हुक्मरान की भैंस

हुक्मरान की भैंस

थाना बारात घर सा सजा हुआ था। ढोल-नगाड़ों की ध्वनि दूर-दूर तक गूँज रही थी। सलाखों के पीछे बैठे कैदी भोज का आंनद उठा रहे थे। एक भैंस का मैकअप तथा दूसरी का गेटअप चेंज करनेवाले थोड़ी दूरी पर अपना सामान समेट रहे थे।

एक हट्टी-कट्टी भैंस और थानेदार दोनों ही फूलों से लदे हुए थे। कुछ नासमझ देखनेवालों का कलेजा मुँह को आ रहा था कि आखिर हो क्या रहा है? क्या अब पुलिसवालों से समाज की नारियाँ विवाह करने को तैयार नहीं, जो यह थानेदार भैंस से विवाह करने जा रहा है।

थाने में उपस्थित सभी पुलिसवाले पीकर नाचने में मग्न थे। मीडियाकर्मी बड़ी ही तन्मयता के साथ भैंस और थानेदार की तसवीरें ले रहे थे।

भैंस बार-बार अपनी पूँछ उठाकर घुँघरू टँके साटिन के लाल रिबन को ऐसे लहरा रही थी, जैसे कोई नई नवेली अपना आँचल सँवार रही हो। थाने का सफाईकर्मी हाथों में परात और झाड़ू लिये ऐसी उतावली मुद्रा में खड़ा था कि यदि भैंस ने थाने में ही उपलों के लिए सामग्री परोस दी तो वह थाने के बाहर की दीवार पर ले जाकर थाप देगा और अपने कार्य को ईमानदारी से निर्वाह करने का सबूत पेश करेगा।

मीडियाकर्मियों की भीड़ संग एक नया नवेला पत्रकार भी अपना कागज-पेन उठाए घुसा हुआ था। उसकी हालत से उसकी प्रेस का अनुमान लगाना बहुत ही आसान था।

नवेला पत्रकार : ‘यहाँ थाने में दो भैंस क्यों खड़ी हैं, चोरी तो एक हुई थी?’

पुलिसकर्मी : ‘दरअसल कांस्टेबल गलत भैंस पकड़कर ले आया था। हम उसका गेटअप चेंज कर हुक्मरान के हवाले करने ही वाले थे कि किसी मुखबिर ने थानेदार साहब को असली भैंस की जानकारी दी, बस हमारे थानेदार साहब अपनी पूरी फोर्स के साथ गए और भैंस चोर के चंगुल से छुड़ा लाए।’

नवेला पत्रकार, ‘चोर ने आसान हाथों भैंस लौटा दी?’

पुलिसकर्मी : ‘कैसे नहीं लौटाता, थानेदार साहब के एक झापड़ ने उसे दिन में तारे दिखा दिए।’

नवेला पत्रकार : ‘जब एक झापड़ से काम चल सकता है तो पूरी फोर्स क्यों लेकर गए।’

पुलिसकर्मी : ‘बहुत चपड़-चपड़ कर रहे हो, जरा अपने अखबार का नाम तो बताओ।’

नवेला पत्रकार : ‘अखबार छोडि़ए, यह बताइए कि थानेदार साहब भैंस रानी से विवाह रचा रहे हैं क्या?’

पुलिसकर्मी : ‘विवाह! बावरे हुए हो क्या?’

नवेला पत्रकार : ‘वो दरअसल थानेदार साहब ने जब भैंस रानी को माला पहनाई तो पंडित महोदय ने कुछ मंत्रों का उच्चारण किया। उपस्थित सभी जनों ने ताली बजाई, मेरे सहयोगी मित्रों ने कपल की तसवीरें भी उतारीं।’

पुलिसकर्मी : ‘अच्छा, तो क्या भैंस को माला पहनाते हुए भी देखा तुमने?’

नवेला पत्रकार : ‘हो सकता है, उन्हें यह रिश्ता मंजूर न हो, अपनी बिरादरी में विवाह का मन बना रखा हो।’

पुलिसकर्मी : ‘बकवास बंद करो और दफा हो जाओ, नहीं तो कोई भी दफा लगाकर यहीं थाने की जमीन में दफन कर दिए जाओगे।’

नवेला पत्रकार चुप्पी साध नृत्य देखने लगा।

पुलिसकर्मी कर्मों से विमुख नाचने-गाने में व्यस्त थे।

पुलिसवालों के नागिन नृत्य से सम्मोहित होकर भैंस भी जमीन पर लोट-पोट होने की सोच ही रही थी कि एक बदहवास सा परिवार थाने में घुसा चला आया।

मेज पर चढ़कर झूम-झूमकर गानेवाले पुलिसकर्मी गाना रोक उस परिवार को घूरने लगे।

नवेला पत्रकार : ‘कौन हैं आप लोग और क्यों रंग में भंग डाल रहे हैं?’

बदहवास परिवार के पुरुष ने मेज पर चढ़े एक पुलिसवाले के पैर पकड़ लिये और बोला, ‘साहब, मेरी बेटी को बचा लीजिए, उसे कुछ गुंडे उठाकर ले गए हैं।’

पुलिसकर्मी : ‘कल आना, आज कोई एफ.आई.आर. दर्ज नहीं की जाएगी।’

‘पर कल तक बहुत देर हो जाएगी साहब, मेरी बेटी को बचा लीजिए।’ अब औरत ने पाँव पकड़ लिये।

नवेला पत्रकार : ‘आप लोग बच्ची को भूल भोजन-भजन का आनंद लीजिए। जिन्होंने भैंस खोज निकाली है, वह अवश्य ही एक-दो दिन में आपकी बेटी खोज निकालेंगे।’

पीडि़त माँ : ‘तब तक बहुत देर हो जाएगी।’

परिवार बिलख-बिलखकर रोने लगा।

उनका रोना सुन भैंस का हृदय द्रवित हो उठा, वह अपनी जगह से हिली और दुःखी परिवार के करीब आ गई।

भैंस की आँखों से जलधारा बह निकली।

तमाशबीन यह देख हैरान थे कि जानवरों का हृदय पुलिस हृदय से कोमल होता है।

भैंस को रोता देख थानेदार भड़क उठा। उसने दुःखी परिवार के पुरुष की पीठ पर लात जमाते हुए कहा, ‘तुम्हारी वजह से हमारे अन्नदाता की भैंस आँसू बहा रही है।’

नवेला पत्रकार : ‘पर आप सबको तो सरकार पगार देती है और यह भैंस सरकार की नहीं। मेरे खयाल से भैंस भी चाहती है कि आप परिवार की पीड़ा को समझें।’

थानेदार : ‘यह समझदार मच्छर कहाँ से घुस आया, इसे बाहर निकालो।’

भैंस ने थानेदार की ओर देख मुँह चलाया।

थानेदार चिल्लाया : ‘अबे! कोई मैडम के लिए पानी लेकर आओ।’

पुलिसकर्मी अपनी-अपनी पानी की बोतल ले भैंस की ओर लपके।

बाहर तैनात एक गार्ड ने थानेदार को सूचना दी कि भैंस के सिरताज जहाँपनाह अलाने-फलाने एरिया के हुक्मरान स्वयं भैंस लेने पधार चुके हैं।

पुलिसकर्मी अपनी-अपनी वर्दी दुरुस्त कर भैंस की आँखें और बदन अपने-अपने रुमाल से पोंछने लगे।

हुक्मरान को देखते ही दुःखी परिवार अपना घायलात्मिक शरीर ले उसके चरणों में बिछ गया।

हुक्मरान को लगा, मानो कदमों से आकर कर्तव्यों के सर्प लिपट गए हों। उन्होंने पैरों को झटका और बोले, ‘दूर होकर गिड़गिड़ाओ, जूते खराब हो जाएँगे।’

संतप्त परिवार ने अपनी बेटी को बचाने की गुहार लगाई।

उनकी बात सुनकर हुक्मरान ने कहा कि रेप और छेड़छाड़ से बचने के लिए महिलाओं को घरों में ही रहना चाहिए। लड़कियों को ऐसी जगहों पर नहीं जाना चाहिए, जहाँ बेशर्मी का नंगा नाच हो रहा हो।’

परिवार : ‘पर हमारी बेटी तो पढ़कर लौट रही थी।’

हुक्मरान : ‘अच्छा तो फिर यह कोई राजनीतिक पार्टी का कार्य लगता है। सत्ता की लोभी पार्टियाँ किसी भी हद तक जा सकती हैं।’

नवेला पत्रकार : ‘पर इसमें राजनीति कहाँ से आ गई। यह तो गुंडागर्दी है। सरेआम बच्ची अगवा की गई है। पुलिस एफ.आई.आर दर्ज नहीं कर रही है।’

हुक्मरान : ‘भई जरा इनके पर चेक कर लो, कुछ ज्यादा निकल आए हैं। और हमारी भैंस रानी को सम्मान के साथ विदा करने का प्रबंध करो।’

थानेदार : ‘जी जनाब, भैंस को पूरे शहर में घुमाते हुए हम सब आपके निवासस्थान पर लेकर पहुँचते हैं।’

नवेला पत्रकार : ‘पूरे शहर से घुमाते हुए क्यों?’

थानेदार : ‘पूरे शहर से इसलिए कि आम नागरिक हम पर भरोसा कर सके कि हम पूरी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभाते हैं। हमारे होते हुए एक जानवर का भी बाल बाँका नहीं हो सकता।’

हुक्मरान ने भैंस के सिर पर हाथ फिराया और थाने से बाहर निकल गया। थानेदार भैंस की रस्सी पकड़ पीछे लपका। पुलिसकर्मी, मीडियाकर्मी तथा तमाशबीन भी साथ चल दिए।

दुःखी परिवार ‘साहब सुनिए’ की रट लगाए पीछे-पीछे लपका।

थाने से ५०० मीटर की दूरी पर एक बच्ची क्षत-विक्षत हालत में पड़ी थी।

हुक्मरान गुजर गए। थानेदार के हाथ से रस्सी छुड़ाकर भैंस बच्ची के करीब पहुँच गई। भैंस ने गरदन बच्ची के नग्न शरीर पर झुका दी। बच्ची का शव फूलों से ढक गया।

मीडियाकर्मियों ने अपने कैमरे में भैंस की तसवीरें बच्ची के शव के साथ खींचनी आरंभ कर दीं।

अचानक भैंस ने अपना सिर और पूँछ एक साथ हिलाना शुरू कर दिया और फिर अपनी आगे की एक टाँग उठा पागलों की भाँति नृत्य करने लगी। देखनेवालों को ऐसा लग रहा था, मानो स्वयं शंभु क्रुद्ध हो तांडव कर रहे हों।

थानेदार : ‘अरे! इसे क्या हुआ?’

नवेला पत्रकार : ‘शायद अपने जानवर होने की खुशी जता रही है। अगर इनसान की औलाद होती तो शायद इस बच्ची की तरह दरिंदों की वासना का शिकार बन मिट्टी में मृतक पड़ी होती।’

हिमालय फर्म, बरेली रोड

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दूरभाष : ०९९१७२५२२४४
—मीना अरोड़ा

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