साहित्य का भारतीय परिपार्श्व

उसके बाद पल्लवी का पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहा था। वह खुशी से नाच रही थी और गीत गुनगुना रही थी। वह अपने बचपन में बिताए पलों को याद करते हुए अतीत में खो गई। वहीं देखने लगी मम्मी, पापा, भैया और खुद को।

यह प्रयास भैया उससे चार साल बडे़ हैं, लेकिन वह बचपन में उनको भैया नहीं बुलाती थी। मम्मी, पापा और दूसरे लोग जिस तरह उसे नाम से बुलाते थे, वह भी वैसे ही बुलाती थी। मना करने पर भी किसी की सुनती नहीं थी, बोलती थी कि वह तो मेरा दोस्त है, भैया क्यों बुलाऊँ?

थोड़ा बड़ा होने के बाद भैया ने खुद भैयाई दिखाई। आम, अमरूद दिखाते हुए बोले, ‘भैया बुलाने पर मिलेगा।’ हाँ, बोलकर वह ले तो लेती थी, लेकिन उसे भैया बुलाने का मन नहीं करता था। भैया उसकी चोटी खींचते थे। उँगली से सिर को ठक से मारते थे। बात-बात पर दोनों एक-दूसरे से लड़ते थे, मगर लड़ाई के बाद समझौता, फिर प्यार-दोस्ती; कोई किसी को छोड़कर नहीं रह पाता था।

अब बीत गया अबोध बचपन...भैया के स्वभाव बदल गए। ठीक पापा की तरह वे गुस्सैल बन गए। पापा और भैया के बीच बढ़ते नोक-झोंक व बहसबाजी से पापा के मान-सम्मान को ठेस पहुँची थी। तब उन्होंने उड़ीसा के बाहर एक हॉस्टल में भैया को डाल दिया। वे वहाँ रहकर पढ़ाई करने लगे।

भैया ने घर से बाहर हॉस्टल में रहकर इंजीनियरिंग व मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी की, उसके बाद वे मुंबई की एक कंपनी में नौकरी करने लगे। इसी दौरान उन्हें एक दलित लड़की से प्रेम हो गया और उन्होंने उस लड़की से शादी कर ली। माता-पिता के विरोध के कारण उन्हें शादी के समय घर आने की अनुमति नहीं मिली। वे भी अभिमान के कारण घर से दूर रहे। लेकिन मैंने एक-दो बार उन्हें फोन किया था। फिर एक लंबी नीरवता के बाद अचानक यह खबर आई कि भैया आनेवाले हैं।

मैंने पूछा, ‘भाभी को साथ लेकर आओगे न, भैया?’ पर उन्होंने कहा, ‘मुंबईवासियों का गणपति प्रेम अद्भुत है। गणेश-पूजा के समय वे लोग कहीं नहीं जाते; मुंबई में ही रहते हैं और ग्यारह दिन चलनेवाले इस महोत्सव का लुत्फ उठाते हैं।’

‘तो भैया, क्या अकेले आएँगे? ठीक है, आइए! आना-जाना पहले शुरू तो हो, सब ठीक हो जाएगा।’

पल्लवी खुश थी। फिर वह मन-ही-मन सोचने लगी, उसके बाद उसने अपने मन से बात की—‘कैसे दिख रहे होंगे भैया अभी—मोटे, पतले, गोरे या साँवले? वैसे ही गुस्सैल होंगे या शांत? हाय रे मन, तू कैसे जानेगा? रुक, धीरज धर।’

उसने अपने पति संग्राम को फोन किया और पहाड़ी शहर नेडरहाट में पढ़नेवाले बेटे को भी। चिकचाक...चिकचाक...खुशी का समय है। देशी गुलाब में घुला थोड़ा और गुलाबी रंग। मन खुश हो तो समय में आता है छंद।

तयशुदा दिन पर प्रयास आया, जो मुंबई में जेनिथ कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। इसके खातिरदारी के लिए छुट्टी पर थे संग्राम। पल्लवी कामकाजी महिला नहीं है। उन दोनों ने प्रयास का भरपूर स्वागत किया, साथ ही फाटक पर खिली हुई मधुमालती का अभिवादन तथा बहुत दिनों के बाद घर लौटने पर चार-छह पतंगों का प्रीतिभरा आह्वान।

पल्लवी ने देखा कि भैया अभी बिल्कुल पापा की तरह दिख रहे हैं—ज्यादा गोरा, ऊँचा और सेहतमंद। वे गुस्सैल नहीं, शांत लग रहे हैं; स्नेहशील व भ्रातृत्व से भरपूर। बातचीत वैसी ही है, जैसे पहले थी। लगा ही नहीं कि सालों बाद एक-दूसरे से मिल रहे हैं।

पता नहीं कहाँ से तभी दो कबूतर गुटरगूँ करते हुए उड़कर आए और बरामदे की रेलिंग पर बैठ गए। पंख फड़फड़ाकर उड़ गए। उनके पीछे मैना की एक जोड़ी आई, जैसे पहले से उनकी बात हुई हो और फुदकने लगी। अपनी भाषा में क्या-क्या बातें करने लगीं, फिर फुर्र हो गईं।

यह सब देखकर प्रयास को काफी अच्छा लगा। पूरा वातावरण खुशनुमा हो गया, जैसे जिंदगी स्पंदित हो रही हो। पंख की फड़फड़ाहट में भी एक शब्द-माधुरी हो सकती है, ऐसा उन्होंने महसूस किया। मुंबई की भाग-दौड़ वाली जिंदगी में यह स्पंदन या यह अनुभव नहीं होता है। पल्लवी ने संग्राम से पूछा, ‘‘इन पंछियों को क्या आपने यहाँ इस तरह देखा था?’’

‘‘हाँ, आते हैं कभी-कभी...सुख-दुःख बाँटते हैं...’’

‘‘आज दुःख नहीं, मेरे भैया के साथ जरूर सुख बाँटने आए हैं।’’

प्रयास के चेहरे पर एक चमक उभरी। उन्होंने घूमकर देखा, बहन का राज्य, उसकी सीमा, परिसीमा सब स्वच्छ व परिपूर्ण है। यहाँ सुशासन जरूर है। उन्होंने तारीफ की कि लड़कियों को सच में कितने कला-कौशल पता होते हैं—सूखती हुई डाली पर फूल खिल सकते हैं, फटी बाँसुरी में भी सात सुर भर सकते हैं।

‘‘इस पल्लवी को देखो, अपने घर-परिवार को किस तरह शोभामय बनाकर रखी है।’’ यह बात सुनकर खुशी से उछल पड़ी पल्लवी।

प्रयास तब मन-ही-मन सोचने लगा, ‘हर नारी के लिए इसी कारण मेरे मन में श्रद्धा और सम्मान है। दलित लड़की प्रीति को मैंने जीवनसंगिनी बनाया। माता-पिता के विरोध का सामना किया। अपने लोगों के पराए बन जाने की यातना सही, मगर मैं मेरी इस प्यारी बहना को परायी कैसे समझ लूँ बताओ।’

‘‘भैया, भाभी याद आ रही हैं क्या?’’ पल्लवी ने पूछा। फिर खिलखिलाने लगी। वह एक कप चाय लाई और बोली, ‘‘नहा-धो लो। बड़ा-घुघनी बनी है। तुम्हें पसंद है न! खाकर खूब गप्पे मारेंगे। वर्षों की बातें बाकी हैं, अरे हाँ, संग्राम! भुट्टा लाए हो न? शाम को हमारे बीच भुट्टा खाने की प्रतिस्पर्धा होगी। याद है न भैया, वह मुकाबला—मैं किस तरह चैंपियन बनती थी...हमेशा!’’

हो-हो...कुछ भी तो नहीं बदला था। बह रही थी उस दिन की वही स्नेहधारा। उसके बाद पल्लवी ने पति संग्राम को फिर एक चेतावनी दी, ‘‘हम भाई-बहन की बातचीत की तुम बिल्कुल मजाक मत बनाना, समझे! नहीं तो जुर्माना देना पडे़गा।’’

‘‘ठीक है, मैं लीना की सहायता करूँगा। जुर्माना क्यों दूँ?’’

‘‘अहा, कितना अच्छा तालमेल है पति-पत्नी में!’’

‘‘तो यह लीना कौन है?’’

‘‘सबके लिए ट्रे में जो फिर से चाय लेकर आई, वही लीना है। मोबाइल चार्जर ले आ बोलने पर जो दे गई, वही लीना है। दूध उबल रहा है, गिर जाएगा, जा के देख, जो देखने गई, वही लीना है। इस कमरे से उस कमरे तक जो दौड़कर जा-आ रही है, वही तो लीना है।’’

‘‘छोटी-सी एक लड़की, हवा में उड़ रही है। हवा में दौड़ रही है। तेरा नाम क्या है रे? ओहो, लीना न! छोटी-सी लड़की, नन्ही-सी चिडि़या, तेरा घोंसला कहाँ है?’’ पल्लवी ने पहचान करवाई।

‘‘एक अनाथ लड़की है। कोई नहीं है इसका।’’

‘‘है, मेरी दीदी है, बाल-सुधार केंद्र में।’’

पल्लवी की बात शायद उसको चुभी। उसने धीरे से कहा, ‘‘कोई तो एक है उसका।’’

‘‘रहने से क्या होगा? वह इसकी मदद करेगी? मैंने इसको सहारा दिया है, भैया। घर में लाकर रखा है। यह पढ़ाई कर रही है? स्कूल के हाजिरी खाते में इसका नाम है।’’

प्रयास ने कहा, ‘‘अच्छा किया पल्ली, लड़की को लाकर घर में रखा है और पढ़ने भेज रही है।’’

लीना का सिर सहलाते हुए फिर से बोला, ‘‘पढ़ रही है न! मन लगाकर पढ़ना। प्यारी बच्ची है। आज स्कूल नहीं गई?’’

पल्लवी बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘तुम आए हो न भैया, संग्राम की छुट्टी है। इसकी भी छुट्टी है। पाँच दिन का पूरा वक्त है तुम्हारे लिए।’’

‘‘क्या जरूरत थी इसकी? इन सब लौकिकता में मुझे विश्वास नहीं है।’’ प्रयास ने कहा और लीना की ओर देखा। वह स्कूल की कोई छात्रा जैसी नहीं लग रही थी। मुरझाया चेहरा, उड़े रंग के कपड़े, चमक है नहीं। किशोरावस्था की पढ़नेवाली लड़की के हाव-भाव नहीं थे उसमें। उस लड़की के प्रति उनका दया-भाव उभरा। लेकिन उसे पत्नी की एक बात याद आ जाने से वह उस दया-भाव से मुक्त हो गया।

प्रीति बोलती है—‘छोटी-छोटी बातों को दिल पर लेकर तुम दुःखी हो जाते हो। ऐसे में कंपनी कैसे चलेगी? उसके हित में कठोर फैसले कैसे लोगे? इतनी भावुकता तुम्हें शोभा नहीं देती, मिस्टर हसबैंड!’ सच में मराठी सुंदरी ‘प्रीति’ सिर्फ उनकी जीवनसंगिनी नहीं है, बल्कि जीवन को दिशा भी वही देती है; लेकिन अपने स्वभाव का मैं क्या कर सकता हूँ!

मन में प्रीति का रंग लेकर वे फिर से लौट आए बहन की खुशहाल दुनिया में। नहाना-धोना, जलपान, फिर दिल खोलकर गपशप। गोद में लैपटॉप लेकर सबको दिखाया अपना संसार—पत्नी और बेटे से जुड़ी अपनी जिंदगी और जीवनशैली।

‘‘अरे, मैं तो भूल गया!’’ कहकर वे बीच में ही उठ गए। बैग में से तीन पैकेट निकालकर पल्लवी के हाथ में दिए। बोले, ‘‘तुम लोगों के लिए प्रीति का भेंट है। साथ में थी—लोनावला की खास स्वादिष्ट ‘चिकी’। छोटे से एक और डब्बे में थी एक मोती की माला मैचिंग कर्णफूल के साथ। लीना से कहा, ‘‘यह तेरे लिए है।’’ इस पर पल्लवी ने कहा, ‘‘भैया! यह तो काफी महँगी है। लीना कहाँ रखेगी? मेरे पास ही रहने दो। बाहर जाने पर वह पहन लेगी।’’

फिर बढ़ा हुआ नन्हा सा हाथ लौट गया। उस पर प्रयास की माया उमड़ी। तभी संग्राम ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम दोनों भाई-बहन बातें करो। मैं लीना को लेकर रसोई सँभालता हूँ।’’

‘‘रुको, रुको, इस नई मिठाई चिकी का एक पीस खाकर जाओ। लीना, दो कप ग्रीन टी लाना तो।’’

खाने में छप्पन भोग परोसे गए। ‘‘इतना सारा, किसने बनाया, बहन पल्लवी रानी! तू तो मेरे साथ गप्पें मार रही थी?’’

संग्राम बोले, ‘‘लीना ने बनाया और मैंने उसकी सहायता की। समझे भैया! लेकिन इन सबके पीछे पल्लवी ही है। कुछ नहीं जानती थी वह, पल्लवी ने उसको सिखाया है। सीखने के बाद अब वह खुद बना लेती है।’’ प्रयास को बात अच्छी नहीं लगी, लेकिन अपनी प्रशंसा होने के कारण पल्लवी को अच्छी लगी। वह प्रयास की प्लेट में दो पीस चिकन डालते हुए बोली, ‘‘वह तो झोंपड़ी की लड़की है। हमारा खाना पकाना क्या जानेगी बेचारी?’’

प्रयास थोड़े रुक गए; गले में खाना भी। खाते समय वे बीच में पानी नहीं पीते, लेकिन एक घूँट लिया। लीना को देखा, उसका मुँह सूख गया था। अपना घर हर किसी के लिए स्वर्ग होता है। घर की परिस्थिति को लेकर किसी के मन में ठेस पहुँचाना ठीक नहीं है, यह पल्लवी नहीं जानती। खाते वक्त वह फिर से कमियाँ ढूँढ़ने लगी—‘‘दाल इतनी पतली क्यों है? भिंडी क्या ऐसे तली जाती है? चिकन में थोड़ा और मसाला डलता, तेरा ध्यान किधर था?’’

प्रयास ने देखा कि लीना बारंबार संग्राम की ओर देख रही है। ‘‘क्यों? उनकी गलती क्या है? इन व्यंजनों को इन्होंने बनाया है?’’ गलती किसी की भी हो, पर प्रयास को लगा, जैसे मैं दोषी हूँ। खाना बनाने में एक छोटी सी लड़की की कड़ी मेहनत लगी है, वे पचा कैसे सकते हैं? मुख में घुसते भोजन में से जैसे उनको उस छोटी सी लड़की का करुण दीर्घश्वास सुनाई दे रहा था।

पहले दिन कुछ और, दूसरे दिन सूर्योदय के बाद कुछ और! प्रयास ने समझना शुरू किया था। पल्लवी सुगृहिणी है। जीवन की कला की अधिकारिणी है। बगीचे में फूल खिलने की कहानी है।

‘क्या, कैसा!’ उन्होंने पढ़ना शुरू किया था। उन्हें समझ में आ गई कि इस सुंदर राज्य का वास्तुकार और चित्रकार उनकी बहन या जीजा नहीं, बल्कि कोई और है—नन्हे-नन्हे दो हाथों के साथ जो दस भुजा है, नन्हे पाँव से जो चलती है लाखों कदम। वे दोनों घर के मालिक हैं, प्रभु और वह भृत्य। वंशवाद होने को बाध्य है। वह अनाथ जो है। उसका कोई सहारा नहीं। वह हुक्म मानेगी ही मानेगी। अच्छे दिन, अच्छी जिंदगी कौन लाकर दे उसे?

जो कल खूबसूरत था, रुचिशील लगता था, आज वह निर्दय और निष्करुण लगने लगा। प्रयास समझ गए कि सबमें लीना के हाथ की कारीगरी है। लड़की छोटी जरूर है, मगर उसमें अनेक गुण हैं, उसके सिर पर घर का सारा बोझ है। वह इतना बोझ कैसे उठा लेती है—खाना बनाना, घर की सफाई करना, घर सजाना, पौधों में पानी देना, कपड़े धोना आदि-आदि का बोझ तो कम नहीं है! तो पल्लवी क्या करती है?

अनगिनत बातों में से उन्होंने अवश्य सही जवाब निकाल लिया। जो इस प्रकार है—वह आधुनिक है, पदस्थ अधिकारी की पत्नी, उसको लड़ना पड़ता है उम्र और सौंदर्य के साथ। रहना होता है अपडेट। इंटरनेट के जरिए स्मार्ट फोन, फेसबुक पर लोकप्रियता के लिए बटोरने होते हैं सैकड़ों लाइक। वहाट्सएप चैटिंग, टी.वी. सीरियल, प्रोफाइल के लिए परिपाटी का भी ध्यान रखना होता है। आधुनिक जीवनशैली के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है, वरना पूछता कौन है? और इसके लिए शोषित होते हैं लीना व रीना जैसे लोग। प्रयास के मन में भावना की एक नदी बह रही थी। ईंट के भट्ठों में, पत्थर की खादानों में बाल-श्रमिकों का शोषण किए जाने, गुलामी करवाए जाने की खबरें वे हमेशा पढ़ते थे, मगर सिर्फ वहीं नहीं, सारे घरों में भी चल रहा है यह शोषण। यही तो देख रहे हैं वे लीना नामक इस नाबालिग में। उसका शोषण नहीं हो रहा है? प्रयास अपनी भावनाओं की नदी के तट नहीं ढूँढ़ पा रहे थे। मन-ही-मन वे प्रीति को बोल रहे थे कि इन सब दुःखों को मैं हवा में नहीं उड़ा सकता, प्रीति? क्या करूँ, बताओ?

यह रात फिर से इनसान पहचानने की रात थी। संग्राम के साथ प्रयास कुछ वक्त बैठे, ड्रिंक लिया। पी-पीकर मदहोश हो गए संग्राम उठे, पर अपने बिस्तर पर नहीं गए, बल्कि लीना की चटाई पर चले गए। अचंभित हुए प्रयास। पहचान लिया मुखौटा पहने हुए इनसान को—तो ऐसा है यह? इस पीड़ा को भी सहती है लीना? उस रात चाँद-सितारे नहीं थे, था तो केवल अँधेरा। लेकिन दूसरे दिन की सुबह खूब उज्ज्वल थी।

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हरिशंकर घूमने का कार्यक्रम था। फिर पति-पत्नी के बीच खींचा-तानी होने लगी। पल्लवी बोल रही थी कि लीना घर पर रहेगी, पर संग्राम कह रहे थे कि चलेगी। बीच में प्रयास आ गए। उन्होंने कहा, ‘‘वह क्या सिर्फ काम करती रहेगी? वह भी चलेगी!’’ लीना गाड़ी में बैठी। उसके होंठों पर मुसकान उभर आई। प्रयास को काफी अच्छी लगी वह मुसकान। हाँ, शीशु की मुसकान ईश्वर की मुसकान है। हे ईश्वर! तुम इसी तरह मुसकराते रहो। लोगों को सद्बुद्धि देते रहो।

हरिशंकर पुराण-प्रसिद्ध गंधमादन पर्वत की गोद में एक अपूर्व पर्यटन स्थूल है। प्रकृति रानी ने यहाँ ऐसी अकुंठित हरियाली बिखेरी है कि देखने से लगता है कि यहाँ पेड़-पौधों में तो जिंदगी है ही, साथ-साथ पत्थरों में भी है। यहाँ पत्थर के विभोर होकर प्रेमिका बन जाते हैं। अपूर्व इसका झरना भी काफी ऊँचाई से बहता है। इसका झर-झर शीतल जल। इस झरना में रोज स्नानोत्सव चलता है। वहाँ पहुँचते ही लीना को पल्लवी ने आगाह किया, ‘‘इस पत्थर पर बैठ, झरने के पास मत जाना। पानी को छूना मत। सर्दी-बुखार होने पर तुझे कौन सँभालेगा?’’

संग्राम ने प्रयास को बुलाया, ‘‘तुम दोनों जाओ। पहले मैं इस मनमोहक परिवेश की शूटिंग कर लूँ।’’ वे घूमने निकल गए। घूमते रहे। मुग्ध व चकित होकर रूपसी प्रकृति को कैमरे में कैद किया। वहाँ के बंदरों की बदमाशी और उछल-कूद को भी कैद कर लिया।

पहाड़, जंगल, झरना, चिडि़या, बंदर सबको लेकर हरिशंकर खूबसूरत है। प्रयास विभोर हो गए। वे लौट आए। लौटते वक्त उन्होंने दूर से देखा कि लीना पत्थर पर बैठी है। उसके बदन से सटकर कौन बैठा है? पहचान लिया—वह गीले कपड़ों में संग्राम है! वह हाथ घुमा रहा है—उसके कंधे पर, पीठ पर, फ्रॉक के अंदर। ओह!...कितना सांघातिक है।

लंबे-लंबे डग भरकर प्रयास जल्दी वहाँ पहुँच गए। संग्राम खड़े हो गए। बोले, ‘‘शावर साथ ले आया था। आइए, स्नान का लुत्फ उठाते हैं।’’

‘‘चलो, हैंडीकैम रखकर आता हूँ। संग्राम के चले जाने के बाद प्रयास ने पूछा, ‘‘लीना! वे कुछ कह रहे थे?’’

‘‘नहीं।’’

‘‘सच बता लीना, डरने की कोई बात नहीं?’’

‘‘पेशाब करने जाऊँ? क्या पूछ रहे थे? कुछ चिल्लर पैसा दिखाकर खनका रहे थे?’’

मन-ही-मन उन्होंने सोचा, ‘तो बहलाने-फुसलाने का नेटवर्क फेल हो गया। बच गई बेचारी...अहा! कहीं भी जरा सी शांति नहीं है इसको।’ उसके बाद झरने के पानी में नहाने चले गए।

‘‘इतना नहाने पर भी मेरा मन व शरीर नहीं भीग रहा है। मन हो रहा है कि नहाता रहूँ। ऐसा लग रहा है, जैसे कुछ जादू है इस झरने के पानी में।’’ उन्होंने कहा और नहाते रहे।

पल्लवी ने बुलाया, ‘‘भैया! असली जगह तो अभी बाकी है। आओ, मंदिर देखते हैं।’’

हरि और शंकर के मिलन का मंदिर हरिशंकर मंदिर। भक्तों का तीर्थस्थल। यहाँ हमेशा भीड़ रहती है। मंदिर-दर्शन और प्रसाद सेवन के बाद वे लोग जल्दी औट आए।

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दूसरे दिन सुबह जाना है सोमतीर्थ रानीपुर-झरियाल, प्रसिद्ध चौंसठ योगिनी पीठ, चौंसठ कला, चौंसठ विद्या का स्थल। सब गए, लीना भी। यहाँ प्रयास बिल्कुल भक्त बन गए। शिला और सौंदर्य से भरपूर योगिनियों को देखा। आते वक्त संग्राम ने बताया, ‘‘योगिनियों की संख्या अभी बासठ है। दो असली योगिनियों की चोरी हो गई थी। चोर ने उस जगह पर नकली योगिनियों को रख दिया है।’’ यह बात सुनकर और उसका अवहेलित शक्ल देखकर प्रयास दुःखी हुए। उन्हें लगा, जैसे दुःख और क्षोभ से अभी भी रो रही हैं योगिनियाँ। वहाँ का प्रसिद्ध इंद्रलाठ और सोमेश्वर मंदिर भी प्रयास ने घूमकर देखा। सबसे बड़ी बात, वे लीना के हाथ पकड़कर घूम रहे थे तथा उसको सबकुछ समझा रहे थे। वह समझे, चाहे न समझे, ‘हूँ-हूँ’ कर रही थी।

शायद यह सब पल्लवी सहन नहीं कर पाई। संग्राम के साथ वह वहाँ की भूल-भुलैया घूमी और आराम से दोनों एक जगह बैठ गए।

‘तो यही एक मौका है!’ प्रयास ने सोचा।

उन्होंने लीना से संग्राम के मंसूबे के बारे में पूछा। लीना डर गई और उनका हाथ छोड़कर दूर हट गई। प्रयास ने हिम्मत दी। काफी मुश्किल से बताया। बोली, ‘‘उन्होंने अगर जान लिया कि मैंने आपको कहा है, तो मेरा और मेरी दीदी का गला घोट देंगे।’’

‘‘नहीं, नहीं, बता कुछ नहीं जानेंगे वे। बोल, तेरे पिताजी क्या तुझसे बुरा बरताव करते हैं?’’

‘‘हाँ, पिता क्या कभी अपनी बेटी को काटता है? उसके ऊपर सोता है? परेशान करता है? मुझे बहुत रोना आता है, इसलिए...’’ कहते हुए वह सचमुच रो पड़ी।

‘‘मत रो लीना, अच्छा, तू रोज स्कूल जाती है?’’

आँखों से आँसू पोंछकर उसने कहा, ‘‘कभी-कभार जाती हूँ। आधी छुट्टी में छुपकर भाग आती हूँ। घर पर बहुत सारे काम होते हैं न मुझको, लेकिन स्कूल बहुत अच्छा लगता है। किताबें, पढ़ाई...सबकुछ अच्छा लगता है। मैं पढ़ना चाहती हूँ...सहेलियों को, मेरी दीदी को देखना चाहती हूँ।’’ फिर से उसकी आँखों में आँसू।

प्रयास ने एक बार लीना को देखा, एक बार योगिनियों को। उनके आँसू और इस लड़की के आँसू उन्हें एक जैसे लगे। दोनों आँसुओं का मोल समझे कौन? गगन चुप, पवन चुप। लौटते वक्त वे भी चुप।

तो रहने के दिन समाप्त। कल लौट जाएँगे प्रयास। बगीचे में सुबह की चाय पीते वक्त पल्लवी ने कहा, ‘‘समय कितनी जल्दी बीत गया न, भैया!’’

चाय का कप रखते हुए प्रयास बोले, ‘‘समय अपने रास्ते, अपने लय में चलता है। हमें बस ऐसा लगता है। अच्छा पल्ली! आज सुबह-सुबह लीना को एक मुक्का क्यों जड़ दिया, हुआ क्या था?’’

‘‘आज तक एक कप चाय भी ठीक से बना नहीं पाई। गाली-मार चाहिए इसको।’’

‘‘लेकिन क्या यह सही है? पगली, तुमने एक नाबालिग को रखा है। उसको मार-पीट रही हो। हमारे देश में ऐसा कानून नहीं है। बाल-श्रमिकों की पीड़ा को लेकर फिलहाल काफी चर्चा है? हल्ला हो रहा है चारों ओर, ढूँढ़ा जा रहा है...सावधान!’’

प्रयास की इस बात पर पल्लवी कुरसी से उठ गई। बोली, ‘‘जानती हूँ, हमारा देश किस तरह कायदे-कानून से चल रहा है, समाधान के नाम पर क्या चल रहा है!’’

‘‘पल्लवी धीरे बोल, रिलेक्स।’’

संग्राम को न सुनाई दे, अतः पल्लवी ने धीमी आवाज में फिर बात आगे बढ़ाई। बोली, ‘‘देखो भैया! घर आकर चपरासियों के काम करने का कानून नहीं है। किसी लड़की को रखकर काम करवाने का कानून नहीं है। तो हम लोग करेंगे क्या? चलेंगे कैसे?’’

प्रयास के इशारे पर तीनों बगीचे से चलकर ड्राइंग-रूम में बैठे। पंखा घिर्र-घिर्र घूमने लगा।

जब अपनी जगह पर अखबार टलमलाने लगा तो उसके ऊपर एक पेपर वेट रखते हुए प्रयास ने पल्लवी की बात का जवाब दिया, ‘‘चलने की बात कर रही हो, पल्ली! दूसरे देशों में लोग जिस तरह चलते हैं, चाहें तो हम भी चल सकते हैं बिना नौकर-चाकर के; सिर्फ मानसिकता बदलनी है। उस तरह का वातावरण तैयार करना है।’’

‘‘हाँ, तू एक कामवाली बाई रख सकती है, उचित मेहनताने के साथ।’’

बात पल्लवी को अच्छी नहीं लगी। इसलिए वह दूसरी ओर देखते हुए बोली, ‘‘कामवाली बाई बहुत हिसाब रखनेवाली होती है, आती है, फटाफट काम करके चली जाती है। नहीं जमेगा। लीना ही रहेगी यहाँ।’’ अपना फैसला सुनाकर पल्लवी अंदर चली गई।

दोपहर में प्रयास ओडि़या अखबार पढ़ रहे थे। आग बरस रही थी चारों ओर, पूरी धरती पर। बीच आसमान में अचानक एक चीख सुनाई दी। ‘‘क्या हुआ?’’ प्रयास ने जाकर देखा—इस कमरे में भी वही आग की लपट है। आयरन करते हुए छोटी सी कोई गलती कर देने पर पल्लवी आयरन से लीना को डरा रही थी। वह तुरंत रसोईघर में घुसा, फ्रीज खोला। बर्फ के टुकड़े लाकर लीना के हाथ पर रगडे़ और सोचा कि मेरी बहन ने अपने उस खूबसूरत दिल को कहाँ गँवा दिया? क्यों दूसरे हजारों पत्थर दिल लोगों में वह शामिल हो गई? क्यों सात सुरों से भरी बाँसुरी को तोड़ दिया?

जानेवाले दिन पल्लवी और संग्राम तैयार हो रहे थे प्रयास को स्टेशन छोड़ने के लिए, लेकिन उन्होंने मना किया। कहा, ‘‘मैं चला जाऊँगा।’’ टैक्सी के लिए टैक्सी स्टेंड फोन किया है।

सही समय पर टैक्सी आई। प्रयास ने विदा लिया। दोनों ने हाथ हिलाए, करुण आँखों से लीना ने भी।

लगभग ढाई घंटे बाद दरवाजे पर दस्तक हुई। कॉल बेल बजी। जूतों की आवाज सुनाई दी। पल्लवी ने जाकर दरवाजा खोला, ‘‘कौन?’’

सामने पुलिस है

‘‘आप ही मिसेज पल्लवी दास हैं?’’

‘‘हाँ, बोलिए!’’

‘‘आप और आपके पति संग्राम दास के नाम पर भारी अभियोग है।’’

‘‘क्या...?’’

‘‘एक नाबालिग लड़की को आप लोगों ने घर पर रखा है। काम करवाते हैं। संग्राम दास पर यौन-उत्पीड़न का अभियोग है। यह खबर प्रमाण के साथ आई है हमारे एस.पी. साहब के पास।’’

‘‘गलत, सब गलत है। किसने...किसने अभियोग किया है?’’

‘‘प्रयास त्रिपाठी ने!’’

यह सुनते ही आसमान से गिर पड़े बादल। आठ-दस टुकड़े होकर टूट गई धरती। और पल्लवी धड़ाम से नीचे बैठ गई।

सी-३०१, कृष्णा यशोधन बिल्डिंग, अब्रोल

सोपारा रोड, बालिंज, विरार (प.),

पालघर, महाराष्ट्र-४०१३०३

दूरभाष : ०९८२२०१६००३
गायत्री सराफ

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