मातृ-दिवस (१४-५-२०१७)

मातृ-दिवस (१४-५-२०१७)

माँ की याद तो आती ही रहती है। मेरे लिए तो हर दिवस मातृ-दिवस होता है। वह तो न जाने कितने रूपों में मुझमें समाई हुई है। जब मैं सबसे उपेक्षित हो रहा था, तब उसी ने मुझे अक्षर-ज्ञान कराया था। मेरी सारी कविताओं, कहानियों, उपन्यासों, यानी कि समूचे रचनाकर्म में वही तो समाई हुई है। उँगली पकड़कर उसने मुझे क, ख, ग लिखना नहीं सिखाया होता तो मेरी शिक्षा-यात्रा और रचना-कर्म कैसे संभव हुआ होता। मेरे भी हाथ में लेखनी की जगह कुदाली होती, हँसिया होता, खुरपी होती, माथे पर खाद गोबर होता। और उसकी ममता का तो कहना ही क्या? घोर अभावों के दिनों में भी उसने जिस साहस और कार्य-कुशलता के साथ घर चलाया और हम भाइयों को कभी लाचार अनुभव होने नहीं दिया, वह तो अप्रतिम है। किसी भी प्रकार का संकट आने पर वह स्वाभिमान के साथ संकट और हमारे बीच खड़ी हो जाती थी। विवेकशील इतनी थी कि धर्म या समाज-प्रथा के नाम पर व्याप्त गलाजत को निर्भीक होकर ठुकरा देती थी। माँ, मैं तो तुम्हें रोज याद करता हूँ किंतु आज तुम्हारे लिए मेरी यह गजल भेंट है। तुम जहाँ कहीं हो, इसे स्वीकार करना माँ—

गाल पर ढलका हुआ एक दर्द का मोती है माँ,

घोर अँधियारों में जलती प्यार की जोति है माँ।

ओठ उसके, उसकी आँखें हैं भला उसके कहाँ,

घर के सुख-दुःख में समाकर हँसती है रोती है माँ।

बारी-बारी छोड़ जाते साथ हैं जब हमसफर,

मेरी रग-रग में दुआ सी तैरती होती है माँ।

भूख, बीमारी, तबाही सोखते रहते हैं रस,

ख्वाब फिर-फिर घर की बंजरभूमि में बोती है माँ।

दहशतें आ जाएँ आँखों में न बच्चों के कभी,

रातभर सोती हुई सी भी कहाँ सोती है माँ।

भागती सुबहें, बहुत बेचैन दिन, शामें थकीं,

भग्न रातें शीश पर अपने सदा ढोती है माँ।

दाग कितने ही लगा बाहर से आ जाते हैं लोग,

आँच में खुद को गला करके उन्हें धोती हैं माँ।

जलती रहती है अँगीठी सी रसोईघर के बीच,

देके पूरी जिंदगी कुछ भी कहाँ खोती है माँ।

माँ की चिट्ठी

तुम अपढ़ थीं माँ, मुझे कितना सालती रही है यह बात कि तुम्हारी कोई चिट्ठी मेरे पास नहीं है, लेकिन आज लगता है कि मेरा पूरा जीवन एक बड़ा-सा पन्ना है, जिस पर तुमने अपने को समूचा लिख दिया। लगातार झर रही है तुम्हारी खुशबू और फैलती जा रही है आस-पास।

मैं दादा बन गया

मैं दादा बन गया किंतु माँ अब भी बहुत याद आती है

मेरे बूढे़ कंधों पर सहसा कोई बच्चा चढ़ जाता

मेरी पोथी फेंक-फाँककर कोई बाल गीत पढ़ जाता

दरवाजे पर खड़ी हुई माँ देख-देखकर मुसकाती है

गोदी में मेरा सिर लेकर कहती, ‘बहुत दिनों पर आए

कैसे रहे, बहू कैसी है, कैसे हैं बच्चे मनभाए’

आँखों में ममता अपार भरकर मेरा सिर थपकाती है

आ जाती है याद रात वह, पास सुलाकर करुण कहानी

कहती थी माँ, मेरी आँखों से झरझर बहता था पानी

अब भी मेरी थकी रात में लगता वह लोरी गाती है

भर आते हैं रह-रहकर आँखों में गहन अभावों के दिन

किन-किन चोटों से बनते घर के शरीर पर घावों के दिन

लड़ती इन बेदर्द दिनों से माँ देखो हँसती जाती है

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