दरवाजा बंद, दिमाग खुला

दरवाजा बंद, दिमाग खुला

दूरदर्शन पर प्रायः ‘दरवाजा बंद तो...’ कहते हुए दिखाई देते हैं। इसके पहले प्रसिद्ध नायिका ‘जहाँ सोच, वहाँ...’ वाला नारा बुलंद करती दिखती थी। ये दोनों नारे एक ही बात कहते हैं, जो ‘स्वच्छ भारत अभियान’ से संबंधित हैं। दोनों का विषय एक ही है—‘शौचालय।’ सोच और शौच का रिश्ता बहुत पुराना है, चाहे दरवाजा बंद हो या खुला। हाँ, दरवाजा बंद होने पर सोच की सुविधा बढ़ जाती है। दरवाजा बंद होने पर दिमाग के कपाट खुल जाते हैं। तब ‘जहाँ सोच, वहाँ शौचालय’ का उलटा क्रम अर्थात् ‘जहाँ शौचालय, वहाँ सोच’ अधिक सार्थक लगने लगता है। मैं अत्यधिक पानी बहानेवाले आधुनिक शौचालयों की बात कह रहा हूँ। पुराने जमानेवालों में ‘दरवाजा बंद तो बीमारी बंद’ की जगह ‘दरवाजा बंद तो नाक बंद’ करना ज्यादा व्यावहारिक था। परंतु इस आधुनिक जमाने में सोचने के लिए शौचालय से उम्दा कोई जगह नहीं। उस एकांत में आप इतमीनान से निर्विघ्न जितनी देर चाहें दुनिया-जहान की बातें सोच सकते हैं। अगर किसी को कब्ज हो तो सोने पे सुहागा। इस बीच यदि फोन की घंटी बजती है तो बजती रहे। आपके घर का कोई सदस्य कह देगा या घंटी बंद होन पर उस तरफवाला खुद ही समझ जाएगा कि आप ‘बाथरूम’ में हैं। आजकल शौचालय, बाथरूम एक हो गए हैं।

बड़े अफसर और नेता प्रायः बाथरूम में ही होते हैं; क्यों? इसलिए कि उन्हें बहुत कुछ सोचना पड़ता है। दिनभर के कार्यक्रम का प्लान यहीं बैठकर बन सकता है। इसलिए इनके शौचालय (बाथरूम) आरामदायक पाश्चात्य शैली के होते हैं। बाथरूम जितना शानदार होगा, सोच भी उनती ही शानदार होगी। अगर एअरकंडीशंड हो तो सोने में हीरा। अफसर सोचता है कि अपने मातहतों से कैसे काम लेना है तथा ऊपरवाले से कैसे निबटना है। बड़ा बाबू दफ्तर की फाइलों के बारे में, व्यापारी मुनाफा के बारे में तो नेता राजनीतिक दाँव-पेंच, गठजोड़ या गठतोड़ के बारे में सोचता है। घूसखोर सोचता है कि उँगली टेढ़ी करके कैसे घी निकाला जाए। लेखक कहानी, उपन्यास, नाटक, हास्य-व्यंग्य के बारे में सोचता है तो फिल्मकार फिल्म की पटकथा के बारे में यहाँ फुरसत से सोच सकता है। शौचालय नायाब सोच की नायाब जगह है। यह कतई जरूरी नहीं कि नायाब सोच अच्छी ही हो। चोर, बदमाश, गिरहकट आदि अपने-अपने धंधे के नए-नए तरीके यहीं बैठकर सोचते होंगे! किसी भी प्रकार की प्लानिंग करने के लिए शौचालय माकूल जगह है। यहाँ इनसान फ्रेश होता है। फ्रेश होते ही फ्रेश विचारों का सिलसिला शुरू होता है।

इतिहास में यह तो कहीं लिखा नहीं मिलता कि आर्कमिडीज का बाथरूम शौचालय युक्त था या नहीं! लगता है, अवश्य रहा होगा, तभी तो नहाते समय उसे जो इलहाम हुआ, वह विज्ञान में ‘आर्कमिडीज सिद्धांत’ के नाम से जाना गया। कोई आश्चर्य नहीं कि विज्ञान और गणित के अनेक नियमों का अंकुरण बाथरूम+शौचालय में हुआ हो। बाद में उन्हें तर्क की कसौटी पर कसा गया हो। इस संभावना का खुलासा कभी नहीं हो सकता।

पहले के समय में शौचालय भले ही न रहे हों, परंतु सोच और शौच का संबंध तो बाबा आदम के जमाने से है। हिंदी वर्णमाला में शौच के ‘श’ का स्थान सोच के ‘स’ से पहले है। फिर ‘श’ पर दो मात्राएँ लगी हैं, जबकि ‘स’ पर केवल एक। अतः हिंदी की दृष्टि से ‘शौच’ श्रेष्ठ है ‘सोच’ से। पहले शौच, फिर सोच। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि तो खुले में निवृत्त होते थे, फिर भी दुनिया को कितना बहुमूल्य ज्ञान दे गए। वन के खुलेपन में चिंतन-मनन के लिए जो एकाग्रता शौच के समय आती थी, उसका क्या कहना। वहाँ एकांत भी रहता था और प्रकृति का मनोरम नजारा भी। सोचने का माकूल माहौल होता था। अब न तो पास में वन रहे और न वैसा एकांत। जंगलों पर शहरों और गाँवों ने अतिक्रमण कर लिया है।

वास्तव में शौचालय शहरीकरण की देन है, जिसकी हवा अब ग्रामों तक पहुँच गई है। गरीबों के लिए सुलभ शौचालय योजना प्रशंसनीय है। किंतु मल प्रदूषण रोकने की दिशा में ‘दरवाजा बंद तो बीमारी बंद’ अर्ध सत्य है। कारण हैं—गली के आवारा कुत्ते। यह बदजात ‘स्वच्छ भारत अभियान’ को पलीता लगा रहा है। देखा गया है कि सुबह-सवेरे जमादार गली में झाड़ू लगाकर गया। उसके बाद कूकुर कमबख्त जमीन सूँघते हुए आते हैं। भगवान् जाने क्या सूँघते हैं! हो सकता है गैर-बदबूदार साफ स्थान ढूँढ़ते हों। जब उन्हें मनमाफिक जगह मिल जाती है तो खुले में ही उसकी ऐसी-तैसी कर देते हैं। इसके अलावा यह नामानुकूल जहाँ भी कोई उभरी वस्तु देखते हैं—चाहे वह पत्थर का बोल्डर हो, पेड़ का तना हो या कार का पहिया, वहाँ फटाक से पिछली टाँग उठाकर मानो सलाम ठोकते हैं, साथ ही उसका अभिषेक कर देते हैं। इन पर कोई कानून लागू नहीं होता। आश्चर्य तो यह है कि बिना मिठाई खाए हुए भी यह डायबिटिक जैसा व्यवहार करते हैं। इनके रहते स्वच्छता अभियान या स्वच्छ भारत अभियान कैसे सफल हो सकता है? इन आवारा नामुरादों को मारा भी तो नहीं जा सकता। इन्हें भी जिंदा रहने का अधिकार है, ऐसा जीव-जंतुओं के अधिकारों के रक्षक कहते हैं। जब जीवित रहने का अधिकार है तो वह सब करने का भी अधिकार है, जो किसी जीवधारी के लिए आवश्यक है। अफसोस की बात है कि इस बारे में प्रबुद्ध विचारकों और योजनाकारों ने अब तक कुछ नहीं सोचा।

आवारा कुत्ते ही क्यों, विदेशी नस्ल के महँगे ‘डॉगी’ महाशय भी तो मालिक के साथ सुबह-शाम तफरीह को निकलते हैं। यह पता नहीं चलता कि मालिक उन्हें ले जा रहा है या वे मालिक को। जो भी हो, साहब के लाड़ले डॉगीजी अच्छी सी जगह सूँघकर हलके-फुलके हो लेते हैं, चाहे वह जगह थाने के आगे ही क्यों न हो। साहब को संतोष होता है कि चलो, एक काम से तो फुरसत मिली। लेकिन सफाई-पसंद साहब अपने प्यारे डॉग के लिए न तो टॉयलेट-टिशू का इस्तेमाल करते और न ही उसे धुलाते हुए देखे गए। विलायती प्राणी वैसे ही घर आकर शान से कीमती सोफे पर या मेम साहिबा के बिस्तर पर पसरकर अपने आप पुँछ जाते हैं। यदि यही हरकत उनका छोटा बच्चा करे तो उसे दो थप्पड़ अवश्य पड़ जाएँगे। विदेशी श्वान की औकात अपने देशी बच्चे से ज्यादा है। जाड़े के मौसम में इन पालतू प्राणियों को ठंड से बचाने के लिए मध्य भाग में कपड़ा तो पहनाया जाता है, किंतु चड्डी या डायपर नहीं। पता नहीं क्यों? यदि यह नहीं कर सकते तो छोटे बच्चों की तरह इन्हें ‘पॉटी’ पर बैठाना क्यों नहीं सिखाते। आश्चर्य की बात है कि एक कुतिया को अंतरिक्ष में भेजने के लिए प्रशिक्षित तो किया जा सका है, किंतु उसके सजातियों को इस छोटे से काम के लिए प्रशिक्षित नहीं कर पाए। लानत है! इनके रहते दरवाजा बंद होने पर भी बीमारी बंद होने का कोई भरोसा नहीं।

अंत में एक राज की बात कहूँ! यह लेख लिखने का विचार मुझे वहीं कौंधा था। तभी तो कहता हूँ, ‘जहाँ शौचालय, वहाँ सोच और दरवाजा बंद तो दिमाग खुला।’

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— एम.एल. खरे

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