अपने-अपने अवसाद

अपने-अपने अवसाद

आतंक, अवसर, अवसाद का कोई भरोसा नहीं है कि कब किस पर आ टपके। आतंकी हादसे की सफलता की अनिवार्यता है कि किसी को गुमान तक न हो, जब विनाश की गन चले। कौन कह सकता है कि कब किसी का सबसे बड़ा शत्रु बड़ा बाबू टैं बोलकर उसे प्रमोशन से कृतार्थ कर जाए? कभी-कभी हमें भ्रम होता है कि संसार का सबसे महान् शोधकर्ता समय है। आदमी व्यर्थ ही नए-नए आविष्कार करने का मुगालता पालता है। यदि कुछ नई शोध की वाकई कूबत होती तो इतने दिनों तक प्रतीक्षा क्यों करता? वह तो समय ने सुझाया न्यूटन, आर्कमिडीज या आइंस्टाइन को नई खोज का और नाम उनका हो गया।

गन पाउडर जैसी विनाशक वस्तु की ईजाद सातवीं शताब्दी में चीन में हुई थी। कोई सोचे कि यदि ऐसा न होता तो क्या युद्ध की कल्पना तक इतनी विध्वसंक और भयावह कभी होती? चीन की विस्तारक और आक्रामक प्रवृत्ति के पीछे राष्ट्रीय अवचेतन में कहीं-न-कहीं गन पाउडर की खोज है, वरना कैसे संभव था कि नेहरू पंचशील का राग आलापते रहे और हाँ में हाँ मिलाकर चीन पूर्वोत्तर की सीमा में उन्हीं की पीठ में छुरा घोंप दे! इसीलिए आधुनिक चाणक्यों की मान्यता है कि देशों में दोस्ती-दुश्मनी न होकर सिर्फ विभिन्न राष्ट्रीय हितों के स्वार्थ का टकराव है। चीन और पाकिस्तान की मित्रता इस तथ्य का एक आदर्श उदाहरण है। चीन का लक्ष्य भारत से दोस्ती का दिखावा मात्र है, जबकि पाकिस्तान को वह उकसाता रहता है, आतंक के विषधर पालकर भारत को लगातार डंक मारने को। प्रगति की प्रतियोगिता में भारत को पीछे रखने की इससे खतरनाक रणनीति क्या हो सकती है? ‘तरक्की के कसाई और कहने को भाई-भाई’, शायद इसी दृष्टिकोण को परिभाषित करता है। यों इसका साक्ष्य भी उपलब्ध है। तभी तो कहावत है कि ‘पढ़े-लिखे को फारसी क्या और हाथ कंगन को आरसी क्या।’

जहाँ तक अवसाद का प्रश्न है, तो इस विषय में जब डॉक्टरों का ही ज्ञान आधा-अधूरा है तो सामान्य इनसानों का अज्ञान क्षम्य है। हमारे मोहल्ले के एक सज्जन हैं। कभी-कभी वे गर्मजोशी में मिलते हैं, तो कभी अपने-अपने अजनबी से भी बदतर तरीके से। देखकर भी न देखना कोई उनसे सीखे। चौराहे के पानवाले को यही शिकायत है, ‘‘कभी-कभी खूब चहकते-बोलते हैं, घर का हाल-चाल पूछते-बताते हैं, कभी-कभी सिर्फ  पान उठाकर चलते बनते हैं। अजीब सनकी किस्म के इनसान हैं।’’ पानवाले को कोई कैसे समझाए कि इस व्यवहार में उनकी गलती नहीं है, वह एक रोग से ग्रसित हैं, जिसे अवसाद का नाम दिया जाता है। उन्हें इस रोग की खुद तक खबर नहीं है तो दूसरों को कैसे हो? नहीं तो यदि जानते तो शर्तिया डॉक्टर के पास सिधारते।

सरकारी सेवा में अधिकतर इलाज फ्री इंडिया है। मुफ्तखोरी, चुगलखोरी और हरामखोरी के समान, रोग का सरकारी निदान, सरकारी सेवकों का राष्ट्रीय मिशन है। वह तो सरकारी खजाने पर खैर हुई कि उन्हें आभास तक न हुआ अपने मर्ज का, वरना अवसाद की दवा वह खुद भी खाते और पत्नी, बच्चों को भी खिलाते। कौन कहे यह छूत की बीमारी हो? डॉक्टर के इनकार करने से क्या फर्क पड़ता है? वह तो दवा की खरीद में कम-खर्ची की शासकीय नीति के अनुपालन को कटिबद्ध हैं। वह क्यों रुचि ले? न उसका कट है, न कमीशन। सरकार में कुछ बजारू-विशेषज्ञ भी कार्यरत हैं। उन्हें दवा से लेकर नोट-शीट तक बेचने से परहेज नहीं है। उलटे वह ‘एक्सपर्ट’ इसीलिए कहलाते हैं, क्योंकि वह सहयोगियों से भी एकत्र कर दवाओं का अच्छा रेट दिलवाते हैं। ऐसी रियायत दुकानदार क्यों न दें? वे जानते हैं कि दवाओं में सौ फीसदी से अधिक मुनाफा है। यह एक त्रासद तथ्य है कि सरकार को बेचने में उसी के कर्मचारी ही सक्रिय हैं। नोट-शीट, गुप्त जानकारी, बॉलपेन से लेकर दवाएँ तक बाजार में बिकती हैं। कुछ तो कहते हैं कि यदि सही रेट मिले तो सरकारी कर्मचारी खुद ही, दूसरे देशों की खुफिया एजेंसियों के हाथ स्वेच्छा से बिकाऊ हैं। खरीद जनहित के प्रस्ताव, टैंडर की स्वीकृति और भुगतान, खुद के कर्मियों आदि का बकाया फिर ‘फ्री’ या ‘गुण-दोष’ के आधार पर कैसे हो? कोई जन्मजात आशावादी है तो बैठा रहे आस लगाए। वह भले अवसाद में डूबे, पर सरकार में होना-जाना कुछ नहीं है।

हमें लगता है कि शीरी-फरहाद और लैला-मजनू जैसे प्रेम के धुरंधर जरूर अवसाद के शिकार रहे होंगे। नहीं तो मजनू मियाँ क्यों गिट्टी-पत्थर से पिटने तक पर उफ  करे बिना, केवल चुपचाप पिटते रहते? आज कोई ऐसा दुस्साहस करके दिखाए! पहले तो पुलिस भीड़ को नहीं छोड़ेगी और यदि वरदी से लेन-देन कर कुछ प्रमुख पीटनेवाले छूट भी गए तो आधुनिक आशिक कट्टे-चाकू से अपने साथियों के साथ ऐसों को लहूलुहान करने से बाज नहीं आएगा। यों आज की लैलाएँ भी कोई कम समझदार नहीं हैं। वे भी प्रेम में तभी अंधी होती हैं, जब मजनू के पास पारिवारिक माल-पानी का प्रबंध है या फिर ढंग की नौकरी है। नहीं तो उन्हें विश्वास है कि इश्क के कीटाणु सिर्फ  किसी मानसिक मर्ज के द्योतक हैं। यह भी संभव है कि ये अवसाद के प्रारंभिक लक्षण हैं, विवाह के बाद क्या ठिकाना कि मजनू पूरी तरह अवसाद-ग्रस्त न हो जाए और विक्षिप्तों जैसी हरकत करने लगे। कभी चुप रहे, कभी चीखे और कभी मारपीट पर आमादा हो।

 

अवसाद का अन्य कारण वर्तमान की सामाजिक संरचना है। देखने में आया है कि कुछ स्वयं ही दूसरों की तुलना में जन्मजात गौरव से भरे होते हैं। यह समझने की बुद्धि उनमें है कि जीवन की वास्तविकता में वह किसी से भी बड़े न होकर, नौकरी आदि के क्षेत्र में दूसरों से कई गुने छोटे हैं। फिर भी, वह अपने जन्म की श्रेष्ठता में मगन हैं। वह यह भूलते हैं कि किसी का भी, कोई भी परिवार में जन्म होना महज एक दुर्घटना है। इस पर क्या इतराना? आत्मा की अवधारणा तो और जोखिम भरी है। काया की केंचुल उतरना अनिवार्य है। पुनर्जन्म छिपकली के खोल में भी मुमकिन है और छछूँदर की शक्ल में भी।

 

भारत में विवाह बहुधा दो अनजान व्यक्तियों के साथ जीवन बिताने का अभियान है। इसकी कामयाबी घरेलू सह-अस्तित्व का प्रयास है, प्रयत्न है, कोशिश है। इसके दोनों के अलग-अलग व्यक्तित्व यदि स्वयं को नई चुनौतियों के अनुरूप नहीं ढाल पाए तो जीवन और समाज में उनकी सफलता संदेहास्पद है। विवाह के दोनों प्रमुख पात्रों को समझौते की कला में सिद्धहस्त होना आवश्यक है, वरना जीवन एक सतत संघर्ष का कुरुक्षेत्र बन जाता है। युद्धरत जीवन से बचने का इकलौता रास्ता शांतिपूर्ण पारंपरिक समझौता है, जिसे स्वीकार करना दोनों पक्षों की विवश दरकार है। कौन जाने, घरेलू स्तर पर शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की सफलता से प्रेरित होकर हमने इसे देश की विदेश नीति का प्रमुख आधार बना लिया है? यों ‘विवाह और विदेश नीति’ के संबंधों पर आधिकारिक टिप्पणी कोई इस विषय का विद्वान् ही करने में समर्थ होगा, ऐसी अपनी निजी मान्यता है।

हमारा विश्वास है कि लड़के-लड़की के परिवारों द्वारा तय की गई शादियाँ प्रेम-विवाहों की तुलना में अधिक सफल हैं। मुमकिन है कि इसका कारण बिना किसी अपेक्षा के शादी के बंधन में बँधना है। वहीं प्रेम विवाह एक आदर्श सुखी जीवन बिताने की अपेक्षा से शुरू होता है। अनुभव की सीख है कि जिंदगी के तराजू में दुःख का पलड़ा हमेशा भारी रहा है, और रहता आया है, नहीं तो सुख की अनुभूति कैसे हो? अपना विनम्र सुझाव है कि हिंदी में हर संभव-असंभव विषय पर पीएच.डी. हो चुकी है तो हम देश की विदेश-नीति को क्यों बख्शें? कोई आचार्य अपने शिष्य से क्यों नहीं ‘भारत के पारंपरिक विवाह और विदेश नीति’ के विभिन्न आयामों पर शोध करवा सकता है? शैक्षणिक क्षेत्र में यह एक प्रथम और सर्वथा मौलिक शोध होगा। क्या पता, इसमें शोधार्थी कोई-न-कोई ग्रांट हथियाकर यूरोप या अमेरिका की सैर भी करने में समर्थ हो। रोजगार की बात करें तो विदेश मंत्रालय में शोध के दौरान समाज को उसकी वहाँ किसी पद पर नियुक्ति संभावित हो?

मनोरोग के एक विशेषज्ञ हमें बताते हैं कि वैवाहिक जीवन की असफलता अवसाद का एक प्रमुख कारण है। इस दशा में पत्नी को कभी-कभी संदेह होता है कि उसका पति घर में जबरन घुस आया सड़क का भौंकता हुआ कुत्ता है, या फिर कोई जंगल का आक्रामक भेडि़या। जब उसकी प्रजाति ही वन्य हिंसक जीवों की है तो उसका इनसान होना कोरी गप है? यह सिर्फ  मन का भ्रम है, धोखा है, छल है। पति की भी कभी यही मनोदशा मुमकिन है, जब उसके मन में भी ऐसे ही ऊलजुलूल खयाल आएँ। इतना ही नहीं, वह उन पर यकीन भी कर ले। इस हद तक कि यह काल्पनिक जीव उसे सच और वास्तविक लगने लगे।

मनोरोग की इस अवस्था में कुछ भी संभव है। पति या पत्नी का एक-दूसरे से खौफ खाना, घर से भाग निकलना या फिर आत्मरक्षा के लिए खुद को कमरे में बंद कर सुरक्षित समझना, अथवा पुलिस को फोन कर सुरक्षा की गुहार लगाना। कुछ भुक्तभोगी तो यहाँ तक कहते हैं कि शादी स्वयं ही अपनी जिंदगी बिताने की स्वतंत्रता में खलल है। कोई कब तक दूसरे की सधी जीवन-शैली के आगे घुटने टेके? महिलाएँ भी आज आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं। ऐसे में पारंपरिक जीवन-मूल्य और जीने की साझी पद्धति को निभाना और भी मुश्किल है। इस प्रकार विवाह के पहले दिन से अवसाद के कारण मौजूद हैं। कामयाबी यही है कि कोई कब तक इसे टालने की जुगत में सफल है।

अवसाद का अन्य कारण वर्तमान की सामाजिक संरचना है। देखने में आया है कि कुछ स्वयं ही दूसरों की तुलना में जन्मजात गौरव से भरे होते हैं। यह समझने की बुद्धि उनमें है कि जीवन की वास्तविकता में वह किसी से भी बड़े न होकर, नौकरी आदि के क्षेत्र में दूसरों से कई गुने छोटे हैं। फिर भी, वह अपने जन्म की श्रेष्ठता में मगन हैं। वह यह भूलते हैं कि किसी का भी, कोई भी परिवार में जन्म होना महज एक दुर्घटना है। इस पर क्या इतराना? आत्मा की अवधारणा तो और जोखिम भरी है। काया की केंचुल उतरना अनिवार्य है। पुनर्जन्म छिपकली के खोल में भी मुमकिन है और छछूँदर की शक्ल में भी।

ऐसे जब असलियत की खुरदरी जमीन पर आते हैं तो निराशा में डूबते हैं। कल तक जहाँ हर गली में गुलाब थे, अब सिर्फ काँटे हैं। इनसे कैसे निबाह करें? जन्म की श्रेष्ठता का उनका सपना केवल सपना है। उसमें सच का कोई भी अंश नहीं है। न वर्तमान में, न भविष्य में। उन्हें आभास होता है कि वह जिस नाव पर सवार हैं, उसमें छेद ही छेद हैं। सामाजिक न्याय नामक एक ड्रिलिंग मशीन है, जो रही-बची नाव में भी छेद करने में जुटी है। इन हालात में सवार और नाव का डूबना निश्चित है। विघटनकारी जातीय राजनीति से और हासिल भी क्या होना है? इस प्रकार के राजनेताओं के लिए देश देश न होकर, सिर्फ अपनी और परायी जातियों का एक झुंड है। उनकी एकमात्र हसरत दूसरी जातियों की नाव डुबोने की है। दुर्घटना को अतीत की धरोहर मानना और उसके आधार पर जनमी पीढि़यों को प्रताडि़त करना उनके चिंतन का नतीजा है। सामाजिक न्याय उनके लिए केवल नौकरियों में आरक्षण से मुमकिन है। जितना उसका फीसद बढ़ेगा, उतना सामजिक न्याय! यों कुछ अक्ल के दुश्मन इसे सामाजिक समरसता और सौहार्द का मूल-मंत्र भी मानते हैं। सबके अपने-अपने निहित स्वार्थ हैं। परमार्थ का नाम देकर सब उससे ही संचालित हैं। मक्खी-मच्छर की भिनभिन लगन से वह तत्पर हैं, दूसरे जातीय गिरोहों की नैया डुबोने में। जब तक ऐसे गिरोह सक्रिय हैं, देश की उन्नति सिर्फ  एक दिवा-स्वप्न है। जो निश्चित है, वह केवल डायबिटीज की तरह फलता-फूलता लाइलाज डिप्रेशन है। हमें खीज तब आती है जब देश के सर्वे-सर्वा नए भारत के निर्माण का दिलासा देते हैं। हमें लगता है कि पुरानी पारंपरिक किश्ती में सवार होकर जैसे कोई आधुनिक न्यूक्लियर पॉवर से संचालित जहाज से प्रतियोगिता की सोचे। अपनी सोच रखने को सब स्वतंत्र हैं, पर वास्तविकता से कुछ तो वास्ता हो!

हमें आश्चर्य है तो केवल एक है। चुनाव में सूपड़ा-साफ  होने के बावजूद हमारे राजनेता क्यों हँसते-खिलखिलाते रहते हैं? क्या उनकी शारीरिक और मानसिक बनावट सामान्य इनसान से अलग है? कभी-कभी संशय होता है कि इनके कान में केवल ठकुरसुहाती का प्रवेश है। जुबान है, जो आठ-दस लोगों को देखा नहीं कि धाराप्रवाह चलने को मजबूर है। दिल की जगह कोई ऐसा यंत्र है, जो संवेदना-विहीन है, पर साँस लेने-छोड़ने के लिए पर्याप्त है। मुमकिन है कि उनका हँसना-मुसकराना हमारी ही मूर्खता दरशाता है। वोट न दिया, न सही, पर चंदा तो इतना दे ही दिया कि अगले चुनाव तक काम आ सके। इसके पहले बेटे की फैक्टरी में उसका उपयोग हो। चुनावों के खर्चे की एक-एक पाई का हिसाब बनाने को चार्टर्ड अकाउंटेंट तो है ही।

सत्तासुख न भोगने की पीड़ा है तो उसे बर्दाश्त करना ही पड़ेगा। एक बार दल सत्ता में आया था तो ठेकेदार ने आलीशान बँगला बनवा दिया था, दूसरी दफा कमर्शियल कॉम्प्लेक्स। गुजारे के लिए आय काफी से अधिक है, लाखों का तो किराया ही आता है। घर में न सेवकों की कमी है, न वाहनों की। इस बार सोचा था कि सत्ता में आए तो हैलिकॉप्टर की कंपनी बनाएँगे। अपने चुनाव का खर्चा बचेगा और दूसरों को उपयोग के लिए देकर भाड़ा अलग। एविएशन क्षेत्र के एक विशेषज्ञ से प्रारंभिक बात ही नहीं, योजना भी तैयार की कि चुनाव-परिणाम ने सब गुड़-गोबर कर दिया। जनमत के सर्वे उनको पहले ही जिता चुके थे। चुनाव-प्रचारकों ने भी उन्हें सकारात्मक प्रतिक्रिया दी थी। चुनावी नतीजों ने सब पर तुषारपात कर दिया। दरअसल, उनके कान में जनता की आवाज जा ही नहीं पाई। वहाँ प्रशंसा के अलावा हर स्वर का प्रवेश-निषेध है।

उनका मन एक नई संभावना की उधेड़-बुन में है। क्यों न जनता का धन जनता के ही कल्याण में लगाया जाए? वह खाली पड़े प्लांट पर कॉलेज का निर्माण कर सकते हैं। सुना है कि शिक्षा के क्षेत्र में भी काफी लाभप्रद कमाई है। समाज सेवा की छवि अलग है, अपनों को नौकरी देने की भी। संस्था चल निकली तो प्रवेश देकर एहसान भी मुमकिन हैं सैकड़ों पर। निरक्षर समाज भक्षक को और चाहिए ही क्या?

फिर उन्हें एविनेशन कंपनी का खयाल आता है। चुनाव के अलावा भी इसके उपयोगी प्रयोग हैं। सरकार अपनी नहीं तो क्या हुआ, कट्टर विरोधियों से भी उनके मित्रवत् रिश्ते हैं। क्यों न हों, दलों में सुविधानुसार आना-जाना लगा ही रहता है। सिद्धांत, उसूल सब वोटर को उल्लू बनाने के जुगाड़ का ढाँचा है, अंदर तो सबमें सत्ता के स्वार्थ के कलपुरजे हैं। यदि एक-दूसरे के काम न आए तो सियासत का लाभ ही क्या है? हवाई कंपनी में सबका योगदान होगा। सियासी धंधे में भी डॉक्टरों जैसा भाईचारा है। बीमार फँसे तो एक डॉक्टर खुद तो फीस आदि वसूलता ही है, दूसरे विशेषज्ञ के पास रैफर कर उसकी भी कमाई करवाता है। इसके अलावा भी दवा की दुकानें हैं, जाँच के केंद्र हैं। यहाँ हर स्थान पर ‘कमीशन’ नियत है। इसीलिए डॉक्टर राजनीति के समान एक परोपकारी धंधा है।

यही वजह है कि नेता भ्रष्टाचार का भले हो, अवसाद का शिकार बहुत कम होता है। यों उसमें अवसाद को भी साधने की प्रकृति-प्रदत्त प्रतिभा है। जब उसे निजी स्वार्थ के इतर कुछ महसूस ही नहीं होता है तो अवसाद उसका क्या बिगाड़ लेगा? वह ‘न सावन हरे, न भादौं सूखे’ की प्रकृति का है। नेताओं का भाषा-ज्ञान जैसे ‘अ’ से आम, आमदनी और आय तक सीमित है, इसमें अवसाद का शब्द ही नहीं है। उन्हें इसका कोई डर भी नहीं है, उलटे जाँच करनेवाले डॉक्टर को उनसे मिलकर अवसाद में डूबने का गंभीर खतरा है। इसीलिए संपर्क के बावजूद, डॉक्टर नेताओं के इलाज से कतराते हैं। पता नहीं कब, जिसकी संभावना तक नहीं थी, उन्हें उसी अवसाद का रोग लग जाए! इसे हमारे ऐसे ही जन-भक्षकों की, देश की व्यवस्था में स्थायी देन ही कहेंगे कि हर संभव प्रयास के बावजूद सरकार की ख्याति घटिया गुणवत्ता के बिकाऊ माल से बेहतर नहीं है। इन परिस्थितियों में प्रशासन से सुशासन की कल्पना किसी ऐसे निराकार की साधना है, जिसका साकार होना सर्वथा असंभव है।

९/५, राणा प्रताप मार्ग

लखनऊ-२२६००१

दूरभाष : ९४१५३४८४३८
—गोपाल चतुर्वेदी

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