चेतना

चेतना

लॉटरी का भारी इनाम मिलने पर ब्रजलाल न तो मारे खुशी के पागल हो गया और न बहुत साधारण आय के बाद एकदम लखपति हो जाने के कारण उसने दोनों हाथ रुपया फूँकना ही आरंभ किया। एक साधारण-सी आटा-दाल-चावल की दुकान थी। उसने स्वयं दुकान पर बैठना बंद कर दिया और एक विश्वास-पात्र रख लिया।

ब्रजलाल ने जिस असाधारण संयम का प्रदर्शन किया उसके दो कारण थे।

नगर के एक बड़े व्यापारी ने सट्टे में कई लाख रुपया पैदा किया था। उसकी मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी ने अपने हिसाब से बड़ी बुद्धिमानी का परिचय दिया। उसने एक बड़ा प्लॉट खरीदकर कई फ्लैट बनवाने में अपने पिता का सारा पैसा लगा दिया। हैसियत से अधिक खर्च के कारण उस पर लंबा कर्ज हो गया और अंत में उसे अपने फ्लैट औने-पौने बेच देने पड़े। ब्रजलाल ने लाटरी से प्राप्त धन का एक अंश कुछ फ्लैट खरीदने में लगाया और इस तरह उसने उस असंयमी लड़के के अनुभव से लाभ उठाया।

दूसरा कारण ब्रजलाल का जीवन में दुःखी होना था। उसका पुत्र किशोरावस्था में ही एक दुर्घटना में मर गया था और इस आघात से उसकी पत्नी अर्धविक्षिप्त सी हो गई थी। इतना ही नहीं, उसकी शेष रह गई दो बेटियों में से एक विधवा हो गई थी और दूसरी कुरूपा तथा अविवाहित थी।

ब्रजलाल ने एक बुद्धिमानी और की। उसने अपना रुपया कई भिन्न-भिन्न मदों में लगाकर अपना भविष्य काफी सुरक्षित कर लिया था। उसके रहन-सहन में केवल इतना अंतर आया कि पहले जिस साधारण से मकान में (जिसके नीचे के भाग में ही दुकान थी) रहते थे, उसे छोड़कर एक अच्छे फ्लैट में रहने लगे। उन्होंने जो अन्य फ्लैट खरीदे थे, उनसे अच्छा किराया आने लगा।

ब्रजलाल की पत्नी यशोदा की तबीयत इधर कुछ गड़बड़ थी। उसे कई दिनों से नींद नहीं आती थी। फलस्वरूप बहुत चिड़चिड़ी हो गई थी। बात-बात पर परोसी थाली फेंक देती और कपड़े फाड़ डालती।

ब्रजलाल ने अच्छे से अच्छा इलाज किया, पर कोई फल न निकला। यशोदा का मुख्य मनोविकार इस बात की शिकायत थी कि रात को कोई इस प्रकार चिल्लाता है कि वह सो नहीं सकती।

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‘अम्माँ एकदम झूठ नहीं कहती बप्पा’, छोटी कन्या ने पिताजी से कहा, ‘कहीं पास ही, न जाने कैसी चिल्लाने की आवाज रात में आती है और उसे सुनते ही अम्माँ अबाही-तबाही बकने लगती हैं। कपड़े फाड़ने लगती हैं, नंगी हो जाती हैं और छत से कूदने की कोशिश करने लगती हैं। मेरे लिए उनको पकड़कर चारपाई पर लिटाना बड़ा कठिन हो जाता है।’

‘कैसी आवाजें?’ ब्रजलाल ने पूछा, जरा चिल्ला और झुँझलाकर। बहरे आदमी सबको बहरा समझते हैं, और सभी से जोर से बोलते हैं।

‘मेरी समझ में नहीं आता’, राधा बोली, ‘न जाने कैसी आवाजें आती हैं। बैलगाड़ी की ‘चर्रक चूँ’ आपने सुनी होगी, पर यह आवाज उससे भी बहुत कम मिलती है। बैलगाड़ी में बार-बार वही आवाज दुहराई जाती है, पर इस रातवाली आवाज में कोई क्रम नहीं होता। कभी इतनी हल्की कि सुनाई भी न पड़े और कभी इतनी जोरदार और तीखी कि कान के परदे फटने को हो जाते हैं। कुछ-कुछ फटे बाँस की झनझनाहट और लकड़ी पर चलाए जा रहे रंदे से कुछ मिलती-जुलती आवाज होती है।’

‘पर मुझे तो कभी सुनाई नहीं पड़ती।’ ब्रजलाल बोले।

‘आपको कैसे सुनाई पड़े?’ राधा बोली, ‘एक तो आप ऊँचा सुनते हैं, दूसरे अपना कानवाला आला उतारकर तकिए के नीचे रख लेते हैं।’

‘अच्छा, कल रात में जागता ही नहीं रहूँगा, आला भी लगाए रखूँगा।’

ब्रजलाल फ्लैट के बरामदे में खुली खिड़की के पास ही लेटे, पर उस रात उन्हें कोई आवाज सुनने का मौका ही नहीं आया। मिलिटरी के ट्रक की एक ‘कन्वाय’ के उत्तर की ओर की यात्रा का जो ताँता लगा, वह दस बजे से आरंभ होकर सवेरे चार बजे ही समाप्त हुआ। फलस्वरूप ट्रकों के हॉर्न और उनकी घरघराहट में कुछ भी सुनाई पड़ना असंभव था।

दो दिन ब्रजलाल फ्लैट की खिड़की के निकट सोए, पर उन्हें कोई असाधारण आवाज सुनाई नहीं दी। तीसरे दिन उन्होंने निश्चय किया कि आज और प्रतीक्षा करेंगे और उसके बाद अपने कमरे में लेटना प्रारंभ कर देंगे। तीसरे दिन अकस्मात् दो घटनाएँ ऐसी घटीं, जिनसे उनके विश्वास में सचमुच परिवर्तन आया। दोपहर की डाक से उन्हें एक बैरंग पत्र मिला, उसमें लिखा था—

‘बाबू ब्रजलाल जी,

यह पत्र मैं आपकी भलाई के लिए लिख रहा हूँ। आपने जो फ्लैट खरीदे हैं, वे एक ऐसे पापी की कमाई से बने हैं, जिसने सैकड़ों निर्दोष अभागों का सर्वनाश किया है। इसमें लगा रुपया दागी तथा पाप की कमाई का है, और कई प्रेतात्माएँ इनमें वास करती हैं। मैं अपको नेक सलाह देता हूँ कि आप तत्काल इन फ्लैटों को आधी-परधी कीमत पर बेचकर अपनी जान बचाइए।

इन प्रेतात्माओं में से दो के विषय में मेरा निजी अनुभव है। एक कोई औरत है, जो अकसर रोती-पीटती तथा चिल्लाती है, और दूसरी भी इन्हीं में से किसी फ्लैट में रहती है तथा बड़ी विचित्र आवाजें करती है। मेरा विश्वास है कि मैं इस फ्लैट को जानता हूँ। आप बीच के फ्लैट में रहते हैं और यह आवाज आपके नीचे के किसी फ्लैट से आती है। शायद मैं उस फ्लैट में रहनेवाले आदमी को जानता भी हूँ। कृपा कर इस पत्र को नष्ट कर दीजिएगा, नहीं तो वह व्यक्ति मेरा दुश्मन हो जाएगा।

आपका शुभचिंतक

एक जानकार’

जब राधा ने मुझे खाना खाने के लिए बुलाया तो मैंने उसे पत्र पढ़कर सुनाया। उस पत्र की अंतिम पंक्ति काट दी गई थी, पर जब मैंने रूमाल का कोना भिगोकर कटे भाग पर फेरा तो साफ पढ़ने में आ गया—

‘और मुझे फेल कर देगा।’

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उस रात को दूसरी घटना अधिक निर्णायक थी। लगभग साढ़े बारह बजे ब्रजलाल को दो-ढाई घंटे तक विचित्र प्रकार की आवाजें सुनाई पड़ती रहीं।...आवाजें न तो मनुष्य की जान पड़ती थीं और न पशु-पक्षी के कंठ की। मनुष्य की विभिन्न जातियों से निकली हुई ध्वनियाँ अन्य जातियों के कंठ से न निकल पाती हैं और न उन्हें लिपिबद्ध किया जा सकता है।

ब्रजलाल को उस रात जो ध्वनियाँ सुनाई पड़ीं, वे नितांत अनोखी थीं। कभी तो उसे जान पड़ता कि किसी प्राणी का गला दबाया जा रहा है, कभी ऐसा लगता कि कोई जाड़े से काँप रहा है और कभी लगता, मालूम देता कि जैसे किसी को बहुत धीरे-धीरे हलाल किया जा रहा हो। परंतु यह न भूलना चाहिए कि ऊपर जिन तीन ध्वनियों का वर्णन किया गया है, वह किसी भी प्राणी की ध्वनि से तनिक भी मिलती-जुलती न थीं।

इसे संयोग ही कहना चाहिए कि इन प्रेतात्माओं का रहस्य अनायास ही खुल गया। ब्रजलाल की पत्नी की विक्षिप्तता में तो कोई रहस्य था ही नहीं, जिस रात ब्रजलाल को ये विचित्र आवाजें सुनाई दीं, उस रात उनकी पत्नी ने बड़ा ऊधम किया था। उनके व्यवहार में कुछ भी अनोखा न था और उन विचित्र ध्वनियों के उद्गम की तलाश में ब्रजलाल को कुछ भी परिश्रम न करना पड़ा।

ब्रजलाल बीच के फ्लैट में रहता था। उसके ठीक नीचे के फ्लैट में स्थानीय डिग्री कॉलेज के उद्भिदशास्त्र के एक अध्यापक का निवास था। अध्यापक डॉ. साठे ऊँची-ऊँची डिग्रियाँ अर्जित विद्वान् थे। वे जरा झक्की और सनकी प्रसिद्ध थे। छात्रों को कोर्स की बातें कम पढ़ाते थे, पर इतने ऊँचे स्तर का व्याख्यान देते थे कि लड़के-लड़कियों के पल्ले कुछ न पड़ता। कई महीनों से कॉलेज के प्राचार्य ने छात्रों की शिकायत पर उन्हें सस्पेंड कर रखा था।

दूसरी और तीसरी मंजिलों की अपेक्षा नीचे की मंजिलों का किराया कुछ अधिक था, क्योंकि नीचे की मंजिलों के सामने छोटे-छोटे बगीचे थे, जिनमें किराएदारों ने फूल-पत्ती और शाक-सब्जी उगा रखी थी। इसके अतिरिक्त नीचेवालों को मोटर साइकिल इत्यादि रखने की सुविधा भी थी।

सवेरे दस बजे के लगभग जब ब्रजलाल नीचे के फ्लैट के सामने बगीचे में पहुँचे, तब दरवाजा अंदर से बंद था। पड़ोसियों ने बताया कि जब से डॉ. साठे सस्पेंड हुए हैं, तब से दिनभर सोया करते हैं और रात में कुछ पढ़ा-लिखा करते हैं या तारों और पेचकस से न जाने क्या रातभर बनाया करते हैं।

पहले तो ब्रजलाल को बगीचे में कभी कोई विशेषता नहीं दिखलाई पड़ी थी, लेकिन आज इधर-उधर टहलते हुए ध्यान से देखा तो उन्हें कुछ विचित्र बातें देखने को मिलीं। दो-तीन मूलियाँ आधी गहराई तक खुदी हुई तथा अधकटी दिखाई पड़ीं। हरसिंगार की पतली शाखाएँ किसी गुट्ठल अस्त्र ने कई जगह अधकटी दिखीं। बगिया में एक छोटा सा कामिनी का झाड़ था, उसकी जड़ में कई जगह काटने के ताजा निशान थे।

ब्रजलाल को पहला खयाल यही आया कि सस्पेंड होने के बाद पहले से ही सनकी डॉ. साठे का दिमाग कुछ बिगड़-सा गया है, जिसके कारण वह इस प्रकार के काम करने लगे हैं। ब्रजलाल ने दरवाजे पर लगी घंटी का बटन दबाया।

कई बार के प्रयत्न के बाद अंदर से सिटकिनी खुलने की आवाज आई तथा नींद भरी आँखें मलते, थोड़ा झुँझलाए हुए डॉ. साठे दरवाजा खोलकर बाहर निकले। बाहर ब्रजलाल को देखकर वे कुछ घबरा-से गए। ऐसा होने का एक कारण भी था कि डॉ. साठे कई महीनों से फ्लैट का किराया नहीं दे पाए थे, और उनके पास कई तकाजे पहुँच चुके थे।

‘क्षमा कीजिएगा, डॉक्टर साब!’ ब्रजलाल ने नकली शालीनता से कहा, ‘आपके फ्लैट से इधर कुछ विचित्र प्रकार की आवाजें आया करती हैं और मैंने अभी-अभी देखा कि आपका बाग कुछ अस्त-व्यस्त सा है। आप स्वयं भी परेशान दिखते हैं। यदि मुझसे कुछ सहायता हो सकती हो तो निःसंकोच बतलाइए। मेरी समस्या आप जानते ही हैं। असाधारण शोरगुल से मेरी पत्नी का मस्तिष्क असंतुलित हो उठता है।’

डॉ. साठे अध्ययनशील, चुप्पे, अंतर्मुखी और असंयत व्यक्ति थे। उन्हें सबसे बड़ा भय यह था कि मालिक मकान किराए के लिए आया है। चढ़ा किराया किराएदार को बड़ा कायर बना देता है। बाग की अस्तव्यस्तता और असाधारण आवाजों के आरोप सुनकर उनकी रही-सही हिम्मत भी टूट गई। उनके चेहरे का भाव नितांत दयनीय हो गया। वह अड़ोस-पड़ोस में शायद ही किसी से अंतरंग तो क्या, परिचित भी नहीं थे। उनके दरवाजे पर मालिक मकान को आया देखकर कई पड़ोसी कुतूहलवश एकत्र हो गए, फल यह हुआ कि डॉ. साठे और भी अधिक घबरा गए। कई मिनट तक उनके मुँह से आवाज ही न निकली, पर जब ब्रजलाल ने अपने प्रश्न फिर दोहराए तो उन्होंने हकलाते हुए कहा, ‘जी...जी...कोई विशेष बात नहीं है। कॉलेज के अधिकारियों से मेरा कुछ झगड़ा हो गया है, इसलिए कई महीनों से मैं आपका किराया नहीं चुका सका हूँ। कोशिश कर रहा हूँ, यदि रुपया मिल गया तो जल्दी ही चुका दूँगा।’

‘मैं किराए के लिए नहीं आया हूँ, डॉक्टर साहब।’ ब्रजलाल ने कहा, ‘मैं तो उन आवाजों तथा आपके बाग की उथल-पुथल के विषय में जानने आया हूँ और आपसे जानकर ही वापस जाऊँगा।’

डॉ. साठे ने मानो एकदम कंधे डाल दिए। वे हताश होकर दरवाजे की सीढि़यों पर बैठने के क्रम में धम से गिर पड़े। कई क्षण बाद उनके मुँह से आवाज निकली।

‘बाबू ब्रजलालजी,’ वे रुक-रुककर बोले, ‘मैं वैज्ञानिक हूँ और वनस्पति-विज्ञान पर अनुसंधान कर रहा हूँ। इसी अनुसंधान के कारण मैं कॉलेज के अध्यापन-कार्य में पूरा ध्यान नहीं दे पाता और प्रबंधकों में से कुछ सदस्य मुझे विक्षिप्त समझते हैं। उन्होंने मुझे सस्पेंड कर दिया है।’

ब्रजलाल तो इतने पढ़े-लिखे थे नहीं कि वैज्ञानिक अनुसंधान के बारे में कुछ बातचीत कर पाते, पर तीसरी मंजिल पर रहनेवाले मिस्टर मुबश्शिर हुसैनजी एक डिग्री कॉलेज में भौतिकी के अध्यापक हैं, वे बीच में टोककर बोल पड़े—

‘यानी आप कोई रिसर्च कर रहे हैं, साठे साहब?’

‘जी...’ बड़ी हीनता के साथ डॉ. साठे ने उत्तर दिया।

‘क्या विषय है आपकी रिसर्च का?’ मिस्टर हुसैन ने पूछा।

‘उद्भिद विज्ञान पर।’

‘यानी आपका मतलब है बॉटनी से?’

‘जी...’

‘बॉटनी के किस टॉपिक पर?’

‘अभी तो मेरे काम की शुरुआत है।’ डॉ. साठे ने जरा आश्वस्त होकर कहा।

‘फिर भी उस पर कुछ रोशनी तो डालिए, डॉक्टर साहब!’ मिस्टर हुसैन ने आग्रह से पूछा।

‘अभी मेरा काम इतना अधूरा है कि इस विषय में अधिक बताना संभव नहीं।’ डॉ. साठे ने जरा दृढ़ता से कहा।

‘मगर साठे साहब, मुझे लगता है कि आप अपनी बात साफ-साफ बताना नहीं चाहते। पता नहीं, आप सच कह रहे हैं या आप कोई ऐसा काम कर रहे हैं, जिसमें कोई खतरा है। मैं तो इतना जानता हूँ कि आपके फ्लैट से जो चीखें आती हैं, उनका असर मेरी पत्नी पर बुरा पड़ता है।’ ब्रजलाल ने कहा, ‘इसलिए मैं लगी-लिपटी बात का आदी नहीं हूँ, या तो मेरा पूरा किराया पूरा-पूरा अदा करके मुझे इत्मीनान दिलाइए या मेरा मकान छोड़कर कोई और इंतजाम कीजिए। मैं तो साफ-साफ बात पसंद करता हूँ।’

‘आखिर इसमें आपको पसोपेश क्या है, साठे साहब?’ बात बढ़ती देखकर मामला सुलझाने के इरादे से मिस्टर हुसैन बोले, ‘बाबू ब्रजलाल की बात बेजा नहीं है। अगर आपकी वजह से उनकी बीवी को तकलीफ होती है तो या तो आपको अपना काम बंद करना होगा और अगर आपकी रिसर्च अभी पोशीदा है तो मैं आपसे वायदा करता हूँ कि आपकी इजाजत के बगैर उसके बारे में हममें से कोई भी उसका कहीं जिक्र नहीं करेगा। आप इत्मीनान रखें।’

‘अपनी रिसर्च का आधा काम तो मैं पूरा कर चुका हूँ। जितना काम किया है, उतना डॉक्टरेट के लिए काफी है, पर मैं अभी अपना काम और आगे बढ़ाना चाहता हूँ। उसके लिए मुझे बाहर जाना पड़ेगा। इधर आपने पिछले तीन-चार दिनों से आवाजें न सुनी होंगी। बात यह है कि मैं मिर्जापुर गया था, कल ही लौटा हूँ और दो-चार दिनों बाद कई हफ्तों के लिए मिर्जापुर चला जाऊँगा।’

‘मेरी राय मानिए साठे साहब’, मिस्टर हुसैन ने सलाह दी, ‘आप अपनी रिसर्च की मोटी-मोटी बातें हम लोगों को बता दीजिए। यकीन रखें, हम उसका जिक्र किसी से न करेंगे।’

‘अच्छी बात है,’ डॉ. साठे ने कहा, ‘अगर आप और ब्रजलाल मेरे यहाँ रात दस बजे के बाद आ जाएँ तो मैं अपनी रिसर्च के बारे में कुछ थोड़ा-बहुत आपको बता दूँगा।

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भोजन आदि से निवृत्त होकर ब्रजलाल और मुबश्शिर हुसैन डॉ. साठे के कमरे में आ गए। हुसैन ने समझा-बुझाकर अन्य पड़ोसियों को लौटा दिया।

डॉ. साठे का कमरा क्या था, आधी जगह तो मोटी-मोटी किताबों ने घेर रखी थी और आधी में बिजली की बैटरियाँ तथा लाल, पीले, नीले, हरे और सफेद रंग के तारों का जाल बिछा हुआ था। दीवार पर लंबी सुइयोंवाली अनेक घडि़याँ जैसी लगी थीं और छोटी सी मेज पर टेलीफोन ऑपरेटरों जैसा दोनों कानों तक पहुँचनेवाला सिर पर बने पुल से जुड़ा एक आला रखा था। एक ओर लाउडस्पीकर का यंत्र एक बैटरी से जुड़ा हुआ रखा था। कमरे में एक ही कुरसी थी। ब्रजलाल और हुसैन के लिए मुश्किल से दो स्टूलों की जगह बनाई जा सकी।

‘अपनी बात समझाने के लिए मुझे बात की तह तक जाना पड़ेगा,’ साठे ने कहा, ‘बात यह है कि मनुष्य, पक्षी, बंदर, बिल्ली सबमें जीवनी शक्ति होती है और होती है वह चीज, जिसे चेतना कहते हैं। प्राणी नर और मादा के संयोग से जन्म लेता है, खाता-पीता है, आकार में बढ़ता है, प्रकृति तथा माता-पिता से सीखता है। आत्म-रक्षा करता है, संतान उत्पन्न करता है तथा अंत में मर जाता है।

‘वनस्पति जगत् में भी ये सब बातें होती हैं, भेद केवल इतना है कि ये बातें उतनी स्पष्ट नहीं होतीं, जितनी प्राणियों में। दूसरे अधिकतर प्राणी जंगम हैं और अधिकतर वनस्पति स्थावर। अपवादस्वरूप बहुत से प्राणी जैसे कुछ समुद्री फूल स्थावर हैं। प्राणी और वनस्पति की प्रारंभिक दशाओं में इन दोनों में भेद नहीं रह जाता।’

‘गाजर, मूली तथा पेड़ों में प्राणियों के और तो कई गुण होते हैं, पर उनमें चेतना होती है, इसका क्या प्रमाण है?’ ब्रजलाल ने पूछा, ‘गाजर काटते समय घोड़े को चाबुक मारने जैसी पीड़ा कहाँ होती है?’

‘होती है’, साठे बोले, ‘यह मेरी कोई नई सूझ नहीं है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु प्रमाणित कर गए हैं कि वनस्पति में चेतना होती है। दूर क्यों जाएँ, छुईमुई को यदि स्पर्श का ज्ञान न होता तो वह छूने पर अपनी पत्तियाँ कैसे समेट लेती है? अगर वनस्पति में प्रकाश का अनुभव न होता तो कमल रात को और कुमुदिनी दिन को कैसे बंद हो जाती? सूर्यमुखी का फूल पूर्व की ओर ही क्यों खिलता है? लौकी, तोरई इत्यादि बेलें एक प्रकार के ‘टेंड्रिल’ पैदा करके छप्पर और दीवारों पर कैसे चढ़ जाती हैं?

‘वनस्पति को जब चोट पहुँचाई जाती है, तब उनमें कंपन पैदा होता है, यह बात बसु महाशय पहले ही प्रदर्शित कर चुके हैं। मैं तो केवल एक कदम आगे बढ़ा हूँ। मैंने यह प्रमाणित किया है कि चोट पहुँचने पर वनस्पति काँपते और कराहते ही नहीं, चिल्लाकर अपना कष्ट प्रदर्शित करते हैं।’

‘बड़ी ऊँची और नामुमकिन-सी लगनेवाली उड़ान है आपकी,’ हुसैन बोले, ‘गाजर, मूली चोट लगने पर चीखते-चिल्लाते हैं, और वह भी इतनी जोर से कि हम-आप सुन सकें, यह जरा शेखचिल्ली की सी बात लगती है।’

‘बिल्कुल ठीक कहते हैं आप, मुबश्शिर साहब। मामूली हालत में हम मूली की चीख नहीं सुन सकते हैं, पर मैंने दो आलात ऐसे बनाए हैं, जिनसे यह मुमकिन हो जाता है।’

‘कैसे हैं वे दो आलात?’ हुसैन ने पूछा।

‘मुझे बड़ी खुशी है कि मुझे अपनी बात समझाने के लिए आप मिल गए, क्योंकि आप स्वयं भौतिकी, यानी फिजिक्स के प्रोफेसर हैं और मेरी रिसर्च ध्वनि अर्थात् साउंड से संबंधित है। साउंड क्या है? हवा में उत्पन्न कंपन। मनुष्य के कान में एक परदा होता है, जिससे लगी हुई तीन छोटी-छोटी हड्डियाँ होती हैं, जिनका वही काम है, जो लाउडस्पीकर यंत्र का। अर्थात् ये हड्डियाँ साउंड को कई गुना बढ़ाकर हजारों की भीड़ तक आवाज पहुँचा देती हैं।

‘मनुष्य का कान एक सेकेंड में बीस हजार अथवा इससे कुछ अधिक तक का कंपन ग्रहण कर लेता है। इससे बहुत कम या बहुत अधिक बार का कंपन ग्रहण करने में वह समर्थ नहीं है। मूली, गाजर पौधे इत्यादि के एक सेकेंड में बहुत सुस्त कंपन करते हैं, जिन्हें मनुष्य का कान ग्रहण नहीं कर सकता। मेरा एक आला तो उन कंपनों की संख्या उतनी बढ़ा देता है कि मनुष्य का कान उन्हें ग्रहण कर सके और दूसरा लाउडस्पीकर के सिद्धांत पर है, जो उन कंपनों को इतना जोरदार बना देता है कि मनुष्य उन्हें सुन सके।’

‘अगर सचमुच आपने इस काम में कामयाबी हासिल कर ली है तो सचमुच कमाल कर दिया है।’ हुसैन साहब बोले, ‘पर जब तक हमारे सामने करके न दिखा देंगे तब तक यकीन न आएगा।’

‘अभी दिखाता हूँ, हुसैन साहब, पर करीब बीस मिनट तैयारी के लिए इंतजार करना पड़ेगा। हाँ, एक बात और, ब्रजलालजी आपकी पत्नी को जब कोई विशेष उत्तेजना हो जाती है, तब आप क्या करते हैं?’ डॉ. साठे ने ब्रजलाल से मुखातिब होते हुए पूछा।

‘एक टिकिया डॉक्टर श्रीवास्तव ने दे रखी है। उसे देने से वह शांत हो जाती हैं और दस मिनट के अंदर सो जाती हैं।’ ब्रजलाल ने उत्तर दिया।

‘तो आप अभी जाकर पत्नी को एक टिकिया खिला दीजिए’, साठे ने कहा, ‘जिससे वे सो जाएँ और उत्तेजित न हों और हुसैन साहब, मेहरबानी करके आप यहाँ बैठकर देखते रहिए कि मैं कोई चालाकी तो नहीं कर रहा हूँ।’

ब्रजलाल की पत्नी को राधा ने अभी-अभी खाना खिलाया था। पिता के आदेश पर उन्हें नींद की टिकिया खिला दी। थोड़ी देर में पत्नी गहरी नींद में सो गईं और ब्रजलाल साठे के कमरे में लौट आए।

‘आइए ब्रजलालजी, सो गईं आपकी पत्नी?’ साठे ने पूछा, ‘देखिए हुसैन साहब ने मेरे ऊपर कड़ी निगाह रखी है और ये गवाह हैं कि बैटरियों के कनेक्शन ठीक करने के अलावा मैंने कोई गड़बड़ी या बेईमानी नहीं की है। यह रहा वह यंत्र, जिससे कंपन की गति तेज की जाती है और ये रहे लाउडस्पीकर के कनेक्शन। हुसैन साहब का विषय ही भौतिकी है और उन्होंने अवश्य ही मेरे कामों में किसी चालाकी की गंध भी न पाई होगी। अच्छा, अब मैं बाहर की बत्ती जलाता हूँ। आप लोग बाहर चलें।’

डॉ. साठे ने एक बड़ा सा सूजा मेज पर से उठाया। वह एक इंसुलेटेड तार से बँधा हुआ था।

‘वह छोटी सी खुरपी दीवार की कील पर टँगी हुई है।’ साठे ने कहा, ‘कृपया इसे ले लीजिए। आपको थोड़ा सा खोदने का काम करना पड़ेगा।’

तीनों व्यक्ति कमरे से निकलकर बाहर बगीचे में आए। वहाँ एक जगह हल्की गीली जमीन पर मूली की छोटी सी क्यारी थी।

‘हुसैन साहब’, साठे ने कहा, ‘जरा सावधानी से मूली के किसी एक पौधे के चारों ओर की मिट्टी खुरपी से हटाइए। देखिए, खुरपी मूली की जड़ में न लगने पाए।’

अभ्यस्त हाथों से हुसैन साहब ने एक मूली के चारों ओर की मिट्टी सावधानी से खोदी। जब आधी मूली दिखाई पड़ने लगी, तब खोदी हुई मिट्टी साठे ने कुछ दूर हटाकर चारों ओर की जगह साफ कर दी।

‘अच्छा, अब यह सूजा, ब्रजलालजी’, साठे ने कहा, ‘जोर से मूली में भोंक दीजिए। हाँ, ठीक है। बस अब अंदर चलिए।

‘यह रहा वह यंत्र, जिससे वायु में कंपन की गति नियंत्रित की जाती है,’ हुसैन साहब, ‘यह किस सिद्धांत के अनुसार काम करता है, इससे आप भलीभाँति परिचित हैं। यह रहा लाउडस्पीकर का नियंत्रक।’ दोनों स्विच ‘आन’ करते हुए साठे ने कहा।

अकस्मात् एक विचित्र प्रकार का चीत्कार कमरे में गूँज गया। ब्रजलाल और हुसैन दोनों के मुँह बरबस खुले के खुले रह गए।

‘वर्णन कर सकते हैं इस चीत्कार का, जो मूली ने अपना कष्ट व्यक्त करने के लिए किया है?’ साठे ने दोनों को संबोधित करते हुए पूछा। दोनों चुप रह गए।

‘इसे टेपरिकॉर्डर में भर क्यों नहीं लेते?’ हुसैन ने पूछा।

‘इतनी सीधी सी बात मुझे अभी तक सूझी ही नहीं, कैसी आश्चर्य की बात है।’ साठे बोले, ‘पर मेरे पास न तो टेपरिकॉर्डर है और न उसे खरीदने के पैसे।’

‘खैर, टेपरिकॉर्डर मैं आज ही खरीद लाऊँगा।’ हुसैन ने उत्तर दिया।

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पर उस दिन इतवार के कारण बाजार बंद था और टेपरिकॉर्डर न आ सका। दूसरे ही दिन साठे को सवेरे मिर्जापुर निकल जाना था।

उस रात तीनों व्यक्ति दस बजे रात को फिर एकत्र हुए और आलू, गाजर, हरसिंगार, मालती तथा नीम पर प्रयोग किए गए और प्रत्येक बार अजीब-अजीब ध्वनियाँ निकलीं। इतना अवश्य था कि प्रत्येक ध्वनि भिन्न प्रकार की थी। फिर ब्रजलाल और हुसैन को कोई संदेह अथवा आपत्ति करने का अवसर नहीं मिला।

‘कल फिर से नए प्रयोग करके ध्वनियाँ रिकॉर्ड कर ली जाएँगी।’ हुसैन साहब ने कहा।

‘असंभव!’ साठे बोले।

‘क्यों?’ हुसैन ने पूछा।

‘कल मुझे फिर मिर्जापुर जाना है। आज बैटरियाँ तथा यंत्र पैक हो जाएँगे। मैं कल सवेरे मिर्जापुर के लिए रवाना हो जाऊँगा।’ साठे ने कहा।

‘मिर्जापुर में क्या है?’ ब्रजलाल ने पूछा।

‘मिर्जापुर में ही तो मेरा दूसरा शोध कार्य संपन्न होना है। मेरा विश्वास है कि वनस्पति में ही नहीं, पत्थरों में भी किसी-न-किसी प्रकार की चेतना होती है।’ साठे ने बताया।

‘तो मिर्जापुर में ही क्या खास बात है?’ ब्रजलाल ने पूछा, ‘नैनीताल, मसूरी इत्यादि स्थानों में भी तो पत्थर हैं।’

‘अरे नैनीताल के पत्थर कोई पत्थर हैं? हिमालय तथा तिब्बत समुद्र तल में थे। वहाँ के बलुए पत्थरों की तहें हिमालय में हैं। असली पत्थर विंध्याचल तथा उसके दक्षिण में हैं। वे पत्थर सचमुच जानदार होंगे, लेकिन उनमें बहुत क्षीण मात्रा में चेतना मिलेगी, ऐसा मेरा विश्वास है’, साठे ने बताया, ‘मेरा कल ही मिर्जापुर जाने का सब प्रबंध हो चुका है। टेपरिकॉर्डिंग दोनों रिसर्चों की एक साथ हो जाएगी।’

‘कब तक लौटेंगे, साठे साहब?’ हुसैन ने पूछा।

‘कौन जाने?’ साठे बोले, ‘महीनों लग सकते हैं।’

‘और मेरा किराया?’ ब्रजलाल ने पूछा।

‘भई इस समय तो मेरे पास पैसा मिर्जापुर जाने के लिए भी कम है,’ साठे बोले, ‘मैं सोचता हूँ, फ्लैट छोड़ दूँ। आप कृपा करके एक कोठरी में मेरा सामान रख लें। यदि भगवान् ने चाहा, आगे चलकर पाई-पाई चुकता कर दूँगा।’

‘मेरे फ्लैट के एक कमरे में आप अपना सामान और किताबें बंद करके ताला डाल दीजिए’, हुसैन साहब बोले, ‘और किराया अगर जनाब साठे नहीं दे पाए तो मैं जिम्मेदार होऊँगा। ब्रजलाल साहब, बड़ी ऊँची हस्ती हैं डॉक्टर साठे।’

और दूसरे दिन सूर्योदय से पहले ही साठे साहब सामान ट्रक पर लादकर मिर्जापुर चले गए। दुर्भाग्य से हम उनका पता भी न पूछ सके।

कई महीने बीत गए। हम डॉक्टर साठे के समाचारों की उत्सुकता से प्रतीक्षा करते रहे। मिर्जापुर में हुसैन साहब के कई परिचित मित्र थे। उनसे पत्र-व्यवहार किया गया। पर कुछ पता न चला।

एक दिन हुसैन साहब के एक मित्र ने मिर्जापुर के स्थानीय समाचार-पत्र की एक कटिंग भेजी। उसमें लिखा था—‘लोमहर्षक दुर्घटना’।

मिर्जापुर नगर के बाहर पत्थर की एक पुरानी और लगभग परित्यक्त खदान में एक दुःखद दुर्घटना का समाचार मिला है। एक संवाददाता ने खबर दी है कि एक बड़ी चट्टान धसक जाने से एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि एक अज्ञात व्यक्ति ने एक पत्थर की खदान के ठेकेदार के साथ किसी अज्ञात उद्देश्य से खदान की एक गुफा में रहकर कुछ काम करने का समझौता किया था। गुफा की छत अकस्मात् धँस गई। टनों पत्थर के नीचे दबी उस व्यक्ति की लाश निकालने में कई दिन लग गए। लाश इतनी क्षत-विक्षत हो गई थी कि पहचानने का कोई साधन नहीं था। ऐसा जान पड़ता है कि मृत व्यक्ति कोई प्रयोग या अनुसंधान कार्य कर रहा था, क्योंकि उसके साथ अनेक तेजाबी बैटरियाँ, बिजली के तार और वैज्ञानिक पुस्तकें आदि थीं। तेजाब के कारण केवल एक पुस्तक पर अंग्रजी का शब्द ‘साठे’ लिखा हुआ पढ़ा जा सका। दुर्भाग्य से जिस ठेकेदार से मृत व्यक्ति का समझौता हुआ था, वह खदान का काम छोड़े हुए था और बहुत बीमार था। उसकी भी कई दिन हुए मृत्यु हो चुकी है। इसलिए इस घटना का रहस्य अब तक नहीं खुल पाया है।

समाचार कटिंग से इस बात में कोई संदेह नहीं रह गया कि मृत व्यक्ति डॉ. साठे ही थे। वह अपने साथ स्व. जगदीश चंद्र बसु के अनुसंधान को आगे बढ़ाकर भी रहस्य के रूप में छोड़ गए तथा विज्ञान की अपूरणीय क्षति कर गए।

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