शेरजंग गर्ग : अपनी किस्म के एक अदद व्यंग्य-गुरु

शेरजंग गर्ग : अपनी किस्म के एक अदद व्यंग्य-गुरु

डॉ. शेरजंग गर्ग यानी सदा मुसकराता एक नूरानी चेहरा, भीतर तक बींधनेवाली सुंदर बड़ी आँखें, तीखे नक्श, प्रभावी अंदाज और प्रतिभा का एक रोशन पुंज, जिसे देखना, सुनना किसी सुखद अनुभव से कम नहीं था। कालिदास ने ऐसे ही व्यक्तित्व के लिए मेरी ओर से कभी लिखा था—‘क्षणे-क्षणे यत्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः।’ इसीलिए संभवतः डॉ. गर्ग सदैव मनोहारी और रमणीय बने रहे।

वे एक श्रेष्ठ कवि, उत्कृष्ट गीत व गजल लेखक, अनुकरणीय आलोचक, आदर्श बाल-साहित्यकार, सुधी समीक्षक, प्रखर वक्ता, कुशल प्रबंधक और एक सच्चे शोध-मनीषी थे। उनकी पुस्तकें ‘व्यंग्य के मूलभूत प्रश्न’ और उससे पूर्व ‘स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कविता में व्यंग्य’ हम उनके परवर्ती व्यंग्यकर्मियों के लिए कुरान और बाइबिल साबित हुई हैं।

डॉ. शेरजंग गर्ग से पूर्व किसी ने व्यंग्य पर शोध-कार्य नहीं किया। उनके शोधग्रंथ के प्रकाशित होने के पूर्व किसी ने भी व्यंग्य का ऐसा ठोस शास्त्रीय आधार नहीं रखा था। हास्य-रस से संदर्भित कतिपय ग्रंथ प्रकाश में आए, किंतु वे प्रायः उन अध्येताओं के थे, जिन्होंने व्यंग्य को हास्य-रस का ही एक विभेद माना था! जी.पी. श्रीवास्तव, एस.पी. खत्री, बरसानेलाल चतुर्वेदी, प्रेमनारायण दीक्षित आदि ने हास्य पर ही कार्य किया और उल्लेखनीय कार्य किया, परंतु किसी ने भी व्यंग्य को गहराई में जाकर न खँगालने की कोशिश की, न ही महत्त्व दिया।

एकमात्र डॉ. शेरजंग गर्ग ऐसे थे, जिन्होंने व्यंग्य को समझने और समझाने का भरसक प्रयास किया। उनके शोधग्रंथ को प्रकाशित हुए पूरे चालीस वर्ष बीत गए हैं, परंतु वह आज भी समीचीन है। व्यंग्य का अध्ययन करना हो तो उनके शोध-कार्य को देखे बिना काम नहीं चलता। अपने शोध में जो स्थापनाएँ उन्होंने दीं, वे आज तक पथ-प्रदर्शक हैं।

अनेक शहरों में आयोजित अनेकानेक गोष्ठियों, सम्मेलनों आदि में मुझे डॉ. गर्ग का सान्निध्य मिला। विशेष रूप में लखनऊ में आयोजित ‘माध्यम’ की अनूप श्रीवास्तव द्वारा संयोजित व्यंग्यालोचन गोष्ठियों में कई वर्ष उनके साथ जाना हुआ। हर बार उनसे कुछ-न-कुछ नया सीखने को मिला। गोष्ठी में उनका होना ही गरिमा प्रदान करता था।

एक श्रेष्ठ नागरिक, जिसके सामाजिक सरोकार बृहत् थे, जो पारिवारिक स्तर पर एक श्रेष्ठ पुत्र, समर्थ पिता, समर्पित पति और एक आत्मीय मित्र के भिन्न-भिन्न रूपों में मैंने डॉ. गर्ग को देखा। यों तो मैंने डॉ. गर्ग को उनके एक श्रोता के रूप में लालकिला के कवि-सम्मेलनों में श्रद्धेय श्री गोपालप्रसाद व्यास के युग से जाना है। उनके दर्जनों सम्मेलनों में सजग श्रोता बनकर गया हूँ। बालस्वरूप राही, शेरजंग गर्ग और कुँअर ‘बेचैन’ मेरे पसंदीदा कवि-सम्मेलनीय प्रस्तोता रहे हैं। तीनों ही साहित्यिकता के क्षेत्र में भी मुख्य मार्ग पर डटे हुए। डॉ. गर्ग के कहने का अंदाज और उनके मार्मिक भावों ने मुझे बहुत भीतर तक छुआ।

उनसे रू-ब-रू परिचित होकर उनकी डायरी में अपना नाम डलवाने में मुझे काफी वक्त लगा। सन् १९७३-७४ की बात है, मैं कॉलेज ऑफ वोकेशलन स्टडीज में ‘हिंदी साहित्य सभा’ का परामर्शदाता था। अतः महाविद्यालय कविता प्रतियोगिता का आयोजन था। मेरे मन में इच्छा थी कि अध्यक्ष के रूप में डॉ. शेरजंग गर्ग पधारें। मैंने इस आशय का एक निवेदन-पत्र डॉ. गर्ग को अपने विद्यार्थी सुबोध शर्मा, जो सभा के सचिव थे, के हाथ उनके कार्यालय, जो कनॉट सर्कस के समीप था, में भिजवाया।

सुबोध शर्मा जब लौटकर आए, उनका चेहरा मुरझाया हुआ था, मूड खीझ के वश में था। मेरा कॉलेज समीप ही गोल मार्केट एरिया में था, तब भी सुबोध क्लांत व दुर्बोध लग रहे थे। मेरे पूछने पर सुबोध ने बताया, ‘‘डॉ. गर्ग तो जैसे आपको पहचानते ही नहीं। जब उन्होंने पूछा कि कौन हरीश नवल? सर, मैंने उन्हें बताया कि वही व्यंग्यकार, जो पत्र-पत्रिकाओं में लिखते हैं, आप उन्हें नहीं जानते? वे बोले कि नहीं जानता। बस सर, मैं फिर आपका पत्र वापस लेकर आ गया। आप हमारे सर हैं, पर वे नहीं जानते, फिर उन्हें बुलावे का क्या फायदा?’’

मैं सन्न रह गया। नादान सुबोध के लिए मैं एक बड़ा लेखक था, क्योंकि उसके कुएँ में मेरा ही दखल था। मैं उसका अध्यापक था, इसलिए उसने गैर-इरादतन ऐसी हरकत की थी।

मैं अगले दिन स्वयं पत्र लेकर डॉ. गर्ग के दफ्तर पहुँच गया। वे अपने कैबिन में व्यस्त थे। मेरा फोन रिसेप्शन से वहाँ पहुँचा, उन्होंने उठाया तो मैंने अपना नाम बताया, उद्देश्य बताया...वे बोले, ‘जरा ठहरिए...’ फोन बंद हो गया। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में हुआ, पर यह मूढ़त्व लगभग डेढ़ मिनट तक ही रहा। डॉ. गर्ग खुद रिसेप्शन पर मुझे लिवाने आ गए। मैं उनके भव्य परिवेश में गुम हो गया। वे बोले, ‘‘मैं कॉलेज आऊँगा, तुम्हें देखकर तो पहचान ही जाता, पर वह तुम्हारा विद्यार्थी बड़ी शान से रोब मार रहा था, जैसे हरीश नवल पता नहीं, कितने बडे़ लेखक हैं! मैंने उसे कहा भी था कि अभी अपने सर को नाम तो बनाने दो, पर वो तुम्हें...’’ कहकर वे अपने अंदाज में धीमे-धीमे रुक-रुककर हँसने लगे।

बहरहाल, वे वोकेशनल कॉलेज में आए। उनकी कविताएँ और उनके अध्यक्षीय भाषण ने सबको मोहित कर दिया। कॉलेज प्रिंसिपल डॉ. मल्होत्रा तो उनके मुरीद हो गए।

जल्द ही डॉ. गर्ग से पुनः मुलाकात हो गई। इंजीनियर्स इंडिया की ओर से अशोक रैना ने कार्यालय अधिकारियों की रचना प्रतियोगिता रखी थी, जिसमें डॉ. गर्ग के साथ मैं भी एक निर्णायक था। उस दिन भी मुख्य निर्णायक के रूप में उनका अभिभाषण बहुत कुछ दे गया। सिलसिला कुछ ऐसा निकला कि फिर बालस्वरूप राही और स्व. भूपेंद्र स्नेही, जिनके मैं निकट था, के कार्यालयों की बैठकों में डॉ. शेरजंग गर्ग से कई मुलाकातें हुईं तथा कॉफी हाउस के अतिरिक्त प्लाजावाली गली में महावीर रेस्टोरेंट में भी लघु महफिलें समोसों व गुलाबजामुन के साथ सजने लगीं।

उन्हीं दिनों मैंने डॉ. गर्ग की पुस्तक पढ़ी और उनसे बाकायदा चर्चा की। उनकी बातें बहुत मार्के की लगीं। व्यंग्य के विषय में उन दिनों तो वे ब्रह्मज्ञान वितरित करने में विलंब नहीं करते थे। बाल-साहित्य पर भी उनकी बहुत पैठ थी, उनकी रचनाएँ बडे़ चाव से पढ़ी जाती रही हैं। व्यंग्य और बाल-साहित्य दोनों विषय उन्हें रुचिकर थे। मालवीय नगर के उनके घर में गया तथा साऊथ एक्सटेंशन के भी, और नोएडा के घर में दो गोष्ठियों में सम्मिलित हुआ, जहाँ डॉ. गर्ग ने आग्रह से मेरा व्यंग्य-पाठ भी करवाया। वे मुझे नाम कमाने केअवसर देने लगे। मुझे ही नहीं, मेरी पीढ़ी को भी उन्होंने व्यंग्य-क्षेत्र में उत्साह बढ़ाकर आगे बढ़ाया। रेडियो, टी.वी. आदि के लिए भी डॉ. गर्ग ने नव-लेखकों के नाम अकसर प्रस्तावित किए। बरसों पूर्व उन्होंने मुझसे किसी टी.वी. धारावाहिक के लिए व्यंग्य माँगे। मैंने कहा कि मुझे लगता नहीं कि इन पर टी.वी. के लिए कुछ बन सकता है। इस पर उनका कहना था कि इसका फैसला तुम नहीं निर्माता-निर्देशक करेंगे! कालांतर में उनके माध्यम से मेरा विश्वास और बढ़ा और मैंने व अभिन्न मित्र प्रेम जनमेजय ने मिलकर दो दर्जन से अधिक टी.वी. स्क्रिप्टें लिखीं, जिनमें हमारे अपने भी व्यंग्य शामिल थे।

वोकेशलन कॉलेज छोड़कर मैं हिंदू कॉलेज में आ गया और यहाँ भी ‘हिंदी साहित्य सभा’ देखने लगा। हिंदू कॉलेज में वार्षिक उत्सव (स्थापक दिवस) पर वृहत् कार्यक्रम होता है। विद्यार्थियों ने हास्य कवि-सम्मेलन के अयोजन का प्रस्ताव मेरे समक्ष रखा। मैं तथाकथित ऐसे हास्य कवि-सम्मेलन, जिसमें कविता कम और चुटकुले अधिक होते हैं, के प्रसार में हाथ नहीं बँटाना चाहता था। मैं एक गंभीर साहित्यिक, किंतु रंजकत्ववाला कवि-सम्मेलन करना चाहता था। मैंने डॉ. शेरजंग गर्ग से सलाह ली, उन्होंने कहा, ‘‘हास्य के स्थान पर ‘सरस कवि-सम्मेलन’ करो और वीर, शृंगार, हास्य, नीति आदि को सम्मिलित करके विद्यार्थियों को एक नई सोच दो।’’

मैंने ऐसा ही किया। बालस्वरूप राही, शेरजंग गर्ग, विजय किशोर मानव, हरिओम पंवार, अशोक चक्रधर और सरोजिनी प्रीतम को लेकर ‘सरस बनाम सवरस कवि-सम्मेलन’ का आयोजन किया। युवा पीढ़ी जागरूक होती है—जैसा, जिस ढंग से परोसेंगे, वह ग्रहण करेगी। स्थापना दिवस के चार दिन के आठ कार्यक्रमों में सबसे अधिक धूम व चर्चा उस सम्मेलन की रही, जिसमें सभागार खचाखच भरा था और कहीं मर्यादा भंग न हुई...बस तब कई वर्ष तक प्रतिवर्ष ऐसा कवि-सम्मेलन होता रहा, यही नहीं, बल्कि डॉ. गर्ग के कहने पर हिंदू कॉलेज ने व्यंग्य-पाठ की भी एक परंपरा डाल दी, जिसमें प्रथम अवसर पर नरेंद्र कोहली, प्रेम जनमेजय, मनोहरलाल और मेरे अतिरिक्त शेरजंग गर्ग भी थे। अध्यक्षता कन्हैयालाल नंदन ने की थी।

एक बार मुझे और शेरजंग गर्ग को एक साथ एक कमरे में ठहराया गया था। यह जयपुर में हो रहा ‘माध्यम व्यंग्य-सम्मेलन’ था। तीन दिन दो रात हम साथ-साथ रहे। उन दिनों केवल टी.वी. नया-नया आया था, देर रात तक डॉ. गर्ग उसमें एक कार्यक्रम देखते थे, जो समाचारों पर केंद्रित था। उनके साथ उनके एक परिजन के घर भी गया था। जिस सम्मान और शान से डॉ. गर्ग को और उनका मित्र होने के नाते मुझे सत्कार शिरोमणि बनाया गया था, वह सदा याद रहेगा। परिवार में भी डॉ. गर्ग का अत्यधिक यश था। ‘मैरिटी विंगज एट होम।’ कितने ही अभागे रचनाकार हैं, जिनकी पूछ बाहर है, परंतु घर में नहीं।

डॉ. गर्ग का जीवन और उनका निजी लेखन दोनों प्रशस्त हैं, अभिनंदनीय हैं। उनकी एक स्थापना ने मुझे बहुत प्रभावित किया। उनका कहना था कि ‘जीवन और साहित्य दोनों में व्यंग्य महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।’ यहाँ व्यंग्य उनके विचार रूप में है। वास्तव में जीवन के त्रासद, करुण और भयावह दंशों का आभास व्यंग्य द्वारा बहुत प्रभावी होता है। डॉ. गर्ग मानते हैं कि जीवन की समझ व्यंग्य से बखूबी होती है। मुझे लगता है कि तभी उनको जीवन की खूब समझ थी। वे जीवन जीना जानते थे, वे जो सीखना चाहें, उसे जीने के गुर भी सिखा देते थे। देखा गया है कि साहित्य में भी वे व्यंग्यकार अधिक सफल हैं, जिनकी सूक्ष्म पर्यवेक्षण दृष्टि विपरीत में से व्यंजक तत्त्व खोज निकालती है।

डॉ. गर्ग के अनुसार व्यंग्य में त्रासदी और कामदी का योग होता है या हो सकता है। व्यंग्य की परिणति करुणा में होती है, माननेवाले मेरे जैसे कुछ लोग विवाद कर सकते हैं, परंतु जब हम भाव और शिल्प के विषय में व्यंग्य संदर्भित विचार करते हैं, कथन में सच्चाई नजर आने लगती है।

व्यंग्य और हास्य के संबंध को लेकर प्रश्न उठते रहे हैं। डॉ. शेरजंग गर्ग की एक और स्थापना इस विषय में मेरी धारणा को बलवती करती है। उनका मानना था कि रस की दृष्टि से व्यंग्य में हास्य-रस की दरकार जरूरी नहीं है। व्यंग्य को विधा न माननेवाले व्यंग्य विधाकार परसाई भी कहते थे कि बिना हास्य के भी श्रेष्ठ व्यंग्य लिखा जा सकता है। वे इसके उदाहरण अन्य व्यंग्यकारों की रचनाओं से देते भी थे।

डॉ. गर्ग से कई बार ऐसी चर्चाएँ होती थीं, जिसमें व्यंग्य की बारीकियाँ समझने में दिशा मिलती थी। कई बार विचार-भेद भी हुआ था और सरेआम गोष्ठियों में हुआ, पर उन्होंने कभी अपना बड़ापन हावी न रखकर अपने बड़प्पन का ही परिचय दिया। वे शिष्ट साफगोई को पसंद करते थे। कई बार मैंने कहा है कि डॉ. गर्ग का व्यंग्यालोचक कविता की आलोचना के इतर करता है, क्योंकि बिंब, अलंकार आदि पद्य में आलोचनीय होते हैं, गद्य में नहीं। उन्होंने कभी खुलेआम इसका विरोध न कर, व्यंग्य के प्रति अपने ज्ञान-कोश का पिटारा समृद्ध किया था। उस पिटारे को देखें तो ज्ञात हो जाता है कि भले ही उनका शोध कविता में व्यंग्य पर था, परंतु कहीं उनके अंतर्मन में गद्य व्यंग्यकार बसे हुए थे, इसीलिए उन्होंने अपने प्रबंध की भूमिका में कवियों से पूर्व हरिशंकर परसाई और शरद जोशी के नाम लिये थे।

डॉ. गर्ग का मानवतावादी पक्ष, जो उनकी रचनाओं को अधिक महत्त्वपूर्ण बनाता है, अनुकरणीय है। उनकी स्थापना मानवीय और युगीन विसंगतियों पर प्रहार के बावजूद व्यंग्य मानव-मूल्यों की स्थापना के लिए भी सर्वाधिक प्रयत्नशील रहा। इससे मेरी पीढ़ी के व्यंग्यधर्मियों को रास्ता मिला। जब-जब डॉ. गर्ग ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘हिंदुस्तान’, ‘दिनमान’ आदि पत्रिकाओं में मेरी व्यंग्य रचना देखते थे, बाकायदा पढ़ते और जब मिलते तो उसके विषय में बात करते, उनकी कमियों को भी बताते और ऐसा केवल मेरे साथ नहीं, बल्कि मेरी पीढ़ी के अनेक रचनाकारों के साथ हुआ और हमें अपने को परिष्कृत करने की दृष्टि निरंतर मिलती रही। अभी तो सीख रहे हैं, दीक्षा पूर्ण कहाँ हुई है। डॉ. गर्ग से सीखा कि आनेवाली पीढ़ी पर नजर रखो, यदि वे चाहें तो उसे मार्ग सुझाओ, अन्यथा नहीं।

कितने ही विभिन्न कोण हैं, जिनसे डॉ. शेरजंग गर्ग को समझा जा सकता है। जिन्होंने जाने कितने कोणों से और कोनों से व्यंग्य को परखा। जहाँ तक शिल्पगत प्रयोगों का सवाल है तो इस कोण पर डॉ. गर्ग स्थापित करते थे, व्यंग्य विधा में इसकी बड़ी छूट है। शिल्प की दृष्टि से व्यंग्य में भाषा के सर्वथा विस्फोटक उपभोग, तुकों की तोड़-मरोड़, बिंबों के साथ सपाटबयानी और व्यंग्य के संप्रेषण के लिए नाटकीयता एवं फंतासी के प्रयोगों की वे चर्चा करते थे। इन पर पक्ष व विपक्ष दोनों प्रकार के विचार मन में आ सकते हैं, विशेषतः जब बात गद्य व्यंग्य की हो। एक उनका बड़ा विचार एक पृथक् परिचर्चा की माँग करता था, जब वे कहते थे, ‘‘व्यंग्य का साधारणीकरण होना अनिवार्य नहीं है।’’ मुद्दा गंभीर है, बहुआयामी है, पर विचारोत्तेजक है...फिर कभी के लिए छोड़ सकते हैं, पर दोस्तो, जैसे शेरजंग गर्ग व्यंग्य को नहीं छोड़े, खुदा को हाजिर-नाजिर मानकर मैं अपनी पीढ़ी की ओर से कहना चाहता हूँ कि हम व्यंग्यकार डॉ. शेरजंग गर्ग को नहीं छोड़ सकते।

...और छोड़ेंगे भी नहीं। अभी उनके वर्तमान गुरुग्राम वाले घर में जाकर भाभी के हाथ के पकौडे़ भी खाने हैं। आमीन!

 

६५ साक्षरा अपार्टमेंट, ए-३,

पश्चिम विहार, नई दिल्ली-११००६३

दूरभाष : ९८१८९८८२२५
हरीश नवल

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