे में किसी को भी पता नहीं चला। लोगों को जब यह पता चला तब वे आनेवाली विपत्ति के संकेत से भयभीत हो गए थे; किंतु उस भीड़ के बीच एक आदमी ने अपना धीरज नहीं खोया और सतर्कता के साथ उस पानी के टैंक में छलाँग लगाकर उस मूर्ति को कुछ ही देर में निकाल लिया था। वे मेरे दादाजी के दादाजी थे। अब वहाँ उपस्थित लोगों की खुशी की कोई सीमा नहीं थी। मंदिर के पुजारी प्रसन्नतापूर्वक उन्हें धन्यवाद दे रहे थे। हालाँकि वे जानते थे कि वे मुसलिम थे, परंतु किसी के मन में वह भावना नहीं आई। जात-पाँत को माननेवाले धर्म के कट्टर अनुयायी इस घटना को नफरत की दृष्टि से देखते कि कैसे एक गैर-हिंदू ने भगवान् की मूर्ति को छुआ! लेकिन वहाँ मौजूद किसी भी व्यक्ति के मन में यह भावना नहीं जागी थी।

मेरे दादाजी के दादाजी को एक हीरो की तरह ख्याति मिली थी। उसके बाद वहाँ यह घोषणा की गई कि हर त्योहार में मंदिर की तरफ से उन्हें सम्मानित किया जाएगा और उन्हें ‘मुदल मरायादाई’ का आदर दिया जाएगा। यह एक अद्वितीय सम्मान था, जो मंदिर की तरफ से दूसरे धर्म के माननेवाले को दिया जाता था। यह ‘मरायादाई’ कई बरसों तक चलती रही। किसी भी त्योहार से पहले हमारे दादाजी के दादाजी को सम्मानित किया जाता था। उन्हें ‘मरायादाई सम्मान’ वर्षों तक दिया जाता रहा। यह सम्मान सदियों तक चलता रहा। इसके बाद हमारे पूर्वजों को सम्मानित किया जाने लगा। वर्षों तक यह सिलसिला चलता रहा। हमारे पिताजी को भी ‘मरायादाई सम्मान’ दिया जाता था।

सौहार्द व सद्भावना का यह भाव बाद के वर्षों में भी बना रहा। जैसाकि मैंने अपने दूसरे अध्यायों में लिखा है कि मेरे पिताजी ‘फेरी’ के व्यापार से जुड़े हुए थे। वे तीर्थयात्रियों को धनुषकोडि तक लेकर जाते थे। हमारी ‘फेरी’ की सेवा मंदिर के साथ भी जुड़ी हुई थी।

मेरे पिताजी रामेश्वरम मसजिद में इमाम थे। वे एक श्रद्धालु व्यक्ति थे और उनकी आस्था पूर्णतः ‘कुरान’ में थी। उन्होंने अपने बच्चों तथा अपने परिवारवालों को भी एक अच्छे मुसलिम के रस्मो-रिवाज तथा संस्कार दिए थे। इस शहर के निवासियों के लिए वे एक मनोचिकित्सक तथा सफल गाइड भी थे। अधिकतर लोग अपनी विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए उनके पास आते थे, भले ही वह आध्यात्मिक व अन्य विषयों से जुड़ी हुई हो।

मेरे पिता के अच्छे मित्र रामनाथ स्वामी मंदिर के पुरोहित पक्षी लक्ष्मण शास्त्री थे। वे न केवल एक पुजारी थे, बल्कि उन्हें वेदों का अच्छा ज्ञान था और एक शिक्षित व्यक्ति थे। मैं आज भी उनकी छवि को नहीं भूल सकता हूँ। वे पारंपरिक पुजारी की वेशभूषा में रहते थे। उन्हें धोती तथा अंगवस्त्रम् के साथ देखा जा सकता था। उनके सिर पर चोटी होती थी, जिसे ‘कुदुमी’ कहा जाता है। मेरी जानकारी के अनुसार, वे एक सज्जन व दयावान् व्यक्ति थे।

इनके अलावा हमारे छोटे शहर में रहनेवाले तीसरे व्यक्ति फादर बोदल शहर की चर्च के पादरी थे। वे आध्यात्मिक रूप से महान् थे तथा उनका उस शहर में उच्च स्थान था। वे हमेशा चर्च में आनेवालों के हित के बारे में सोचते थे तथा उन सबकी भलाई के लिए कार्य करते थे। वे मेरे पिता और पक्षी लक्ष्मण शास्त्री की तरह हमेशा शहर की भलाई के लिए सोचते रहते थे तथा शहर की शांति व सद्भाव के लिए निरंतर तत्पर रहते थे।

उन तीनों की छवि मेरी यादों में अभी भी विद्यमान है। मैं आज भी उन्हें उसी रूप में देखता हूँ—एक, अपनी पगड़ी व इमाम के लंबे अँगरखे में, दूसरा धोती में तथा तीसरा अपने गाउन में नजर आता था। तीनों ही हर शुक्रवार को शाम ४:३० बजे आपस में मिलते थे तथा धर्म पर चर्चा करते थे। इसके अलावा शहर की महत्त्वपूर्ण समस्याओं तथा घटनाओं की जानकारी लेते थे। कई बार इस शहर के लोग उनके पास अपनी व शहर की समस्याओं को लेकर आते थे, जिन्हें तीनों ही सुलझाने की कोशिश करते थे। वे अपने शहर में फैलनेवाली किसी भी आशंका व अफवाह को अपनी समझदारी से दूर करते थे। जब तक हालात काबू से बाहर हो जाएँ, उन्हें जल्द ही दूर करने की कोशिश करते थे। इस शहर की मौलिक आवश्यकता शांति का वातावरण था, जिसे सार्थक बातचीत व समझदारी से दूर किया जाता था। उनकी चर्चा का विषय देश में स्वतंत्रता आंदोलन का रूप था। इसके अलावा ब्रिटिश सरकार का इस आंदोलन पर राजनीतिक रुख और उससे हमारे समुदाय पर पड़नेवाले प्रभाव पर व्यापक रूप से विचार किया जाता, जिससे इस शहर में शांति का माहौल बना रहता था। इस समुदाय को कुछ इस तरह से सींचा गया था कि शहर में खुशनुमा माहौल बना रहे तथा हर कोई अपनी समस्या व विचारों को इकट्ठा मिलकर बाँट सके।

मेरे बचपन की एक घटना ने इस भावना को हमारे करीब रखा था। मैं उस समय ८ वर्ष का था और तीसरी कक्षा में पढ़ता था। मेरी दोस्ती रामनाथन शास्त्री, अरविंदन तथा शिवप्रकाशन से थी। वे तीनों ही ब्राह्मण थे। रामनाथन शास्त्री लक्ष्मण शास्त्री का पुत्र था। हम सब मिलकर आदर्श सहपाठियों की तरह व्यवहार करते थे। हम मिल-जुलकर कक्षा व कक्षा के बाहर समय व्यतीत करते थे। अच्छे दोस्तों की तरह हमारा दिन एक-दूसरे के बिना अधूरा ही रहता था। अगर कोई साथी किसी कारण से विद्यालय न आए तो हम उसके लिए चिंतित रहते थे। हम सब एक साथ ही बैठते थे, एक-दूसरे के साथ अपने विचार बाँटते थे। रामनाथन और मैं एक ही बेंच पर बैठते थे।

इससे पहले कि मैं इस कहानी को आगे बढ़ाऊँ, मैं आप सबको इस स्कूल की स्थिति के बारे में बताना चाहता हूँ, जहाँ मेरे बचपन की सुखद यादें व शरारतें जुड़ी हुई हैं। इस स्कूल का नाम रामेश्वरम पंचायत प्राइमरी स्कूल’ था। मैंने यहाँ सन् १९३६ से १९४४ तक शिक्षा प्राप्त की थी। यह समुद्र के किनारे स्थित था, जो बहुत मजबूत बिल्ंिडग नहीं थी। इस स्कूल का कुछ हिस्सा ईंटों से निर्मित था, लेकिन छत छप्पर की बनी हुई थी। यह शहर का इकलौता स्कूल था, जहाँ शहर के बच्चे पढ़ते थे। हम लगभग ४०० लड़के व लड़कियाँ इस स्कूल में पढ़ते थे। यकीनन हमारे स्कूल में कई सुविधाएँ नहीं थीं, न ही इस स्कूल की बिल्डिंग ही बहुत अच्छी स्थिति में थी; फिर भी, यह स्कूल हम सबके लिए आकर्षण का केंद्र था, जिससे हम सब जुड़े हुए थे। इस स्कूल के अध्यापक, विशेषतः इतिहास, भूगोल व विज्ञान विषयों को पढ़ानेवाले, विद्यार्थियों के प्रिय थे। क्यों? क्योंकि वे बच्चों को प्रेमपूर्ण ढंग से पढ़ाते थे तथा आश्वस्त रहते थे, ताकि इस स्कूल के सभी बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके। सभी ५५ बच्चों को एक जैसी शिक्षा देना तथा सबके साथ एक जैसा व्यवहार करना कोई आसान काम नहीं था। वे सिर्फ हमें अच्छे अंक लेने के लिए ही प्रेरित नहीं करते थे, बल्कि इस बात का भी ध्यान रखते थे कि सभी विद्यार्थियों में इन विषयों के प्रति रुचि व अनुराग बना रहे। हम अपने अध्यापकों में सच्चाई व ईमानदारी का भाव देखते थे।

अगर एक दिन भी कोई विद्यार्थी स्कूल न आए तो अध्यापक इसकी चिंता करते थे तथा घर जाकर उसकी अनुपस्थिति का कारण पूछते थे। अगर हममें से किसी भी विद्यार्थी के अच्छे अंक आते थे तो अध्यापक उसके घर जाकर अभिभावकों को बधाई देते थे। हमारा स्कूल हम सबके लिए रुचिकर तथा आनंददायक स्थान था। हम सभी विद्यार्थियों ने उस स्कूल से पढ़ाई आरंभ की, किसी ने भी बीच में स्कूल नहीं छोड़ा तथा आठवीं कक्षा तक उस स्कूल में पढ़ाई की। मुझे याद नहीं कि किसी भी विद्यार्थी ने बीच में स्कूल छोड़ा हो। आज जब मैं विभिन्न स्कूलों में जाता हूँ, निश्चित रूप से सोचता हँू कि स्कूल का बड़ा या छोटा होना मायने नहीं रखता। स्कूल की सुविधाओं व विज्ञापनों का अधिक असर नहीं पड़ता, इन सबका स्कूल की शिक्षा के स्तर पर कोई असर नहीं पड़ता। इसका असर देखा जा सकता है कि स्कूल में शिक्षा देनेवाले अध्यापकों के क्या गुण हैं तथा उनका शिक्षा प्रदान करने का क्या स्तर है।

अब मैं अपनी कथा पर आता हूँ। उस समय छोटे स्कूलों, जैसा कि हमारा स्कूल था, में कोई यूनिफॉर्म या वरदी नहीं होती थी। विद्यार्थी इस बात के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र थे कि वे कैसी भी ड्रेस पहनकर स्कूल आ सकें। इसलिए हम अपने धर्म के अनुसार ही कपड़े पहनकर आते थे। मेरा मित्र रामनाथन अपनी चोटी के साथ स्कूल में आता था, जैसे कि उसके पिताजी कुदुमी के साथ ही बाहर निकलते थे (बाद में मेरा यह मित्र अपने पिता की तरह ही मंदिर का पुरोहित बन गया था)। मैं भी स्कूल में मुसलिम लड़कों की तरह बुनी हुई गोल टोपी पहनकर जाता था। हममें से कोई भी अपने कपड़ों के बारे में अपने विचार नहीं बताता था और न ही कोई इसकी परवाह करता था।

जब हम तीसरी कक्षा में थे, हम सबकी जिंदगी में एक अनोखी घटना घटी। हमारे स्कूल में एक नए अध्यापक पढ़ाने के लिए आए। हम सब बच्चों के लिए यह एक नया हैरान करनेवाला विषय था, जिस पर चर्चा होती थी। हम बच्चे नहीं जानते थे कि आगंतुक अध्यापक का स्वभाव कैसा होगा! क्या वह सख्त स्वभाव का होगा या उसका रवैया नरम होगा? क्या वह अधिक गुस्सा करनेवाला होगा या शांत भाव का होगा? हमने उनसे पढ़ना आरंभ नहीं किया था। जब वह पहली बार क्लास में दाखिल हुए, हमारे सपने बिखर चुके थे।

वह अध्यापक एक हिंदू ब्राह्मण था। उसने कक्षा में दाखिल होते ही हम सब की तरफ अचंभे से देखा तथा कुछ बच्चों को हैरानी से देखा। मैं आज सोचता हूँ कि उन्होंने बच्चों की आँखों की चमक तथा उनकी भोली-भाली मुसकानों को नहीं देखा था, जो आनेवाले का स्वागत अपनी अनजान मुसकान से करते हैं। लेकिन हमारे अध्यापक ने इन सबकी परवाह न करते हुए अपना काम आरंभ कर दिया। वह कक्षा के आगे खड़े हो गए तथा उनकी नजर सबसे पहले मुझ पर तथा रामनाथन पर पड़ी थी। हम दोनों ही कक्षा में आकर्षण के केंद्र थे तथा दाईं पंक्ति में सबसे आगे की बेंच पर बैठते थे। उनकी नजर में गुस्से व बेचैनी के भाव नजर आ रहे थे। उनकी नजर मेरी टोपी तथा रामनाथन के बालों के गुच्छे पर जाकर थम गई थी। उनकी नजर में गुस्से, बेचैनी के भाव साफ नजर आ रहे थे। बिना कोई कारण बताए उन्होंने मेरा नाम जानना चाहा। जब मैंने उन्हें अपना नाम बताया तो मुझे आदेश मिला कि मैं जल्दी से अपनी सभी वस्तुओं को इकट्ठा करके सबसे पीछे की पंक्ति में जाकर बैठ जाऊँ, जिसका कारण वह खुद ही जानते थे।

मैं अपने को बहुत दुखी व पीड़ित महसूस कर रहा था। मुझे इस हुक्म का कारण मालूम नहीं था। रामनाथन भी आँसुओं में डूबा हुआ था। जब मैं अपनी पुस्तकें उठाकर पीछे की सीट पर बैठने गया, मेरी यादों में अभी भी वे आँसू आ रहे थे, जो कि रामनाथन की आँखों से निरंतर बह रहे थे।

हममें से कोई भी इस घटना पर शांत नहीं रह सकता था। उस दिन मैंने अपने पिताजी को सारी घटना की जानकारी दी। इसी तरह से रामनाथन ने भी अपने पिताजी को सबकुछ बता दिया। वे दोनों ही यह जानकर हैरान-परेशान हो गए। यह सब उनकी उम्मीद तथा प्रयासों के विपरीत था, जिसके लिए वे काम कर रहे थे। एक अध्यापक, जिसका काम विद्यार्थियों को ज्ञान देना तथा उनके दिमाग को विकसित करना है, वह कैसे इस भावना से विपरीत कार्य कर रहा था? हमने कभी उन सुलझे हुए इनसानों को इस तरह परेशान तथा गुस्से में नहीं देखा था। इन दोनों ने आपस में विचार-विमर्श किया तथा इस घटना की पूरी जानकारी ली।

अगले शुक्रवार शाम के समय वे हर सप्ताह की मुलाकातों की तरह एकत्र हुए। बोदल भी उस बैठक में शामिल हुए। उस अध्यापक को भी वहाँ उपस्थित होने के लिए कहा गया। दिन ढलने के बाद रात का पहर आ गया और हर तरफ अँधेरा छा चुका था। मेरे पिताजी तथा शास्त्रीजी ने देश में बढ़ते जात-पाँत के भाव का जिक्र किया, जिससे देश के कई भाग प्रभावित हो चुके थे। लेकिन इस आग को वे अपने शहर में नहीं देखना चाहते थे। वे नहीं चाहते थे कि बच्चों में जात-पाँत के नाम पर विभाजन किया जाए। वे इस छोटे से शहर में इस नफरत की आग को बरदाश्त नहीं करेंगे। धर्म के नाम पर समाज को तोड़ा न जाए, अपितु धर्म के सद्भावपूर्वक समाज को जोड़ा जाए। वे नहीं चाहते थे कि बच्चों के दिमाग में नफरत के बीज बोए जाएँ।

यह संदेश उस अध्यापक को ससम्मान तथा सद्भाव से दिया गया। उससे पूछा गया कि क्या वह अपने को ज्ञान व शिक्षा का स्रोत मानेंगे, जिससे इस देश की बुनियाद मजबूत बन सकेगी? हमारे अध्यापक महोदय चुपचाप शांत भाव से वह सबकुछ सुनते रहे तथा सोचते रहे। इसके बाद उन्होंने कहा, ‘‘मैं नहीं जानता था कि मेरे द्वारा दो बच्चों को अलग करने का इतना व्यापक परिणाम हो सकता है! मैं अपने इर्द-गिर्द कुछ ऐसा ही देख रहा था तथा उसके अनुसार यह समाज इसी बुनियाद पर चल रहा है तथा मैंने भी उन्हीं नियमों को स्वीकार किया है। इससे पहले मुझे किसी और ने नहीं सिखाया था कि यह विभाजन समाज के लिए कितना हानिकारक हो सकता है!’’ उन्होंने अपनी गलती को सुधारने का वचन दिया और सुबह अपनी गलती को सुधार लिया।

यह मेरा पहला अनुभव था कि किस तरह से धार्मिक लोग मिलकर तथा दृढ़ता से किसी समस्या को सुलझा सकते हैं। उन्होंने मिलकर समस्या को बिलकुल समाप्त कर दिया। उन्होंने इस समस्या को धीरे-धीरे पनपने नहीं दिया और घाव को बढ़ने नहीं दिया। इस भाव ने मुझे बाद में समस्याओं को अच्छे प्रबंधन से सुलझाने का संदेश दिया।

यह एक सोच थी, जिसकी झलक मेरे जीवन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन लाई। हमारे अंदर का दृढ़ विश्वास तथा हमारे अंदर के विचार हैं, जो हमारे कार्यों को प्रभावित करते हैं। बाहर की ताकतें, दूसरों की सलाह तथा प्रलोभन आदि इसके बाद अपना प्रभाव रखते हैं; लेकिन हममें से जो सच्चाई व दृढ़ता के साथ अडिग रहते हैं, उन्हें निश्चित रूप से शांति का वातावरण मिलता है। हमारे देश में ऐसे नागरिकों की आवश्यकता है, जो अपने व्यक्तित्व पर विश्वास करें और भटकानेवाले विवादों से दूर ही रहें।

अगर मेरे धर्म की बात की जाए तो निश्चित रूप से मेरे भाग्य ने मुझे विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में पहुँचाया था, उसकी बुनियाद रामेश्वरम से ही बनी थी। मैं हमेशा से ही विज्ञान में विश्वास करनेवाला था, लेकिन इसके साथ ही मेरा आध्यात्मिक विश्वास था, जो कि युवा अवस्था में स्थापित हो चुका था। यह मेरे साथ ही चल रहा था। मेरे मन में ईश्वर के बारे में विभिन्न मत थे। मैंने विभिन्न धर्मों की धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन किया था। मुझे ज्ञान की प्राप्ति ‘कुरान’, ‘गीता’ तथा ‘बाइबिल’ द्वारा ही मिली थी। इनके मिलाप से ही मेरे जीवन व संस्कारों का मिलाप मुझे अपनी जन्मभूमि से मिला था और इस शहर के अनूठे संस्कारों ने मेरा पूर्ण विकास किया। अगर मुझसे कोई एक सच्चे मुसलिम के गुणों के बारे में पूछे तो मैं निश्चित रूप से अपने पिता, शास्त्रीजी तथा फादर बोदल का जिक्र करूँगा, जिनके साथ मैं बड़ा हुआ था, या ऐसे ही कुछ और व्यक्तित्व, जो मेरी जिंदगी में आए थे और जिन्होंने हमारे देश के नैतिक मूल्यों व धर्म की नींव को मजबूत किया था। उन्होंने एक ऐसे देश का विकास किया, जहाँ विभिन्न धर्मों तथा विभिन्न मतों का विकास हुआ तथा हर किसी को अपना उचित स्थान मिल सका। निश्चित रूप से हम विभिन्न समस्याओं तथा मतों को देखते हैं, परंतु आनेवाली पीढ़ी अगर मेरे पूर्वजों, इमाम तथा रामेश्वरम के पुरोहित की कथाओं को याद करे, जो कि सदियों पुरानी थीं, तो उन्हें जीने का नया ढंग मिलेगा तथा हम एक धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र बनाए रखेंगे।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
(‘डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम मेरी जीवन-यात्रा’ पुस्तक से साभार)

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