भावी पीढ़ी के लिए

भावी पीढ़ी के लिए

संघर्ष का नाम ही है जीवन

मनुष्य

यह क्यों भूल जाता है

कि वह

मात्र पंचतात्त्विक काया भर न हो

सर्व शक्तिमान परमात्म पुरुष का ही है

एक अंश!

क्यों भूल जाता है वह

कि उसका धरा पर अवतरण

उस परम प्रभु के ही

किसी प्रयोजन विशेष की संपूर्ति का ही है

एक माध्यम?

यह सब जानते हुए भी

क्यों बन जाता है मनुष्य

अपने निराश्रित बाल-गोपाल

वृद्ध-असहाय माता-पिता

तथा सात-सात जन्मों तक

साथ निभानेवाली अर्धांगिनी भार्या को—

बिलखता छोड़

कभी फंदा लगा

कभी गरल घूँट पी

कभी नदी में डूब तो कभी

केरोसीन छिड़क

देह को माचिस लगा लग

ले लेता है सदा-सदा के लिए

इस कर्म-संसार से विदा।

जीवन से संघर्ष न कर

भौतिक कष्टों से घबरा

दायित्वों को भुला

एकाएक पलायन कर जाना

कायरता नहीं तो और क्या है?

आत्महत्या उतारती नहीं

बढ़ाती ही है परिवार के सिर का बोझ।

कब चुका है लिया ऋण

कब हुई है पार

सांसारिक जिम्मेदारियों की बाढ़ी नदी।

जीवन पलायन का नहीं

संघर्ष का ही है दूसरा नाम।

ऐसे जियो बंधु

आज में भी जियो

तो ऐसे जियो बंधु,

आनेवाला कल

तुम्हें ही नहीं

तुम्हारे कर्मनिष्ठ

सेवा-सिद्ध जीवन की श्रेष्ठता को

बार-बार दुहरा

न केवल अपनी वाक्पटुता से

श्रोता मन को चमत्कृत करे

अपनी सशक्त

युगांतरकारी शब्दावली से

कुछ नवीन

रचनात्मक कर-गुजरने को

संप्रेरित भी कर सके।

वर्तमान में

सचेतन सक्रियता

तथा पूर्ण क्रियाशीलता के साथ

जीना ही है

सार्थक जीवन।

भावी पीढ़ी के लिए

बनता है यही

गहरी प्रतिष्ठा का विषय

प्रेरणास्पद, उदाहरणीय, अनुकरणीय।

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