मौलिकता : भारतीय और भारतेतर आचार्यों की दृष्टि

मौलिकता : भारतीय और भारतेतर आचार्यों की दृष्टि

संपादकीय कार्यालय अपने पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशनार्थ हमेशा ही ‘मौलिक’ रचना की माँग करते हैं। लेकिन ‘मौलिक’ सृजन से उनका तात्पर्य क्या है, इसे वे कितने व्यापक अथवा सीमित अर्थ में जानते हैं, यह एक बड़ा सवाल है। विभिन्न विद्वानों के कथन और शब्दकोशों में दिए गए अर्थों के आधार पर यदि ‘मौलिक’ शब्द पर विचार करें तो इसका मतलब होगा—‘विचार में स्वतंत्र सृजनात्मक कार्य’। रूप और शैली में इस कार्य के भव्य तथा सर्वथा नवीन होने की अपेक्षा की जाती है। यह बात उल्लेखनीय है कि साहित्य में विचार, दृष्टि और विवेचन की नवीनता भी मौलिक ही कही जाती है।

भारतीय आलोचकों का मत

मौलिकता के संबंध में आनंदवर्धन ने अपने ग्रंथ ‘ध्वन्यालोक’ में लिखा है—‘जहाँ नवीन स्फुरित होनेवाली काव्यवस्तु पुरानी यानी प्राचीन कवि द्वारा निबद्ध वस्तु आदि की रचना के समान निबद्ध की जाती है तो वह निश्चित रूप से दूषित नहीं होती।’ यानी उसे मौलिक ही माना जाता है। इसी प्रकार प्राचीन भाव को अपनी निराली नूतनता द्वारा चमत्कृत करनेवाले कवि को भी आनंदवर्धन ने मौलिक की श्रेणी में रखा है। उन्होंने कहा है कि जहाँ सहृदयों को ‘यह कोई नया स्फुरण है’, ऐसी अनुभूति होती है, तो नई या पुरानी जो भी हो, वही वस्तु रम्य कहलाती है। उनके अनुसार, पुराने कवियों से कुछ भी अछूता नहीं रह गया है, इसलिए नए कवियों को पुरानी उक्तियों का संस्कार करना चाहिए। इसमें कोई भी बुराई वे नहीं देखते हैं।

अभिनव गुप्त के अनुसार भी ‘पूर्व प्रतिष्ठापितयोजनासु मूल प्रतिष्ठाफलमामनन्ति, यानी पूर्व आचार्यों द्वारा स्थापित सिद्धांतों की मूल प्रतिष्ठा तथा उनकी प्रकृत विवेचना में भी मौलिक सिद्धांतों की विवेचना जैसा फल परिलक्षित होता है।’ राजशेखर ने भी लगभग ऐसा ही मत प्रकट किया है तथा अन्य विद्वानों ने भी राजशेखर और आनंदवर्धन के सिद्धांत का समर्थन किया है। उन्होंने इसे कवि-प्रतिभा के रूप में स्वीकार किया है। वे तो यह भी मानते हैं कि शब्द भी वही रह सकते हैं, अर्थ विभूति या काव्य विषय भी वही, अंतर केवल कहने के ढंग, यानी शैली में आता है।

मौलिकता की दृष्टि से राजशेखर ने कवियों के चार प्रकार गिनाए हैं—

१. उत्पादक

२. परिवर्तक

३. आच्छादक

४. संवर्गक

इनमें उत्पादक कवि अपनी प्रतिभा के बल पर काव्य में नवीन अर्थवत्ता का समावेश करता है। परिवर्तक कवि पूर्व कवि के भावों में इच्छानुरूप परिवर्तन करके उन्हें अपना लेता है। आच्छादक पूर्व कवि की उक्ति को छिपाकर उसी के अनुरूप उक्ति को अपनी रचना के रूप में प्रस्तुत करता है और संवर्गक कवि बिना किसी परिवर्तन के दूसरों की कृति को अपना लेता है। इस चौथे को राजशेखर ने चोर अथवा डकैत की संज्ञा दी है। मौलिकता की दृष्टि से राजशेखर ने उत्पादक कवि को ही श्रेष्ठ माना है। अन्य तीन प्रकार के कवियों में, उनका मानना है कि मौलिकता का अंश नहीं होता। अर्थ का अपहरण करनेवाले कवियों का भी राजशेखर ने अपने ग्रंथ में विस्तार से वर्णन किया है।

माना यह जाता है कि भाव-साम्य और अर्थ का अपहरण यदि काव्यगत उक्ति के सौंदर्य में वृद्धि करने में योग करता है, तो उसे मौलिकता की श्रेणी में रखा जा सकता है। भाव-साम्य के डॉ. नगेंद्र ने तीन प्रकार गिनाए हैं—

१. समान मानसिक परिस्थितियाँ, संस्कार, विचार-पद्धति और सामाजिक वातावरण के कारण आया भाव-साम्य।

२. दो या दो से अधिक कवियों द्वारा पूर्ववर्ती भावों को ग्रहण किए जाने के कारण आया भाव-साम्य।

३. पूर्ववर्ती साहित्य के गंभीर अध्ययन द्वारा संस्कार ग्रहण करने के कारण आया भाव-साम्य।

कभी-कभी समान मनःस्थिति के कारण समांतर प्रतीत होनेवाली बहुत-सी रचनाओं में एक ही प्रयास और एक ही अंतर्प्रेरणा महसूस हो सकती है।

विद्वानों ने भाव-साम्य के तीन प्रभाव गिनाए हैं—

१. सौंदर्य सुधार

२. सौंदर्य रक्षा

३. सौंदर्य संहार

इनमें से प्रथम दो में भी सौंदर्य सुधार की भूरि-भूरि प्रशंसा होती है, इसलिए साहित्य-मर्मज्ञों ने इन्हें ‘अच्छा’ स्वीकार किया है; लेकिन ‘सौंदर्य संहार’ को ‘साहित्यिक चोरी’ बताया है। रीति-युग की काव्यगत मौलिक चेतना से असहमति जतानेवाले आलोचकों ने रीति-कवियों को भाव-साम्य और अर्थ-अपहरण दोनों का दोषी माना है। बावजूद इसके पुरानी उक्तियों में अपनी सहज रसग्राहिता का समावेश करते हुए रीति-कवियों ने रस-चयन में जो कुशलता दिखाई है, वह अप्रतिम है। इस तथ्य को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी स्वीकार किया है।

काव्य की मौलिक चेतना का प्रादुर्भाव एक विशिष्ट जन्म-नक्षत्र में होता है; और उसी में जन्म लेकर कोई कवि या कथाकार सौंदर्यपूर्ण अभिव्यक्ति के द्वारा लोकप्रियता को प्राप्त होता है। आचार्यों ने प्रतिभा को लोकोत्तर शक्ति के रूप में चिह्नित किया है; और कवि-प्रतिभा के आधार पर ही उन्होंने किसी रचना में मौलिकता के अंश का विवेचन प्रस्तुत किया है। यह तो निश्चित है कि काव्य-सृजन की नव-प्रेरणा प्रतिभा के अभाव में तनिक भी संभव नहीं है। प्रतिभा अंतःकरण का वह आलोक है, जिसके कारण समस्त रचना मौलिकता के सौंदर्य से जगमगा उठती है। भारतीय काव्यशास्त्रियों में रुद्र ने प्रतिभा को ऐसी शक्ति माना है, जो चित्त के सम्मिलन से अभिधेय अर्थ को अनेक प्रकार से स्फुरित करती है।

आचार्य कुंतक ने कहा है, ‘वस्तुओं में अंतर्निहित सूक्ष्म और सुंदर तत्त्व को जो अपनी वाणी से खींच लाता है, उसे; और जो वाणी द्वारा ही इस विश्व की बाह्यतः अभिव्यक्ति करता है, उसे भी मैं प्रणाम करता हूँ।’ इस कथन से स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति के स्तर पर व्यंजना और अभिधा दोनों पुरातन काल से ही प्रणम्य रही हैं।

प्राचीन रचनाशीलता के आलोक में विद्वानों ने माना है कि विषय की सीमा और शास्त्रीयता के कड़े अंकुश के कारण रचनाकार की अंतश्चेतना पूरी तरह स्फुटित नहीं हो पाती और भीतर-ही-भीतर कुंठित हो जाती है। ‘हिंदी साहित्य का उद्भव और विकास’ में एक स्थान पर आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि ‘शास्त्रीय मत को श्रेष्ठ और अपने मत को गौण मान लेने के कारण उनमें (यानी पूर्व काल के अनेक कवियों में) अपनी स्वाधीन चिंता के प्रति अवज्ञा का भाव आ गया है।’

भारतेतर आलोचकों का मत

लगभग इसी मत का प्रतिपादन ‘द्विवेदी अभिनंदन ग्रंथ’ के अपने एक अंग्रेजी लेख में मि. ग्रीव्स ने भी किया है। वे लिखते हैं, ‘मौलिक सृजन की अपेक्षा संस्कृत अनुवाद के कार्यों में अनेक (पूर्वकालीन कवियों) ने अपनी प्रतिभा को प्रायः नष्ट कर दिया।’

ग्रियर्सन का कहना है कि कवि यदि प्रतिभा संपन्न है और उसमें मौलिक रचने की क्षमता है, तो उसे अधिकार है कि वह दूसरों की रचना का उपयोग अपनी इच्छा के अनुसार कर ले। वह प्रतिभा-शक्ति के अभाव में मौलिकता को अस्वीकार करते हैं। कांट और कॉलरिज ने प्रतिभा को ‘कल्पना शक्ति’ (इमेजिनेशन पॉवर) के रूप में स्वीकार किया है।

उन्नीसवीं सदी के अंतिम चरण की अंग्रेजी समीक्षा कृति के बजाय कवि और उसकी व्यैक्तिकता को महत्त्व देती थी। वाल्टर पीटर और ऑस्कर वाइल्ड ने ‘कलावाद’ को ही महत्त्व दिया। टी.एस. इलियट का मानना था कि ‘परंपरा के अभाव में कवि छाया मात्र है और उसका कोई अस्तित्व नहीं होता।’ उसने कहा कि ‘परंपरा को छोड़ देने पर वर्तमान भी हमसे छूट जाता है।’ परंपरा की परिभाषा करते हुए इलियट ने कहा, ‘इसके अंतर्गत उन सभी स्वाभाविक कार्यों, स्वभावों, रीति-रिवाजों का समावेश होता है, जो स्थान-विशेष पर रहनेवाले लोगों के सह-संबंध का प्रतिनिधित्व करते हैं। परंपरा के भीतर विशिष्ट धार्मिक आचारों से लेकर आगंतुक के स्वागत की पद्धति और उसको संबोधित करने का ढंग, सबकुछ समाहित है। परंपरा अतीत की वह जीवन-शक्ति है, जिससे वर्तमान का निर्माण होता है और भविष्य का अंकुर फूटता है। अपनी इसी विचारधारा के आधार पर उसने कहा कि कोई भी रचनाकार स्वयं में महत्त्वपूर्ण नहीं होता, उसका मूल्यांकन परंपरा की सापेक्षता में किया जाना चाहिए। वह अपने पूर्ववर्ती रचनाकार की तुलना में ही अपनी महत्ता सिद्ध कर सकता है। लेकिन ध्यातव्य है, परंपरा से इलियट का तात्पर्य प्राचीन रूढि़यों का मूक अनुमोदन या अनुमोदन कभी नहीं रहा, बल्कि परंपरा से उसका तात्पर्य वस्तुतः प्राचीन काल के इतिहास और धारणाओं का सम्यक् बोध रहा है। वह परंपरा से प्राप्त ज्ञान के अर्जन और उसके विकास का पक्षधर है। यही परंपरा का गत्यात्मक रूप है। इसके अभाव में हम नहीं जान सकते कि मौलिकता क्या है, कहाँ है? इस सिद्धांत के अनुसार, अतीत को वर्तमान में देखना रूढि़ नहीं, मौलिकता की तलाश है। रचना की मौलिकता और श्रेष्ठता का आकलन तत्संबंधी अतीत को जाने बिना संभव नहीं है। इसी बिंदु पर परंपरा का संबंध संस्कृति से जुड़ता है, जिसमें किसी जाति या समुदाय के जीवन, कला, दर्शन आदि के उत्कृष्ट अंश समाहित रहते हैं। परंपरा बोध से ही साहित्यकार को अपने कर्तव्य तथा दायित्व का बोध और लेखन का मूल्य मालूम रहता है।

इस तरह इलियट ने मौलिकता को परंपरा-सापेक्ष माना है। उनका कहना है कि परंपरा अपने आप में व्यापक अर्थ से युक्त है। उससे विहीन मौलिकता मूल्यहीन है। अपने सुप्रसिद्ध निबंध ‘परंपरा और वैयक्तिक प्रतिभा’ में उसने स्पष्ट संकेत किया है कि ‘परंपरा को उत्तराधिकार में प्राप्त नहीं किया जा सकता; इसे कड़े श्रम से कमाना पड़ता है, अर्जित करना पड़ता है’ तथा ‘परंपरा के मूल में एक ऐतिहासिक चेतना (हिस्टोरिकल सेंस) गुँथी रहती है।’

इलियट का सवाल है कि परंपरा की समग्र मान्यताओं को जाने बिना कोई भी व्यक्ति उनके रूढ़ और गलित अंशों को हटाने के बारे में सोच भी कैसे सकता है?

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