प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रचंड बहुमत : जनता का बहुमत

सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव परिणाम अब देश के सामने हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रचंड बहुमत से जीत के कारण विपक्षी दल हतप्रभ हैं, हतोत्साहित हैं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व एवं अध्यक्ष अमित शाह के प्रयासों से भाजपा ने ३०३ सीटों पर विजय प्राप्त की है, उसका वोट प्रतिशत भी बढ़ा है। सहयोगी दलों को साथ लेकर राष्ट्रीय प्रजातंत्रात्मक संगठन (एन.डी.ए.) को ३५० से ऊपर सीटें मिली हैं। एन.डी.ए. का जो दावा था कि वह २०१४ के मुकाबले और अधिक सीटों पर विजयी होकर पुनः सत्ता में आएगी, वह सही साबित हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी जीत के विषय में इतने आश्वस्त थे कि उन्होंने सभी मंत्रालयों को आदेश दे दिए थे कि वे नई सरकार के १०० दिनों का कार्यक्रम तैयार करें। उधर विपक्षी दल भी बड़े उत्साहित थे, विशेषतया गुजरात और कर्नाटक के चुनावों के बाद कि वे अपने ‘मोदी हटाओ’ कार्यक्रम में पूर्णतया सफल होंगे। पहले वे चाहते थे कि सब दलों का एक महागठबंधन नरेंद्र मोदी सरकार के विरुद्ध बनाया जाए, ताकि एकजुट होकर उनको अपदस्थ किया जा सके। पहले तो यह कठिनाई आई कि तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी, तेलगूदेशम के अध्यक्ष और तेलंगाना के मुख्यमंत्री राव एक ऐसा फेडरल फ्रंट बनाने के पक्षधर थे, जो कांग्रेस और भाजपा दोनों से अपनी दूरी बनाए रखे। दूसरी ओर कुछ विपक्षी दल थे, जो चाहते थे कि चुनाव के पहले ही महागठबंधन बना लिया जाए और नरेंद्र मोदी के विरुद्ध किसको अगले प्रधानमंत्री पद के लिए जनता के सामने रखा जाए, प्रोजेक्ट किया जाए। यहाँ अनेक समस्याएँ सामने आईं। तेलगूदेशम के अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडू इस महागठबंधन को बनाने की मुहिम के नेता थे। पिछले दिनों अपने राज्य के कामकाज को छोड़कर देश के विभिन्न राज्यों में उनके दौरे हो रहे थे, मात्र अन्य क्षेत्रीय दलों को समझाने और मनाने के लिए। आप के अलावा अन्य दलों को वे राजी न कर सके। कारण था कि प्रधानमंत्री की गद्दी के अनेक दावेदार थे—तृणमूल की ममता बनर्जी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, बहुजन पार्टी की अध्यक्षा मायावती और राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष शरद पवार। सी.पी.आई. और सी.पी.एम. ने अपने पत्ते नहीं खोले और जोर देते रहे कि पहले एकसाथ चुनावी समर जीता जाना चाहिए।

कांग्रेस जो सबसे पुरानी पार्टी है और जिसका देशव्यापी होने का दावा था, वह चाहती थी कि राहुल गांधी के नेतृत्व में ही सब दल मिलकर लडे़ं। यहाँ परिवार की प्रतिष्ठा का मामला भी जुड़ा था। राहुल गांधी का तो प्रधानमंत्री बनने का पैदाइशी हक है, ऐसा कांगे्रस का मानना था। यह न तो ममता को मंजूर था और न मायावती को। दोनों ही समय-समय पर प्रधानमंत्री के पद की अपनी दावेदारी का स्मरण कराते रहते थे। कांशीराम मायावती को राजनीति में लाए ही इसी उद्देश्य से थे। २०१४ के चुनाव में बहुजन पार्टी का सफाया हो गया था। मायावती और उनकी पार्टी का अस्तित्व भी संकट में था। उनके शाही और अधिनायकवादी व्यवहार से पार्टी के अनेक नेता या तो उन्होंने निकाल दिए थे या वे स्वयं अलग हो गए तथा बहुत से दूसरे दलों में चले गए। फिर भी मायावती की महत्त्वाकांक्षा बरकरार थी। अपने भतीजे को बहुजन पार्टी में स्थान देने के कारण भी काफी असंतोष पैदा हो गया था। ममता बनर्जी सी.पी.एम. को दो बार हराकर किसी और को अपना नेता मानने को तैयार नहीं थीं। पश्चिम बंगाल में उनका एकच्छत्र राज था। हालाँकि वहाँ भी तृणममूल में फूट पड़ चुकी थी। ममता बनर्जी के अपने भतीजे को राजनीति में लाने और महत्त्वपूर्ण पद देने के कारण पार्टी में बिखराव के बीज उगने लगे। कई पदाधिकारी घोटालों में शामिल होने के कारण तृणमूल कांग्रेस को धक्का लगा। उधर साधारण जनता भी परेशान थी, क्योंकि वह कोई भी काम करना, चाहे अपने घर की मरम्मत हो या नया मकान बनाना हो, स्थानीय तृणमूल के सिंडीकेट को पैसे देने पड़ते थे, इजाजत लेनी होती थी। स्वच्छ प्रशासन की जगह लफंगों का बोलबाला था और पुलिस इसकी अनेदखी करती थी। कोलकाता में जो एक बड़ा पुल बन रहा था, वह टूट गया। कुछ जाने गईं। ठेकेदार ने खराब माल लगाया था, क्योंकि उसने सामान वहीं से खरीदा, जहाँ से सिंडीकेट ने खरीदने के आदेश दिए। अपनी किसी प्रकार की आलोचना के प्रति असहनीय होने के कारण बंगाल के प्रबुद्ध मध्यम वर्ग के लोग भी अंदर-ही-अंदर ममता से नाराज हो रहे थे। इस सबके होते हुए भी पश्चिम बंगाल में उनका दबदबा था। ममता बनर्जी अपने को प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे बेहतर दावेदार समझती थीं। शरद पवार तो पिछले तीस-पैंतीस साल से प्रधानमंत्री के पद के लिए लालायित रहे हैं, पर हर बार वे गच्चा खाते गए, चाहे जब वे कांग्रेस में थे तब या जब अपनी अलग पार्टी बना ली। वही हाल समाजवादी पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव का रहा। उन्हें चुनाव के अवसर पर आशा की किरण दिखाई पड़ी, पर सदैव कौड़ी उलटी पड़ी। पुत्र अखिलेश यादव ने भले ही अध्यक्ष पद से पिता को वंचित कर दिया है, पर उन्हें प्रधानमंत्री बनना चाहिए, यह लालसा तो थी ही। जहाँ तक कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का प्रधानमंत्री बनने का दावा रहा, मुलायम सिंह, शरद पवार आदि ने कभी उनकी परिपक्वता में अपने संदेह को छिपाया नहीं। आखिर में सभी को कहना पड़ा कि चुनाव के नतीजों के आधार पर ही तय होगा कि प्रस्तावित महागठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा और कौन प्रधानमंत्री बनेगा। असल में हुआ यह कि तालाब खुदा नहीं था और मगरमच्छ पहले से ही आ बैठे थे।

देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी और आज की सबसे बड़े विरोधी दल कांग्रेस की अजीब स्थिति हो गई है। वैसे आज की कांग्रेस को १९४७ के पहले से जोड़ना गलत है। आज की कांग्रेस का तो वास्तव में आजादकाल के उपरांत ही जन्म हुआ। पुरानी कांग्रेस तो तभी समाप्त हो गई, जब वह दो धड़ों में बँट गई थी। चुनाव की करारी हार से पस्त और त्रस्त कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने इस्तीफे की घोषणा की, पर कमेटी ने उनके इस्तीफे को नामंजूर कर दिया। राहुल गांधी स्वयं अपने पुश्तैनी गढ़ अमेठी में चुनाव हार गए। इस प्रकार की आशंका उन्हें पहले से थी, अतएव केरल में वायनाड, जो कांग्रेस की पक्की सीट मानी जाती है, वहाँ के प्रत्याशी बने और विजयी हुए। कार्यकारिणी की बैठक में राहुल ने यहाँ तक कह दिया कि चिदंबरम अपने बेटे की टिकट के लिए अड़े रहे और न मिलने पर पार्टी छोड़ देने की भी धमकी दी। यही हाल रहा राजस्थान का, जहाँ असेंबली के चुनाव में कुछ दिनों पहले कांग्रेस जीती थी और अशोक गहलौत मुख्यमंत्री बने। गहलौत भी अड़े रहे कि उनके अपने लोकसभा क्षेत्र से उनके बेटे वैभव गहलौत को टिकट दिया जाए। उनकी जिद पर टिकट मिला, पर पुत्र करीब तीन लाख मतों से हारा। राजस्थान में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली। ऐसे ही हालात मध्य प्रदेश में रहे। अपने पुराने चुनावी क्षेत्र से कमलनाथ, जो मुख्यमंत्री हो गए थे, अपने बेटे के दावे के समर्थन में रहे, वह तो जीत गया, पर बाकी का सफाया हो गया। राहुल के कहने का मतलब शायद यही था, खासकर बड़े नेता अपने स्वार्थ साधन में लगे रहे, पार्टी के हित में नहीं।

हालाँकि बताया जाता है कि कांग्रेस कार्यकारिणी समिति में चिदंबरम अत्यंत भावुक हो गए, उन्होंने कहा कि यदि राहुल ने इस्तीफा दिया तो तमिलनाडु में बहुत से समर्थक दुखी होकर आत्मघात कर लेंगे। किंतु राहुल गांधी अपने इस्तीफे की जिद पर कायम रहे। सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा भी उनको इस्तीफा वापस लेने के लिए राजी नहीं कर सकीं। कुछ दिनों तक राहुल कांग्रेस नेताओं से मिले भी नहीं, जो इस्तीफा न देने की वकालत कर रहे थे। फिर कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक हुई। राहुल गांधी सबकी मनौती, चिरौरी के बाद भी अपने फैसले से टस-से-मस नहीं हुए। बैठक में कांग्रेस संसदीय दल की नेता तो सोनिया गांधी पुनः चुनी गईं, किंतु लोकसभा में कांग्रेस दल का नेता कौन होगा, यह अभी तक अनिश्चित है। पता लगा है कि राहुल गांधी विदेश चले गए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पार्टी असमंजस में है। राज्य स्तर पर नेतृत्वहीन होने के कारण कार्यकर्ताओं में हताशा है। कई राज्यों में संगठन की हालत बेहद खस्ता है। उत्तर प्रदेश, जो कभी कांग्रेस का गढ़ था, में संगठन नाम का ही है। आपसी वैमनस्य और फुटौवल के कारण राज्यों के संगठन तितर-बितर हो रहे हैं। नेतृत्व की प्रतिद्वंद्विता अभी भी जारी है। मध्य प्रदेश में सिंधिया और कमलनाथ ने, हालाँकि सिंधिया लोकसभा चुनाव में गुना से बुरी तरह परोजित हुए, ‘महाराज’ होने का दबदबा निष्फल रहा। राजस्थान में गहलौत और सचिन पायलट की प्रतिद्वंद्विता बहुत मुखर है। गहलौत ने प्रदेश अध्यक्ष और अपने उपमुख्यमंत्री पर ही अपने पुत्र की हार का ठीकरा फोड़ दिया।

पंजाब, केरल तथा तमिलनाडु में, खासकर डी.एम.के. की सहायता से कांग्रेस का चुनावी खेल संतोषजनक रहा। पर इन राज्यों में भी कांग्रेस में काफी आंतरिक मतभेद और वैमनस्य है। पंजाब में अमरेंद्र सिंह कद्दावर नेता हैं, किंतु नवजोत सिंह सिद्धू अपनी डींगअलग हाँक रहे हैं। उनकी बीबी को, जो चंडीगढ़ सीट का टिकट माँग रही थी, नहीं मिली, उनका कहना है कि केवल राहुल ही उनके नेता हैं। पिछले दिनों मुख्यमंत्री अमरेंद्र सिंह ने सिद्धू के पोर्टफोलिओ बदल दिए, पर उन्होंने नया दायित्व अभी तक नहीं सँभाला है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के पास वे अपनी शिकायत लेकर दिल्ली पहुँचे। सिद्धू का कहना है कि उनको हलका-फुलका नहीं समझना चाहिए। पता नहीं कांग्रेस अपनी आज की पस्त हालत में कहीं पुराना खेल तो नहीं खेल रही है कि क्षेत्रीय नेताओं को मजबूत न होने दिया जाए, उनके खिलाफ कुछ विरोध उभरना ही चाहिए, ताकि वे दिल्ली में तथाकथित हाईकमांड की शरण में आएँ। अनुशासनहीनता कांग्रेस में चरम सीमा पर है, ऐसा प्रतीत होता है।

बहुत से पर्यवेक्षकों और टिप्पणीकारों का कहना है कि राहुल गांधी काकथन कि गांधी-नेहरू परिवार से इतर कांग्रेस का कोई अध्यक्ष होना चाहिए, जो सामयिक और समीचीन है, इसकी आवश्यकता है, क्योंकि अब गांधी परिवार का करिश्मा समाप्त हो गया है। देश के मध्यवर्गीय युवा और युवती अब गांधी परिवार के पुराने मोहपाश से मुक्त हैं। उनके अनुसार लोकतंत्र में योग्यता के आधार पर सभी को अवसर मिलना चाहिए। कांग्रेस का धर्मसंकट यह है कि उसके अंदर इतनी मारामारी है, इतने आपसी मतभेद हैं, इतनी आपसी फूट है, इतने महत्त्वाकांक्षी बैठे हैं कि अध्यक्ष बनने के गृहयुद्ध में पार्टी ही टूट जाएगी। कुछ का कहना है कि परिवार का नाम ही वह माध्यम है, जो कांग्रेस को अभी तक जोड़े हुए हैं, वरना पार्टी कब की बिखर जाती। सवाल है कि आखिर एक राजनैतिक दल के लिए यह कब तक संभव है।

एक और तथ्य ध्यान देने योग्य है कि इस चुनाव में कांग्रेस ने सेकुलर शब्द का उपयोग कम ही किया। अल्पसंख्यकों की बात की, किंतु मुसलमानों को ज्यादा सामने रखकर नहीं। डर था कि मुसलिम तुष्टीकरण का सवाल लागों के मन में उठेगा। सेकुलर शब्द तो अब राजनीति में हास्यास्पद सा हो गया है। यह बात अलग है कि अपने आपको कुछ लिबरल कहनेवाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मस्तकोषीय स्वाभाविक विरोधी इसकी दुहाई देते रहते हैं। कांग्रेस द्वारा सॉफ्ट हिंदुत्व, यानी नरम हिंदुत्व का काफी सहारा लिया। राहुल गांधी द्वारा शंकर उपासक, जनेऊधारी, धर्म स्थानों में जाने और पूजा-पाठ करने का रास्ता चुनाव में अपनाया गया। फिर भी बात नहीं बनी, क्योंकि जनता इतनी नासमझ नहीं है कि वह इन हथकंडों को समझ न सके। उसको लगा कि यह अवसरवादिता है, दिखावा है। प्रियंका गांधी वाड्रा की प्रयागराज (पहले इलाहाबाद) से वाराणसी तक नाव की यात्रा में, जो पूजा-पाठ के दृश्य जनता ने देखे, उसमें उनको सच्ची उपासना की गंभीरता का अभाव ही दिखाई दिया। प्रियंका वाड्रा की भाव-भंगिमा में कृत्रिमता और दिखावा ही उनके देखने में आया, मानो किसी नाटक का पार्ट अदा किया जा रहा हो। इस मामले में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने तो हद कर दी। वे पहले नर्मदा यात्रा का आयोजन सार्वजनिक रूप से कर चुके थे। अपने गुरु अर्जुन सिंह की तरह उनकी महत्त्वाकांक्षाएँ कोई कम नहीं हैं। भोपाल की लोकसभा सीट बहुत समय से भाजपा के कब्जे में रही है। कमलनाथ और सिंधिया ने सोचा कि दिग्विजय सिंह अपने राजनीतिक अनुभव, लंबे संपर्क और चातुर्य से यह सीट जीत सकते हैं। इसमें कमलनाथ और सिंधिया की प्रतिद्वंद्वी की भावना छिपी थी, जो समय-समय पर पहले भी सामने आती रही है। हार गए तो उनकी ही किरकिरी होगी। दिग्विजय सिंह ने चुनौती स्वीकार की। स्वामी स्वरूपानंद का तो वरदहस्त उन पर था ही। उनके समर्थन में सैकड़ों साधु-संतों की यात्रा आयोजित की गई। एक पाइलट बाबा आए। उन्होंने मुहिम सँभाली। यज्ञ आदि तरह-तरह के आयोजन किए गए। यह प्रचारित करने के लिए कि दिग्विजय सिंह बड़े आस्थावन हैं, अपने धर्म से उनका बड़ा पुराना लगाव है।

वैसे सबको पता है कि दिग्विजय सिंह मुंबई के जिहादी प्रचारक जाकिर के पुराने समर्थक रहे हैं। डंके की चोट पर वे उसके तथाकथित जनहित कार्यक्रमों की प्रशंसा करते रहे। जाकिर इस समय मलेशिया में भगोड़ा के रूप में रह रहा है। भारत सरकार उसकी गिरफ्तारी और प्रत्यार्पण की कोशिश कर रही है। कुछ जिहादियों को पकड़ा गया था, दिल्ली के बटाला हाउस में पुलिस के दावे को दिग्विजय सिंह ने गलत बताया था, जिसमें एक पुलिस अधिकारी शर्मा की मृत्यु हुई थी। पुलिस की कार्रवाई आतंकवादियों को पकड़ने की थी। भोपाल में चुनाव के लिए उन्होंने अब नरम हिंदुत्व का चोला पहना, पर हारे उस साध्वी प्रज्ञा ठाकुर से, जिनको भाजपा ने अपने प्रत्याशी के तौर पर खड़ा किया। वे मालेगाँव कांड और समझौता एक्सप्रेस कांड में आरोपी हैं। यह सही है कि जब तक अदालत निर्णय न करे, वे दोषी नहीं कही जा सकती हैं। पर फिर भी हमारी राय में अच्छा होता कि शिवराज सिंह चौहान प्रत्याशी होते, विरोधी दलों को भी भाजपा की आलोचना का अवसर न मिलता। भाजपा ने शायद यही सोचा कि विष-विष को काटता है और वह सोच भोपाल के जनादेश से सही साबित हुई।

सबसे दयनीय स्थिति कांग्रेस की है। लोकसभा का सत्र सोमवार १७ जून को शुरू हुआ। जो सांसद निर्वाचित हुए हैं, उनको शपथ दिलाई गई। राहुल गांधी विदेश से वापस आ गए, शपथ ग्रहण समारोह में भाग लिया। अमेठी की अध्यक्षता वाली कोर कमेटी की ओर से प्रवक्ता सुरजेवाला ने घोषणा की है कि अभी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ही हैं। दयनीय स्थिति इसलिए भी है कि सूझ नहीं पड़ रहा है कि क्या किया जाए। अमेठी की हार के उपरांत सोनिया गांधी के साथ प्रियंका गांधी मतदाताओं को धन्यवाद देने रायबरेली पहुँचीं। गुस्से में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कह डाला कि कुछ लोगों ने काम किया और जिन्होंने काम नहीं किया, उनको ढूँढ़-ढूँढ़कर निकालेंगे। इस आक्रामक रुख के कारण न केवल रायबरेली वरन् पूरे प्रदेश में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में रोष की लहर व्याप्त हो गई है। सोनिया की जीत के बारे में उन्होंने कहा कि वे तो अपनी छवि के कारण जीती हैं। केवल कार्यकर्ताओं पर हार का दोष लगाना बेमानी है, जब नेतृत्व सही मार्गदर्शन न कर सके और न संघठन को मजबूत कर सके। अगर प्रियंका पूर्वी उत्तर प्रदेश की जनरल सेके्रेटरी नियुक्त हुई थीं, क्या वहाँ कांग्रेस के पराजय के लिए वह उत्तरदायी नहीं हैं? यही बात अमेठी की राहुल की हार पर भी लागू होगी, क्योंकि प्रियंका ही रायबरेली और अमेठी के देखभाल की जिम्मेदारी उठा रही थीं। अभी भी मानसिकता, जैसा मोदी कहते हैं कि ‘नामदार’ की है, वैयक्तिक और वंशवाद के बड़प्पन की बू काम कर रही है। इसी मानसिकता ने उन्हें जमीनी सच्चाइयों से दूर कर दिया और कांग्रेस पार्टी तथा उसके अध्यक्ष ख्वाबी दुनिया में ही रह गए। अपने गिरहबान में न झाँककर प्रियंका वाड्रा ने मोदी को फिर कोसा कि उन्होंने झूठ, फरेब और अनैतिक हथकंडों से चुनाव जीता है।

पंकज वोहरा एक सुलझे हुए पत्रकार हैं। उनको दिल्ली की राजनीति की अद्भुत जानकारी है। उन्होंने ‘संडे गार्जियन’ में लिखा है कि राहुल गांधी को उनके अपने ऑफिस से अंत के दिनों तक गलत सूचनाएँ मिलती रहीं और उन पर राहुल गांधी विश्वास करते रहे। प्रवीण चक्रवर्ती, जो उनके चुनावी व्यवस्था के सबसे विश्वासपात्र सहायक थे, बताते रहे कि हर हालत में १६४ सीटों पर कांग्रेस जीतेगी, बल्कि उससे कहीं ज्यादा १८४ तक भी हो सकती हैं। उन्होंने पेशेवर आदमी प्रशांत किशोर की तरह अपने चुनावी आँकड़ों के विश्लेषण के लिए २४ करोड़ वसूल किए। इसी प्रकार दिव्या स्पंदना, जो कांग्रेस अध्यक्ष के दफ्तर में सोशल मीडिया पर ट्वीट करती थीं, उसने आठ करोड़ लिये। कहा जाता है कि नतीजों के आने के बाद राहुल की निजी टीम का पत्ता कट गया। यही नहीं, राजस्थान में गहलौत ने २५ सीटों में से १४ से १६ तक जीतने की बात कही। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने २९ सीटों में ११ से १५ तक जीतने का विश्वास दिलाया। केवल छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश वघेल ने तीन सीटों के जीतने की संभावना बताई थी। दिल्ली कांग्रेस ऑफिस के आँकड़ों के विश्लेषण के आधार पर वघेल द्वारा कहा गया कि ८ सीटें कांग्रेस को मिलेंगी। अहमद पटेल ने गुजरात के बारे में एक भी सीट न मिलने की आशंका व्यक्त की, जिससे कांग्रेस अध्यक्ष नाराज हो गए। छत्तीसगढ़ में दो सीटों पर जीत हुई। गुजरात और राजस्थान में एक भी सीट पर कांग्रेस को जीत नहीं हुई, मध्य प्रदेश में केवल एक, वही पुरानी कमलनाथ का चुनावी क्षेत्र।

अपनी टीम और चक्रवर्ती के अत्यंत उत्साहवर्धक समाचार से प्रसन्न राहुल गांधी ने मतगणना के एक दिन पहले एम.के. स्टालिन को फोन किया। बताया जाता है कि वे उनको अपने मंत्रिमंडल में गृहमंत्री बनाना चाहेंगे। इसी प्रकार शरद पवार से अनुरोध किया गया कि उनकी वरिष्ठता के अनुकूल उनको मंत्रालय दिया जाएगा। उमर अब्दुल्ला, अखिलेश और तेजस्वी यादव को भी फोन किया गया। अखिलेश को कम-से-कम चालीस सीटों की उम्मीद थी और तेजस्वी को २० सीटों की। मंत्रिमंडल के लिए कांग्रेस पार्टी के मल्लिकार्जुन खड़गे, पवन कुमार बंसल, हरीश रावत, अजय माकन आदि के नाम तय हुए थे। राहुल और प्रियंका प्रयत्नशील थे कि नरेंद्र मोदी के हटने के बाद किन-किन दलों का सहयोग मिल सकता है। साँझे की सरकार बनाने के लिए राष्ट्रपति के सामने अपना दावा पहले पेश करने के लिए कांग्रेस द्वारा एक कानूनी पंडित से दो ड्राफ्ट बनवाए गए। एक में सीधा दावा कांग्रेस का अपना था। दूसरा था कि यू.पी.ए. के किसी भी अन्य दल को कांग्रेस के समर्थन का। किंतु अगले दिन जैसे ही नतीजे आने शुरू हुए कि आशाओं का यह किला धूल-धूसरित हो गया। स्वर्गनसैनी से गिरने के कारण कांग्रेस में निराशा का वातावरण और भी गहरा गया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसीलिए इस्तीफे की पेशकश की और कहा कि परिवार से अलग किसी व्यक्ति को कांग्रेस अध्यक्ष बनाना उचित होगा। कांग्रेस की दृष्टि परिवार के बाहर जाती ही नहीं। इस कारण गतिरोध है। वैसे वे आकांक्षी बहुत हैं। एक समाचार है कि मुकुल वासनिक, जो कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी हैं, वे पहले लोकसभा में रह भी चुके हैं, मंत्री भी रहे। दलित वर्ग केहैं। कहा जा रहा है कि शीला दीक्षित और पृथ्वीराज चह्वाण भी अध्यक्ष पद के उम्मीदवार हैं। वासनिक के अध्यक्ष बनने की अधिक संभावना है। एक दूसरा समाचार है कि गतिरोध की स्थिति में कांग्रेस के मुख्यमंत्री भी आपस में मंत्रणा कर रहे हैं कि ऐसी स्थिति में क्यों न वे अधिक गतिशील हों और कांग्रेस का अध्यक्ष उनकी मर्जी का हो, ताकि राज्यों का बोलबाला कांग्रेस में रहे, क्योंकि आखिरकार कांग्रेस का अस्तित्व तो प्रदेशों पर ही निर्भर है। देखना है कि कांग्रेस में आगे क्या गुल खिलते हैं।

नरेंद्र मोदी की आशातीत और आश्चर्यचकित विजय कैसे और क्यों हुई, यह विरोधी दल नहीं समझ पा रहे हैं। भारत बदल गया है। एक बहुत बड़ा तबका मध्य वर्ग में आ गया है। उच्च-मध्यम वर्ग और अति समृद्ध इनकी श्रेणियाँ अलग हैं। धीरे-धीरे वैश्वीकरण, शिक्षा के प्रसार, टी.वी. के कारण जो नीचे के वर्ग कहे जाते हैं, उनकी आकांक्षाएँ बढ़ रही हैं। आरक्षण की भी इसमें उल्लेखनीय भूमिका रही है। समय-समय पर जो चुनाव होते हैं, इससे वंचित और साधनहीन, निरीह, महिलाएँ आदि में जागरूकता बढ़ती जाती है और उनका जो देश है, उनका जो हक है, उसकी वे माँग करते हैं। मंडल आयोग में आनेवाले समुदाय अब अधिक क्रियाशील हैं। वे और आगे बढ़ना चाहते हैं। प्रधानमंत्री समय-समय पर याद दिलाते हैं कि वे पिछड़ा वर्ग के हैं; कोई भी व्यक्ति योग्यता तथा जनता के आदेश से ऊँचा-से-ऊँचा पद पा सकता है। मोदी ने चुनाव के नतीजों से आइडेंटी पॉलिटिक्स अथवा अस्मिता की राजनीति को धराशायी कर दिया है। जाति, क्षेत्र के आधार पर अब तक जो राजनीति करते आए हैं, उनको धक्का लगा। लोग देख रहे हैं कि उसका लाभ कुछ लोगों या परिवारों तक सीमित रहता है, सर्वसाधारण तक नहीं पहुँचता है। इन सच्चाइयों से विरोधी दल जानबूझकर अनजान बने हुए हैं। मोदी का नारा ‘सबका साथ, सबका विकास’ सभी वंचित, साधनहीन या पिछड़े समुदायों को प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता दिखाई देता है, और इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति वे आकर्षित हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि जातिवाद या जाति का मुद्दा समाप्त हो गया, किंतु अब लोगों को एहसास हो रहा है कि कुछ लोग इसका दुरुपयोग निहित स्वार्थ के लिए करते हैं। यह शुभ लक्षण है, समतावादी समाज का आना संभव है और उसके लिए सतत प्रयत्न आवश्यक है—कानून और समाज-व्यवस्था दोनों के स्तर पर।

लोकसभा के चुनाव के पहले जो दल बहुत उछल-कूद कर रहे थे, उनमें एक केजरीवाल की आप पार्टी भी थी। आखिर तक दिल्ली में कांग्रेस से गठबंधन होगा, यह नाटक होता रहा, पर नतीजा कुछ नहीं निकला। भाजपा ने पहले की तरह दिल्ली की सातों सीटों पर पुनः कब्जा कर लिया और वह भी बहुत बड़े मतों के अंतर से। पंजाब में जरूर एक सीट आप के हाथ आई। उत्तर प्रदेश में बसपा और समाजवादी गठबंधन में मायावती फायदे में रहीं। २०१४ में जहाँ शून्य था, २०१९ में दस सीटें प्राप्त कर लीं। मायावती अस्तित्व के संकट में फँस गई थीं, उससे उभर आईं। उनके सहयोगी अखिलेश यादव को केवल पाँच तथा तीसरे साझीदार अजीत सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल को शून्य मिला। न अजीत सिंह और न उनके पुत्र ही चुनाव जीत पाए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उन्हें जाट मतों पर बड़ा गुमान था, वह भ्रम टूट गया। अखिलेश की समाजवादी पार्टी के पास पाँच सीटें पहले थीं, वे तो बरकरार रहीं, पर उनकी पत्नी डिंपल यादव को कन्नौज में हार का मुँह देखना पड़ा। दो-तीन भाई-भतीजे भी हारे। घर की फूट से मुलायम सिंह की लंका को आग लग गई। बुआ मायावती का अखिलेश ने हर प्रकार से आदर किया, स्वयं कभी-कभी अपने को अपमानित महसूस करते हुए भी। लेकिन चुनाव के बाद मायावती ने भतीजे से नाता तोड़ लिया, कहा कि उत्तर प्रदेश में अब विधानसभा के लिए उप चुनावों में वे अलग से चुनाव लड़ेंगी। यह जरूर कहा कि डिंपल और अखिलेश से उनके व्यक्तिगत संबंध अच्छे बने रहेंगे। बिहार में लालू यादव की पार्टी की बहुत बुरी शिकस्त हुई। उनकी बेटी मीसा भी चुनाव हार गई। खीज में उन्होंने जिन विकास कार्यक्रमों को अपने एम.पी. लोकल डेवलपमेंट फंड से राज्यसभा सदस्य के रूप में स्वीकृति दी थी, उसको निरस्त कर दिया। यह विचित्र राजनीति है। वोटरों ने जिताया नहीं तो हम उनसे बदला लेंगे।

पश्चिम बंगाल में ममता अत्यंत चिंतित हैं, क्योंकि भाजपा ने १८ सीटें जीतीं और तृणमूल कांग्रेस ने २२, क्योंकि दो साल के बाद वहाँ विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, उसके पहले कुछ शहरी स्थानीय निकायों के भी चुनाव होंगे। उन्हें भाजपा के ‘जय श्रीराम’ नारे से चिढ़ हो गई। उनकी शिकायत है कि भाजपा ने बाहर से गुंडे बुलाए हैं। बंगाल की सांस्कृतिक अस्मिता खतरे में है। हिंसक घटनाएँ बढ़ रही हैं, दोनों दलों के समर्थक जान गँवा रहे हैं। ममता ने मानसिक संतुलन खो सा दिया है। वे जब बाहरी लोगों की बात करती हैं, भूल जाती हैं, उनके पूर्वज भी कभी कन्नौज से आए थे। संविधान के अंतर्गत कोई भी नागरिक कहीं भी रह सकता और रोटी-रोजी कमा सकता है। वे नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री मानने को तैयार नहीं। ‘फानी चक्रवात’ के समय प्रधानमंत्री का फोन लेने से इनकार कर दिया। अब व्यर्थ में डॉक्टरों से टकराव मोल लिया। राज्यपाल को भी उनसे संपर्क करना कठिन हो गया। बंगाल राज्य में सब ओर जो अराजकता फैल रही है, ममता केअनुसार उसके लिए भाजपा उत्तरदायी है। सब उसके षड्यंत्र हैं। केंद्र उनकी सरकार को गिराना चाहता है। प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में आने से ममता मुकर गईं और नीति आयोग की पहली बैठक में भी नहीं आईं। अपनी चुनावी असफलता का ठीकरा वे ईवीएम मशीनों पर फोड़ रही हैं। वह चुनाव के नतीजों को भी मानने को तैयार नहीं हैं। मायावती ने भी ईवीएम मशीनों को दोषी ठहराया है। इधर सोनिया गांधी ने रायबरेली में कहा कि चुनावी प्रक्रिया संदेहास्पद है। मतलब यही कि ईवीएम उनकी पार्टी की हार के लिए जिम्मेदार हैं। पर वे स्वयं भी तो उसी तंत्र द्वारा जीती हैं। शरद पवार ऐसे मँजे हुए राजनीतिज्ञ, पर उन पर भी ईवीएम का भूत सवार है, यद्यपि उनकी बेटी बारामती से चुनाव जीत गई। उनके भतीजे का, जो महाराष्ट्र का पूर्व उपमुख्यमंत्री रहा है, उसका बेटा चुनाव हार गया, वह ईवीएम को विरोधी पार्टियों की हार के लिए उत्तरदायी नहीं मानता। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने चुनावी नतीजों के बाद कहा था कि कांग्रेस के ५२ सदस्य लोकसभा में नाकों चने चबवा देंगे। अब डर इस बात का है कि विरोध पक्ष की पार्टियाँ इस कदर खीजी हुई हैं कि कहीं प्रारंभ से ही लोकसभा की कार्रवाई नियमानुसार चलने भी देंगी या नहीं। प्रधानमंत्री मोदी को लोकसभा चुनाव में मिले जनादेश की अवहेलना तो नहीं होगी। १७वीं लोकसभा के चुनावी परिणाम देश के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं और उनको स्वेच्छापूर्वक एवं सदाशयता से सभी दलों को स्वीकार करना चाहिए, यही संविधान और लोकतंत्र की मंशा है।

इस चुनाव के अनेक पक्ष हैं, जिनके विश्लेषण में जाने की इस समय आवश्यकता नहीं और संभव भी नहीं। समय बीतने पर स्थिति और स्पष्ट होगी। विरोधी पक्षों का यह कहना था कि मोदी को हटाओ, भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को हटाओ, और यदि भाजपा सत्ता में आती भी है तो ऐसी स्थति होनी चाहिए कि कम-से-कम नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री न बन सकें और १७वीं लोकसभा के चुनाव को एक व्यक्ति पर केंद्रित कर दिया। उसका लाभ मोदी को ही हुआ। यह आम चुनाव अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव की तर्ज का हो गया। यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान राजनीतिक विमर्श की भाषा का स्तर बहुत गिर गया और उसकी जिम्मेदारी सभी दलों पर है। प्रधानमंत्री को चुनाव के बाद भी दो बार बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने ‘राक्षस’ कहा। अपशब्द लोकतंत्र की शोभा नहीं बढ़ाते हैं। २०१४ के पहले गुजरात के प्रसंग को लेकर देश-विदेश के बुद्धिजीवियों ने बयान दिए, लेख लिखे कि मोदी के आते ही देश बरबाद हो जाएगा। इस बार भी वही बातें दोहराई गईं। अलग-अलग तथाकथित बौद्धिक समुदायों के बयान मोदी के विरुद्ध आए और अब भी आ रहे हैं। लेख लिखे जा रहे हैं कि संविधान और प्रजातंत्र खतरे में है। ऐसी पुस्तकें भी आ रही हैं। हैदराबाद के के.एस. कोमीरेडी ने अपनी पुस्तक ‘मैलीवोलेंट इंडिया : ए शॉर्ट हिस्टरी ऑफ द न्यू इंडिया’ में नरेंद्र मोदी के प्रति अपने रोष को छिपाया नहीं है। एक जगह लिखा है कि मोदी की उपस्थिति, जो सबसे निकृष्ट व्यक्ति, प्रधानमंत्री चुना गया, उस पद के लिए, जिसे नेहरू और शास्त्री ने शोभित किया था, मेरे लिए अत्यंत तकलीफ का कारण बना। वायनाड में अपने मतदाताओं को धन्यवाद देने गए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अभिनंदन सभा में कहा, ‘वह (मोदी) प्रतिनधि हैं, इस देश की सबसे निकृष्ट भावनाओं के, वह प्रतिनिधित्व करते हैं घृणा का, वह प्रतिनिधित्व करते हैं असुरक्षा का, वह प्रतिनिधित्व करते हैं झूठ का।’ राहुल गांधी स्वयं कहते रहते हैं कि उनके हृदय में मोदी के लिए स्नेह है, पर वह न उनके चेहरे से और न शब्दों से झलकता है। अब देश कामना करता है कि इस राजनीतिक भाषा की दुर्गति का अंत शीघ्र हो। कड़ी से कड़ी बात सभ्य ढंग से सुविचारित भाषा में कही जा सकती है। इंग्लैंड की संसद् इसका उदाहरण रही है।

मोदी की अप्रत्याशित जीत से बौराए हुए व्यक्तियों और दलों को समझने की आवश्यकता है कि मोदी की यह जीत कोई फेक जीत नहीं है, भुलावा नहीं है, छलावा नहीं है। यह भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति का नतीजा, जिन्होंने छोटे से छोटे मुद्दे को ध्यान में रखकर, स्थानीय समस्याओं पर विचार करते हुए हर राज्य के लिए रणनीति बनाई। अपने कार्यकर्ताओं के मनोबल को निरंतर बढ़ाया। अपने संगठन को दृढ बनाया। विरोधी दलों के जाति समीकरण और क्षेत्रीय गठबंधन निरर्थक साबित हुए। सभी दल चुनाव में अनाप-शनाप धन खर्च करते हैं, जो सत्तारूढ़ होता है, उसको हमेशा अधिक सुविधा रहती है। राफेल और राफेल सौदे की बात तथा मोदी के भ्रष्टाचार की बात लोगों के गले नहीं उतरी, क्योंकि मोदी के पीछे-आगे कोई है ही नहीं। मोदी के शब्दों में राष्ट्र ही उनका परिवार है। ‘चौकीदार चोर है’ का नारा भी राहुल गांधी के लिए उलटा पड़ा। मोदी के शासन में भले कोई कमी रही हो, पर मोदी के प्रति जनता के विश्वास में कोई कमी नहीं आई। पुलवामा, बालाकोट आदि घटनाओं से जनता में विश्वास और दृढ़ होता गया कि मोदी ही है, जो इन स्थितियों का मजबूती से सामना कर सकता है। विपक्ष में जनता को दिखाई पड़ रहा था भानुमती का कुनबा, अपनी-अपनी महत्त्वाकाक्षाओं और निहित स्वार्थी से प्रेरित अच्छी तरह से जाने-परखे नेतागण। वे कहेंगे कुछ, करेंगे कुछ। इनमें जनता को कोई विकल्प नहीं दिखाई दे रहा था। मोदी से जनता का तादात्म्य स्थापित हो गया था, उनकी भाषण-कुशलता के कारण अथवा उनकी संप्रेषण कला के कारण, जिससे वे अपनी बात को समझा सके। यही नहीं, उन्हें मोदी द्वारा शुरू की गई योजनाओं से, चाहे उनमें कुछ कमियाँ भी रही हों, लाभ मिलने का एहसास हुआ। इतने विस्तृत क्षितिज पर कभी किसी ने नरेंद्र मोदी के पहले साधारण व्यक्ति के लिए सोचा नहीं था। जनता को विश्वास हो गया कि ‘मोदी है तो मुमकिन है’, जनसाधारण के लाभ की जो योजनाएँ हैं, वे संभव हैं। मोदी जो कह रहे हैं, अवश्य करेंगे। विपक्षी दलों के नेताओं के प्रति बड़ी विश्वासहीनता थी। मोदी की कुछ योजनाओं ने जनता में उनके प्रति अटूट विश्वास पैदा कर दिया है कि मोदी में वायदे पूरे करने की क्षमता है। मोदी की अथक शारीरिक और मानसिक क्षमता से लोग अभिभूत थे। मोदी की विदेश यात्राओं से देश का कद बढ़ा, भारत भी एक देश है, यह सबको आभास हुआ। पूरा विपक्ष मोदी की विदेश यात्राओं की हँसी उड़ाता रहा। मोदी देश के सर्वप्रिय नेता हैं, यह सर्वमान्य है, विपक्ष चाहे कुछ भी कहता रहे। नरेंद्र मोदी विकास और सुरक्षा, प्रगति और गौरव के पर्याय हो गए। जिस ऐतिहासिक जीत से पूरा विश्व आश्चर्यचकित है और विपक्षी दल हतप्रभ हैं, वह नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सूझ-बूझ, कल्पना-शक्ति, बहुआयामी कठोर परिश्रम तथा धैर्य का परिणाम है। एक स्वतंत्र चिंतक-विचारक ने सही कहा कि बहुत से नेता जीत जाते हैं, क्योंकि जनता को कोई विकल्प नहीं दिखाई पड़ता, परंतु मोदी की जीत हुई, क्योंकि मोदी ने किसी भी विकल्प के विषय में सोचना ही अमान्य कर दिया।

नरेंद्र मोदी अब दूसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में अपनी ‘नए भारत’ की अवधारणा को साकार करने में, मूर्तिमान करने में पूरी तरह सक्षम हैं। देश के सामने बहुत सी नई-पुरानी समस्याएँ हैं, जिन पर बाद में विचार करना उचित होगा। इस समय सबसे अहम समस्या है कि देश का एक तिहाई से अधिक भाग भीषण अकाल की चपेट में है,
राज्यों के सहयोग से उसका मुकाबला करना है। १७वीं लोकसभा अनेक मायनों में नई है। ऐसे कुछ चेहरे इस बार नहीं होंगे, जिन्होंने न केवल भाजपा को वरन् अपनी उपस्थिति से सदन को भी गरिमा प्रदान की। नए सदस्यों को अनुशासन और उत्तरदायित्व से सदन की कार्यप्रणाली को समझना होगा। उनके व्यवहार और आचरण पर सबकी निगाहें रहेंगी। नए मंत्रिमंडल को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अवधारणा के अनुरूप अपने को ढालना होगा। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पिछले दो भाषणों में अपने सदस्यों के लिए बहुमूल्य मार्गदर्शन किया है, जिसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उसका अनुपालन होना चाहिए और उसके लिए भाजपा अध्यक्ष तथा प्रधानमंत्री दोनों को ही सावधान रहना होगा, ताकि सदस्य अपनी शपथ की गंभीरता और अपने पद के महत्त्व को सदैव ध्यान में रखें।

‘सबका साथ, सबका विकास’ और अब प्रधानमंत्री ने ‘सबका विश्वास’ की जो बात कही है, उसके मूल तत्त्व और वृहद महत्त्व को समझें। संविधान सर्वोपरि है। न तो मौखिक रूप से और न व्यवहार में, उसकी लक्ष्मण रेखाओं का उल्लंघन होना चाहिए। तभी तो हम सबका विश्वास प्राप्त कर सकेंगे। जनता विपक्ष से भी सकारात्मक तथा रचनात्मक संसदीय व्यवहार की अपेक्षा रखती है। विरोध पक्ष अपना विरोध प्रदर्शित करे, सरकार की गलतियों को जोरदार ढंग से बताए, पर संसद् की कार्रवाई में अवरोध पैदा नहीं करे। संसद् कानून बनाने के लिए है। जनता की आवाज उठाने का, जनता के अभाव-अभियोगों को उजागर करने का वह एक फोरम है। अतएव संसद् की कार्रवाई हर हालत में चलनी ही चाहिए। संसद् चलनी चाहिए, ताकि जनता की भलाई के काम हो सकें, समस्याओं के समाधान निकल सकें। चुनाव की हार-जीत पाँच साल की है, किंतु इसमें लोकतंत्र का भविष्य निहित है। हार-जीत राजनीति में होती रहेगी, पर संवैधानिक लोकतंत्र की अपनी निरंतरता है, जिस पर किसी प्रकार की आँच नहीं आनी चाहिए, यह प्रतिबद्धता सबको ध्यान में रहनी चाहिए। सबको सम्मति दे भगवान्।

(त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी)

हमारे संकलन