अद्भुत छात्रा

अद्भुत छात्रा

नारियल के लंबे-लंबे पेड़, हरियाली और ठंडी-ठंडी पुरवा बह रही थी। आसमान साफ  था। नीला आसमान धवल चमक लिये केरल के निवासियों में एक नई ऊर्जा का संचार कर रहा था। इन्हीं निवासियें में से एक थी 60 साल की अमीनिम्मा। अम्मीनिमा अपनी माँ कार्तियानी अम्मा के कहने पर इस आयु में पढ़ रही थी। कार्तियानी बेहद गरीब थी। खेलने-कूदने की आयु में उसने दूसरों के घरों में काम किया। पिता ने कम आयु में ही विवाह कर दिया। कम उम्र में ही वह छह बच्चों की माँ बन गई।

कार्तियानी को पुस्तकों से बेहद प्रेम था। नन्हीं सी कार्तियानी जब बच्चों को स्कूल जाते देखती तो पढ़ने के लिए मचल उठती। लेकिन तब उसके घर की आर्थिक स्थिति बेहद सोचनीय थी। ऐसे में भला स्कूल जाना कहाँ मुमकिन था! विवाह के बाद बच्चे होने पर कार्तियानी दूसरी ही जिम्मेदारियें तले बुरी तरह दब गई थी। इसी बीच पति बीमारी में कम आयु में ही साथ छोड़कर चल बसे। अशिक्षित कार्तियानी पर छह बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी आ गई। परिस्थितियों ने कार्तियानी को अपनी किस्मत पर रोने तक का अवसर नहीं दिया। अगर वह रोती ही रह जाती तो भला अपने बच्चों का पेट कैसे भरती? कार्तियानी ने संघर्ष करके अपने छह बच्चों की शादियाँ कीं। अब नन्हीं कार्तियानी नाती-पोतों के परिवार में सबसे बड़ी थी। बच्चों का हँसता-खेलता परिवार देखकर वह बहुत खुश होती। लेकिन एक टीस उसके मन में रह-रहकर उभरती कि काश वह पढ़ी-लिखी होती तो जिंदगी ज्यादा खुशहाल होती।

कार्तियानी की बेटी की पढ़ाई बीच में ही छूट गई थी। एक दिन उनके इलाके में केरल सरकार की तरफ से साक्षरता अभियान के अंतर्गत बुजुर्गों को पढ़ाने के लिए क्लास लगाई जाने लगी। यह देखकर चहककर कार्तियानी ने अमीनिम्मा को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। माँ का संबल पाकर अमीनिम्मा ने पढ़ने के लिए जाना आरंभ कर दिया। धीरे-धीरे उसे पढ़ने में आनंद आने लगा। अमीनिम्मा ने मेहनत से परीक्षाएँ पास कीं और दसवीं कक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर ली। बेटी को इस उम्र में दसवीं कक्षा पास करने पर कार्तियानी खुशी से झूम उठी। जिस दिन अमीनिम्मा को दसवीं कक्षा का प्रमाण-पत्र प्राप्त हुआ, उस दिन कार्तियानी की आँखों में खुशी के आँसू थे। वह बेटी को आशीर्वाद देते हुए बोली, “बेटी, अच्छे कार्य और पढ़ाई करने की कोई उम्र नहीं होती। अब तू बारहवीं कक्षा की तैयारी कर।” अमीनिम्मा माँ की बात सुनकर आगे पढ़ने की तैयारी करने लगी। एक दिन वह घर में पोते-पोतियों की पुस्तकों को उलट-पलटकर पढ़ रही थी और सोच रही थी कि काश मैं भी पढ़ पाती। संयोगवश तभी अमीनिम्मा वहाँ आ गई। अमीनिम्मा को देखकर कार्तियानी ने जल्दी से पुस्तकों को नीचे रख दिया। अमीनिम्मा यह देखकर बोली, “अम्मा, एक बात बता। तू मुझे तो कहती है कि पढ़ाई कर। पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती। फिर तू क्यों नहीं पढ़ती?” बेटी की बात सुनकर कार्तियानी का मुँह खुला-का-खुला रह गया। वह बोली, “क्या बिटिया 90 साल की उम्र में मैं पढ़ाई करूँगी?”

“क्यों अम्मा? जब मैं साठ साल की उम्र में पढ़ सकती हूँ और अच्छे नंबरों से पास भी हो सकती हूँ तो फिर तू क्यों नहीं पढ़ सकती।” बेटी की यह बात कार्तियानी के मन को लग गई। उसने उसी समय निश्चय कर लिया कि वह भी पढ़ेगी। बस फिर क्या था, जीवन के 90 बसंत गुजारनेवाली कार्तियानी ने जीवन में पहली बार कागज-कलम व स्लेट उठाई और काले अक्षरों को पहचानने का प्रयत्न करना आरंभ कर दिया। कार्तियानी की आँखें और शरीर अवश्य बूढ़ा हो गया था, लेकिन उसके मन की नई उमंगों ने अभी पंख पसारने आरंभ किए थे और उन्हें नन्हे-नन्हे पंख लगे थे।

कार्तियानी को बचपन से ही पढ़ना बेहद पसंद था। अब उसकी इच्छा पूरी हो रही थी। पढ़ाई की धुन में उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। कई बार जब लोग नाती-पोतों के बीच में कार्तियानी को पढ़ते देखते तो उसकी बालसुलभ जिज्ञासाओं को देखकर वे यह भूल जाते थे कि कार्तियानी उन बच्चों की दादी और परदादी हैं। साक्षरता मिशन के अंदर कार्तियानी खूब मन लगाकर पढ़ रही थी। कार्तियानी की आयु को देखकर शिक्षक उसे पढ़ाने के लिए घर आते थे। कार्तियानी का पढ़ने के प्रति उत्साह देखते ही बनता था। नब्बे साल में उन्होंने गणित का जोड़ और घटा सीखा। वे अभी तक जीवन के जोड़ और घटा सुलझाती आई थीं। अब जीवन के इस पड़ाव पर वे संख्याओं के जोड़ और घटाओं को सुलझा रही थीं। हालाँकि कई लोग कार्तियानी को इस उम्र में पढ़ते-देखते तो वे उन पर व्यंग्य करते और कहते, “अम्मा, भला इस उम्र में पढ़कर क्या मिलेगा?” इस पर अम्मा मुसकराकर कहतीं, “इस उम्र में पढ़कर मुझे आत्मिक शांति मिलेगी। जो काम मैं बरसों से करना चाहती थी, वह मैं अपने जीवित होते हुए पूरा कर पाऊँगी, भला इससे बड़ा सुख और क्या होगा?”

आखिर साक्षरता परीक्षाएँ प्रारंभ हो गईं। इस अभियान के अंतर्गत पूरे राज्य से करीब 43 हजार बुजुर्गों ने भाग लिया। कार्तियानी की परीक्षाएँ बहुत अच्छी हो रही थीं। वह प्रसन्न मन से परीक्षा-पत्र हल करतीं और उत्साह से सबको बतातीं कि उनकी परीक्षाएँ बहुत अच्छी हुई हैं। परीक्षाएँ समाप्त हो गईं, लेकिन कार्तियानी का उत्साह और पढ़ने का जुनून बढ़ता गया। कुछ समय बाद परीक्षाफल घोषित हुआ। परीक्षाफल देखकर केवल केरल राज्य नहीं, अपितु पूरे देश ने अपने दाँतों तले अंगुली दबा ली, जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि कार्तियानी ने 100 में से 98 अंक प्राप्त कर पूरे राज्य में टॉप किया था। यह खबर कुछ ही पलों में सुर्खियाँ बनकर हर ओर फैल गई। केरल सरकार ने उन्हें सम्मानित किया। कार्तियानी की उम्र इस समय 96 वर्ष है। टॉप आने पर उन्होंने कंप्यूटर सीखने की इच्छा प्रकट की थी। केरल सरकार ने उनकी इस इच्छा को पूर्ण किया और उन्हें ईनामस्वरूप लैपटॉप भेंट किया। हैरानी की बात तो यह है कि कार्तियानी कहती हैं कि मुझे यह समझ नहीं आया कि मेरे दो नंबर कहाँ और कैसे कटे!

कार्तियानी के जज्बे ने इस बात को मिथ्या सिद्ध कर दिया कि जीवन में पढ़ने और कुछ कर दिखाने के लिए उम्र बाधा बन जाती है। मन में लगन और इच्छा जन्म ले ले तो पहाड़ सी बाधा भी राई बन जाती है और बुलबुला बनकर गायब हो जाती है। इसके बाद जीवन में उन्नति और कामयाबी कदम चूमती है, जो कइयों की आशा बनकर हौसलों में बदल जाती है।

3, डी.डी.ए. फ्लैट्स, खिड़की गाँव,

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— रेनू सैनी

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